मक्का पैक्ट फेल? सऊदी क्राउन प्रिंस के अपने भाई को तेहरान भेजने की इनसाइड स्टोरी
ईरान की राजधानी तेहरान में मक्का पैक्ट वाले देशों की एक बैठक हुई है। सबसे खास बात यह है कि क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए मक्का पैक्ट बना लेकिन हूतियों के हमलों का समधान खोजने उन्हें ईरान के पास ही आना पड़ा।
मक्का पैक्ट फेल? सऊदी क्राउन प्रिंस के अपने भाई को तेहरान भेजने की इनसाइड स्टोरी
सऊदी अरब के रक्षा मंत्री मोहम्मद बिन खालिद तेहरान में मीटिंग के दौरान

हालात की आंच जब अपनी दहलीज तक आई,
तो तख्त-नशीनों को भी सुलह की राह याद आई...

ईरान की राजधानी तेहरान के एक बंद कमरे में टेबल सजी थी। मक्का पैक्ट साइन करने वाले देशों की ईरान से बातचीत होने वाली थी। मीडिया की नजरें थीं। 26 अक्टूबर को मक्का पैक्ट में शामिल पाकिस्तान, तुर्किये के अलावा सऊदी अरब के भी प्रतिनिधि आए। इसमें सबसे खास था- सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का अपने भाई को भेजना। ऐसा इसलिए क्योंकि तेहरान के साथ सऊदी के रिश्ते तनावपूर्ण ही रहे हैं। प्रिंस खालिद बिन सलमान सऊदी के रक्षा मंत्री भी हैं। अब इसके दो मैसेज निकाले जा रहे हैं।

1. मक्का पैक्ट बनने के बाद आई पहली ही चुनौती में यह फेल हो गया है क्योंकि सभी देशों को मदद के लिए तेहरान आना पड़ा। 

2. सऊदी क्राउन प्रिंस का भाई को तेहरान भेजना दिखाता है कि वह ईरान से अच्छे रिश्ते बनाने को लेकर कितने गंभीर हैं। 

सऊदी इस समय बड़े संकट में है। हूतियों के हमलों ने उसके तेल के रास्ते रोक दिए हैं, तेल रिफाइनरीज पर अटैक हो रहे हैं, हवाई अड्डे भी सेफ नहीं हैं। दूसरी, मक्का पैक्ट साइन करने वाले देश पाकिस्तान और तुर्किए ने सऊदी को वैसी सहायता नहीं दी, जिसकी उसे जरूरत थी। अमेरिका सऊदी के साथ है पर वह भी हूतियों के खिलाफ जंग में सीधे नहीं उतरा। वह चुप्पी साधे बैठा है। ऐसे में सऊदी ने हूती विद्रोहियों को रोकने के लिए ईरान से ही बात करना जरूरी समझा।

आइए समझते हैं सऊदी क्राउन प्रिंस का अपने भाई को तेहरान भेजना क्या मैसेज दे रहा है?

क्राउन प्रिंस ने भाई को ही तेहरान क्यों भेजा?

सऊदी का यह कदम दोनों के बीच रिश्तों में आई गर्माहट को एक नई कूटनीतिक ऊंचाई देता दिख रहा है।

'पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज' के निदेशक अब्दुल्ला खान ने एक निजी चैनल पर सऊदी के इस कदम को डिकोड किया है। उन्होंने कहा कि सऊदी की ओर से किसी राजनयिक की जगह अपने रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान (जो क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के भाई हैं) को तेहरान भेजना दिखाता है कि सऊदी इस बैठक को केवल एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि सुरक्षा और तनाव कम करने की गंभीर कवायद मान रहा है।

सऊदी अरब अपने अहम बुनियादी ढांचों पर सीधे हूती हमलों का सामना कर चुका है और वह 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' (Mecca Joint Defense Agreement) का भी हिस्सा है। अब्दुल्ला खान कहते हैं कि रक्षा मंत्री की मौजूदगी दिखाती है कि सऊदी ठोस समाधान चाहता है और उस स्तर पर बात करने को तैयार है जहां खतरे का आकलन और सेना की तैनाती से जुड़े फैसले लिए जाते हैं।

एक बात और

सऊदी अपनी तरफ से तेहरान को यह भरोसा दिलाना चाहता है कि मक्का समझौता उसके खिलाफ नहीं है।

अबदुल्ला खान ने कहा कि बैठक में शामिल प्रतिनिधियों के पदों में अंतर जैसे सऊदी अरब के रक्षा मंत्री, पाकिस्तान के सेना प्रमुख और तुर्की के खुफिया प्रमुख किसी छोटे-बड़े के दर्जे को नहीं, बल्कि हर देश के सुरक्षा मामलों में काम के आंतरिक बंटवारे को दर्शाता है।

त्रिकोणीय भूमिका सबसे बड़ी वजह

▶ वह मोहम्मद बिन सलमान के सगे भाई हैं, इसलिए उनकी जुबान सीधे रियाद की पॉलिसी के बराबर है।
▶ वह 2022 से सऊदी के रक्षा मंत्री हैं, इसलिए हूती हमले, यमन युद्ध और सैन्य तनाव पर उनके पास अधिकार और जानकारी दोनों बराबर की है। 
▶ वह रॉयल सऊदी एयर फोर्स में F-15 लड़ाकू पायलट रहे हैं और ISIS के खिलाफ अभियान समेत 50 से अधिक लड़ाकू मिशन उड़ा चुके हैं।
▶ खालिद बिन सलमान वह चेहरा हैं जो ईरान से बात कर सकते हैं, अमेरिका को समझा सकते हैं और सऊदी सेना के लिए भी प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। इसी त्रिकोणीय भूमिका की वजह से उन्हें तेहरान भेजा गया।

मोहम्मद बिन खालिद

तो क्या मक्का पैक्ट फेल हो गया?

हां, यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। इस साल जब पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने मक्का डील साइन की थी, तब यह तय हुआ था कि किसी भी देश पर हमला सब पर अटैक माना जाएगा। इसे 'मुस्लिम नाटो' कहकर पुकारा गया। इस पैक्ट के तहत तीन बैठकें हो चुकी हैं। सऊदी ने पाकिस्तान और तुर्किये से हूतियों से निपटने के लिए मदद मांगी, पर वैसी नहीं मिली जैसा सऊदी चाहता था।

समझौते की औपचारिक शर्तों के बावजूद संकट के समय पाकिस्तान और तुर्किये ने कोई ठोस सैन्य तैनाती नहीं भेजी। उन्होंने केवल सैन्य सलाहकार (Advisers) भेजे। जमीन पर हूतियों के सस्ते ड्रोन और क्रूज मिसाइलों के सामने ये पारंपरिक सुरक्षा संधि सुरक्षा ढाल नहीं बन सकी, जिससे रियाद को विकल्प तलाशने पर मजबूर होना पड़ा।

तेहरान में बैठक के दौरान

हूतियों को रोकने का रास्ता ईरान के पास है?

हां, सऊदी अरब जानता है कि हूतियों के लगातार हमलों को रोकने का एकमात्र रास्ता ईरान के पास ही है। इसलिए उसने ईरान से ही सीधे बातचीत करना जरूरी समझा। सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने ईरानी अधिकारियों की मध्यस्थता में हूतियों के साथ इस समझौते पर चर्चा की है। हूतियों की तरफ से सऊदी तेल रिफाइनरियों, हवाई अड्डों और बुनियादी ढांचे पर लगातार मिसाइल/ड्रोन हमलों के कारण रियाद की अर्थव्यवस्था और तेल निर्यात को भारी नुकसान पहुंच रहा है। सऊदी नेतृत्व किसी भी कीमत पर अपनी घरेलू सुरक्षा और 'विजन 2030' के विकास एजेंडे को सुरक्षित रखना चाहता है।

ईरान ने खुद को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया है जो सीधे तौर पर हूतियों को नियंत्रित या कहिए प्रभावित कर सकता है। ईरान लंबे समय से तर्क देता रहा है कि मध्य पूर्व के मसले बाहरी शक्तियों (अमेरिका/पश्चिम) के बगैर, क्षेत्रीय देशों के बीच ही सुलझने चाहिए। यह घटनाक्रम तेहरान के इसी रुख को बल देता है।

हूतियों की फाइल तस्वीर

तेल के बंद रास्ते भी खुलवाने हैं

सऊदी अरब के पास एक और संकट है और वो यह कि उसके तेल भेजने वाले रास्ते हूतियों ने बंद कर रखे हैं। सऊदी तेल भेजने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भी तेल भेजता है। अमेरिका-इजरायल से संघर्ष के चलते यह बंद है। इसका कंट्रोल ईरान के पास है। ईरान सऊदी का तेल होर्मुज से जाने देगा तो इससे सऊदी अरब को ही आसानी होगी। सऊदी ने वैकल्पिक रास्ते अपनाए, पर वहां हूतियों का कब्जा हो गया। सऊदी के तेल वाले रास्ते जैसे लाल सागर भी पूरी तरह बंद हैं। हूतियों ने ड्रोन हमले किए, जिसके बाद हूतियों को वो तेल वाली पाइपलाइन बंद करनी पड़ी थी।

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तेहरान में हुई यह बैठक ईरान के लिए अपनी छवि मजबूत करने का बड़ा मौका रही। क्षेत्र के तीन बड़े देश यमन के मुद्दे पर मदद मांगने ईरान पहुंचे। ऐसे में माना जा रहा है कि ईरान ने मदद के बदले अपनी कुछ शर्तें भी रखी होंगी। ईरान इस बैठक को ‘तेहरान समिट’ कह रहा है। इससे लगता है कि ईरान मिडिल ईस्ट में एक अलग तरह की क्षेत्रीय व्यवस्था बनाना चाहता है, जिसमें उसकी अहम भूमिका हो और शर्तें भी काफी हद तक वही तय करे।
वली नस्र
वली नस्र
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर

माना जाता है कि यमन में हूतियों को ईरान से सपोर्ट मिलता है, यह कोई नई बात नहीं है। अमेरिका सऊदी को सपोर्ट करता है।

इधर, ईरान-अमेरिका के बीच संघर्ष फिर से शुरू हो सकता है। ऐसे में नुकसान सऊदी अरब का भी होगा। सऊदी पर इसके चलते दबाव बढ़ेगा जिससे अमेरिका भी परेशान हो सकता है। यही वजह है कि सऊदी ने समस्या का हल खोजने के लिए ईरान पर ही भरोसा किया। 

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