अमेरिका से दोस्ती हो या ईरान संघर्ष, इजरायल चुनाव से दुनिया क्या उम्मीद कर रही है?
इजरायल में 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं। इस चुनाव पर अमेरिका से लेकर ईरान और खाड़ी देशों की नजरें हैं।
अमेरिका से दोस्ती हो या ईरान संघर्ष, इजरायल चुनाव से दुनिया क्या उम्मीद कर रही है?
इजरायल में 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव होने हैं।AP

38 साल में पहली बार है जब इजरायली संसद नेसेट का कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव कराए जा रहे हैं। इस चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की रेस में हैं।

इजरायल के चुनाव पर अमेरिका से लेकर ईरान और खाड़ी देशों की भी नजरें हैं। इस चुनाव नतीजे का मिडिल ईस्ट पर कितना असर होगा? विश्लेषकों का मानना ​​है कि अगले सप्ताह होने वाले इजरायल के चुनावों से वहां का नेतृत्व तो बदल सकता है, लेकिन रणनीति नहीं।

तेहरान और रियाद कैसे देख रहे?

ईरान, इजरायल को अपना धुर विरोधी मानता है और दोनों देशों के बीच सीधा रणनीतिक टकराव रहा है। इजरायल में सख्त सुरक्षा रुख वाला नेतृत्व आने से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और लेबनान (हिजबुल्लाह) व यमन के हूती जैसे समूहों पर सैन्य कार्रवाई की आशंका बढ़ जाएगी। चुनाव के नतीजों से यह तय होगा कि इजरायल ईरान के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई चुनेगा या कूटनीतिक दबाव। फिलहाल, पश्चिम में ईरान पर हमले की तैयारियों के दावे वाली रिपोर्ट खूब चर्चा में है। सऊदी पर हूती हमले लगातार हो रहे हैं। 

ईरानी नेता मोजतबा खामेनेई© फोटो : MKhamenei/Facebook

ऐसे में तेहरान से रियाद तक, इजरायल चुनाव को किसी बड़े बदलाव के मोड़ के रूप में नहीं, बल्कि इस बात की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है कि क्या मिडिल ईस्ट एक लंबे टकराव की ओर बढ़ रहा है। एक ऐसी स्थिति जहां युद्ध कभी धीमे तो कभी तेज होते रहते हैं, लेकिन मूल विवाद अनसुलझे ही रह जाते हैं।

विश्लेषकों के अनुसार ईरान उसका (इजरायल का) मुख्य विरोधी बना रहेगा, सैन्य बल का इस्तेमाल उसकी प्राथमिकता बनी रहेगी। फिलिस्तीनी राष्ट्र बनने की संभावना अभी भी बहुत दूर की बात है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि 7 अक्टूबर 2023 को फिलिस्तीनी चरमपंथी समूह हमास की तरफ से दक्षिणी इजरायल की बस्तियों पर किए गए हमलों, गाजा-लेबनान और ईरान पर किए गए हमलों ने इजरायली पॉलिसी के पीछे की रणनीतिक धारणाओं को और मजबूत कर दिया है।

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अगर नेतन्याहू चुने जाते हैं, तो वह वही करेंगे जो वह करना चाहते हैं। बस्तियों का विस्तार जारी रहेगा। ईरान, हमास और हिजबुल्लाह के खिलाफ युद्ध भी चलते रहेंगे। अभी आप जो देख रहे हैं, चुनाव के बाद भी वही देखने को मिलेगा, शायद और भी अधिक आक्रामक रूप में। जब तक ईरान ऐसी स्थिति में है, तब तक फिलिस्तीन के बारे में बात करना समय की बर्बादी है।
अवीव बुशिंस्की
अवीव बुशिंस्की
नेतन्याहू के पूर्व सलाहकार

क्या इजरायल की पॉलिसी बदलेगी?

विश्लेषकों का कहना है कि इजरायल अपनी सुरक्षा नीति को और सख्त बना सकता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की जीत, जिसमें उन्हें धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन सहयोगियों का समर्थन हासिल है, उन्हें ईरान के साथ युद्ध तेज करने, वेस्ट बैंक (जिस पर इजरायल का कब्जा है) पर अपनी पकड़ मजबूत करने और कूटनीति को और अधिक हाशिए पर धकेलने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।

इजरायल की सुरक्षा नीति अब तीन स्तंभों पर टिकी है-

1. ईरान को कमजोर करना

2. अपनी सीमाओं के पार बफर जोन बनाए रखना, और

3. इजरायल के दुश्मनों को रोकने के लिए बल प्रयोग करना।

विश्लेषकों के अनुसार, असली अंतर दिशा का नहीं, बल्कि तीव्रता का है। इसका मतलब है कि इजरायल अपने युद्ध कितने आक्रामक तरीके से लड़ता है। वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का विस्तार किस हद तक करता है और क्या कोई नेता कूटनीति का रास्ता चुनता है।

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इजरायल को 'रोकथाम और रक्षा की तुलना में रोकथाम और आक्रमण' को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिसमें उभरते खतरों को विफल करने के लिए पूर्व-खाली हमले शामिल हैं। साथ ही इजरायल को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना और हथियारों में अपनी स्वतंत्रता को अधिकतम करना शामिल है।
बेंजामिन नेतन्याहू
बेंजामिन नेतन्याहू
इजरायली पीएम

फिलिस्तीन नीति में क्या कोई बदलाव की उम्मीद है?

इस चुनाव में नेतन्याहू की दक्षिणपंथी 'लिकुड' पार्टी और उनके कट्टर राष्ट्रवादी सहयोगी, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट की 'यशार' पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष के आमने-सामने हैं। फिलिस्तीनी मामलों के जानकार घसन अल-खतीब को फिलिस्तीनियों के प्रति नीति में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं दिखती।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली राजनीतिक दल और भी सख्त रुख अपनाने की होड़ में हैं, क्योंकि वहां की जनता की राय भी दक्षिणपंथ की ओर झुक रही है। लेकिन अल-खतीब का मानना ​​है कि ऐसे बदलाव केवल काम करने के तरीके में होंगे, न कि नीति के मूल सार में।

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फिलिस्तीन नीति का मूल सार वही है: फिलिस्तीनी राज्य को अस्वीकार करना और बस्तियों का विस्तार जारी रखना। इस बात पर वे सभी सहमत हैं। अगर नेतन्याहू के विरोधियों के नेतृत्व में कोई सरकार बनती भी है, तो वे शायद बस्तियों में होने वाली हिंसा को कुछ हद तक रोककर या बस्तियों के विस्तार को कम शोर-शराबे के साथ आगे बढ़ाकर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजरायल की छवि सुधारने की कोशिश कर सकते हैं।
घसन अल-खतीब
घसन अल-खतीब
फिलिस्तीनी मामलों के जानकार

अमेरिका इस चुनाव में क्या देख रहा है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से नेतन्याहू के फिर से चुने जाने के दावे का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया जा चुका है।

ट्रंप ने नेतन्याहू को 'महान योद्धा प्रधानमंत्री' बताया है। अमेरिका इजरायल का सबसे बड़ा रणनीतिक और सैन्य साझेदार है।

इजरायल में दक्षिणपंथी या मध्यमार्गी/उदारवादी सरकार बनने से वॉशिंगटन की पश्चिम एशिया नीति, द्विपक्षीय सैन्य सहायता और दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) पर रुख तय होता है।

अमेरिकी प्रशासन अक्सर ऐसे नेतृत्व के साथ काम करना पसंद करता है जो क्षेत्रीय तनाव को कम करने और मानवीय संकटों के समाधान में तालमेल बिठा सके।

AP

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता का कहना है कि वॉशिंगटन तेहरान पर दबाव डालना जारी रखेगा। प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिका वेस्ट बैंक को इजरायल में शामिल किए जाने (एनेक्सेशन) का समर्थन नहीं करता है। उन्होंने कहा कि एक स्थिर वेस्ट बैंक इजरायल को सुरक्षित रखता है और यह इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के मौजूदा प्रशासन के लक्ष्य के अनुरूप है।

कार्नेगी मिडिल ईस्ट सेंटर के माइकल यंग ने कहा कि इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था और उसके अधिकतर राजनीतिक वर्ग की रणनीतिक सोच एक जैसी है। यह सोच ईरान का सामना करने, 'फॉरवर्ड डिफेंस' बनाए रखने और सैन्य प्रतिरोध (डिटेरेंस) को कायम रखने पर केंद्रित है, जिससे बड़ी नीतिगत बदलावों की गुंजाइश कम हो जाती है।

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के जूस्ट हिल्टरमैन, जिन्होंने वेस्ट बैंक में रिसर्च किया है, ने कहा कि बसने वालों (सेटलर) की बढ़ती हिंसा, फिलिस्तीनियों की बढ़ती हताशा और किसी 'राजनीतिक क्षितिज' (भविष्य की राजनीतिक संभावना) के न होने से हालात इतने विस्फोटक हो गए हैं कि एक छोटी सी घटना भी बड़े पैमाने पर विद्रोह भड़का सकती है।

ईरान के साथ टकराव का क्या होगा?

कुछ क्षेत्रीय नीति-निर्माता यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या ईरान के साथ इजरायल का टकराव मध्य-पूर्व की सुरक्षा का मुख्य आधार बन गया है, चाहे चुनाव में कोई भी जीते। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से नेतन्याहू को 'एक महान योद्धा प्रधानमंत्री' बताए जाने से यह उम्मीद और मजबूत हो गई है कि अगर नेतन्याहू सत्ता में बने रहते हैं, तो वे तेहरान के खिलाफ चल रहे अभियान को निर्णायक अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे।

नेतन्याहू ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनका लक्ष्य केवल ईरान को रोकना नहीं, बल्कि वहां के धार्मिक शासकों को सत्ता से हटाना भी है। बुधवार को सैन्य अधिकारियों के दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा कि इस खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने का बस एक ही तरीका है: ईरान की सत्ता को उखाड़ फेंकना।

ईरान के तेहरान में 'इस्लामिक रिवोल्यूशन स्क्वायर' पर लगा बिलबोर्ड। तस्वीर में ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनेई (बीच में); लेबनान के हिजबुल्लाह समूह के दिवंगत नेता हसन नसरल्लाह (दाएं से दूसरे) और अन्य।AP

उन्होंने आगे कहा कि यह सेना, मोसाद और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के लिए उनका स्पष्ट निर्देश है। इस हफ्ते एक और भाषण में उन्होंने कहा, 'इस काम को पूरा करने का मतलब है ईरान के आतंकवादी शासन को उखाड़ फेंकना, जो एक जहरीले ऑक्टोपस का सिर है।'

हालांकि, सैन्य और राजनीतिक विश्लेषकों के मन में यह सवाल है कि क्या अमेरिका-इजरायल के जमीनी हमले के बिना, ईरान को उन चीजों को छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जिन्हें वह अपने मुख्य सुरक्षा हित मानता है और जिसे वह अपने अस्तित्व की लड़ाई के रूप में देखता है?

महीनों तक चले युद्ध को झेलने के बाद, ईरान शायद यह मानकर चल रहा है कि वह अपने विरोधियों से ज्यादा देर तक टिक सकता है। साथ ही अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए दबाव भी बनाए रख सकता है। माइकल यंग के अनुसार यह एक ऐसी दलदल जैसी स्थिति है, जिसमें से निकलना मुश्किल है। ईरानी लोग ट्रंप से ज्यादा लंबे समय तक टिक सकते हैं।

अरब से लेकर लेबनान की स्थिति

2020 में हुए अब्राहम समझौते के बाद संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के साथ इजरायल के राजनयिक रिश्ते बने हैं। वहीं, सऊदी अरब के साथ नॉर्मलाइजेशन की बातचीत ग्लोबल डिप्लोमेसी का अहम हिस्सा रही है। इजरायल में एक अधिक संतुलित व उदारवादी गठबंधन बनने से खाड़ी देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों का विस्तार आसान होता है।

इसके विपरीत, फिलिस्तीनी वेस्ट बैंक या गाजा में आक्रामक विस्तारवादी रुख अपनाने वाली सरकार से इन अरब मुल्कों के साथ कूटनीतिक प्रगति ठंडी पड़ सकती है। मिस्र और जॉर्डन के लिए सीमा सुरक्षा और गाजा शांति वार्ता सीधे तौर पर इजरायली नेतृत्व से जुड़ी है।

विश्लेषकों का कहना है कि लेबनान में हिजबुल्लाह और गाजा में हमास कमजोर हुए हैं। अरब जगत में नेतन्याहू को लेकर भले ही काफी चिंताएं हों, लेकिन खाड़ी देशों के कुछ नेता अभी भी उन्हें ऐसे इजरायली राजनेता के रूप में देखते हैं जो ईरान पर दबाव बनाए रख सकता है।

इससे उनके सामने एक दुविधा पैदा हो जाती है: वे नेतन्याहू की विस्तारवादी नीतियों का विरोध तो करते हैं, लेकिन साथ ही यह भी चाहते हैं कि ईरान के प्रभाव को सीमित किया जाए।

गल्फ रिसर्च सेंटर के चेयरमैन अब्दुल अजीज सागर ने कहा कि गाजा, वेस्ट बैंक, सीरिया और लेबनान में नेतन्याहू की नीतियां नुकसानदेह हैं। जहां तक ​​ईरान की बात है, तो संघर्ष के और बढ़ने से पहले कोई समझौता होना जरूरी है।