
पिछले साल 15 अगस्त को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात हुई। ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों की ये पहली आमने-सामने की मुलाकात थी। इस मुलाकात के नतीजों के अलावा जिस बात की सबसे ज्यादा चर्चा हुई, वो थी इस मीटिंग की जगह… अलास्का। वही अलास्का जो कभी रूस का हिस्सा हुआ करता था, और 19वीं सदी में उसे अमेरिका को महज 72 लाख डॉलर में बेच दिया गया था। इतनी कम रकम में 15 लाख वर्ग किलोमीटर जितना बड़ा इलाका मिलने के बावजूद, जिस समय ये सौदा हुआ, अमेरिका में इसे ‘बर्फ का डिब्बा’, ‘पोलर बियर गार्डन’ और ‘मूर्खता भरा फैसला’ बताया गया, लेकिन इसी सौदे ने अमेरिका की तकदीर बदल दी। रूस ने अपना ये सुदूर इलाका अमेरिका को क्यों बेचा, 'रशियन अमेरिकी' बस्ती की कहानी शुरू कैसे हुई, आइए शुरू से बताते हैं।
अलास्का की खोज कैसे हुई?
अलास्का की खोज की कहानी भी दिलचस्प है। 18वीं सदी की शुरुआत तक रूसियों ने साइबेरिया का अधिकतर हिस्सा खोज लिया था। एक सदी से भी अधिक समय तक खोजकर्ता फर यानी जानवरों की खाल, विशाल समुद्री जीव वालरस के दांत और साइबेरिया में मिलने वाली अन्य कीमती चीजों की तलाश में पूरब की ओर यात्रा करते रहे। लेकिन फिर उनका सामना प्राकृतिक रुकावट से हुआ। दक्षिण-पूर्व में उन्हें चीन के विशाल और काफी हद तक अनजान इलाके मिले। उसकी सीमाएं तय होने से पहले कई बार टकराव भी हुए। वहीं, उत्तर की तरफ रूसी खोजकर्ताओं ने दिखने में खूबसूरत, लेकिन मुश्किल कामचातका प्रायद्वीप का रास्ता तय किया। उसके आगे दूर-दूर तक फैला सिर्फ प्रशांत महासागर था। जो लोग उसके पानी तक पहुंचे, उन्हें ऐसा लगा मानो वो दुनिया के छोर पर आ गए हों।

साइबेरिया से आगे का अनोखा जहां
सुदूर उत्तर जहां साइबेरियाई तौर-तरीकों से भी जिंदा रहना काफी मुश्किल था, वहां एक चुकोतका प्रायद्वीप था। वहां निडर और बिंदास मिजाज वाले चुक्ची लोग रहते थे। यह रूस का सबसे दूर का कोना था। ऐसा जंगली और खतरनाक इलाका जहां हर कदम पर खतरा था। चुकोतका को डेवलप करना हालांकि एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन खोजकर्ताओं ने इस इलाके के बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली।
17वीं सदी के मध्य में फर की तलाश करते-करते एक खोजकर्ता सेम्योन देझनेव ने चुकोतका के चारों तरफ की यात्रा कर डाली। उन्होंने जानकारी दी कि पूर्व की ओर एक जलडमरूमध्य यानी स्ट्रेट है। स्ट्रेट मतलब दो जमीनी हिस्सों के बीच का संकरा समुद्री मार्ग। उस जलडमरूमध्य के पार नई जमीनों की खोज करने में अधिक समय नहीं लगा। साइबेरिया में ऐसी अफवाहें फैलीं कि कुछ रूसी लोग तूफान में बहकर अमेरिकी महाद्वीप पहुंच गए थे और वहीं बस गए। पकड़े गए चुक्ची लोगों ने भी उस अनजान धरती के बारे में कई कहानियां सुनाईं। वक्त बीतने के साथ, चुक्ची लोगों के साथ टकराव खत्म हो गया और व्यापारिक संबंध बन गए। चुक्ची लोग रूसी राजा की प्रजा बन गए।
18वीं सदी का खोजी अभियान
रूसियों की खोज जारी रही। 18वीं सदी के मध्य में साइबेरिया, आर्कटिक महासागर और आखिर में प्रशांत महासागर के इलाकों में एक बड़ा खोज अभियान शुरू किया गया। इस अभियान को सात टीमों में बांटा गया था। हर टीम को एक खास काम सौंपा गया। 1741 में कैप्टन बेरिंग और चिरिकोव की अगुवाई में एक ग्रुप दो पैकेट बोट्स (छोटी समुद्री नावों) से अमेरिकी महाद्वीप पहुंचा। उन्हें वहां कोई रूसी बस्ती तो नहीं मिली, लेकिन पक्का हो गया कि यह अमेरिकी महाद्वीप का ही हिस्सा है।
धीरे-धीरे रूसियों ने प्रशांत महासागर में समुद्री जानवरों का शिकार करना शुरू कर दिया। इनमें अलग-अलग तरह की सील और समुद्री ऊदबिलाव भी शामिल थे। साथ ही उन्हें अलास्का में आर्कटिक लोमड़ियां भी मिलीं। इन वजहों से अलास्का की यात्राएं उनके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित हुईं। रूसियों ने अमेरिका से सटे तटीय इलाकों में बस्तियां बसाईं। कई कंपनियों ने अलास्का की संपदा पर अपना दावा किया।

अलास्का में रूसी किले और व्यापार
1780 के दशक में अलास्का के तट के किनारे छोटे-छोटे किले बनने शुरू हो गए। 1784 में, इर्कुत्स्क के व्यापारी ग्रिगोरी शेलिखोव के नेतृत्व में एक अभियान दल ने कोडियाक द्वीप पर एक किला बनाया। सदी के अंत तक, यह एक विशाल किला बन गया। वहां पादरी और अन्य लोग रहने लगे। पादरियों ने स्थानीय एलियट लोगों को ईसाई धर्म की दीक्षा दी। उस समय वहां करीब 500 रूसी ही थे। रूस की महारानी कैथरीन द ग्रेट ने वहां और लोगों को भेजा। इनमें मजदूर, अधिकारी और पादरी शामिल थे।
फर का व्यापार करने वाले ग्रिगोरी शेलिखोव ने अलास्का में पहली रूसी कंपनी स्थापित की। व्यापारियों में फर के व्यापार की होड़ लगी थी। इसी होड़ के बीच शेलिखोव ने 1797 में 'रशियन-अमेरिकन कंपनी' बनाई। उसने बाजार पर कब्जा कर लिया। शेलिखोव की मौत के बाद उनके वारिसों ने रशियन-अमेरिकन कंपनी को एक लोकल मोनोपॉली (एकाधिकार) में बदल दिया। रूसी साम्राज्य ने इसे कई खास अधिकार दिए।
रूसी तौर-तरीकों से अलास्का में जिंदगी बिताना बहुत मुश्किल था, लेकिन फिर भी लोग वहां आने को तैयार रहते थे, अक्सर गुलामी, टैक्स और जालिम मालिकों से बचने के लिए। रूसियों ने स्थानीय वाशिंदों के सबसे बड़े समूह एलियट्स के साथ दोस्ताना रिश्ते बना लिए। उन्होंने खुशी-खुशी नए औजार, घरों में काम आने वाली यूरोपीय चीजें अपनाईं, अपने रीति-रिवाज अपनाए और धीरे-धीरे रूसी पड़ोसियों के करीब आ गए।
किले पर कब्जे की लड़ाई
1799 में, शेलिखोव के करीबी अलेक्जेंडर बारानोव ने सितका में एक किला बनाया। यहां रूसियों का सामना अंग्रेज व्यापारियों और उससे भी अधिक अहम त्लिंगित इंडियन्स से हुआ। ये योद्धाओं की उग्र जनजाति थी। वो मानते थे कि रूसी लोग उनकी जमीनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं और उनके इलाके में समुद्री ऊदबिलाव का शिकार करते हैं। मूल निवासियों में नाराजगी बढ़ रही थी क्योंकि कई रूसियों ने त्लिंगित महिलाओं से शादी भी कर ली थी। अंग्रेजों के उलट, रूसियों ने त्लिंगित लोगों को बंदूकें बेचने से भी इनकार कर दिया था। हालात ऐसे हो गए कि कभी भी टकराव हो सकता था।

फिर वो दिन आ ही गया, जब खूब खून-खराबा हुआ। 1802 में एक दिन जब अधिकतर लोग शिकार पर गए थे, तब त्लिंगित लोगों ने किले पर हमला कर दिया। किले में आग लगा दी। सुरक्षा करने वाले लगभग सभी लोगों को मार डाला। इलाके में शिकार करने निकले दलों पर घात लगाकर हमला किया गया। हमले में कुल मिलाकर 24 रूसी, उनके सहयोगी और लगभग 200 एलियट्स व एस्किमो मारे गए।
इस हमले से किला बनाने वाले अलेक्जेंडर बारानोव खून का घूंट पीकर रह गए। 1804 में उन्होंने 150 रूसियों, 900 एस्किमो, एलियट और अन्य मूल निवासियों के साथ सितका पर दोबारा कब्जे का अभियान चलाया। उन्होंने त्लिंगित लोगों के लकड़ी के किले को घेर लिया और तोपों से गोले बरसाए। पकड़े जाने के डर से त्लिंगित लोगों ने अपने बुज़ुर्गों और बच्चों को मार डाला ताकि वो रूसियों के हाथ न लगें और खुद भाग गए। 1805 में, याकुतात किले पर भी लड़ाई छिड़ गई। इसमें भी बहुत से लोग मारे गए और भयानक झड़पें हुईं।
तोप से ज्यादा असरदार आलू-ब्रेड!
इन लड़ाई-झगड़ों की वजह से रूस का विस्तार धीमा तो हुआ, लेकिन रुका नहीं। त्लिंगित लोग वैसे नहीं थे, जैसे कि चरवाहों की कहानियों में दिखाया गया है। वो शांति पसंद तो बिल्कुल नहीं थे। एक बार वो एक मिशनरी को मारकर खा गए। उसके मांस और खून को प्रसाद की तरह खाया-पिया। खैर, लड़ाई चलती रही और बारानोव उसका अंत देखने के लिए जीवित नहीं रहे।
फिर एक दिन रूसियों और त्लिंगित लोगों के बीच सुलह हो गई। उन्होंने आपस में जमीनें बांट लीं। 1818 में, उन्होंने शांति संधि पर हस्ताक्षर किए। यूरेशियाई महाद्वीप पर चुक्ची लोगों की तरह ही, त्लिंगित लोगों को भी आखिरकार व्यापार के जरिए शांत किया गया। जो काम तोपें नहीं कर पाईं, वो तंबाकू, आलू-ब्रेड जैसी चीजों ने कर दिया। शांति कायम हो गई।

कैलिफोर्निया में रूसी बस्ती की कहानी
इस सबके बीच रूसी लोगों ने अमेरिका के तटों के साथ अपनी खोज यात्राएं जारी रखीं। कुछ समय के लिए कैलिफोर्निया में एक रूसी बस्ती फोर्ट रॉस भी बनी। यह छोटा सा कस्बा था। इसके लिए जमीन का सौदा भी अनोखे तरीके से हुआ। वहां रहने वाली मूल जनजातियों को तीन कंबल, तीन जोड़ी पतलून, दो कुल्हाड़ियां और तीन कुदालें दी गईं, बदले में जमीनें ली गईं।
रूसियों के कैलिफोर्निया की ओर आकर्षण की अपनी वजह थी। अलास्का बहुत ठंडा इलाका था। शिकारियों के लिए भोजन की व्यवस्था करना मुश्किल होता था। इसीलिए फोर्ट रॉस की बस्ती बसाई गई थी। फोर्ट रॉस में उन्होंने पशुपालन किया, फलों के बाग लगाए, यहां तक कि छोटे जहाज भी बनाए और उन्हें स्पेनिश लोगों को बेचा। दिलचस्प बात यह है कि रूसियों के साथ कई दर्जन एलियट लोग भी अलास्का से कैलिफोर्निया आकर बस गए। लेकिन वक्त के साथ इस बस्ती का वजूद खत्म हो गया। आज एक ओपन-एयर म्यूजियम के रूप में इसके कुछ निशान मौजूद हैं।
रूसी नागरिकों की चुनौतियां
रूसी वहां रह तो रहे थे, लेकिन उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी। उनकी संख्या बहुत कम थी। अलास्का में बस्तियां बसाने और कैलिफोर्निया तक अभियान चलाने के बावजूद, वहां रूसी आबादी 1,000 से अधिक नहीं थी। रूस का सुदूर पूर्वी इलाका पहले से ही दूरदराज का क्षेत्र माना जाता था। आज भी, मध्य रूस से कामचतका या चुकोतका पहुंचना मुश्किल और महंगा है। रूसी साम्राज्य के दौर में भी यह कड़वी सच्चाई थी। मध्य रूस से अलास्का जाने के लिए दुनिया का आखिरी छोर जैसे लगने वाले इलाके तक यात्रा करनी पड़ती थी। पानी के जहाज से समुद्र पार करना पड़ता था।
रूसियों की तरह वहां 'क्रियोल' भी रहते थे। वो एलियट, एस्किमो और मूल अमेरिकी महिलाओं के बीच शादियों से पैदा हुए लोग थे। उनकी भी संख्या कम थी, लेकिन समय के साथ उनकी तादाद बढ़ गई। 19वीं सदी के मध्य तक, वहां लगभग 1,500 क्रियोल और 600-700 रूसी बस गए थे। हालांकि ये बहुत छोटी बस्तियां थीं। अमेरिका में रूसी बस्तियों का हाल महाद्वीप के दूसरी तरफ वाइकिंग बस्तियों की कहानी जैसा ही था। स्कैंडिनेवियाई लोगों के लिए ग्रीनलैंड एक दूर का ठिकाना था, जबकि विनलैंड यानी अमेरिका उससे भी कहीं दूर था।

रूसियों के लिए साइबेरिया जैसे विशाल और भयंकर ठंड वाले इलाके में खोजबीन करना और उसे बसाना बहुत मुश्किल काम था। इस सबसे जूझते-जूझते अलास्का पहुंचने तक उनके पास लोगों और जरूरी सामान की भारी कमी हो गई। हालांकि इस मुश्किल स्थिति में रूसी पादरियों ने मदद की। उन्होंने स्थानीय भाषाएं सीखीं और लोगों की मदद की। नतीजतन, आज भी अलास्का में ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों की काफी बड़ी संख्या है। ये उन्हीं लोगों के वंशज हैं जिन्हें रूसी मिशनरियों ने ईसाई धर्म सिखाया था।
अलास्का को रखना क्यों मुश्किल हो गया?
वक्त बीता और 19वीं सदी का मध्यकाल आ गया। इस समय तक अलास्का में रूसी बस्ती बनाए रखने की जरूरत पर सवाल उठने लगे थे। लगातार शिकार से समुद्री ऊदबिलावों की आबादी कम हो गई थी। सप्लाई घटी तो माल महंगा हो गया। रशियन-अमेरिकन कंपनी को शिकारियों को ज्यादा कीमत देनी पड़ रही थी। इससे कंपनी का मुनाफा कम हो रहा था।
कुछ समय तक रूसी कॉलोनी के लोगों ने अपना काम एक अनोखे व्यापार से चलाया। वो कैलिफोर्निया के लिए बर्फ इकट्ठा करते थे। कैलिफोर्निया उस समय 'गोल्ड रश' के दौर से गुजर रहा था और खाने-पीने की चीजों को स्टोर करके रखना होता था। इसमें बर्फ काम आती थी। हालांकि कमाई का यह जरिया ज्यादा दिन नहीं चला।
रूसी शासक के सामने अलास्का को लेकर चिंता बढ़ रही थी। इसके कई कारण थे। बेहद दूर-दराज का इलाका होने के कारण कॉलोनी की रक्षा करना मुश्किल था, खासकर किसी सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में। क्रीमिया युद्ध के कारण स्थिति कमजोर हो गई थी। वहां संसाधन भी बहुत खर्च हो रहे थे, और जितना निवेश होता था, उससे मिलने वाला फायदा बहुत कम था।
ऐसे हालात के बीच पूर्वी साइबेरिया के गवर्नर-जनरल निकोलाई मुराव्योव-अमुरस्की के मन में एक ख्याल आया- क्यों न अलास्का को बेच दिया जाए! मुराव्योव एक पक्के रूसी साम्राज्यवादी थे। उन्होंने साइबेरिया के विकास और सुदूर पूर्व में रूस की स्थिति मजबूत करने में अहम योगदान दिया था। उन्होंने अलास्का की कड़वी सच्चाई को समझा।
72 लाख डॉलर में हुई डील
रूस के लिए अलास्का को अपने साथ बनाए रखना जितना मुश्किल था, अमेरिका और ब्रिटेन की वहां तक पहुंच उससे कहीं ज्यादा आसान थी। सुरक्षा और अन्य पहलुओं पर विचार करने के बाद उसे बेच देना ही अधिक समझदारी भरा कदम लग रहा था। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी सरकार के साथ बातचीत शुरू हुई।
आखिर में 30 मार्च 1867 का वो दिन आया, जब रूसी सम्राट अलेक्जेंडर द्वितीय ने इस 'रशियन अमेरिका' इलाके (अलास्का) को 72 लाख डॉलर (तब के हिसाब से 72 लाख भारतीय रुपये) में बेच दिया। उस समय के हिसाब से यह एक बड़ी रकम थी। रूसी शासक को लग था कि ऐसे इलाके को अपने पास रखने का कोई मतलब नहीं है, जहां बहुत कम रूसी लोग रहते हैं, जिसका कोई खास आर्थिक महत्व नहीं है, जिसकी हिफाजत करना भी कठिन है। इसके अलावा रूसी राजा को रकम की भी जरूरत थी। अलास्का से जो रकम मिली, उसका इस्तेमाल रूस में रेलवे नेटवर्क बनाने में किया गया।
अलास्का को बेचे जाने को आज बहुत से रूसी हल्के-फुल्के मजाक या तंज के रूप में देखते हैं। इसे लेकर कई कहानियां लोक संस्कृति में रची-बसी हुई हैं। जैसे कि, एक गाने में रूस ठंड से निपटने के लिए अमेरिका को 'वालेन्की' (रूसी फेल्ट बूट्स) देने की पेशकश करता है। वहीं, एक मशहूर रूसी रॉक ओपेरा में निकोलाई रेजानोव की रोमांटिक कहानी बताई गई है। रेजानोव रूसी राजनयिक और खोजी यात्री थे। उन्हें सैन फ्रांसिस्को के स्पेनिश गवर्नर की बेटी मारिया कॉन्सेप्सियन आर्गुएलो से प्यार हो गया था। उनकी सगाई भी हो गई थी। रेजानोव वापस आने का वादा करके रूस के लिए निकल पड़े, लेकिन रास्ते में बीमार पड़ गए और उनकी मौत हो गई। दिल को छू लेने वाली इस प्रेम कहानी पर बना रॉक ओपेरा “जूनो एंड एवोस” रूस में एक क्लासिक रचना बन चुका है।
जहां तक अलास्का की बात है तो यह आज भी ऐसी जगह है, जहां कभी रूस, अमेरिका और उस ऊबड़-खाबड़ मगर खूबसूरत जमीन के मूल निवासियों की राहें एकदूसरे से मिली थीं।
(लेखक येवगेनी नोरिन रूसी पत्रकार और इतिहासकार हैं, जो तब के सोवियत संघ मामलों के जानकार हैं।)




