
परमाणु बम का नाम सुनते ही दिमाग में डर, दहशत और तबाही की तस्वीर उभरती है। लोग इसे महाविनाश का दूसरा नाम मानते हैं। दुनिया इसकी तबाही हिरोशिमा और नागासाकी में देख चुकी है। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा पल भी दर्ज है, जब रूस (सोवियत संघ) ने परमाणु बम का इस्तेमाल तो किया, लेकिन एक भयंकर आपदा को रोकने और शांति कायम करने के लिए। पाताल से फूट रही भीषण आग को बुझाने का हर वैज्ञानिक तरीका फेल हो चुका था। फिर वो हुआ, जिसने करीब 3 साल से धधक रही ‘पाताल की ज्वाला’ को कुछ ही मिनटों में शांत कर दिया। ये कहानी है उसी शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट की।
सोवियत संघ का पहला परमाणु परीक्षण
साल था 1949, सोवियत संघ (USSR) ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। यह सोवियत संघ ही नहीं, दुनिया के लिए एक नए युग का आगाज था। लेकिन इसी के साथ इसने लोगों के मन में एक डर भी बिठा दिया। शीत युद्ध के साए में जी रही दुनिया अगले 40 वर्षों तक इस डर से सहमी रही कि कहीं अमेरिका और रूस के बीच परमाणु युद्ध न छिड़ जाए। न्यूक्लियर पावर ने वैश्विक राजनीति को एक नया रूप दे दिया था।
परमाणु ताकत का शांतिपूर्ण इस्तेमाल
परमाणु ताकत एक तरफ सैन्य जनरलों और राजनेताओं के दिमाग में नई-नई योजनाओं को जन्म दे रही थी, वहीं सोवियत संघ के वैज्ञानिकों के मन में भी ये विचार चल रहे थे कि इस ताकत का इस्तेमाल देश को आगे बढ़ाने में किस तरह से किया जा सकता है। 1950 के दशक में ये विचार और मजबूत हुआ। वैज्ञानिकों ने पीसफुल न्यूक्लियर एक्सप्लोशंस (PNE) यानी शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोटों का एक पूरा खाका खींचा। इसके तहत अंडरग्राउंड 124 परमाणु विस्फोट किए गए।
विकास के लिए 124 विस्फोट
कहां: सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने जमीन के बहुत नीचे परमाणु बमों से 124 धमाके किए। ये कई समस्याओं का समाधान साबित हुए।
मकसद: इन धमाकों का उद्देश्य तबाही मचाना या नए परमाणु प्रयोग करना नहीं बल्कि विकास के नए रास्ते खोलना था।
फायदा: इन धमाकों से बड़े जलाशय बनाए गए, धरती के गर्भ में छिपे खनिजों तक पहुंच मिली और गैस स्टोर करने की जगह बनाई गईं।
लेकिन परमाणु बम का एक बेहद हैरान करने वाला इस्तेमाल अभी बाकी था।
जब धरती का सीना चीरकर निकली ज्वाला
1960 के दशक में सोवियत संघ ने तेल और गैस के बड़े भंडार खोजे। खासकर पश्चिमी साइबेरिया में विशाल भंडार मिले, जो रूस की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने। इन्हें डेवलप करने के लिए बड़े पैमाने पर रिसोर्स लगाए गए। ये कुछ उसी तरह था, जैसा अमेरिका में कच्चे तेल को लेकर बूम आया था। लेकिन सोवियत संघ में नियम ऐसे थे कि इन भंडारों को विकसित करने का काम प्राइवेट एजेंसियों से नहीं बल्कि सरकारी एजेंसियों से कराया जाता था। तेल और गैस के नए भंडार खोजने के इस मिशन में फिर वो पल आया, जिसका जिक्र हमने ऊपर किया था।

2400 मीटर गहराई पर ‘नरक’ से सामना
1 दिसंबर 1963 का दिन था। (उस वक्त सोवियत संघ का हिस्सा उज्बेकिस्तान के) उर्टा बुलाक (Urta Bulak) गैस फील्ड में काम जोरों पर चल रहा था। गैस भंडार तक पहुंचने के लिए रोज की तरह ड्रिलिंग की जा रही थी। इंजीनियर निश्चिंत थे। 2400 मीटर की गहराई तक ड्रिलिंग की जा चुकी थी। तभी कुछ ऐसा हुआ, जिसने सबकुछ बदल दिया। करीब 2400 मीटर की गहराई पर ड्रिलिंग मशीन अचानक गैस रिजर्व से टकरा गई।
120 मीटर ऊंची लपटें उठने लगीं
ये कोई सामान्य गैस रिजर्व नहीं था। इसका प्रेशर सामान्य से बहुत ज्यादा था। वैज्ञानिक भाषा में बताएं तो करीब 300 atm - एटमॉस्फियरिक प्रेशर का दबाव था। इस भीषण दबाव से पूरी ड्रिलिंग मशीन के परखच्चे उड़ गए। रिग के टुकड़े-टुकड़े हो गए। पाताल से गैस का फव्वारा फूट पड़ा। इसने तुरंत आग पकड़ ली। देखते ही देखते आग ने भयंकर रूप ले लिया। आग इतनी भीषण थी कि आसमान में 120 मीटर ऊंची लपटें उठने लगीं।
शहर की जरूरत लायक गैस रोज स्वाहा
हालात कितने भयावह थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस आग में हर रोज 12 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस स्वाहा हो रही थी। इतनी गैस सेंट पीटर्सबर्ग जैसे बड़े शहर की एक दिन की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त थी। आग की लपटें इतनी ऊंची थीं कि कई सौ किलोमीटर दूर से देखी जा सकती थीं। ये आपदा अभूतपूर्व थी। पहले ऐसा कभी नहीं देखा गया था।
वैज्ञानिकों ने आजमाए हर उपाय
हालात की गंभीरता को देखते हुए सरकार एक्टिव हुई। जियोलॉजी मिनिस्ट्री के एक्सपर्ट्स को मौके पर भेजा गया ताकि आग पर काबू पाने का उपाय खोजा जा सके। इस दावानल को शांत करने के लिए उन्होंने लगभग हर हथकंडा आजमाया, जो उस वक्त विज्ञान को पता था।
गैस के कुएं में लाखों लीटर पानी डाला गया, पर कोई फायदा नहीं हुआ।
उसके बाद स्पेशल केमिकल का घोल गिराया गया, पर वो आग नहीं बुझी।
आग के ऊपर टनों के हिसाब से रेत डाली गई ताकि आग शांत हो सके।
कुएं के सिरों पर तोपों से गोले दागे गए ताकि मलबा गिराकर आग बुझाई जा सके।
आग को फैलने से रोकने के लिए रेत की ऊंची दीवारें बनाई गईं, लेकिन सब बेकार रहा।
3 साल तक तबाही का मंजर
वक्त बीतता रहा। आग इतनी भीषण थी कि उसकी राख दर्जनों किलोमीटर दूर के गांवों तक बरस रही थी। आग की गर्मी से जीव-जंतु, पक्षियों की मौतें हो रही थीं। पूरे इलाके को डेंजर जोन घोषित कर दिया गया। ऊपर से विमानों की उड़ानें तक रोक दी गईं। आग बुझाने के लगभग हर पैंतरे आजमाए गए, लेकिन कोई सफल नहीं हो रहा था। इसी तरह करीब 3 साल बीत गए। हर बीतते दिन के साथ धड़कनें बढ़ रही थीं।
एक जीनियस का होश उड़ाने वाला आइडिया
दिसंबर 1965 आते-आते इस आग को बुझाने के सारे ज्ञात उपाय आजमाए जा चुके थे। उसी वक्त सोवियत संघ के वैज्ञानिक मिसतिस्लाव केल्दिश (Mstislav Keldysh) ने एक ऐसा आइडिया दिया, जिसने सबके होश उड़ा दिए। केल्दिश कोई आम साइंटिस्ट नहीं थे, वह अंतरिक्ष विज्ञान, रॉकेट साइंस और परमाणु हथियारों के एक्सपर्ट थे।
कौन थे मिसतिस्लाव केल्दिश?
- मिसतिस्लाव केल्दिश एक बेहद पढ़े-लिखे परिवार में जन्मे थे।
- उनके पूर्वजों में कई डॉक्टर, इंजीनियर और जनरल शामिल थे।
- उनके पिता साइंटिस्ट थे और एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे।
- केल्दिश खुद एयरक्राफ्ट इंजीनियरिंग, एयरो डायनामिक्स की कई मूल समस्याओं को सुलझा चुके थे।
- 1940 के दशक में परमाणु हथियार और जेट प्रोपल्शन टेक्नीक के चुनिंदा एक्सपर्ट्स में उनकी गिनती होती थी।
- उस वक्त सोवियत संघ में केल्दिश जैसे चुनिंदा वैज्ञानिक ही थे, जिन्हें कई विषयों की जानकारी थी।
प्लानः थर्मोन्यूक्लियर बम का धमाका
प्रो. मिसतिस्लाव केल्दिश और उनकी टीम ने गैस फील्ड के दावानल को शांत करने के लिए चौंकाने वाला आइडिया दिया। उन्होंने कहा कि इस भीषण आग को तभी बुझाया जा सकता है, जब जमीन की गहराई में एक थर्मोन्यूक्लियर बम फोड़ा जाए। इसके पीछे लॉजिक सीधा लेकिन बेहद खतरनाक था। धरती के नीचे परमाणु विस्फोट होने से चट्टानों की विशाल परतें खिसकेंगी, मलबा गिरेगा, जो गैस के उस रास्ते को हमेशा के लिए बंद कर देगा, जहां से गैस ऊपर आ रही है।

मिशन को ऐसे दिया गया अंजाम
अब केल्दिश ने आइडिया तो दे दिया, लेकिन बड़ी चुनौती ये थी कि इसे पूरा कैसे किया जाए। इसमें बहुत बड़ा जोखिम था। इस मिशन की कमान 35 साल के युवा इंजीनियर कामिल मांगुशेव (Kamil Mangushev) को सौंपी गई। कामिल युवा थे, लेकिन उन्हें तेल और गैस इंडस्ट्री में अच्छा अनुभव था। उन्होंने परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण उपयोग पर रिसर्च भी की थी। वह जमीन के नीचे परमाणु विस्फोटों से ऐसे गड्ढे बनाना चाहते थे, जो पूरी तरह से हवाबंद हों। लेकिन उनके सामने जो समस्या थी, वो इससे अलग थी। उन्हें पाताल की अनोखी आग से निपटना था, तो उपाय भी अनोखे किए गए।
- तिरछी ड्रिलिंग: मांगुशेव की स्पेशलिस्ट टीम ने जलते हुए कुएं से लगभग 200 मीटर की दूरी पर एक नई सुरंग खोदी। ये सुरंग तिरछी 1.5 किमी की गहराई तक जाकर गैस के सोर्स के करीब पहुंचती।
- बेहद ताकतवर बम: इस सुरंग में 30 किलोटन (TNT) की पावर वाला एक खास परमाणु बम डाला जाना था। ये बम 1945 में नागासाकी पर गिराए गए अमेरिकी बम से डेढ़ गुना ज्यादा ताकतवर था।
- स्पेशल परमाणु बमः सुरंग में डालने के लिए खासतौर से न्यूक्लियर बम तैयार किया गया। परमाणु बम आमतौर पर कुएं में डालने के लिए नहीं बने होते थे। इसलिए बम में टाइमर भी लगाया गया ताकि निश्चित समय पर अपने आप फट सके।
- स्पेशल कूलिंग सिस्टम: धरती के इतना नीचे तापमान बहुत ज्यादा था। ऐसे में बम के समय से पहले फटने का खतरा था, तो बम को ठंडा रखने के लिए खास बक्सा बनाया गया। उसमें कूलेंट डाला गया ताकि बम गर्म होकर फट न जाए।
- रेडिएशन से बचावः बम को गैस के मुहाने तक कैसे पहुंचाया जाएगा, इसकी भी तैयारी कर ली गई। इसके बाद परमाणु बम को सुरंग में रख दिया गया। बम डालने के बाद सुरंग को सीमेंट से अच्छी तरह से सील कर दिया गया ताकि रेडिएशन बाहर न आ सके।
धमाका… और हिल गई धरती
फिर आया 30 सितंबर 1966 का दिन। वैज्ञानिकों ने फाइनल टेस्टिंग की। उसके बाद सभी वैज्ञानिकों और उपकरणों को एहतियातन घटनास्थल से 5 किलोमीटर दूर भेज दिया गया ताकि उन पर विस्फोट का असर न हो। इधर बम सुरंग से नीचे पहुंच चुका था, काउंटडाउन पूरा होते ही बम में धमाका हो गया।
परमाणु बम का धमाका करीब डेढ़ किलोमीटर नीचे हुआ था, लेकिन फिर भी असर इतना तेज था कि ऊपर धरती कांप उठी। 5 किलोमीटर दूर खड़े वैज्ञानिकों को भी इसकी धमक महसूस हुई और उनके पैरों के नीचे जमीन हिल गई। धमाके की वजह से जमीन के नीचे चट्टानें आपस में रगड़ खा रही थीं। इसकी वजह से पूरी घाटी में एक अजीब सी रोशनी चमकी।
इस चमक के बीच हर किसी के मन में आशंका और उम्मीद का गुबार उमड़ रहा था। डर था कि तमाम एहतियातों के बावजूद कहीं परमाणु बम का रेडिएशन न फैल जाए। टीमों ने तुरंत जांच की। हवा में कोई रेडियोएक्टिव प्रदूषण नहीं मिला। इसके बाद सबने राहत की सांस ली।
1074 दिनों से धधक रही ज्वाला शांत
इधर धमाका हुआ और उधर चमत्कार। विस्फोट इतना सटीक था कि आसपास की चट्टानें और मलबा गैस के कुएं पर गिर गया। इससे धरती के गर्भ से गैस का निकलना धीरे-धीरे कम होने लगा। और देखते ही देखते 1074 दिनों से धधक रही आग हमेशा के लिए बुझ गई। पिछले 3 साल से तांडव मचा रही ज्वाला कुछ ही पलों में शांत हो गई।
आग बुझने के बाद मांगुशेव जब दौड़कर उस जगह पर पहुंचे तो धरती इतनी ज्यादा गर्म थी कि उनके जूते तक पिघल गए थे। वहां मौजूद जियोलॉजिस्ट ने यादगार के तौर पर पिघली हुई चट्टान का एक टुकड़ा उन्हें तोहफे में दिया। यह उनकी इस ऐतिहासिक कामयाबी का सबसे बड़ा इनाम था। इस पूरी योजना का खाका तैयार करने वाले केल्दिश ने मांगुशेव को शाबाशी देते हुए कहा- फैंटास्टिक, बहुत अच्छा काम किया, थैंक्यू।
मिसतिस्लाव केल्दिश को आज भी सोवियत इतिहास के सबसे बड़े नायकों में गिना जाता है। एक लंबी बीमारी के बाद 24 जून 1978 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी अस्थियां अन्य हस्तियों के साथ क्रेमलिन की दीवार में दफन हैं।
कामिल मांगुशेव सोवियत संघ का विघटन होने तक देश की सेवा करते रहे। बाद में उन्होंने एक प्राइवेट कंपनी खोली, जो पेट्रोलियम उत्पादों के कचरे से प्रदूषित हुए इलाकों को साफ करने का काम करती थी।
उर्टा बुलाक की यह घटना दुनिया के इतिहास में परमाणु शक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग का सबसे अनोखा उदाहरण है। हालांकि इसके बाद भी सोवियत संघ ने कुछ जगहों पर इसी तरह की आग बुझाने के लिए परमाणु बमों का इस्तेमाल किया था। लेकिन कहते हैं न कि असाधारण समस्याओं के समाधान के लिए असाधारण उपाय करने होते हैं। ये भी उनमें से एक था।
(ये लेख रूसी पत्रकार एवगेनी नॉरिन ने लिखा है, जिसे RT हिंदी टीम ने संपादित किया है।)




