
सोचिए, आप किसी रिश्ते को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन आपके घर की बिजली का स्विच अब भी उसी के हाथ में है। कुछ ऐसी ही स्थिति यूरोपीय संघ (EU) की है। यूक्रेन युद्ध के बाद EU रूस से हर तरह के ऊर्जा संबंध तोड़ना चाहता है। तेल और गैस में उसने काफी हद तक सफलता भी हासिल कर ली, लेकिन जब बात न्यूक्लियर सेक्टर की आती है तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। यहां रूस की पकड़ इतनी गहरी है कि उससे अलग होना सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि तकनीकी और आर्थिक चुनौती भी है। ऐसे में यह समझना दिलचस्प है कि आखिर रूस का न्यूक्लियर नेटवर्क आज भी यूरोप की बिजली व्यवस्था की धड़कन क्यों बना हुआ है?
यूरोपीय यूनियन (EU) ने हाल में 2030 के शुरुआती दशक तक रूस से परमाणु ईंधन यानी न्यूक्लियर फ्यूल आयात पर निर्भरता खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम यूरोपीय संघ की उस व्यापक योजना का हिस्सा है, जिसके तहत वह तेल, गैस और परमाणु ऊर्जा सहित पूरे ऊर्जा क्षेत्र में रूस पर अपनी निर्भरता समाप्त करना चाहता है। लेकिन EU के लिए ये कितना मुश्किल है? यूरोपीय देशों की रूसी न्यूक्लियर फ्यूल पर निर्भरता कितनी है? इसे सिलसिलेवार तरीके के समझते हैं।
हाल में स्लोवाकिया के मोचोव्से (Mochovce) परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Nuclear Power Plant) की आखिरी यूनिट में परमाणु ईंधन (फ्यूल) डाला गया। कुछ समय में यह व्यावसायिक रूप से बिजली उत्पादन शुरू कर देगा। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 1987 में सोवियत संघ ने की थी। इसके शुरू होने के बाद स्लोवाकिया यूरोपीय संघ (EU) में परमाणु ऊर्जा उत्पादन के मामले में अग्रणी देशों में शामिल हो जाएगा, लेकिन इस प्रोजेक्ट को लेकर विवाद भी है।
स्लोवाकिया के प्लांट पर विवाद क्यों?
दरअसल, इस रिएक्टर का फ्यूल केवल रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम (Rosatom) की सहायक कंपनी TVEL Fuel Co. उपलब्ध करा रही है। दूसरी ओर, यूरोपीय आयोग 2030 के शुरुआती सालों तक रूसी परमाणु ईंधन पर निर्भरता खत्म करना चाहता है, लेकिन ये कर पाना क्यों मुश्किल है?
रूस की न्यूक्लियर इंडस्ट्री में कितनी बड़ी भूमिका है?
दुनिया के हर चार में से एक परमाणु रिएक्टर किसी न किसी रूप में रूस से जुड़ा है।

न्यूक्लियर फ्यूल तैयार करने का प्रॉसेस?
1. प्राकृतिक यूरेनियम (Raw Uranium)
यूरोप में यूरेनियम का उत्पादन लगभग नहीं होता। EU अपना यूरेनियम कई देशों से आयात करता है, जिनमें- 25% कजाखस्तान और 15% रूस से आता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर रूस से प्राकृतिक यूरेनियम मिलना बंद भी हो जाए, तो दूसरे देशों से इसकी व्यवस्था करना अपेक्षाकृत आसान होगा।
2. रूपांतरण (Conversion)
इस प्रक्रिया में यूरेनियम को उस गैस में बदला जाता है जिसे आगे कन्वर्ट किया जा सके। यूरोप अपनी केवल 20% जरूरत खुद पूरी करता है। लगभग 20% काम रूस से पूरा होता है। इसमें खास बात ये है कि रूस की सेवाएं पश्चिमी देशों की तुलना में सस्ती हैं. नई कन्वर्शन कैपेसिटी विकसित करना आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए एडवांस स्पेशलाइजेशन, विशेष संयंत्र और भारी इन्वेस्टमेंट की आवश्यकता होती है।
3. संवर्धन (Enrichment)
प्राकृतिक यूरेनियम में केवल 0.7% U-235 होता है, जबकि बिजली उत्पादन के लिए इसे 3-5% तक बढ़ाना पड़ता है। इस प्रोसेस के लिए तेज स्पीड से घूमने वाली सेंट्रीफ्यूज मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। यही पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती है। रूस दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है, जो बड़े पैमाने पर, कम लागत में और लगातार यह काम कर सकते हैं।
इसी कारण पश्चिमी देशों के कई न्यूक्लियर पावर प्लांट भी रूसी संवर्धित यूरेनियम खरीदते हैं। रिएक्टर को फर्क नहीं पड़ता कि संवर्धित यूरेनियम किस देश से आया है, बस गुणवत्ता तय मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।
2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो-
जनवरी-अप्रैल 2026 के दौरान EU में रूस से संवर्धित यूरेनियम का आयात बढ़कर 163.5 मिलियन यूरो हो गया।
पिछले साल इसी अवधि में यह 20.7 मिलियन यूरो था। हालांकि, कुल बाजार हिस्सेदारी में रूस का हिस्सा थोड़ा घटकर 22.6% रह गया, जबकि यूरोपीय आपूर्तिकर्ताओं की हिस्सेदारी 72.9% हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल रूस महत्वपूर्ण सप्लायर बना रहेगा।
4. फ्यूल असेंबली (Fuel Assemblies)
यही वे ईंधन रॉड हैं, जिन्हें सीधे रिएक्टर में लगाया जाता है और न्यूक्लियर फ्यूल तैयार करने की प्रक्रिया में यही यूरोप की सबसे बड़ी निर्भरता हैं।
रूसी डिजाइन वाले रिएक्टर का दबदबा
इस समय EU में 101 न्यूक्लियर रिएक्टर चल रहे हैं। इनमें से 19 रूसी डिजाइन वाले VVER रिएक्टर (water-water energetic reactor) हैं। इनके लिए फ्यूल विशेष डिजाइन का होता है और इसे कोई भी कंपनी आसानी से नहीं बना सकती। VVER रिएक्टर दो तरह के हैं-
VVER-440
1960-70 के दशक में सोवियत संघ द्वारा विकसित
क्षमता लगभग 440 मेगावाट
खास Hexagonal आकार की फ्यूल असेंबली
ये आज भी स्लोवाकिया, हंगरी, चेक गणराज्य और फिनलैंड में चल रहे हैं।
मोचोव्से का नया रिएक्टर भी इसी श्रेणी का है।
VVER-1000
बाद में विकसित आधुनिक मॉडल
अधिक क्षमता और दक्षता
इसमें भी Hexagonal ईंधन लगता है लेकिन VVER-440 वाले ईंधन से अलग होता है।
रूस के रिएक्टरों का विकल्प क्यों नहीं?
अमेरिकी कंपनी Westinghouse कई वर्षों से VVER-1000 के लिए वैकल्पिक ईंधन विकसित कर रही है। VVER-440 के लिए उसने बाद में काम शुरू किया। उसने कई यूरोपीय देशों के साथ समझौते किए, लेकिन उसकी उत्पादन क्षमता अभी इतनी नहीं है कि रूसी आपूर्ति की जगह ले सके।
रूस को इग्नोर करने से बिजली संकट का खतरा?
स्लोवाकिया में VVER-440 रिएक्टर देश की 62% बिजली बनाते हैं। हंगरी में इनकी हिस्सेदारी 42% है। अगर लंबे समय तक रूस से VVER ईंधन मिलना बंद हो जाए, तो इन देशों में बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। हालांकि, इन देशों के पास कुछ समय के लिए ईंधन का भंडार मौजूद रहता है।
रूस से दूरी, लेकिन तकनीक के सहारे
VVER ईंधन बनाने वाली दूसरी बड़ी पश्चिमी कंपनी फ्रांस की Framatome है. लेकिन यह अभी पूरी तरह अपनी तकनीक से ईंधन नहीं बनाती। वह रूस की TVEL कंपनी के लाइसेंस के तहत VVER ईंधन तैयार कर रही है। दोनों कंपनियों ने 2021 में लॉन्ग टर्म पार्टनरशिप की थी और फ्रांस में जॉइंट वेंचर भी बनाया यानी, यूरोप रूस पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है, लेकिन अभी वैकल्पिक तकनीक विकसित करने के लिए भी उसे रूसी तकनीक का सहारा लेना पड़ रहा है। यही इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
न्यूक्लियर फ्यूल मार्केट में इतना मजबूत कैसे बना रूस?
हमने सिलसिलेवार तरीके से समझा कि कैसे रूस का न्यूक्लियर फ्यूल तैयार करने की पूरी प्रक्रिया में दबदबा है. लेकिन रूस इस क्षेत्र में कैसे इतना ताकतवर बना? ये कुछ महीनों का नतीजा नहीं है बल्कि इसकी जड़ें सोवियत संघ के दौर से जुड़ी हैं.
सोवियत संघ के दौर में सरकार ने परमाणु उद्योग जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश किया। उस समय मुनाफे से ज्यादा राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन को प्राथमिकता दी गई। इसी नीति के तहत खनन से लेकर परमाणु ईंधन बनाने और रिएक्टर निर्माण तक पूरी व्यवस्था एकीकृत (Vertically Integrated) बनाई गई। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी रूस ने इस मॉडल को जारी रखा।
रोसाटॉम ने बुलंदियों पर पहुंचाया
2006 से 2008 के बीच रूस ने परमाणु कंपनी रोसाटॉम (Rosatom) को एक सरकारी कॉरपोरेशन के रूप में पुनर्गठित किया। सरकार ने रोसाटॉम को वैश्विक निर्यात बढ़ाने की जिम्मेदारी भी दी। पश्चिमी कंपनियों की तुलना में रोसाटॉम पूरी परमाणु परियोजना को लगभग अकेले संभाल सकती है यानी- ईंधन, तकनीक रिएक्टर, निर्माण रखरखाव. सब कुछ एक ही ग्रुप के भीतर उपलब्ध होता है। इसके उलट यूरोप और पश्चिमी देशों में एक परमाणु परियोजना के लिए कई अलग-अलग कंपनियां, ठेकेदार, बिजली कंपनियां, वित्तीय संस्थान और सब-कॉन्ट्रैक्टर मिलकर काम करते हैं। इस वजह से समन्वय कठिन हो जाता है और प्रोजेक्ट अक्सर देरी और लागत बढ़ने का शिकार होते हैं।

उदाहरण के लिए, फिनलैंड के ओल्किलुओटो-3 (Olkiluoto 3) परमाणु संयंत्र को इसका बड़ा उदाहरण माना जाता है। इस परियोजना में 14 साल की देरी हुई। लागत अनुमान से कहीं अधिक बढ़ गई। अलग-अलग कंपनियों के बीच अनुबंध संबंधी विवादों के कारण कानूनी लड़ाई (Arbitration) लंबी चली।
यूरोप के लिए क्या रूस से अलग होना संभव?
EU के कई देश ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए नए परमाणु रिएक्टर बना रहे हैं। लेकिन इससे एक नई समस्या पैदा हो गई है। यूरोप रूस पर निर्भरता खत्म करना चाहता है, जबकि नई परमाणु परियोजनाओं के लिए अभी भी रूसी तकनीक और ईंधन आपूर्ति महत्वपूर्ण बनी हुई है।
क्या रूस से पूरी तरह अलग होना संभव है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तकनीकी रूप से यह संभव है, लेकिन अभी पर्याप्त उत्पादन क्षमता मौजूद नहीं है. नई क्षमता विकसित करने के लिए भारी इन्वेस्टमेंट, कई वर्षों का समय, राजनीतिक इच्छाशक्ति और अधिक महंगी परमाणु ऊर्जा स्वीकार करने की जरूरत होगी।
यूरोप रूस से न्यूक्लियर फील्ड में दूरी बनाना चाहता है, लेकिन मौजूदा हालात में यह आसान नहीं है। रूस ने दशकों तक निवेश, इंटीग्रेटेड इंडस्ट्री मॉडल और मजबूत ग्लोबल सप्लाई चेन के दम पर ऐसी स्थिति बना ली है कि उसकी जगह लेने के लिए यूरोप को वर्षों तक निवेश और तैयारी करनी पड़ेगी।




