
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन सियासी बिसात बिछने लगी है। कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले जनादेश को अपनी ताकत बता रही है, तो सपा के सामने विधानसभा में अपने बड़े राजनीतिक आधार को देखते हुए सीटों का हिसाब तय करने की चुनौती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कांग्रेस कितनी सीटें मांगेगी और अखिलेश यादव कितनी सीटें छोड़ेंगे, बल्कि यह भी है कि 2022 में अलग-अलग लड़ने और 2024 में साथ आने से दोनों दलों की चुनावी तस्वीर कितनी बदली।
कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 21 अक्टूबर को लखनऊ में कहा कि 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन के भीतर सीटों पर बातचीत शुरू हो गई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने अपने संगठन की मजबूती और जनता के भरोसे के आधार पर कुछ सीटों की मांग रखी है। गौतम ने समझौते को ‘सम्मानजनक’ बनाने की बात भी कही।
कांग्रेस के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में INDIA गठबंधन का प्रदर्शन सीटों की मांग का एक आधार है। दूसरी तरफ, सपा अपनी मजबूत चुनावी जमीन और पार्टी कैडर के दम पर सीटों के बंटवारे में बड़ी हिस्सेदारी का दावा कर रही है। ऐसे में सवाल है कि पिछले चुनावों के आंकड़े दोनों दलों की दावेदारी के बारे में क्या बताते हैं और 2027 के लिए सीटों का हिसाब कैसे तय हो सकता है?
2022 में सपा के मुकाबले कांग्रेस कहां थी?
2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। सपा ने राष्ट्रीय लोकदल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी समेत सहयोगियों के साथ चुनाव लड़ा। इस गठबंधन में कुछ अन्य छोटे दल भी शामिल थे। वहीं, कांग्रेस ने लगभग सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे।
403 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी ने 255 सीटें जीती थीं। सपा को 111 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर जीत सकी। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) भी एक सीट पर सिमट गई।
वोट शेयर की तस्वीर भी दोनों दलों के बीच अंतर दिखाती है। सपा को 32.06 फीसदी वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 2.33 फीसदी रहा। बीएसपी को 12.88 फीसदी वोट मिले, लेकिन वह सिर्फ एक सीट जीत सकी।
यहां एक अहम बात है। चुनाव में वोट शेयर और सीटों की संख्या हमेशा एक ही अनुपात में नहीं बढ़ते। बीएसपी को मिले 12.88 फीसदी वोट और उसका एक सीट पर सिमटना दिखाता है कि राज्यव्यापी वोट प्रतिशत अपने आप सीटों में तब्दील नहीं होता। वोट किस क्षेत्र में मिले, उम्मीदवार कहां मजबूत रहा और मुकाबला कितना करीबी था, ये बातें भी नतीजे तय करती हैं।

2024 में गठबंधन ने बदली तस्वीर
2022 और 2024 के नतीजों के बीच सबसे बड़ा फर्क सपा-कांग्रेस के चुनावी तालमेल में दिखता है। लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने गठबंधन के तहत सीटें बांटीं। नतीजों में सपा 37 और कांग्रेस छह सीटों पर जीतने में कामयाब रही। वहीं, उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में बीजेपी को 33 सीटें मिलीं।
सपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में 111 सीटें जीती थीं। 2024 में उसने लोकसभा की 80 में से 37 सीटें अपने नाम कीं। कांग्रेस के लिए भी लोकसभा चुनाव का नतीजा 2022 के मुकाबले अलग था। विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में छह सीटें जीतीं।
हालांकि, दोनों चुनावों की सीधी तुलना सही नहीं होगी। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मुद्दे और उम्मीदवार अलग होते हैं। इसलिए 2024 के नतीजों से यह तय नहीं किया जा सकता कि 2027 में गठबंधन कैसा प्रदर्शन करेगा। लेकिन इतना साफ है कि साथ चुनाव लड़ने पर सपा और कांग्रेस ने लोकसभा में 43 सीटें जीती थीं।

सपा का अपना फॉर्मूला, कांग्रेस की अलग दलील
उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार पंकज झा के मुताबिक, 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के अपने-अपने तर्क हैं। सपा का जोर इस बात पर है कि सीटों की संख्या से ज्यादा अहम वहां जीतने की संभावना और उम्मीदवार की मजबूती है।
पंकज झा के मुताबिक, प्रियंका गांधी के घर हुई बैठक से पहले सपा ने सीटों को लेकर एक विस्तृत कवायद की थी। इसके लिए पार्टी ने 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों के आंकड़े देखे और उन सीटों की सूची बनाई, जहां उसे किसी चुनाव में 10 हजार या उससे ज्यादा वोट मिले थे। इस आधार पर करीब 146 सीटों का खाका तैयार किया गया।
इसमें रायबरेली और अमेठी जैसी सीटों के अलावा सपा की वे 11 सीटें भी शामिल हैं, जिन्हें पार्टी ने 2022 में जीता था और वह अपने पास रखना चाहती है। झा के अनुसार, सपा हर लोकसभा क्षेत्र में कम से कम एक विधानसभा सीट पर लड़ने की रणनीति पर भी विचार कर रही है, ताकि संगठन को मजबूत किया जा सके।
कांग्रेस की दावेदारी का आधार क्या है?
कांग्रेस की चुनौती यह है कि उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को 2027 के विधानसभा चुनाव में सीटों की मांग का आधार बनाना होगा। लोकसभा चुनाव में छह सीटों पर जीत और 9.46 फीसदी वोट शेयर उसके लिए राजनीतिक तर्क हैं। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि राज्यव्यापी वोट शेयर और सीटवार चुनावी ताकत के बीच बड़ा अंतर रहा है।
2022 में कांग्रेस को सभी 403 सीटों पर मिलाकर 21,51,234 वोट मिले थे और उसका वोट शेयर 2.33 फीसदी रहा था। वहीं, सपा को 2,95,43,934 वोट मिले और उसका वोट शेयर 32.06 फीसदी था।
वरिष्ठ पत्रकार पंकज झा के मुताबिक, कांग्रेस 2022 के चुनाव में अपने प्रदर्शन को सीटों की मांग का आधार बना रही है। उस चुनाव में पार्टी को 46 विधानसभा सीटों पर 10 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। वहीं, सपा का आकलन है कि इन सीटों में से करीब 41 से 51 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी बन सकती है।
ऐसे में कांग्रेस को उन विधानसभा क्षेत्रों का हिसाब देना होगा, जहां उसका अपना वोट बैंक और मजबूत उम्मीदवार हैं। वहीं, सपा के लिए भी सिर्फ 2022 के नतीजों के आधार पर सीटें तय करना आसान नहीं होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के प्रदर्शन ने कांग्रेस की दावेदारी को नया आधार दिया है। अब दोनों दलों के बीच अहम सवाल यही है कि किस सीट पर किसकी पकड़ मजबूत है और साथ लड़ने से कहां फायदा हो सकता है।
सपा-बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन में अंतर?
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 15 सीटें जीतीं और उसका कुल वोट शेयर करीब 39.3 फीसदी रहा। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस साथ आईं। इस गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं और दोनों दलों का कुल वोट शेयर करीब 43.5 फीसदी रहा।
दोनों चुनावों के नतीजे दिखाते हैं कि गठबंधन का प्रदर्शन सिर्फ साथ आने वाले दलों की संख्या पर निर्भर नहीं करता। वोट शेयर के साथ यह भी मायने रखता है कि किस दल का किन इलाकों में जनाधार है और गठबंधन को वोटों का कितना फायदा मिलता है। हालांकि, 2019 और 2024 के राजनीतिक हालात अलग थे।
2027 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर भी यही सवाल अहम होगा कि किस सीट पर किस दल का मजबूत जनाधार है और साथ लड़ने से दोनों को कितना फायदा मिल सकता है।

सीटों के साथ उम्मीदवार भी अहम
दरअसल, अखिलेश यादव का जोर इस बात पर है कि सीट मांगने वाली पार्टी को वहां अपने उम्मीदवार का नाम भी बताना चाहिए। अगर कांग्रेस किसी सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं दे पाती, तो सपा वहां अपना प्रत्याशी उतारने का विकल्प रख सकती है।
ऐसे में बातचीत केवल इस पर नहीं होगी कि कांग्रेस को कितनी सीटें मिलें, बल्कि इस पर भी होगी कि किन सीटों पर उसके पास मजबूत उम्मीदवार और संगठन है।
मध्य प्रदेश में भी बिगड़ी थी बात
कांग्रेस और सपा के बीच सीटों को लेकर मतभेद पहले भी सामने आ चुके हैं। 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई थी और सपा ने अलग चुनाव लड़ा था। यह उदाहरण बताता है कि विपक्षी दलों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर तालमेल होने के बावजूद राज्य के चुनावों में सीटों को लेकर मतभेद सामने आ सकते हैं।
ऐसे में यूपी में भी बातचीत का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों दल सीटों की संख्या और उम्मीदवारों के चयन पर कितनी सहमति बना पाते हैं।
NDA बनाम INDIA: 2027 की लड़ाई
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव बीजेपी और विपक्षी दलों के लिए महत्वपूर्ण होगा। बीजेपी के सामने 2022 में हासिल बहुमत को बरकरार रखने की चुनौती होगी। विपक्ष के लिए यह सवाल अहम रहेगा कि क्या वह 2024 के लोकसभा चुनाव में बने तालमेल को विधानसभा चुनाव तक बनाए रख पाता है।
सपा के लिए गठबंधन में अपनी प्रमुख भूमिका कायम रखना महत्वपूर्ण होगा। कांग्रेस के सामने सीटों की संख्या बढ़ाने के साथ उन सीटों पर अपनी चुनावी क्षमता दिखाने की चुनौती रहेगी, जहां वह चुनाव लड़ना चाहती है।
इसलिए सीटों के बंटवारे पर बातचीत को केवल इस सवाल से नहीं देखना चाहिए कि कांग्रेस कितनी सीटें मांग रही है और सपा कितनी देने को तैयार है। असल सवाल यह होगा कि दोनों दल सीटों का बंटवारा किस आधार पर करते हैं- पिछले चुनावों के वोट, मौजूदा संगठन, उम्मीदवारों की स्थिति या गठबंधन के व्यापक चुनावी समीकरण।
सम्मानजनक समझौते की बात, संख्या अभी तय नहीं
कांग्रेस और सपा के बीच सीटों की संख्या को लेकर बातचीत शुरू हो गई है। कांग्रेस की ओर से यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा है कि सीट बंटवारे पर चर्चा शुरू हो गई है और समझौता सम्मानजनक होगा। उनके मुताबिक, कांग्रेस ने अपने संगठन और जनता के भरोसे के आधार पर कुछ सीटों की मांग रखी है।
वरिष्ठ पत्रकार पंकज झा के मुताबिक, दोनों दलों के बीच बातचीत में सीटों की संख्या के साथ-साथ उम्मीदवारों की मजबूती भी अहम होगी। उन्होंने कांग्रेस को करीब 65 से 70 सीटें मिलने की संभावना जताई है। हालांकि, अंतिम फैसला सीटों की संख्या के साथ-साथ उम्मीदवारों के चयन पर भी निर्भर करेगा। अगर दोनों दलों के बीच सहमति नहीं बनती, तो अलग-अलग चुनाव लड़ने का विकल्प भी खुला रह सकता है।
फिलहाल, कांग्रेस की मांग और सपा की संभावित पेशकश को लेकर किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं हुई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के प्रदर्शन में बड़ा अंतर था, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन ने अलग तस्वीर पेश की। अब सीटों के बंटवारे में पिछले चुनावों के नतीजों के साथ-साथ विधानसभा क्षेत्रवार वोट आधार और संगठन की स्थिति भी अहम भूमिका निभाएंगे।







