इजराइल में संसदीय चुनाव के बाद काउंटिंग जारी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। संसद में बहुमत के 'जादुई आंकड़े' तक पहुंचने की होड़ में नेतन्याहू बढ़त जरूर बनाए हुए हैं, लेकिन मंजिल अभी दूर नजर आ रही है। शुरुआती रुझानों से साफ है कि किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में नई सरकार को लेकर सस्पेंस बरकरार है।
केंद्रीय चुनाव समिति की ओर से जारी नतीजों के मुताबिक, इजरायली समय के अनुसार दोपहर साढ़े 12 बजे तक 77.6 प्रतिशत वोटों की गिनती पूरी हो गई है। नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 54 सीटें मिलती दिख रही है, जबकि आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन के खाते में 49 सीटें जाती नजर आ रही हैं। अरब पार्टियों को 17 सीटें मिल सकती हैं।
120 सदस्यीय इजरायली संसद (नेसेट) में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। फिलहाल दोनों में से कोई भी गठबंधन इस आंकड़े तक पहुंचता नहीं दिख रहा है।
अब तक किस पार्टी को कितनी सीटें?
प्रधानमंत्री नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन में लिकुड 27 सीटों के साथ सबसे आगे है। वहीं, सहयोगी दलों ओत्जमा येहुदित, शास और यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म को 7-7 सीटें और रिलीजियस जायनिज्म को 6 सीटें मिलती दिख रही हैं।
दूसरी ओर, आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन में यशर 22 और बयाहद 12 सीटें पर पहुंच गई हैं। जबकि डेमोक्रेट्स को 8 और यिसराइल बेइतेनु को 7 सीटें मिलती नजर आ रही हैं।

अरब पार्टियों ने चौंकाया, क्या बनेंगे किंगमेकर?
चुनाव में अरब पार्टियों को मिली सीटों ने सरकार बनाने का गणित दिलचस्प बना दिया है। अब तक के आंकड़ों के मुताबिक, अरब प्रतिनिधित्व वाली जॉइंट लिस्ट को 11 और राम (Ra'am) पार्टी को 6 सीटें मिलती दिख रही हैं। ऐसे में अगली सरकार बनाने में इनकी भूमिका अहम हो सकती है।
जॉइंट लिस्ट के अध्यक्ष यूसुफ जबरीन ने कहा है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार को हटाकर नई सरकार बनाने की इच्छा रखने वाले किसी भी दल को उनके गठबंधन से बातचीत करनी होगी। एक टीवी चैनल से बात करते हुए जबरीन ने कहा, “जो भी नेतन्याहू की खूनखराबे वाली सरकार का ठोस और वास्तविक विकल्प देना चाहता है, उसे हमसे बात करनी होगी, ताकि उस बदलाव का रास्ता बनाया जा सके जिसकी इजरायल की जनता उम्मीद कर रही है।”
इसके साथ ही उन्होंने कहा, “या तो नस्लवाद और भेदभाव जारी रहेगा, या फिर यहूदियों और अरबों के बीच सच्ची साझेदारी होगी।”
बता दें कि इजराइल की कुल आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 20% है।

गोलान ने अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने की अपील की
डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने यशर पार्टी के गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन से अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इन दलों के पास मिलकर संसद में बहुमत हासिल करने का मौका है।
गोलान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “नेतन्याहू हार गए। मुझे 120 तक गिनती करना आता है। 65, 55 से ज्यादा है। इजरायल में लोकतंत्र इसी तरह काम करता है। बात खत्म।”
उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात से एक बड़ी सीख मिलनी चाहिए। अगर लोग डरना और नस्लवाद को स्वीकार करना बंद नहीं करेंगे, तो इजरायल में उनका कोई भविष्य नहीं है। गोलान ने कहा कि नेतन्याहू की यह सोच अब स्वीकार नहीं की जानी चाहिए कि यहूदी और अरब मतों को अलग-अलग नजरिए से देखा जाए।
נתניהו הפסיד. אני יודע לספור עד 120. 65 זה יותר מ-55. ככה עובדת הדמוקרטיה הישראלית. נקודה. תמונת המציאות חייבת ללמד אותנו לקח אחד מהדהד: אין לנו עתיד כאן אם לא נפסיק לפחד. ואם לא נפסיק עם הגזענות. אסור לנו לקבל יותר את החלוקה הגזענית של נתניהו בין קולות יהודיים לקולות ערביים. הקול של אזרח ישראלי שמצביע בטירה שווה בדיוק כמו הקול של אזרח ישראלי שמצביע בגבעת שמואל. לא פחות. לא בערך. בדיוק. מי שמנסה למחוק את הקולות של האזרחים הערבים, נכנע לנתניהו ומוותר על ישראל. ועכשיו בואו נדבר על ציונות. בגוש של נתניהו יושבים 16 חברי כנסת ממפלגות חרדיות לא ציוניות, שמקדמות השתמטות המונית בזמן שהילדים שלנו נלחמים ונהרגים. אם נתניהו מתעקש לספור רק רוב ציוני, שיגרע קודם כול מהגוש שלו את 16 חברי הכנסת של המפלגות החרדיות הלא־ציוניות. הם לא יטיפו לנו על ציונות. לגוש השינוי יש רוב ציוני: 49 מול 39. לגוש השינוי יש רוב ישראלי: 65 מול 55. יש לנו רוב. יש לנו אחריות. ויש לנו הזדמנות להקים ממשלת שינוי בשותפות עם אזרחי ישראל הערבים. ממשלה שתשרת את כל אזרחי ישראל. עכשיו צריך אומץ. צריך מנהיגות. צריך להפסיק לפחד ולהתחיל לפעול. ממשלת שינוי עכשיו!
— Yair Golan - יאיר גולן (@YairGolan1) October 28, 2026
गोलान के मुताबिक, बदलाव के पक्ष वाले दलों के पास बहुमत है और उनकी जिम्मेदारी है कि वे अरब नागरिकों के साथ मिलकर नई सरकार बनाएं। ऐसी सरकार सभी इजरायली नागरिकों के हित में काम करेगी। उन्होंने कहा कि अब डर छोड़कर कदम उठाने और नेतृत्व दिखाने की जरूरत है।
वहीं, नेतन्याहू के मुख्य विरोधी और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट ने अरब दलों के साथ सरकार बनाने की संभावना से इनकार नहीं किया है। हालांकि, इसके लिए उन्होंने कुछ शर्तें रखी हैं। इनमें इजरायल को यहूदी राष्ट्र के रूप में मान्यता देना और हमास को चरमपंथी संगठन मानना शामिल है।
चुनावी सीमा पार नहीं करने से नेतन्याहू को नुकसान
संसद में सीट पाने के लिए जरूरी 3.25% वोट की न्यूनतम सीमा पार करने में तीन पार्टियां अब तक नाकाम रही हैं। इनमें रिजर्विस्ट्स को 2.67%, पीपल ऑफ इजरायल को 1.63% और हरेदी पब्लिक को महज 0.2% वोट मिले हैं।
न्यूनतम सीमा पार नहीं कर पाने वाली इन पार्टियों से सबसे ज्यादा नुकसान नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को होता दिख रहा है। कहा जा रहा है कि धुर दक्षिणपंथी मानी जाने वाली पीपल ऑफ इजरायल और रूढ़िवादी हरेदी पब्लिक ने दक्षिणपंथी वोट बैंक में सेंध लगाई, लेकिन जरूरी सीमा पार नहीं कर पाईं। इस वजह से उनके वोट सीटों के बंटवारे में शामिल नहीं होंगे। इसका अप्रत्यक्ष फायदा विपक्षी और अरब दलों को हो सकता है।
हालांकि, अब नजर 'डबल एनवेलप' (Double Envelopes) वोटों पर होगी। पारंपरिक रूप से ये वोट दक्षिणपंथी दलों के पक्ष में जाते हैं। अगर थ्रेशोल्ड से नीचे चल रही छोटी पार्टियां, जैसे रिजर्विस्ट्स (2.64%), जरूरी सीमा पार नहीं करती हैं, तो बची हुई सीटों और सरप्लस वोट एग्रीमेंट के जरिए नेतन्याहू का आंकड़ा 58-59 तक पहुंच सकता है।
बता दें कि इजरायल में 'डबल एनवेलप' वोटिंग उन लोगों के लिए होती है, जो अपने तय पोलिंग बूथ पर जाकर वोट नहीं डाल सकते। इनमें तैनात सैनिक, राजनयिक, कैदी और अस्पताल में भर्ती मरीज शामिल होते हैं।
इसके अलावा, नेतन्याहू को नफ्ताली बेनेट की बयाहद (11 सीटें) या एविग्डोर लिबरमैन की यिसराइल बेइतेनु (8 सीटें) में से किसी एक का समर्थन हासिल करना होगा। हालांकि, दोनों नेता अतीत में नेतन्याहू के साथ काम करने से इनकार करते रहे हैं, इसलिए यह राह आसान नहीं है।
अब राष्ट्रपति पर टिकी निगाहें
किसी भी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में राष्ट्रपति की भूमिका अहम हो जाती है। राष्ट्रपति सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से चर्चा करते हैं। इसके आधार पर वह उस नेता को सरकार बनाने का मौका देते हैं, जिसके संसद में बहुमत का समर्थन हासिल करने की सबसे ज्यादा संभावना हो।
हालांकि, सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता को ही सरकार बनाने का मौका मिले, यह जरूरी नहीं है।
राष्ट्रपति से निमंत्रण मिलने के बाद संबंधित नेता को गठबंधन बनाने और जरूरी समर्थन जुटाने के लिए 42 दिन तक का समय मिल सकता है। इसके बाद उसे नेसेट में अपनी सरकार के पक्ष में बहुमत साबित करना होता है। बहुमत का समर्थन मिलने पर सरकार बनती है और प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों का चयन करते हैं।

इजरायल में राजनीतिक अनिश्चितता से शेयर बाजार में गिरावट
इजरायल में चुनाव के शुरुआती नतीजों के बाद अगली सरकार के गठन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इसका असर देश के शेयर बाजार और मुद्रा पर भी पड़ा है। तेल अवीव स्टॉक एक्सचेंज में गिरावट दर्ज की गई, जबकि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इजरायल की मुद्रा शेकेल 1% कमजोर हो गई।
तेल अवीव स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक TA-125 1.7% गिर गया। वहीं, बड़ी कंपनियों के शेयरों पर आधारित TA-35 सूचकांक में 1.5% की गिरावट आई। TA-35 में शामिल नहीं होने वाली सबसे अधिक बाजार पूंजीकरण वाली कंपनियों के शेयरों को ट्रैक करने वाला TA-90 सूचकांक 3% नीचे आ गया। इसके अलावा, TA-Insurance सूचकांक में 4.1% की गिरावट दर्ज की गई।
मुद्रा बाजार में शेकेल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 1% कमजोर होकर करीब 3.0843 शेकेल प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा था।
चुनाव के शुरुआती नतीजों से अगली सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक गतिरोध की आशंका बढ़ी है। इससे भविष्य की आर्थिक नीतियों की दिशा को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
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