
माइनस 40 डिग्री का जमा देने वाला जानलेवा तापमान, चारों तरफ हजारों किलोमीटर दूर तक फैला सफेद समंदर, और पानी के ऊपर कई फीट जमी मोटी बर्फ की वो चट्टान जिसे आधुनिक मिलिट्री सबमरीन भी नहीं भेद सकती… उत्तरी ध्रुव यानी आर्कटिक की बर्फीली चट्टानों के आगे जहां दुनिया भर के जहाज घुटने टेक देते हैं, वहां स्टील से बना हजारों टन वजनी विशालकाय जहाज आगे बढ़ता है और बर्फीली चट्टान को चकनाचूर कर देता है। ये है आर्कटिक आइसब्रेकर, यानी सफेद समंदर का बाहुबली। इस मामले में रूस दुनिया का सिकंदर है। उसके पास ऐसे महाबलियों की सबसे बड़ी फौज है।
सोवियत संघ (USSR) ने आज से करीब 70 साल पहले ही दुनिया का पहला न्यूक्लियर आइसब्रेकर लॉन्च कर दिया था। नाम - लेनिन। आज कहानी रूस के इसी महाबली की। 30 साल तक सेवाएं देने के बाद अब ये आइसब्रेकर एक म्यूजियम के रूप में इतिहास के अनोखे पन्नों से नई पीढ़ी को रूबरू करा रहा है। जानेंगे ये न्यूक्लियर आइसब्रेकर किस तरह उत्तरी ध्रुव की बर्फीली राजनीति को गरमा रहे हैं, कैसे रूस का रणनीतिक सिक्का बुलंद कर रहे हैं और ये भी कि आर्कटिक को लेकर आखिर इतनी मारामारी क्यों मची है?
रूस के पहले न्यूक्लियर पावर्ड आइसब्रेकर 'लेनिन' का वीडियो, अब है म्यूजियम
— RT Hindi (@RT_hindi_) August 4, 2026
आइसब्रेकर 'लेनिन' को नॉर्दर्न सी रूट और आर्कटिक में काम करने के लिए डिजाइन किया गया था।
इस जहाज को 3 दिसंबर 1959 को चालू किया गया था। 1989 में 'लेनिन' को बंद कर दिया गया।
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1957: दुनिया का पहला न्यूक्लियर आइसब्रेकर
आज से ठीक 69 साल पहले, USSR ने आर्कटिक में दुनिया का पहला न्यूक्लियर आइसब्रेकर 'लेनिन' लॉन्च किया था। इसी के साथ ही मॉस्को ने उत्तरी समुद्रों को विकसित करने की अपनी महत्वाकांक्षा का ऐलान कर दिया। वो तारीख थी 5 दिसंबर 1957। दो साल बाद इसे USSR की नेवी मिनिस्ट्री को सौंप दिया गया। इसे खासतौर से नॉर्दर्न-सी रूट (NSR) के लिए बनाया गया था। ये आर्कटिक के रास्ते समुद्री व्यापार का एक प्रमुख मार्ग रहा है। इसके बाद से रूस ने अपने आइसब्रेकर्स का बेड़ा इतना बढ़ा लिया कि दुनिया में अब उसका कोई मुकाबला नहीं है।
#WATCH | Murmansk, Russia: Visuals from the first nuclear-powered icebreaker ‘Lenin’. It was designed and built to serve on the Northern Sea route, and in the Arctic.
— ANI (@ANI) August 3, 2026
The ship was put into operation on December 3, 1959. In 1989, Lenin had been shut down. For 30 years it led… https://t.co/cEHNi3pwB7pic.twitter.com/I01LqDgsiy
आइसब्रेकर दो तरह के होते हैं-
डीजल से चलने वाले।
परमाणु ऊर्जा से चलने वाले।
रूस दुनिया का इकलौता देश है, जिसके पास न्यूक्लियर आइसब्रेकर्स का पूरा बेड़ा है। आर्कटिक में रूस के दबदबे की एक बड़ी वजह ये भी है। डीजल जहाजों को बार-बार फ्यूल भरने के लिए बंदरगाह पर लौटना पड़ता है, लेकिन न्यूक्लियर आइसब्रेकर बिना रुके सालों तक समंदर में रह सकते हैं। उन्हें सिर्फ चालक दल के राशन के लिए रुकना पड़ता है।
ये बर्फ को काटते नहीं, कुचलते हैं!
हां, आमतौर पर लोग सोचते हैं कि आइसब्रेकर के आगे कोई विशाल आरी या नुकीला कटर लगा होता होगा, जो बर्फ को काटता हुआ चलता है। लेकिन सच इसके बिल्कुल उलट है। आइसब्रेकर बर्फ को काटता नहीं, बल्कि उसे अपने वजन से कुचलता है। इसका इंजीनियरिंग डिजाइन बेहद दिलचस्प है।
- अनोखा हल (Hull) डिजाइन: आम जहाजों का आगे का हिस्सा (Bow) नुकीला होता है ताकि वे पानी को चीरकर आगे बढ़ सकें। लेकिन आइसब्रेकर का आगे का हिस्सा चम्मच की तरह थोड़ा चपटा और ढलानदार (Sloped) होता है।
- बर्फ पर चढ़ना, कुचलना: जब यह जहाज आगे बढ़ता है, तो अपनी रफ्तार और अनोखी बनावट के कारण बर्फ को काटने के बजाय उसके ऊपर चढ़ जाता है।
- ग्रेविटी का खेल: जब जहाज का हजारों टन भारी अगला हिस्सा बर्फ की चट्टान के ऊपर आ जाता है, तो जहाज का वजन बर्फ को नीचे की तरफ दबाता है, जिससे बर्फ तिनके की तरह टूट जाती है।
- स्पेशल कोटिंग: बर्फ के टूटे हुए टुकड़े जहाज के किनारों से रगड़ खाकर उसे रोकें नहीं, इसके लिए इसकी बॉडी पर बेहद चिकनी और मजबूत कोटिंग की जाती है।
- बबल्स: कोटिंग के अलावा बर्फ को हटाने के लिए जहाज के नीचे तेज हवा के बुलबुले छोड़े जाते हैं, जो बर्फ को दूर धकेलते हैं।

न्यूक्लियर आइसब्रेकर बेड़ा बढ़ा रहा रूस
रूस अपने न्यूक्लियर आइसब्रेकर बेड़े को और बढ़ाने पर काम कर रहा है। पहले न्यूक्लियर आइसब्रेकर की लॉन्चिंग की 65वीं वर्षगांठ पर मॉस्को ने एक और बड़ी घोषणा की। नवंबर 2022 के आखिर में, प्रोजेक्ट 22220 का तीसरा आइसब्रेकर 'याकुतिया' लॉन्च किया गया। यह दुनिया के सबसे शक्तिशाली न्यूक्लियर आइसब्रेकर में से एक है। पिछले साल अप्रैल में याकुतिया ने अपने समुद्री ट्रायल पूरे किए और नॉर्दर्न सी रूट पर ऑपरेशन के लिए रवाना हो गया।
रूस के पास कितने न्यूक्लियर आइसब्रेकर?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले साल मार्च में, मरमंस्क में हुए VI आर्कटिक फोरम में न्यूक्लियर आइसब्रेकर के अपने बेड़े को बढ़ाने की प्रतिबद्धता जाहिर की थी। लगभग उसी समय 'यूराल' आइसब्रेकर भी सर्विस में आया। फिलहाल रूस की कंपनी 'एटमफ्लोट' नौ न्यूक्लियर आइसब्रेकर ऑपरेट कर रही है। इनमें न्यूक्लियर पावर से चलने वाला ट्रांसपोर्ट शिप 'सेवमोरपुट', दो रिवर-क्लास आइसब्रेकर ('टाइमीर' और 'वैगाच'), 'यामल' और प्रोजेक्ट 10521 “50 इयर्स ऑफ विक्ट्री” जैसे सी-क्लास आइसब्रेकर शामिल हैं। साथ ही नए प्रोजेक्ट 22220 वाले जहाज भी हैं। इस वक्त रूस दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जिसके पास इस तरह का अपना बेड़ा है। नॉर्थ सी रूट को डेवलप करने में उनकी अहम भूमिका है।
क्या है प्रोजेक्ट 22220?
रूस ने प्रोजेक्ट 22220 के तहत आइसब्रेकर बनाने का काम 2013 में शुरू किया था। इसके तहत कम से कम सात आइसब्रेकर शिप बनाने की योजना थी। तीन जहाज 'आर्कटिका', 'साइबेरिया' और 'यूराल' पहले ही सर्विस में आ चुके हैं। सबसे पहला जहाज 'आर्कटिका' 2020 में सर्विस में शामिल हुआ। यह रूस के आधुनिक आर्कटिक खोज प्रयासों का मुख्य जहाज बन गया। इसके बाद 2021 में 'साइबेरिया' और 2022 में 'यूराल' आए। दो और जहाज 'चुकोटका' और 'कामचटका' अभी बन रहे हैं। सातवां जहाज 'सखालिन' पर भी काम चल रहा है। ये आइसब्रेकर सेंट पीटर्सबर्ग के बाल्टिक शिपयार्ड में बनाए जा रहे हैं। इनके लिए सरकारी मदद से रोसाटॉम की एटमफ्लोट ने फंड दिया है।
'याकुतिया' जैसे एडवांस्ड न्यूक्लियर आइसब्रेकर खास तौर से आर्कटिक के कठोर मौसम के लिए बनाए गए हैं। ये तीन मीटर तक मोटी बर्फ को तोड़ने में सक्षम हैं। इनका हल (hull) डिजाइन ऐसा है कि ये अत्यधिक ठंड और घनी बर्फ वाली जगहों पर भी आसानी से मूवमेंट कर सकते हैं। इनमें दो न्यूक्लियर रिएक्टर लगे हैं, जो कुल मिलाकर 60 मेगावाट बिजली पैदा करते हैं। इससे ये कई महीनों तक बिना किसी बाहरी मदद के बर्फीले समुद्र में तैनात रह सकते हैं।
ये जहाज दुनिया के सबसे शक्तिशाली और कुशल आइसब्रेकर हैं। 2010 तक परमाणु संचालित जहाजों का इस्तेमाल अधिकतर सैर-सपाटे के लिए किया जाता था। हालांकि, अब आर्कटिक क्षेत्र की खोज-बीन में इनका रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। अहम बात यह है कि रूस ने बाहर से मंगवाए जाने वाले पार्ट्स पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। हर जहाज में 92% पार्ट्स देश में ही बने होते हैं। आखिरकार, रूस का लक्ष्य भविष्य के न्यूक्लियर आइसब्रेकर के लिए सभी पार्ट्स के प्रोडक्शन में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनना है।
आर्कटिक क्यों इतना खास?
आर्कटिक का इलाका सिर्फ रणनीतिक ही नहीं, प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से भी बहुत खास है। आर्कटिक को लेकर रूस और पश्चिमी देशों में तनाव पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है। रूस ने 1916 में ही आर्कटिक क्षेत्र पर अपने अधिकार का ऐलान कर दिया था। 20वीं सदी में भी इसी रुख पर डटा रहा। हाल के वर्षों में आर्कटिक का विकास रूसी राजनीति की प्राथमिकता में फिर से आया है। इसकी वजह भी साफ है-
- आर्कटिक जोन में रूसी क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 30 लाख वर्ग किलोमीटर है।
- इसमें 22 लाख वर्ग किमी का जमीनी इलाका है, जो रूस के कुल क्षेत्रफल का 18% है।
- वहां लगभग 24 लाख लोग रहते हैं, जो आर्कटिक की कुल आबादी का 40% हैं।
- रूस जैसे बड़े देश के लिए यह बड़ी संख्या नहीं है और कुल आबादी का 2% से भी कम है।
आर्कटिक को लेकर लड़ाई सिर्फ इलाके की लड़ाई नहीं है। यहां बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। ये समुद्र का ऐसा इलाका है, जिसकी भौगोलिक स्थिति अनोखी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आर्कटिक शेल्फ में रूस के तेल भंडार का एक-चौथाई हिस्सा और गैस का लगभग आधा हिस्सा मौजूद है। इसमें से बैरेंट्स सागर में 49%, कारा सागर में 35% और ओखोटस्क सागर में 15% हिस्सा मौजूद है।
टेंशन की वजह 1: नॉर्दर्न सी रूट
आर्कटिक में तनाव बढ़ने की एक वजह नॉर्दर्न सी रूट भी है। 1 अगस्त 2022 को रूसी सरकार ने
साल 2035 तक इस रूट को डेवलप करने के प्लान को मंजूरी दी थी। वह चाहता है कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख समुद्री मार्ग बने। इसके फायदे साफ हैं- सेंट पीटर्सबर्ग से व्लादिवोस्तोक की दूरी 14,000 किलोमीटर से थोड़ी अधिक है। जबकि स्वेज नहर से माल की ढुलाई के लिए 23,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। अगर नॉर्दर्न सी रूट का सक्रियता से इस्तेमाल किया जाए तो एशिया और यूरोप के बीच सामान की आवाजाही बढ़ सकती है। इस कॉरिडोर से पूरे यूरोप को फायदा होगा।
टेंशन की वजह 2: पिघलती बर्फ
हाल के वर्षों में आर्कटिक में सदियों से जमी बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ी है। कुछ वैज्ञानिक अनुमानों में दावा किया गया है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग की यही रफ्तार रही तो इसी सदी में आर्कटिक महासागर बर्फ से मुक्त हो सकता है। इसके कुछ फायदे हैं तो कुछ खतरे भी हैं। फायदा ये है कि बर्फ पिघलने से अब साल में पहले से ज्यादा दिनों तक 'नॉर्दर्न सी रूट' का इस्तेमाल संभव हो सकेगा।
टेंशन की वजह 3: सैन्यीकरण
लेकिन बर्फ पिघलने के रणनीतिक जोखिम भी हैं। ये बर्फ रूस और अमेरिका के बीच एक तरह की प्राकृतिक दीवार का काम करती है। बर्फ पूरी तरह पिघली तो इलाके में मॉस्को, वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच होड़ बढ़ सकती है। इलाके का सैन्यीकरण भी हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने आर्कटिक के लिए नई सैन्य रणनीतियां जारी की हैं।
रूस के आर्कटिक प्रोग्राम को लेकर अमेरिका हमेशा घबराया हुआ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग और बर्फ के तेजी से पिघलने के कारण, अमेरिकी नेता आर्कटिक को भविष्य के संभावित युद्धक्षेत्र के तौर पर देखने लगे हैं। इसी वजह से वो रूस का प्रभाव सीमित करने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। हाल के दिनों में यह मुद्दा और गंभीर हुआ है।
ओलेग बाराबानोव, प्रोफेसर, हायर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, रूस और प्रोग्राम डायरेक्टर वाल्दाई डिस्कशन क्लब
वजह 4: बाकी देशों की दिलचस्पी
सिर्फ अमेरिका ही नहीं, चीन जैसे देश भी आर्कटिक की संभावनाओं को समझने लगे हैं और वो उस मौजूदा सिस्टम को बदलना चाहते हैं, जिसके तहत आर्कटिक का कामकाज पड़ोसी देश संभालते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और बढ़ेगी।
बाराबानोव का मानना है कि निकट भविष्य में हालांकि किसी बड़े टकराव की संभावना नहीं है। लेकिन बढ़ते तनाव को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। रूस ने बार-बार कहा है कि आर्कटिक में उसे ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसके लिए मिलिट्री समाधान की जरूरत हो। उसका कहना है कि जिसे अमेरिका 'रूस की मजबूती' कहता है, वह असल में मॉस्को की अपनी सीमाओं को सिक्योर की क्षमता मजबूत करने की कोशिशों का हिस्सा है।
(राजनीतिक और वैश्विक मामलों के एक्सपर्ट, पत्रकार वैलेंटिन लोगिनोव के इस लेख को आरटी ने एडिट किया है।




