
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भारत में हैं, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद अल नाहयान भी दिल्ली आ चुके हैं और सऊदी अरब के विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान अल-सऊद ब्रिक्स समिट के लिए आए हैं।
ये तीनों नेता ऐसे वक्त भारत में हैं, जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने यमन के पोर्ट सिटी मोखा पर कब्जा करने के बाद पूरे लाल सागर तट पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है।
बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट तक हूतियों की पहुंच हो गई है। यह वही समुद्री रास्ता है जो लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और आगे स्वेज नहर के रास्ते एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच समुद्री व्यापार का रास्ता खोलता है। मिडिल ईस्ट का यह घटनाक्रम सऊदी, यूएई समेत पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है।

ऐसे में BRICS की भूमिका क्या होगी?
यमन में हूती संकट ने ईरान और सऊदी के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता को और बढ़ा दिया है। यूएई भी यमन के घटनाक्रम से सीधे प्रभावित होता है, खासकर समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि तीनों प्रतिद्वंद्वी देशों का एक समूह में होना ब्रिक्स की ताकत को दिखाता है। इसमें हर तरह के देश एक टेबल पर बैठकर अपनी सहमति-असहमति जता सकते हैं और विवाद के मुद्दों पर बात कर सकते हैं। यही बातचीत आगे चलकर किसी बड़े कूटनीतिक प्रयास की जमीन तैयार कर सकती है।
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर मुदस्सिर कमर कहते हैं कि ब्रिक्स बहुत महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच है, लेकिन जियो-पॉलिटिक्स के लिहाज से इसका एजेंडा अभी सीमित है।
वह कहते हैं, ’जहां तक ब्रिक्स में ईरान, सऊदी अरब और यूएई के नेताओं के एक साथ मिलने का सवाल है, तो यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुपक्षीय सहयोग के लिए एक नए प्लेटफॉर्म के तौर पर उभरा है, खासकर एशिया और अफ्रीकी देशों के लिए। इसका एक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में सुधार और वैश्विक आर्थिक ढांचे को अधिक संतुलित बनाना है।’
हूतियों ने बढ़ाई सऊदी समेत दुनियाभर की मुश्किलें
गुरुवार को हूती विद्रोहियों ने यमन के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा किया। इसके बाद दक्षिण की तरफ उन्होंने धुबाब जैसे इलाकों पर कब्जा किया, जो बाब-अल-मंदेब के ठीक सामने स्थित है।
हूती बाब अल-मंदेब के बीच मयून द्वीप तक पहुंच गए हैं और उनकी यह बढत सऊदी अरब के लिए बहुत बड़ा रणनीतिक झटका है। यह स्ट्रेट के सबसे संकरे हिस्से के बीच में स्थित है और उसे दो समुद्री लेन में बांटता है।
इससे सऊदी अरब और यूएई के ऊर्जा निर्यात के लिए यह इलाका होर्मुज स्ट्रेट के बाद दूसरा बड़ा ‘चोक पॉइंट’ बन सकता है।

हूतियों के हमले के बाद सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को भी अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से से तेल को लाल सागर के तट तक पहुंचाती है और होर्मुज स्ट्रेट को बायपास करने का अहम विकल्प है।
इस पाइपलाइन से हाल के महीनों में रोजाना करीब 40 से 50 लाख बैरल तेल भेजा जा रहा था, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 4-5 फीसदी है। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने पाइपलाइन को एहतियात के तौर पर बंद करने की बात कही है।
यानी सऊदी अरब के सामने अब दो तरफ से दबाव है। पूर्व में होर्मुज का संकट और पश्चिम में बाब-अल-मंदेब में हूतियों ने खतरा बढ़ा दिया है।
#WATCH | Delhi: Sheikh Khaled bin Mohamed bin Zayed Al Nahyan, Crown Prince of Abu Dhabi, arrives in India for the BRICS Summit 2026. MoS MEA Kirti Vardhan Singh received him at the airport. pic.twitter.com/NcHFPs9ulA
— ANI (@ANI) September 11, 2026
मध्य पूर्व के इन दोनों समुद्री रास्तों पर बढ़ते तनाव का सीधा असर तेल बाजार पर पड़ा है। फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक, तेल की कीमत करीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है।
यानी इसका असर सिर्फ सऊदी अरब या यमन तक सीमित नहीं रहेगा। भारत समेत एशिया के बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
क्या ब्रिक्स में हूती संकट पर बात हो सकती है?
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में व्यापार की बात होगी और जब व्यापार की बात आती है तो समुद्री सुरक्षा अहम हो जाती है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट, बाब अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री चोकपॉइंट्स पर बात हो सकती है।
मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट की वरिष्ठ फेलो मीना सिंह रॉय कहती हैं कि ब्रिक्स में ईरान और सऊदी अरब के बीच अनौपचारिक बातचीत हो सकती है।
वह कहती हैं
समुद्री सुरक्षा के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहा भारत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को ब्रिक्स बिजनस फोरम को संबोधित करते हुए कहा कि वैश्विक व्यापार के लिए सुरक्षित और मजबूत सप्लाई चेन जरूरी हैं। उन्होंने समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और समुद्र में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए भारत के मजबूत समर्थन को दोहराया।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर में सामान की आवाजाही सुचारु रखने के लिए सुरक्षित समुद्री रास्ते और खुले सप्लाई रूट जरूरी हैं।
पीएम मोदी ने कहा
मीना सिंह रॉय प्रधानमंत्री मोदी के बयान का जिक्र करते हुए कहती हैं कि भारत होर्मुज और बाब अल-मंदेब जैसे चोकपॉइंट्स पर जहाजों के आवाजाही की सुरक्षा चाहता है।
वह कहती हैं, ‘बाब अल-मंदेब से वैश्विक व्यापार का करीब 10-12 प्रतिशत हिस्सा जुड़ा है। भारत से जुड़े जहाज भी यहां से आते-जाते हैं। इस मुद्दे पर बात होगी और भारत इसे प्रमुखता से उठा रहा है। ‘
इधर, सऊदी अरब के लिए प्राथमिकता अपने तेल निर्यात और समुद्री मार्गों की सुरक्षा है। यूएई के लिए भी लाल सागर और बाब-अल-मंदेब का सुरक्षित रहना उसके व्यापार और बंदरगाहों के लिए अहम है। वहीं ईरान हूतियों के साथ अपने संबंधों और क्षेत्रीय प्रभाव के कारण इस पूरे समीकरण का महत्वपूर्ण पक्ष है। यानी जिन तीन देशों के हित टकरा रहे हैं, वे ब्रिक्स के मंच पर एक ही कमरे में हैं।





