
दुनिया का ग्लोब घुमाइए। आर्कटिक, धरती के उत्तरी ध्रुव के पास का वो इलाका दिखाई देगा, जहां भयानक ठंड पड़ती है। समंदर और पहाड़ बर्फ से ढके नजर आते हैं। तेल और गैस ही नहीं, यहां कई दुर्लभ खनिजों का भंडार भरा पड़ा है। आर्कटिक में साल के 10 महीने सर्दी पड़ती है, इसलिए यहां धरती के अंदर से तेल निकालना बेहद मुश्किल काम होता है। अब आप अंदाजा लगाइए, इस इलाके में सैकड़ों फीट नीचे से तेल निकालना कितना चुनौतीपूर्ण होगा।
जी हां, रूस में माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में आर्कटिक की धरती से तेल निकालने की प्रक्रिया आपको हैरान कर देगी। सर्दी का आलम यह होता है कि 6 महीने सूरज क्षितिज के ऊपर बिल्कुल नहीं उगता और पोलर नाइट जैसी स्थिति का अनुभव होता है। कई बार बर्फ की मोटाई 2 मीटर या उससे भी ज्यादा हो जाती है। यह बर्फ हमॉक बनाती है। हमॉक बर्फ के ढेरों को कहते हैं।
प्रॉब्लम एक नहीं है
आर्कटिक में गाड़ियों के लिए कोई बेस स्ट्रक्चर नहीं बन पाता है।
तेल प्लेटफॉर्म आसानी से काम नहीं करता, क्योंकि इस पर लगातार बर्फ बहती रहती है और इसी के बीच तेल कर्मचारियों को काम करना पड़ता है।
तेल निकालने के समय सुरक्षा का ख्याल रखना सबसे जरूरी होता है।
चिंता बनी रहती है कि अगर बर्फ के बहने की गति तेज हुई, तो 10 मीटर से ज्यादा ऊंचाई तक उठने वाली लहरों के प्रभाव से कैसे बचा जाए?
ऐसी स्थिति में कर्मचारियों के बहने या उसकी चपेट में आकर घायल होने या लापता होने का खतरा रहता है।
बर्फ की चट्टान बनती है मुसीबत
परमाफ्रोस्ट यानी बर्फ की मजबूत जमीनी चट्टान समझ लीजिए। ऐसी जमीन, जहां कम से कम 2 साल या उससे भी ज्यादा समय तक बर्फ जमी रहती है। इसमें पानी और मिट्टी, चट्टानों के बीच बर्फ के रूप में जमा रहते हैं। इसे लैंड ऑफ परमाफ्रोस्ट कहते हैं। यह आर्कटिक क्षेत्रों में होती है, जैसे- रूस का साइबेरिया सबसे बड़ा परमाफ्रोस्ट क्षेत्र कहा जाता है। इसी तरह अमेरिका का अलास्का, उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड, नार्वे और स्वीडन के भी आर्कटिक हिस्से पर भी परमाफ्रोस्ट लैंड पाई जाती है। परमाफ्रोस्ट लैंड में तेल, गैस, हीरा और सोना पाया जाता है। हालांकि, यहां से इन खनिजों को निकालना भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से बेहद जटिल होता है।
परमाफ्रोस्ट की स्थिति में तेल रिसाव बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। अगर यही तेल बर्फ की परत के नीचे चला जाए तो खुले पानी वाली तकनीकों (यानी स्किमर्स और बूम्स जैसे यंत्र) का इस्तेमाल कर पाना लगभग असंभव हो सकता है। यही वजह है कि एक्सपर्ट कहते हैं कि ऐसे क्षेत्रों में तेल का उत्पादन उस वक्त करना उचित रहता है, जब तेल के कुएं पूरी तरह से महासागर से अलग-थलग हो गए हों। आर्कटिक क्षेत्रों में खनन की एक बड़ी खामी यह भी है कि ऐसी परिस्थितियों में बनाए गए आर्टिफिशियल द्वीप की ढलानों को लहरों और बर्फ के कटाव से बचाना असंभव होता है, इसलिए यह काम बहुत रिस्की हो सकता है।
रूस के पास कितना बड़ा है तेल का भंडार?
वैसे तो, रूस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, लेकिन निश्चित तेल भंडार (Proven Oil Reserves) के मामले में वह दुनिया में 9वें स्थान पर है। रूस का निश्चित तेल भंडार करीब 80 अरब बैरल का है। साल 2025 के आंकड़ों पर गौर करें तो दुनिया के कुल निश्चित तेल भंडार में रूस का हिस्सा 4.53 फीसदी है। दुनिया के पास कुल निश्चित तेल भंडार करीब 1765 अरब बैरल है। इससे पूरे विश्व में तेल की जरूरतें पूरी होती हैं। इतना ही नहीं, इसी में से ही दुनिया के तमाम देश विषम परिस्थितियों के लिए ऑयल रिजर्व भी रखते हैं ताकि संकट के समय यह उनके काम आ सके।

आर्कटिक में रूस के पास कितना भंडार
रूस सबसे ज्यादा तेल और गैस परमाफ्रोस्ट की भूमि में निकालता है। यह आर्कटिक क्षेत्र में है। रशियन फेडरेशन के आंकड़ों के अनुसार रूस के आर्कटिक शेल्फ में तेल और गैस का बहुत विशाल भंडार है। यह इतना बड़ा है कि 2050 तक देश के कुल तेल उत्पादन का 20-30 फीसदी हिस्सा यहीं से आ सकता है। यहां तेल और गैस के भंडार इतने ज्यादा हैं कि बहुत से भंडारों की अभी तक मैपिंग नहीं हो गई है। इससे आप आर्कटिक में रूसी तेल और गैस के विशाल भंडारों का अंदाजा लगा सकते हैं। रूस के सुदूर उत्तर में पारंपरिक खनिजों को निकालने की तकनीकें व्यावहारिक नहीं हैं। यहां एक्स्ट्रीम जलवायु परिस्थितियां अपना बड़ा असर दिखाती हैं। इन कठोर जलवायु परिस्थितियों में हाइड्रोकार्बन का निकलना मौजूदा पारंपरिक तकनीकों को सूट नहीं करता।

काम करते हुए ही कई बार ढह जाते हैं द्वीप
आर्कटिक क्षेत्रों से तेल या गैस निकालना कंपनियों के लिए टेढ़ी खीर जैसा है, इसीलिए ज्यादातर कंपनियां समुद्र तल से तेल और गैस निकालने के विकल्प को चुन रही हैं। कनाडाई आर्कटिक के उथले हिस्सों में ऐसे द्वीपों पर काम करते समय वे बहुत तेजी से ढह जाते हैं। अब तक इन संरचनाओं की सुरक्षा की समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सका है। ऐसे में कर्मचारियों का जीवन बहुत मुश्किल में होता है इसीलिए आर्कटिक शेल्फ विकसित करने वाली तेल और गैस कंपनियों ने समुद्र तल से तेल और गैस निकालने का विकल्प चुनना शुरू कर दिया है।
समुद्र से कैसे निकालते हैं तेल?
यह तकनीक समुद्र तल में कुओं को पूरी तरह से अलग करने पर आधारित है। इसे सब-सी इंस्टॉलेशन्स कहा जाता है। इसमें करीब 5 लाख टन तक वजनी प्लेटफॉर्म्स को सीधे समुद्र तल पर स्थापित कर दिया जाता है। इसके आधार के चारों ओर मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए मजबूत पत्थरों की किनारी बनाई जाती है। इसका उदाहरण प्रिराजलोम्नाया फील्ड के प्लेटफॉर्म हैं। प्लेटफॉर्म को तेल और गैस रिसाव रोकथाम प्रणाली से भी लैस किया गया है। यह सिस्टम पूरी तरह स्वचालित होता है और खतरे की स्थिति में कुछ ही सेकंड में सभी कुओं को बंद कर देने की क्षमता रखता है, ताकि रिस्क को कम से कम किया जा सके।
तेल निकालना क्यों है चुनौती?
यहां तेल निकालने के बीच सबसे बड़ी चुनौती परमाफ्रोस्ट और भीषण ठंड के कारण होती है। परमाफ्रोस्ट 800 मीटर तक मोटी जमी हुई विशेष परत को कहते हैं, जो बहुत ठोस होती है। यहां सर्दियों में उपकरण जाम हो जाते हैं, तेल जम जाता है, परमाफ्रोस्ट के पिघलने का खतरा रहता है। इससे तेल निकालने के लिए बनाया गया स्ट्रक्चर समुद्र में डूब सकता है। ऐसे में धरती से तेल निकालने के लिए बहुत जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

पहले क्या करते हैं?
सबसे पहले जमी हुई बर्फ पर 3डी भूकंपीय सर्वेक्षण किया जाता है।
यह जमीन के नीचे की संरचना की 3डी इमेज बनाता है।
इससे संभावित तेल-गैस के भंडार का पता चलता है।
चट्टानों की परतें, दरारें और परमाफ्रोस्ट संरचना के बारे में पता चलता है।
डेटा प्रोसेसिंग के बाद पूरा 3डी मॉडल तैयार होता है।
सर्वे के बाद ड्रिलिंग
- सर्वे के बाद ड्रिलिंग प्रक्रिया में पहले 1.2 मीटर से ज्यादा मोटी जमी बर्फ पर कंपन पैदा किया जाता है।
- इस दौरान हजारों जियोफोन्स (संवेदक) बर्फ पर ग्रिड के पैटर्न में लगाए जाते हैं।
- तरंगे नीचे जाती हैं और चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं और रिकॉर्ड होती हैं।
- ड्रिलिंग करने के लिए विशेष आर्कटिक क्लास रिग्स का इस्तेमाल किया जाता है।
- इसमें आइसब्रेकर जहाज आगे चलता है और बर्फ को तोड़ता है।
- इस दौरान एयरगन ऐरे का इस्तेमाल पानी के अंदर धमाके करने के लिए किया जाता है।
- ड्रिलिंग के लिए फिशबोन या होरिजोन्टल वेल्स (कुएं) ड्रिल किए जाते हैं।
- परमाफ्रोस्ट को पिघलने से बचाने के लिए थर्मोकेसेज, इंसुलेटेड ट्यूबिंग और थर्मोसाइफोन्स लगाए जाते हैं।
ड्रिलिंग के बाद प्रोडक्शन
ड्रिलिंग पूरी होने के बाद धरती से तेल निकालने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें ट्यूबिंग और पम्पिंग तरीका अपनाया जाता है।
प्राकृतिक दबाव से तेल ऊपर आता है। कम दबाव होने पर आर्टिफिशियल लिफ्ट या गैस लिफ्ट का इस्तेमाल करते हैं।
हाई विस्कोसिटी (तेल गाढ़ा) होने पर स्टीम इंजेक्शन या सरफैक्टैंट बेस्ड ईओआर (एन्हैंस्ड ऑयल रिकवरी) तकनीक का इस्तेमाल होता है।
इस तकनीक में विशेष रासायनिक पदार्थ तेल भंडार में जाकर तेल और पानी के बीच का तनाव कम करते हैं।
निकाले गए तेल को गर्म पाइपलाइन या आर्कटिक डीजल से चलने वाले टैंकरों के जरिये निर्यात किया जाता है।
इसके बाद तेल को रूस के ऑफशोर ऑयल प्रोडक्शन प्लेटफॉर्म प्रिराजलोम्नाया (Prirazlomnaya) प्लेटफार्म में इकट्ठा किया जाता है।
इसे आर्कटिक के पेचोरा सागर में बनाया गया है। इसे बर्फीले वातावरण में कच्चे तेल के उत्पादन के लिए खासतौर पर डिज़ाइन किया गया है।




