
4625 kHz पर, रूस के रेडियो पर एक धीमी, मशीनी भिनभिनाहट लगातार गूंजती रहती है। ये आवाज दिन-रात, सर्दी-गर्मी, सीमाओं के पार और दशकों से गूंज रही है। लगभग सम्मोहित कर देने वाली, एक जैसी आवाज। कभी-कभी लड़खड़ाती, कभी छोटा सा पॉज लेती… फिर शोर के बीच से आवाज उभरती- “मैं 143 हूं, कोई जवाब नहीं मिल रहा है।” फिर – सन्नाटा। और कुछ देर बाद वही भिनभिनाहट फिर से शुरू हो जाती है। 1970 के दशक के आखिर से ऐसा ही चला आ रहा है, बिना रुके, बिना थके...
ये रेडियो ट्रांसमिशन कहां से आ रहा है, कौन कर रहा है, क्यों कर रहा है? ये अभी तक रहस्य है। आधिकारिक जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है। न तो रेडियो स्टेशन की कोई पहचान, न कोई क्लियेरिटी, और न ही कोई जाहिर मकसद। दुनिया भर के रेडियो के शौकीन इसे ‘द बजर’ (The Buzzer) कहते हैं। पिछले 50 वर्षों में इस सिग्नल को लेकर कई तरह की कहानियां और मिथक गढ़े जा चुके हैं। ये रूसी रेडियो सिग्नल दुनिया के लिए एक पहेली बना हुआ है।
क्या ये ‘डेड मैन स्विच’ की आवाज है?
कुछ लोगों को आशंका है कि यह आवाज सोवियत-युग के ‘डेड मैन स्विच’ (dead man’s switch) का हिस्सा है। इसके बारे में किवदंतियां हैं कि ये ऐसा अंतिम-उपाय वाला न्यूक्लियर सिस्टम है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि अगर रूस की लीडरशिप कारगर न रहे तो यह अपने आप जवाबी हमला कर दे। कई लोगों को लगता है कि यह रेडियो ट्रांसमिशन अपने जासूसों से संपर्क करने का कोई जरिया हो सकता है, या शायद एलियंस से संपर्क करने का? इसे लेकर इतनी थ्योरी हैं जो कभी अजीब, तो कभी बिल्कुल बेतुकी नजर आती हैं।
कोला सुपरडीप बोरहोल
कोल्ड वॉर के कई गहरे रहस्यों की तरह, इस रहस्य की असली ताकत इस बात में नहीं है कि हम क्या जानते हैं बल्कि इसमें है कि हम क्या नहीं जानते। कोला सुपरडीप बोरहोल की तरह- सोवियत संघ की वो असली ड्रिलिंग परियोजना जिसने ‘नरक से आने वाली आवाज’ जैसी शहरी किंवदंतियों को जन्म दिया। ‘द बज़र’ भी फैक्ट और इमेजिनेशन, सीक्रेसी और अटकलों के बीच की उस संभावनाओं की धुंधली दुनिया में मौजूद है।
पश्चिम में, शीत युद्ध का इतिहास अक्सर अच्छी तरह से डॉक्यूमेंटेड और सार्वजनिक है। लेकिन सोवियत-युग के कई प्रयोग अभी भी मिथकों, अफवाहों और जान-बूझकर साधी गई चुप्पी की परतों के नीचे दबे हुए हैं। इस धुंधलेपन ने सोवियत-बाद की लोककथाओं की एक अनोखी शैली को जन्म दिया है जो रहस्यमयी, माहौल बनाने वाली और बेहद दिलचस्प है।
‘नरक की चीखों’ की कहानी
इन रहस्यमयी कहानियों के संग्रह में एक सबसे चर्चित कहानी 2000 के दशक के मध्य में ऑनलाइन सामने आई थी। यह कहानी आज भी इंटरनेट के कुछ कोनों में घूमती रहती है। इस कहानी पर यकीन करें तो सोवियत वैज्ञानिकों की एक टीम साइबेरिया की जमी हुई बर्फीली धरती (Permafrost) में काफी गहराई तक ड्रिलिंग कर रही थी, तभी वो एक ऐसी चीज तक पहुंच गए जिसकी उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। इतनी अधिक गहराई पर तापमान अचानक से बहुत तेज़ी से बढ़ गया। कहा जाता है कि यह गहराई मारियाना ट्रेंच से भी अधिक थी।
नॉलेज फैक्ट
मारियाना ट्रेंच क्या है?
मारियाना ट्रेंच पृथ्वी पर महासागरों की सबसे गहरी खाई या गर्त है। यह प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में मारियाना द्वीप समूह के पूर्व में स्थित है। यह स्थान हमारे ग्रह की सतह पर सबसे निचला प्वाइंट है। इसकी अधिकतम गहराई लगभग 10,994 मीटर है। इसके सबसे गहरे बिंदु को चैलेंजर डीप कहते हैं।
आगे कहानी बताती है कि इतनी गहराई में अचानक इस बदलाव की वजह जानने के लिए वैज्ञानिकों ने उत्सुकतावश उस बोरहोल में एक ऐसा माइक्रोफोन नीचे उतारा जो बहुत अधिक गर्मी भी झेल सकता था। जो वापस आया, वह... अस्वाभाविक था। चीखें। हजारों चीखें। गहरी खाई से गूंजती हुई, दर्द से कराहती हुई अस्पष्ट आवाजें। कहानी के अनुसार, साइंटिस्ट या तो पागल हो गए, या फिर डर के मारे उस जगह से भाग खड़े हुए। ‘नरक से आती आवाजों’ की यह कहानी, इंटरनेट पर तुरंत ही एक क्लासिक बन गई।
कोला सुपरडीप बोरहोलः एक सच्चाई
यह कहानी शीत युद्ध के डर, बेचैनी और सोवियत-बाद के रहस्यों का एक अनोखा मेल साबित हुई। सच्चाई ये है कि वहां बस एक बोरहोल था। ‘कोला सुपरडीप बोरहोल’ एक असली वैज्ञानिक प्रयास था और यह सचमुच मारियाना ट्रेंच से भी अधिक गहराई तक पहुंचा था। तापमान में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। हालांकि ये किसी ‘पाताल लोक के दरवाजे’ की वजह से नहीं, बल्कि पृथ्वी के ‘जियोथर्मल ग्रेडिएंट’ के कारण हुआ था। कोई चीख रिकॉर्ड नहीं हुई थी। कोई वैज्ञानिक डर कर भागा नहीं था।
बहरहाल 1990 के दशक की शुरुआत में, जब उपकरणों की लागत बहुत अधिक बढ़ गई तो इस प्रोजेक्ट को चुपके से बंद कर दिया गया। प्रोजेक्ट बंद हो गया, फिर भी ये मिथक बना रहा। इसकी वजह थी कि यह महज जिज्ञासा से कहीं अधिक गहरी किसी चीज से जुड़ा था। यह उस अज्ञात, भयानक और आधिकारिक स्पष्टीकरणों के नीचे छिपी उस रहस्यमयी दुनिया को जगाता था। और ठीक वैसा ही एहसास, वही गहरा आकर्षण, ‘द बजर’ (The Buzzer) के इर्दगिर्द भी बना हुआ है।
‘मैं 143 हूं...’
फ्रीक्वेंसी 4625 किलोहर्ट्ज आज भी मौजूद है और कोई भी इसे सुन सकता है। हालांकि लगातार भिनभिनाहट के अलावा कुछ और सुनने की संभावना बहुत कम है। कभी-कभी, यह भिनभिनाहट कुछ हफ्तों या महीनों में आने वाले छोटे शब्दों और संदेशों से बाधित हो जाती है। shlikomops या verhojom जैसे बेतुके शब्द। Hryukostyag या bezzlobie जैसे अजीब कवितामय शब्द। लेकिन एकमात्र समझ में आने वाला वाक्य है- “मैं 143 हूं। कोई जवाब नहीं मिल रहा है।” यह 1997 में रिकॉर्ड किया गया था। उसके बाद से ऐसा कुछ भी सुनने को नहीं मिला है।
एक ही दिन में 18 मैसेज
30 जून, 2025 को मॉस्को समय के अनुसार दोपहर 12:57 बजे, दिन का पहला शब्द शोर के बीच से सुनाई दिया: zevoseul। बाद में दोपहर 2:26 बजे एक और शब्द प्रसारित हुआ: trunonord। कुछ समय पहले 25 जून को The Buzzer ने एक ही दिन में 18 अलग-अलग संदेश प्रसारित किए थे। इनमें bueroprysh, khryakokhrych और kranofai शामिल थे। हमेशा की तरह, इसके बाद कुछ भी क्लियर नहीं था। कोई पैटर्न भी सामने नहीं आया।
इस स्टेशन को UVB-76 कहा जाता है। कहा जाता है कि यह मूल रूप से लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) के पास से ट्रांसमिट होता था। हालांकि 2010 में कुछ समय के लिए यह शांत हो गया था। इसके बाद इसने एक नई जगह से अपना ऑपरेशन फिर से शुरू किया, संभवतः मॉस्को के आस-पास कहीं से।

इसके ट्रांसमिशन का मकसद अब भी एक रहस्य है, लेकिन सबसे चर्चित थ्योरी यह बताती है कि यह मिलिट्री इस्तेमाल के लिए कोडेड मैसेज भेजता है। इस बात की कभी भी आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई है, क्योंकि रूसी अधिकारियों ने इसके अस्तित्व पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
इसका कोई रजिस्टर्ड प्राइवेट ओनर नहीं है। ऐसे में इस रेडियो स्टेशन के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। कई मिलिट्री एक्सपर्ट्स आशंका जताते है कि यह ‘पेरिमीटर’ नाम के एक सिस्टम का हिस्सा हो सकता है, जिसे आम तौर पर ‘डेड हैंड’ के नाम से जाना जाता है।
ऑटोमेटिक परमाणु जवाबी सिस्टमः पेरिमीटर
कहा जाता है कि पेरिमीटर (Perimeter) एक बैकअप ऑटोमेटिक परमाणु जवाबी सिस्टम है। इसे 1980 के दशक के दौरान USSR में विकसित किया गया था। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यदि किसी परमाणु हमले के शुरुआती मिनटों में ही कमांड सेंटर नष्ट हो जाए तो यह अपने आप सक्रिय होकर जवाबी कार्रवाई कर सके।
यह सिस्टम भूकंपीय एक्टिविटी, रेडिएशन लेवल और कमांड सेंटरों के साथ संपर्क न होने की स्थिति का विश्लेषण करता है। यदि न्यूक्लियर हमले के संकेत कन्फर्म होते हैं तो पेरिमीटर बैकअप कम्युनिकेशन के जरिए मिसाइल लॉन्च के आदेश जारी कर सकता है। लेकिन इसके प्रभावी ढंग से काम करने के लिए विश्वसनीय कम्युनिकेशन बेहद जरूरी है।
इस सिस्टम के बारे में शुरुआती जानकारी 1980 के दशक में सामने आई थी। 1990 के दशक तक, एक्सपर्ट्स ने इससे जुड़ी कुछ सीक्रेट जानकारी को पब्लिक करना शुरू कर दिया था। रूसी जनरल और रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के पूर्व सलाहकार दिमित्री वोल्कोगोनोव ने इनडायरेक्ट रूप से इसके अस्तित्व की पुष्टि की थी।
डूम्सडे रेडियो
ऐसे दावे हैं कि ‘द बजर’ इसके मुख्य संचार केंद्रों में से एक के तौर पर काम करता है। यही वजह है कि इसे ‘डूम्सडे रेडियो’ (Doomsday Radio) जैसा खौफनाक निकनेम मिला है। स्टेशन को मिलिट्री ऑपरेशन से जोड़ने वाली थ्योरी को इस फैक्ट से सपोर्ट मिलता है कि प्रमुख अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के बाद यह ‘बज’ अक्सर बाधित हो जाता है। उदाहरण के लिए, इस्तांबुल में हुई बातचीत के ठीक बाद ‘hryukostyag’ और ‘bezzlobie’ संदेश प्रसारित किए गए थे।
क्या ये डराने का हथियार है?
इस रहस्यमयी आवाज की एक कम गंभीर वजह भी हो सकती है। हो सकता है कि यह शायद सिर्फ़ डराने-धमकाने के एक हथियार के तौर पर काम करती हो। नेताओं के सीधे आदेश के बिना मिसाइल लॉन्च के प्रोटोकॉल पहले ही अविश्वसनीय साबित हो चुके हैं।
सबसे कुख्यात घटना 1983 में हुई थी। उस समय वॉर्निंग सिस्टम ने गलती से यह संकेत दिया कि अमेरिका ने बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च कर दी हैं। USSR ने जवाबी हमले की तैयारी शुरू कर दी थी। लेफ्टिनेंट कर्नल स्टानिस्लाव पेत्रोव ने इसे रुकवाया था। उन्होंने भांप लिया था कि सिस्टम में कोई खराबी आ गई है और उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को इस बारे में बताया था।
कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसी घटनाओं के चलते ‘पेरिमीटर’ प्रणाली अब चालू नहीं है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
सीक्रेट एजेंट से कॉन्टेक्ट का जरिया?
जाहिर है, कुछ लोग इससे संतुष्ट नहीं हुए। पिछले 50 साल में कई लोगों ने ‘द बजर’ के रहस्य पर कई दिलचस्प थ्योरी पेश कीं। कुछ कंजर्वेटिव थ्योरी दावा करती हैं कि यह रेडियो स्टेशन विदेशों में सीक्रेट तरीके से काम कर रहे रूसी एजेंटों को, या सरकार के उन सुरक्षित बंकरों को सिग्नल भेजता है, जहां युद्ध की स्थिति में अधिकारी शरण ले सकते हैं।

लेकिन ये छिपा राज नही है कि रूस के पास सीक्रेट सर्विसेज और नेताओं के लिए गुप्त ठिकाने हैं, और इस स्टेशन से भेजे जाने वाले बेतरतीब संदेश, रूसी एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कोड से कुछ हद तक मिलते-जुलते हैं। ये मिलिट्री कम्युनिकेशन के तरीकों से भी मिलते-जुलते हैं। लेकिन आमतौर पर रूसी आर्म्ड फोर्सेज अमेरिकियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ‘ब्रोकन ऐरो’ या ‘बेंट स्पीयर’ जैसे शब्दों की तुलना में कम कवितामय कोड को प्रायोरिटी देते हैं।
तबाही का रास्ता या एलियंस से संबंध?
एक थ्योरी कहती है कि ये रहस्यमय स्टेशन एक रहस्यमयी प्रलय पंथ से जुड़ा था। इसमें सोवियत सैन्यकर्मी और राजनेता शामिल थे जो सर्वनाश की प्रतीक्षा में थे। कई सोवियत नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वो गुप्त विद्या जानते थे। ओजीपीयू और एनकेवीडी ने पैरा साइकोलॉजी, साइकोलॉजी, साइक्लोजिकल वेपन्स और यहां तक कि टेलीपैथी की संभावनाओं का पता लगाया। सोवियत संघ में, खासतौर से USSR के आखिरी दिनों में अजीबोगरीब संप्रदाय और पंथ उभरे। अमराम शम्बाला ने तो सेना में घुसपैठ का भी प्रयास किया। हालांकि ये प्रयास ज्यादा सफल नहीं हुए और ये पंथ हाशिए पर ही रहे।
कुछ सिद्धांत दावा करते हैं कि ‘द बजर’ एलियंस से संपर्क का जरिया है। सोवियत संघ ने अंतरिक्ष में कुछ संदेश भेजे थे। 1962 में डीप स्पेस कम्युनिकेशन सेंटर से ‘शांति’, ‘लेनिन’ और ‘यूएसएसआर’ शब्दों वाले सिग्नल भेजे गए थे। वो शुक्र ग्रह से टकराकर पृथ्वी पर वापस आए। लेकिन इस प्रयोग का उद्देश्य ग्रहों के रडार सिस्टम को चेक करना था, न कि एलियन सभ्यताओं तक पहुंचना।
फ्रीक्वेंसी में छिपा सीक्रेट मैसेज
लंबे समय तक UVB-76 स्टेशन में सिर्फ सेना से जुड़े और शौकिया लोगों ने ही दिलचस्पी दिखाई। लेकिन हाल के वर्षों में इसने अधिक ध्यान खींचना शुरू किया है। लेकिन सही जानकारी नहीं होने और सेना के सीक्रेट्स पर गहरे गुप्त रहस्यों की परत चढ़ी होने से कई लोग अपनी खुद की व्याख्याएं गढ़ना शुरू कर देते हैं, जो समय के साथ सच लगने लगते हैं। रेडियो की इस बेमतलब की भिनभिनाहट का क्या कोई मतलब है भी, क्या पता।
(लेखक वादिम जगोरेन्को मॉस्को स्थित कॉलमिस्ट हैं जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और मीडिया ट्रेंड्स पर लिखते हैं।)




