आज इजरायल में हो रहे चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा वो नहीं, जो आप समझ रहे
दुनिया की नजर इजरायल की जंग पर है, लेकिन वहां के मतदाताओं के लिए सिर्फ गाजा और ईरान ही मुद्दे नहीं हैं। सेना में भर्ती से छूट, 7 अक्टूबर के हमले की जवाबदेही, न्यायपालिका में बदलाव और बढ़ती महंगाई भी चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
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आज इजरायल में हो रहे चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा वो नहीं, जो आप समझ रहे
इजरायल में मंगलवार को वोटिंग।AP

इजरायल में आज चुनाव हो रहे हैं। हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश में पहली बार राष्ट्रीय चुनाव कराए जा रहे हैं। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन चुनाव में सिर्फ गाजा और ईरान के साथ संघर्ष ही मुद्दा नहीं है। देश के भीतर भी कई ऐसे बड़े मुद्दे हैं, जिनका सामना इस चुनाव में नेतन्याहू को करना है। युवाओं को सेना में भर्ती से छूट, न्यायपालिका में बदलाव और महंगाई जैसे मुद्दे भी वोटर के फैसले को प्रभावित कर रहे हैं।

1. 7 अक्टूबर के हमले के लिए कौन जिम्मेदार?

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में बड़ी संख्या में इजरायली मारे गए थे। इसे इजरायल के इतिहास का सबसे घातक दिन माना जाता है। अब चुनाव में इस बात पर सवाल उठ रहे हैं कि हमला रोकने में सुरक्षा व्यवस्था क्यों नाकाम रहीं और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टिट्यूट के सर्वे के मुताबिक, करीब 68 फीसदी यहूदी इजरायलियों के लिए 7 अक्टूबर का हमला पार्टी चुनने का अहम आधार है। अरब समुदाय के 32 फीसदी लोगों ने इसे अहम मुद्दा बताया। इस समुदाय के ज्यादातर लोगों ने इसके बजाय अपराध और कानून-व्यवस्था को अपनी प्रमुख चिंता बताया।

नेतन्याहू हमले से जुड़ी नाकामी के लिए सुरक्षा अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। वह गाजा में हमास, लेबनान में हिज्बुल्लाह और ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को अपनी सरकार की उपलब्धि बताते हैं। उनके विरोधियों का आरोप है कि वह हमले की जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र जांच नहीं होने दे रहे। आलोचक यह भी कहते हैं कि सरकार बंधकों की रिहाई के लिए पहले ही समझौता कर सकती थी।

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गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई, लेबनान और सीरिया के कुछ इलाकों पर कब्जे और ईरान के खिलाफ सैन्य अभियानों पर चुनाव प्रचार में ज्यादा बहस नहीं हो रही है। इन मुद्दों पर इजरायल में काफी समर्थन भी है।

2. सेना में भर्ती से छूट पर क्यों नाराज हैं लोग?

इजरायल में ज्यादातर यहूदी पुरुषों और महिलाओं के लिए सेना में सेवा देना जरूरी है। लेकिन अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के कई युवाओं को धार्मिक पढ़ाई के आधार पर इससे छूट मिलती रही है। नेतन्याहू की सरकार को लंबे समय से ऐसे समुदायों के राजनीतिक दलों का समर्थन मिलता रहा है। इस व्यवस्था से उन लोगों में नाराजगी है जिन्हें युद्ध के दौरान बार-बार सेना में बुलाया जाता है। हर साल करीब 13 हजार अति-रूढ़िवादी पुरुष 18 साल की उम्र में सैन्य सेवा के योग्य होते हैं, लेकिन इनमें से 10 फीसदी से भी कम सेना में भर्ती होते हैं।

सर्वे में करीब एक चौथाई यहूदी वोटर्स ने सेना में भर्ती से छूट को पार्टी चुनने का अहम मुद्दा बताया। नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट ने इस छूट को खत्म करने का वादा किया है। वह इजरायल के पूर्व सेना प्रमुख हैं। गाजा में संघर्ष के दौरान उन्होंने अपने बेटे और दो भतीजों को खोया है।

3. न्यायपालिका में बदलाव का मुद्दा भी बाकी

2023 में नेतन्याहू सरकार ने न्यायपालिका की शक्तियां कम करने और सरकार की भूमिका बढ़ाने की योजना पेश की थी। इसके खिलाफ इजरायल में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। सरकार का कहना था कि इससे चुनी हुई सरकार के अधिकार बढ़ेंगे। वहीं, विरोधियों को डर था कि इससे प्रधानमंत्री की शक्तियां बढ़ेंगी और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होंगी। उस समय नेतन्याहू भ्रष्टाचार के आरोपों का भी सामना कर रहे थे। 7 अक्टूबर के हमले के बाद लोगों का ध्यान बंधकों की रिहाई और गाजा की ओर चला गया। ऐसे में न्यायपालिका का मुद्दा पीछे रह गया। सर्वे में 18 फीसदी यहूदी मतदाताओं ने इसे वोट देने के फैसले को प्रभावित करने वाला अहम मुद्दा बताया।

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पिछले साल इजरायल की संसद ने न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका बढ़ाने वाला कानून पारित किया था। यह अगली संसद के गठन के बाद लागू होना है। नेतन्याहू के विरोधी इस कानून को रद्द करने का वादा कर रहे हैं।

क्या नेतन्याहू बचा पाएंगे अपनी सरकार?

इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री को वोट नहीं देते, बल्कि राजनीतिक दलों को चुनते हैं।

देश की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है।

किसी एक पार्टी को अपने दम पर बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में सरकार बनाने के लिए अलग-अलग दलों को साथ आना होगा। अगर कोई भी गठबंधन बहुमत नहीं जुटा पाता, तो नए चुनाव होने तक मौजूदा सरकार कार्यवाहक के तौर पर काम कर सकती है।

नेतन्याहू के समर्थक उन्हें अनुभवी नेता मानते हैं। उनका कहना है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपतियों और दूसरे देशों के नेताओं के दबाव के सामने इजरायल के हितों से समझौता नहीं करते। वहीं, विरोधी उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों और 7 अक्टूबर की सुरक्षा नाकामी की जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाते हैं। दूसरी ओर, गादी आइजेनकोट के समर्थक उनके लंबे सैन्य अनुभव और परिवार के सदस्यों को खोने के बावजूद सार्वजनिक जीवन में बने रहने को उनकी ताकत मानते हैं। 

4. महंगाई और महंगा होता जीवन भी चिंता

शनिवार को इजरायल के तेल अवीव में गुस्साई भीड़ ने सरकार विरोधी रैली निकाली।

इजरायल में बढ़ती महंगाई और रोजमर्रा की चीजों पर होने वाला खर्च भी लोगों की चिंता बढ़ा रहा है। राइखमैन यूनिवर्सिटी के आरोन इंस्टीट्यूट के शोध के मुताबिक, इजरायल में रहने का खर्च ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और स्वीडन जैसे कई अमीर यूरोपीय देशों से भी ज्यादा है। सर्वे में 38 फीसदी यहूदी मतदाताओं और 46 फीसदी अरब मतदाताओं ने अर्थव्यवस्था और महंगाई को चुनाव के सबसे अहम मुद्दों में शामिल किया।

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नेतन्याहू का कहना है कि उनकी नीतियों से अर्थव्यवस्था को फायदा हुआ है और इजरायल का तकनीकी क्षेत्र मजबूत हुआ है। वहीं, विरोधियों का आरोप है कि आर्थिक विकास का फायदा सभी लोगों तक नहीं पहुंचा। इसके बावजूद प्रमुख उम्मीदवारों ने चुनाव प्रचार में महंगाई और अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा जगह नहीं दी। युद्धों पर होने वाला खर्च भी एक बड़ी चिंता है। हिब्रू यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री जोसेफ जीरा के मुताबिक, संघर्षों की आर्थिक कीमत बहुत बड़ी है।

कुल मिलाकर, इजरायल का यह चुनाव सिर्फ सरकार चुनने के बारे में नहीं है। मतदाताओं के सामने यह तय करने का सवाल भी है कि 7 अक्टूबर के हमले की जवाबदेही कौन लेगा, सेना में भर्ती के नियम कैसे होंगे, न्यायपालिका की भूमिका क्या रहेगी और बढ़ती महंगाई से कैसे निपटा जाएगा। इन मुद्दों के बीच नेतन्याहू के सामने अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है। 

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