
➤साल 2026- पेपर लीक और धांधली जैसे आरोपों के बीच सरकार ने MBBS, BDS जैसे मेडिकल कोर्सों में दाखिले के लिए 21 जून को NEET परीक्षा फिर से कराई। इससे ठीक पहले सरकार ने चर्चित इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम (Telegram) पर अस्थायी रोक लगा दी। इससे करीब 15 करोड़ यूजर्स 6 दिन तक टेलीग्राम का इस्तेमाल नहीं कर पाए।
➤साल 2023- मई के महीने में सरकार ने 14 मैसेंजर ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया। इनका इस्तेमाल पाकिस्तान के इशारे पर कश्मीर में आतंकी हरकतों को बढ़ावा देने में किया जा रहा था। इनमें Crypviser, Enigma, Safewithme और विकर (Wickr) शामिल थे। इनके डेटा सर्वर भारत से बाहर थे और ये जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे।
➤साल 2023- सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सट्टेबाजी को बढ़ावा देने वाले 138 ऐप्स को ब्लॉक किया। गैरकानूनी तरीके से कर्ज देने वाले 94 ऐप्स को भी बंद कर दिया गया। ये बड़े-बड़े दावे करके लोगों को फंसाते थे, उनका डेटा चोरी करते थे, फिर ब्लैकमेल करते थे।
➤साल 2021-22- किसान आंदोलन और अन्य संवेदनशील विवादों के वक्त सरकार ने ट्विटर (अब X) को सैकड़ों अकाउंट्स, हैशटैग और ट्वीट्स को ब्लॉक करने का आदेश दिया था। सरकार का दावा था कि इनके जरिए भड़काऊ और फर्जी खबरें फैलाई जा रही थीं।
➤साल 2020- चीन के साथ लद्दाख की गलवान घाटी में सीमा संघर्ष और तनाव के बाद, भारत सरकार ने 300 से अधिक चाइनीज ऐप्स को बैन कर दिया, जिनमें PUBG Mobile, SHAREit, Xender, यूसी ब्राउजर, CamScanner जैसे चर्चित ऐप्स भी थे।
कहने के लिए ये अलग-अलग वक्त में अलग-अलग मकसद से सरकार की ओर से की गई कार्रवाइयां थीं, लेकिन इनमें 2 चीजें कॉमन थीं। पहली, ये देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर उठाए गए कदम थे। दूसरा, ये सभी आदेश आईटी एक्ट की धारा 69A का इस्तेमाल करके जारी किए गए थे। आईटी एक्ट यानी Information Technology Act, 2000। इस कानून का मुख्य मकसद इंटरनेट और डिजिटल दुनिया में अपराध रोकना और व्यवस्था बनाए रखना है। इसी कानून की एक मजबूत धारा है- 69A... सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा की ‘डिजिटल ढाल’ बताती है, तो विरोधी इसे ‘डिजिटल सेंसरशिप का हथियार’ कहते हैं। आज बात कानून के इसी प्रावधान की। बताएंगे कि इस धारा में ऐसा क्या है, सरकार किन मामलों में इसके जरिए ऑनलाइन चाबुक चला सकती है, इसकी प्रक्रिया क्या होती है, नियम तोड़ने पर कितनी सजा है, और ये भी कि इसकी इतनी आलोचना क्यों होती है? क्यों इसे बार-बार अदालतों में चुनौती दी जाती है? साथ में ये तो बताएंगे ही कि टेलीग्राम ऐप में ऐसे क्या फीचर्स हैं, जो वॉट्सऐप में नहीं हैं और जिनकी वजह से सरकार को इसे बैन करने जैसा बड़ा कदम उठा पड़ा।
क्या है आईटी एक्ट की धारा 69ए?

किन मामलों में यह लागू होती है

भारत सरकार ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की सिफारिश पर आईटी एक्ट की धारा 69A (Section 69A) के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए टेलीग्राम पर टेंपरेरी बैन लगाया। लेकिन ये इस धारा का पहली बार इस्तेमाल नहीं था। राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा चोरी, धोखाधड़ी और सार्वजनिक शांति का हवाला देते हुए सरकार पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों लोकप्रिय मोबाइल ऐप्स, चीनी प्लेटफॉर्म्स और वेबसाइटों को इस कानून के तहत प्रतिबंधित कर चुकी है।
यह कानून कैसे काम करता है?
ये समझना भी जरूरी है कि ये कानून लागू कैसे किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) इस कानून के तहत आदेश जारी करता है। लेकिन इससे पहले, एक सरकारी अधिकारियों की कमेटी शिकायतों की जांच करती है। जांच के बाद कंटेंट या ऐप को ब्लॉक करने की सिफारिश की जाती है।
यदि मामला बहुत गंभीर हो, जैसे टेलीग्राम के मामले में देखने को मिला तो MeitY बिना किसी देरी के तुरंत आपातकालीन ब्लॉकिंग आदेश जारी कर सकता है। बाद में कमेटी इसकी समीक्षा करती है।
सरकार यह आदेश गूगल जैसे सर्च इंजन, Jio-Airtel जैसे इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स, सोशल मीडिया कंपनियों, मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स और इन सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने वाली वेब होस्टिंग और इंटरमीडियरी कंपनियों को देती है, जिन्हें इसे तुरंत मानना होता है।
नियम तोड़ा तो कितनी सजा?
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A के तहत जारी किए गए सरकारी आदेशों का उल्लंघन करने पर कानून में सख्त सजा का प्रावधान है। धारा 69A आम नागरिकों के लिए नहीं है। कोई व्यक्ति अगर कोई आपत्तिजनक कंटेंट इंटरनेट पर डालता है, तो उसके खिलाफ अन्य कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है। धारा 69A के तहत जारी आदेश का पालन न करने वाले मध्यस्थ (इंटरमीडियरी) या कंपनी के जिम्मेदार अधिकारियों को 7 साल तक की कैद हो सकती है। जेल के साथ-साथ कंपनी पर भारी आर्थिक जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
जैसे-
- Jio, Airtel, Vi, या BSNL जैसी कंपनियां बैन की गई वेबसाइट या ऐप का एक्सेस ब्लॉक नहीं करें तो उन पर कार्रवाई की जा सकती है।
- खुद टेलीग्राम या अन्य टेक कंपनियां, जो सरकार के चिन्हित किए गए गैर-कानूनी कंटेंट, चैनलों या लिंक्स को अपने प्लेटफॉर्म से हटाने से मना कर दें।
- Google Play Store और Apple App Store, यदि वे सरकार के आदेश के बाद भी प्रतिबंधित ऐप को अपने स्टोर पर डाउनलोड के लिए उपलब्ध रखें।
आईटी की धारा 69ए की आलोचना क्यों होती है?
केंद्र सरकार देश की सुरक्षा और संप्रभुता का हवाला देकर इस धारा का प्रयोग करती है, लेकिन कई लोगों का आरोप है कि सरकार लोगों की आवाज दबाने के लिए इसका इस्तेमाल करती है। डिजिटल राइट्स एक्टिविस्ट्स, कुछ न्यायविद और आम नागरिक इसकी कड़ी आलोचना कर चुके हैं। इस धारा का विरोध करने वाले अक्सर आरोप लगाते हैं कि-

क्या धारा 69ए को चुनौती दी जा सकती है?
तो इसका उत्तर हैं हां। भारत का संविधान नागरिकों को यह कानूनी अधिकार देता है कि यदि सरकार इस धारा का गलत इस्तेमाल करती है, तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सके।
➤यदि सरकार किसी ऐसे कंटेंट या अकाउंट को ब्लॉक करती है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है, बल्कि केवल सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहा है। इसे अनुच्छेद 19(1)(a) (Freedom of Speech) का उल्लंघन माना जाता है।
➤ यदि सरकार ने प्रभावित पक्ष (कंटेंट क्रिएटर या वेबसाइट मालिक) को नोटिस दिए बिना या उसका पक्ष सुने बिना सीधे आपातकालीन बैन लगा दिया हो।
पिछले केस
➤टेलीग्राम ने अपने ऊपर नीट-2026 परीक्षा तक यानी 22 जून तक लगे बैन को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी,लेकिन कोर्ट ने सरकार के फैसले को उचित ठहराते हुए अस्थाई रोक को सही ठहराया था। 23 जून से टेलीग्राम पर लगा बैन हट गया।
➤श्रेयस सिंघल बनाम भारत सरकार (2015): इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट में धारा 69A को चुनौती दी गई थी। हालांकि, कोर्ट ने इस धारा को रद्द नहीं किया, लेकिन यह साफ किया कि सरकार इसका इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं कर सकती और ब्लॉकिंग के आदेशों के खिलाफ अदालत जाने का अधिकार हमेशा रहेगा।
➤ट्विटर (X) बनाम भारत सरकार (2022-2023): ट्विटर ने कर्नाटक हाई कोर्ट में सरकार के कई ब्लॉकिंग ऑर्डर्स को चुनौती दी थी। ट्विटर का तर्क था कि सरकार उसे पूरे के पूरे अकाउंट ब्लॉक करने को कह रही है, जबकि कानूनन केवल विवादित ट्वीट या विशिष्ट यूआरएल (URL) को ही ब्लॉक किया जा सकता है। अदालत ने अपने फैसले में न सिर्फ ट्विटर की दलीलों को खारिज कर दिया, बल्कि वक्त बर्बाद करने और सरकारी आदेशों का पालन न करने पर 50 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
मैसेजिंग ऐप तो कई हैं, टेलीग्राम पर ही बैन क्यों?
अगर आप नहीं जानते हैं तो जान लीजिए कि टेलीग्राम (Telegram) एक क्लाउड-बेस्ड (Cloud-based) इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म है। यह व्हाट्सएप की तरह ही काम करता है, लेकिन अपने खास एडवांस फीचर्स और फाइल शेयरिंग कैपेसिटी के कारण दुनिया भर में काफी लोकप्रिय है। इससे आप आसानी से फोटो वीडियो ऑडियो भेज सकते हैं। फाइल और डॉक्यूमेंट्स भी भेज सकते हैं। इसे वॉट्सऐप का विकल्प कहें तो गलत नहीं होगा। वॉट्सऐप की तुलना में टेलीग्राम के जरिए भारी भरकम फाइल भेजना आसान है। कोई भी व्यक्ति ग्रुप बनाकर लोगों को जोड़ सकता है। इसकी लगभग कोई लिमिट नहीं है। छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कैंडिडेट्स, मूवी और कंटेंट लवर्स, बिजनेस और डिजिटल मार्केटर्स, क्रिप्टो और टेक कम्युनिटी और सेंसरशिप से बचने वाले लोग इसका ज्यादा यूज करते हैं।
भारत सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000) की धारा 69A के तहत जब टेलीग्राम को बैन करने का आदेश दिया तो सबसे पहला सवाल तो यही उठा कि आखिर इसी को ही क्यों चुना गया? टेलीग्राम को बैन करने के पीछे 4 सबसे बड़े तकनीकी और सुरक्षा कारण सामने आए-
1. टेलीग्राम में एक ‘मैसेज एडिट फीचर होता है। इसमें किसी भी पुराने मैसेज या पीडीएफ को भेजने के बाद भी ‘एडिट’ किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात कि ऐसा करने पर भी उसका असली टाइमस्टैम्प (भेजने का समय) नहीं बदलता। धोखाधड़ी करने वाले लोग इसका फायदा उठाकर “बैकडेटेड स्कैम” (Backdated Scam) कर रहे थे। उदाहरण के लिए इसे ऐसे समझिए कि परीक्षा से पहले जालसाजों ने खास टेलीग्राम चैनल पर क्वेश्चन पेपर डालकर पोस्ट कर दिया। जैसे ही एग्जाम खत्म हुआ, उस पोस्ट को एडिट किया और पेपर की जगह कोई और पीडीएफ डाल दिया। इससे पता ही नहीं चलता कि उस पोस्ट पर क्वेश्चन पेपर लीक हुआ भी था या नहीं।
2. वॉट्सऐप से इतर टेलीग्राम पर ग्रुप बनाना ज्यादा आसान है। इस पर जुड़ने वाले लोगों की संख्या 2 लाख तक हो सकती है। इससे जालसाजों को किसी भी परीक्षा का पेपर बड़ी संख्या में लोगों तक सर्कुलेट करना आसान होता है।
3. टेलीग्राम पर बिना मोबाइल नंबर दिखाए केवल ‘यूजरनेम’ के जरिए चैनल और ग्रुप बनाए जा सकते हैं। इससे जालसाजों को अपनी पहचान छुपाना आसान हो जाता है। इसके अलावा, पेपर लीक माफिया वीपीएन (VPN) का इस्तेमाल करके अपनी डिजिटल लोकेशन भी छुपा लेते थे। यही वजह है कि पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए इन अपराधियों को ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो रहा था।

कंपनियों का सुरक्षा कवच
आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत, सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाता था। यानी अगर कोई यूजर कुछ गलत पोस्ट करे, तो पुलिस कंपनी को गिरफ्तार नहीं करती थी। नए नियमों के अनुसार, अगर कोई कंपनी ऊपर बताए गए नियमों (जैसे 3 घंटे में कंटेंट हटाना या लेबल लगाना) का पालन नहीं करती है, तो उसका यह सुरक्षा कवच (Safe Harbour) खत्म हो जाएगा। इसके बाद कंपनी के अधिकारियों पर भी आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है।
AI बदलावों पर भी नजर
AI डीपफेक
हाल के समय में AI डीपफेक एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। एआई डीपफेक ने बीते साल में कैसे खतरनाक हो चला था,किसी से छिपा नहीं है। बड़े-बड़े सेलिब्रेटीज के शरीर से ऑनलाइन छेड़छाड़ कर उनका फर्जी वीडियो बनाने के केस खूब आए। इसके बाद सरकार को इसे लेकर नियम लाना पड़ा। AI‑generated और deepfake कंटेंट को लेकर सरकार ने सीधे निर्देश दिए हैं कि इन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से तीन घंटे के भीतर हटाना होगा। इसके अलावा जो भी एआई से कंटेंट बने उसकी लेबलिंग जरूरी है मतलब आपका वीडियो और इमेज अगर एआई से बना है तो उसकी लेबलिंग जरूरी है और वो भी स्पष्ट रूप से।
ऑटोमेटेड टूल्स
सरकार का साफ कहना है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स (ट्विटर) जैसी बड़ी कंपनियों को ऐसे ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर/टूल्स तैनात करने होंगे जो अपलोड होते ही हानिकारक एआई कंटेंट को पहचान सकें और रोक सकें। कंपनियों को अब खुद से यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल गैर-कानूनी डीपफेक बनाने या फैलाने के लिए न हो।




