3 देश, 3 नेता और 3 संगठन... मोदी, पुतिन और जिनपिंग का दुनिया पर ‘3D इफेक्ट’
चीन, रूस और भारत तीनों ही वैश्विक इकोनॉमी की नई धड़कन हैं, इनकी मिलिट्री ताकत के आगे दुनिया बौनी लगती है, टेक्नोलॉजी में भी ये बहुत आगे हैं। इन तीनों देशों के नेताओं की दोस्ती दुनिया में नया त्रिकोण बनाती है।
3 देश, 3 नेता और 3 संगठन... मोदी, पुतिन और जिनपिंग का दुनिया पर ‘3D इफेक्ट’
पीएम मोदी, पुतिन और जिनपिंग एक मंच पर।

जब वो एक मंच पर आते हैं तो सुर्खियां बन जाते हैं…

जब वो साथ चलते हैं तो कई देशों को जलन होने लगती है…

जब वो मिलकर बोलते हैं तो पूरी दुनिया सुनती है…

जब वो फैसले लेते हैं तो उसका बड़ा असर होता है…

आप समझ ही गए होंगे, हम भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग की बात कर रहे हैं। आइए समझते हैं कि भारत, रूस, चीन और इनके मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष किस तरह पूरी दुनिया पर ‘3D इफेक्ट’ डाल रहे हैं? अगर ये तीनों एकसाथ आ जाएं तो दुनिया की सूरत कैसी होगी? 

इन तीनों नेताओं में 3 बातें बहुत कॉमन 

  1. ये सभी अपने देश से बहुत प्रेम करते हैं और हर मामले में राष्ट्र को आगे रखते हैं।
  2. ये किसी के आगे झुकते नहीं हैं, चाहे वो किसी ताकतवर मुल्क का प्रमुख क्यों न हो।
  3. जब बात राष्ट्रीय हितों की हो तो ये तीनों ही नेता बोल्ड और सख्त फैसले लेते हैं। 

एक बात और, कि ये अपने-अपने देशों में कम से कम 3 टर्म से सत्ता में हैं। 

दुनिया के 3 ताकतवर नेता।

मोदी-पुतिन-जिनपिंग के ‘3D’ इफेक्ट का क्या मतलब?

भारत, रूस और चीन अर्थव्यवस्था से लेकर जनसंख्या तक और टेक्नोलॉजी से लेकर ट्रेड तक, धरती से लेकर अंतरिक्ष तक दुनिया की बड़ी ताकत के रूप में जाने जाते हैं। हर क्षेत्र में ये देश अपना परचम लहरा रहे हैं। 

तीनों ही देश वैश्विक इकोनॉमी की धड़कनें हैं। इनकी जीडीपी का असर दुनिया की ग्रोथ पर पड़ता है। भारत, रूस और चीन तीनों ही दुनिया की बड़ी परमाणु ताकतें हैं। इनकी मिलिट्री ताकत के आगे दुनिया बौनी लगती है। इन 3 देशों की जनसंख्या करीब आधी दुनिया पर राज करती है। टेक्नोलॉजी के मामले में भी ये दुनिया में बहुत आगे हैं। 

भारत, रूस और चीन तीनों देशों की कमान ऐसे नेताओं के हाथों में है, जो बेहद प्रभावशाली माने जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और प्रेसिडेंट जिनपिंग की दोस्ती दुनिया में नया त्रिकोण बनाती है। ये तीनों नेता अपनी रणनीतियों और कूटनीतियों से पूरी दुनिया पर असर डालते हैं। इनका यही डॉमिनेंस ही ‘3D’ इफेक्ट है।  

तीनों की संयुक्त इकोनॉमी कितनी ताकवर?

GDP

तेजी से बदल रही है आर्थिक दुनिया

मशहूर अर्थशास्त्री और आर्थिक थिंक-टैंक ‘अर्थक्रांति प्रतिष्ठान’ के संस्थापक प्रो. अनिल बोकिल ने 'RT हिंदी' से विशेष बातचीत में कहा कि अभी दुनिया युद्ध में है, इसलिए वैश्विक इकोनॉमी बहुत डायनिमिक और स्ट्रैटेजिक है। मतलब, समय के हिसाब से आर्थिक स्थितियां लगातार बदल रही हैं। ऐसा कब तक चलेगा, अभी कुछ कह नहीं सकते। 

Economy
हो सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पॉलिसी आगामी नवंबर में होने वाले मिड-टर्म इलेक्शन के बाद बदल जाए। अभी पूरा यूरोप और चीन ट्रंप की पॉलिसी के खिलाफ खड़ा है, क्योंकि ट्रंप ने नाटो देशों से साफ कह दिया है कि आप अपनी रक्षा पर जीडीपी का 5 फीसदी खर्च करिये नहीं, तो हम नाटो से निकल जाएंगे। अमेरिका ईरान युद्ध में फंसा है। इससे हालात बदल रहे हैं। 
अनिल बोकिल
अनिल बोकिल
अर्थशास्त्री

बोकिल कहते हैं कि भारत की इकोनॉमी भी बहुत डायनिमिक है। अभी वह अमेरिका के साथ तनाव को काउंटर करने के लिए चीन के करीब जा रहा है। बाद का कुछ कहा नहीं जा सकता। मगर अभी इतना जरूर है कि ब्रिक्स और एससीओ की इकोनॉमी ने अमेरिका और पश्चिम के लिए चुनौती अवश्य पैदा कर दी है। अकेले भारत, रूस और चीन की इकोनॉमी दुनिया की कुल इकोनॉमी का करीब 22 फीसदी है। 

भारत, रूस और चीन की GDP ग्रोथ 

भारत, रूस, चीन की जीडीपी

अर्थशास्त्री बोकिल कहते हैं कि यहां एक फैक्ट ये भी है कि भारत, रूस और चीन की इकोनॉमी मिलकर भी अमेरिका के बराबर नहीं है। क्योंकि अमेरिका अकेले अभी भी करीब 32-35 ट्रिलियन इकोनॉमी के साथ खड़ा है। चीन अभी केवल 20 ट्रिलियन के करीब पहुंच पाया है। भारत 4 ट्रिलियन को क्रॉस कर सका है। जबकि रूस 3 ट्रिलियन से भी कम है। रूस और अमेरिका अब दोनों अलग-अलग जंग में फंसे हैं। इसलिए भविष्य में क्या होने वाला है, इसकी सही भविष्यवाणी किसी के लिए भी मुश्किल है। 

 उन्होंने कहा कि अभी अमेरिका, भारत, रूस, चीन जैसे देश अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रख रहे हैं। इसका असर ग्लोबल इकोनॉमी पर हो रहा है। इसकी शुरुआत सबसे पहले अमेरिका और ट्रंप ने की। उन्होंने अपना खर्चा कम करने के लिए दूसरे देशों को दी जाने वाली अमेरिकी रकम में कटौती की और नया टैरिफ वॉर छेड़ दिया। इसका असर भी देशों पर हो रहा है।  

दुनिया की इकोनॉमी के महत्वपूर्ण फैक्ट

यूरोप के 50 देशों की कुल इकोनॉमी32.3
यूरोपीय संघ के 27 देशों की कुल इकोनॉमी23.0
ब्रिक्स देशों की कुल इकोनॉमी35.18
सीओ देशों की कुल इकोनॉमी29.054
भारत, रूस, चीन की इकोनॉमी27.66
अमेरिका की इकोनॉमी32.38
(आंकड़े ट्रिलियन डॉलर में, डेटाः IMF, World Bank)


एक खास बात यह भी है कि भारत, रूस और चीन तीनों ही BRICS, SCO और RIC जैसे ताकतवर संगठनों के सदस्य हैं। लिहाजा पूरी दुनिया पर भारत, रूस और चीन प्रभावी हैं। वह पूरे विश्व की जियोपोलिटिक्स को तेजी से बदल रहे हैं।  

RIC

 1. BRICS

 ब्रिक्स का औपचारिक गठन सितंबर 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन (BRIC) ने मिलकर किया। इससे पहले 2001 में मशहूर अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने अपने एक शोध पत्र में इन चारों देशों की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक जीडीपी में बड़ी भूमिका निभा सकने वाला बताया था। जून 2009 में रूस के एकातेरिनबर्ग में ब्रिक्स का पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन हुआ। इसके एक साल बाद दिसंबर 2010 में BRIC में दक्षिण अफ्रीका को भी शामिल कर लिया गया। इसके बाद नाम BRICS हो गया। शुरू में इसकी थीम आर्थिक सहयोग पर आधारित थी, लेकिन अब यह रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक मामलों का एक बड़ा वैश्विक मंच बन चुका है।  

BRICS© statisticsoftheworld.com

BRICS इकोनॉमी के बड़े फैक्ट

  • ब्रिक्स की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे बड़ी है।
  • यह अमेरिका के 32.38 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी से भी बड़ी है।  
  • ब्रिक्स देशों की कुल अर्थव्यवस्था करीब 35.18 ट्रिलयन डॉलर है।
  • यह यूरोप के 50 देशों की अर्थव्यवस्था (32.3 ट्रिलियन डॉलर) से ज्यादा है।
  • यह यूरोपीय संघ के 27 देशों की कुल इकोनॉमी (23.0 ट्रिलियन डॉलर) से भी अधिक है। 

(डेटा सोर्सः IMF, World Bank और वर्ल्ड स्टेटिस्टिक्स)

2. SCO (शंघाई सहयोग संगठन)

इस संगठन की स्थापना 15 जून 2001 को चीन के शंघाई शहर में हुई। इसे चीन और रूस की अगुवाई में शुरू किया गया। इसकी अवधारणा 1996 में शंघाई फाइव से विकसित हुई थी। रूस, चीन, कजाकिस्तान, तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान इसके संस्थापक सदस्य रहे। बाद में भारत, पाकिस्तान और ईरान जैसे देश भी इसमें शामिल हो गए। 

SCO

SCO की अर्थव्यवस्था यूरोपीय संघ से बड़ी

एससीओ देशों की कुल अर्थव्यवस्था  29.054 ट्रिलियन डॉलर यूरोपीय देशों की कुल अर्थव्यवस्था (32.3 ट्रिलियन डॉलर) के करीब है, जबकि यह यूरोपीय संघ के 27 देशों की कुल इकोनॉमी 23.0 ट्रिलियन डॉलर से बड़ी है। वहीं एससीओ की इकोनमी ब्रिक्स और अमेरिका की कुल अर्थव्यवस्था के काफी करीब है। इसलिए ब्रिक्स के बाद एससीओ भी इकोनॉमी के मामले में बेहद ताकतवर संगठन है।  

3. RIC (रूस, भारत और चीन) 

यह ब्रिक्स और एससीओ से भी ज्यादा पुराना संगठन है। इसमें सिर्फ भारत, रूस और चीन हैं। इसकी स्थापना 1990 के दशक के अंत में हुई। इस संगठन को ही आगे चलकर ब्रिक्स के लिए भी आधार बनाने की वजह माना जाता है। यह यूरेशिया के सबसे पावरफुल तीन देशों का त्रिकोणीय संगठन है। 

भारत, रूस और चीनी इकोनॉमी की मुख्य बातें

  • भारत, रूस और चीन की कुल इकोनॉमी 27.66 ट्रिलियन डॉलर है।
  • यह यूरोपीय संघ के 23.0 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है।
  • साथ ही यह अमेरिका की कुल इकोनॉमी 32.3 ट्रिलियन डॉलर से महज 6 ट्रिलियन डॉलर कम है।
  • यह यूरोप के 50 देशों की इकोनॉमी 32.3 ट्रिलियन डॉलर से सिर्फ 5 ट्रिलियन डॉलर पीछे है। 
Population

 अमेरिका को BRICS और SCO से सीधी चुनौती’

अनिल बोकिल ने कहा कि ग्लोबल इंट्रेस्ट ही दुनिया की इकोनॉमी को आगे ले जा सकता है। नेशनल इंट्रेस्ट से ग्लोबल इकोनॉमी नहीं बढ़ सकती, इसलिए यह सभी देशों के लिए बड़ी चुनौती है। अभी पूरा खेल स्ट्रैटेजिक और डायनिमिक इकोनॉमी पर है। अमेरिका और रूस दोनों युद्ध में हैं। इसलिए दोनों की इकोनॉमी प्रभावित हो रही है।  

एक्सपर्ट
इकोनमी के मामले में अमेरिका अभी दुनिया में टॉप पर। मगर उसने यदि अपने राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता को नहीं बदला तो ट्रंप और अमेरिका के लिए भविष्य में मुश्किल होगी। ब्रिक्स और एससीओ जैसे संगठन निश्चित रूप से चुनौती बनेंगे, जिसे अमेरिका संभाल नहीं पाएगा।
अनिल बोकिल
अनिल बोकिल
अर्थक्रांति के जनक और नोटबंदी का सुझाव देने वाले अर्थशास्त्री

उन्होंने कहा कि सभी देशों को ग्लोबल इंट्रेस्ट ही बचा सकता है। भारत इकलौता देश है, जो वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है। हम युद्ध से बुद्ध की ओर आगे बढ़ रहे हैं। अगर दुनिया भी इस रास्ते पर नहीं आई तो विश्वयुद्ध की संभावना गहरी हो सकती है।  

प्रो. बोकिल ने कहा कि अभी ऐसी परिस्थितियां हैं कि भारत को भी अपना नेशनल इंट्रेस्ट देखना पड़ रहा है। अगर भारत का ट्रेड अमेरिका से टूटेगा तो वह विकल्प तो ढूंढ़ेगा ही। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी भी पोजीशन ले रहे हैं। मगर वह वसुधैव कुटुंबकम की बात भी कर रहे हैं। 

अमेरिका के ट्रेड वॉर के खिलाफ सिर्फ ब्रिक्स, एससीओ ही नहीं, अब नाटो भी रिएक्ट करेगा। चीन दुनिया का बड़ा सप्लायर है। अमेरिका और भारत जैसे देश डिमांड वाले देश हैं। इनके पास परचेजिंग पावर है। जिसके पास परचेजिंग पावर है, वही असली किंग होता है। ट्रेड के प्रोजेक्शन की शुरुआत ही डिमांड से शुरू होती है। डिमांड के आधार पर ट्रेड बदलता है। उसके बाद सप्लायर रिएक्शन करता है।  

SCO और BRICS का दुनिया को संदेश 

हाल ही में, 31 अगस्त से 1 सितंबर तक किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित SCO (शंघाई सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग की पावरफुल तस्वीर सामने आई। प्रधानमंत्री मोदी एक हाथ से राष्ट्रपति पुतिन और दूसरे हाथ से शी जिनपिंग का हाथ पकड़कर गहरे दोस्तों की तरह बात करते दिखे, ठीक उसी तरह जैसे बचपन के तीन बिछड़े दोस्त अचानक कहीं मिल गए हों। 

तीनों नेताओं की ये केमिस्ट्री पूरी दुनिया को भारत, रूस और चीन की ताकत का एहसास करा रही थी। साथ ही, अमेरिका और पश्चिम के उन देशों के लिए बड़ा संदेश दे रही थी, जो इनकी ताकत को शक की नजरों से देखते हैं। पुतिन और जिनपिंग के साथ मोदी की वायरल तस्वीर का संदेश साफ था कि भारत कभी अमेरिका या अन्य किसी देश का पिछलग्गू नहीं हो सकता और न ही वह किसी दबाव में आता है। यह तस्वीर बता रही थी कि ये आज का नया और उभरता हुआ भारत है, जो अपने दम पर दुनिया में ताकत का नया पर्याय बना है।  

मोदी, पुतिन और जिनपिंग न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के आधार

मोदी, पुतिन और जिनपिंग की तिकड़ी यह भी बता रही थी कि भारत, रूस और चीन एक साथ होकर दुनिया को नया वर्ल्ड ऑर्डर देने को तैयार हैं। इसका इशारा साफ था कि दुनिया के सामने अब पश्चिम और अमेरिका का नया विकल्प भारत, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के रूप में तैयार है। ये तीनों ही वैश्विक शांति और स्थिरता के नये और दमदार पिलर के रूप में खड़े हैं। इससे पहले, चीन के तियानजिन में सितंबर 2025 में हुए पिछले एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान भी ऐसी दोस्ती दिखी थी।

दुनिया की टॉप-5 ताकतें

भारत, रूस, चीन - नया ग्लोबल पावर सेंटर

देश के जाने-माने रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात ने भारत, रूस और चीन को नया ग्लोबल पावर सेंटर बना दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन देशों की तिकड़ी ने अमेरिका और पश्चिम के लिए नया कंपटीशन पैदा कर दिया है। भारत, रूस, चीन इसलिए भी अमेरिका और पश्चिम की आंखों की किरकिरी बनते हैं क्योंकि यही ग्लोबल साउथ के विकास की बात करते हैं।  

उन्होंने कहा कि पश्चिम के लिए यह सब चुनौती बन जाता है इसीलिए अमेरिका और पश्चिमी देश इनको आगे बढ़ने से रोकना चाहते हैं। वह पूरी कोशिश कर रहे हैं कि रूस को यूक्रेन में फंसा दिया, ईरान को युद्ध में जकड़ दिया, वेनेजुएला के तेल पर कब्जा कर लिया और ईरान के तेल पर भी कब्जा चाह रहे। मगर इस सबके बावजूद वह भारत, रूस और चीन को आगे बढ़ने से अब रोक नहीं पाएंगे। 

 कमर आगा का कहना था कि आज भी पश्चिम का माइंड औपनिवेशक है, यानी वह दूसरे देशों के संसाधनों पर कब्जा करके शासन करना चाहते हैं। इनकी मुख्य ताकत मोनोपॉली और टेक्नोलॉजी रही है, जो अब चीन, रूस और भारत की ओर ट्रांसफर हो रही है। ये तीनों देश टेक्नोलॉजी में बहुत आगे बढ़ चुके हैं। मिलिट्री पावर में वो हैं ही। 

 विदेश नीति एक्सपर्ट आगा कहते हैं कि भारत, रूस और चीन के साथ ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भी उभर रहे हैं। अब टेक्नोलॉजी पर इनका अच्छा कंट्रोल है। अभी तक पश्चिम का इस पर नियंत्रण था। भारत, रूस और चीन जैसे देश ब्रिक्स और एससीओ के जरिये अब इकोनॉमी पर भी कंट्रोल करने का प्रयास कर रहे हैं। ब्रिक्स और एससीओ की इकोनॉमी अगर मिल जाए तो यह पश्चिम के लिए बहुत बड़ा कंपटीशन पैदा कर सकती है। इसलिए पश्चिम घबराया हुआ है। इसीलिए पश्चिम कभी नहीं चाहता है कि भारत, रूस और चीन साथ आए।

रिश्तों में कहां फंसा है रोड़ा?

एक्सपर्ट
भारत, रूस और चीन एक साथ आ रहे हैं, मगर भारत और चीन के बीच एक रोड़ा बॉर्डर इश्यू का है। अगर दोनों देश मिलकर अपने सीमा-विवाद को सुलझा लेते हैं तो इन तीनों देशों का मुकाबला करना अन्य किसी के लिए मुश्किल हो जाएगा।
कमर आगा
कमर आगा
रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ

कमर आगा ने कहा कि भारत, रूस और चीन एक साथ आ रहे हैं, मगर भारत और चीन के बीच एक रोड़ा बॉर्डर इश्यू का है। अगर दोनों देश मिलकर अपने सीमा-विवाद को सुलझा लेते हैं तो इन तीनों देशों का मुकाबला करना अन्य किसी के लिए मुश्किल हो जाएगा।  

आगा ने सुझाव दिया कि भारत और चीन को अपना बॉर्डर इश्यू सॉल्व करने के लिए ऐसा कोई मैकेनिज्म बनाना चाहिए, जो कम से कम वास्तविक मुद्दों का समाधान कर दे और उनके बीच सैन्य तैनाती कम हो जाए। इसमें रूस बहुत मददगार हो सकता है। मुझे लगता है कि भारत और चीन के करीब लाने में रूस की भूमिका है। वह और अच्छा रोल निभा सकता है। 

मोदी, पुतिन और जिनपिंग प्रभावशाली नेता

उन्होंने आगे कहा कि ये अच्छा है कि मोदी, पुतिन और जिनपिंग जैसे मजबूत नेताओं के हाथों में इन तीनों देशों की कमान है, उनमें काफी सामंजस्य और अच्छी केमिस्ट्री है। वो बोल्ड फैसले लेते हैं, दबाव में नहीं आते और अपने राष्ट्रीय हित को आगे रखते हैं। इन तीनों नेताओं के रणनीतिक विचार भी मेल खाते हैं। इसीलिए वह एक मंच पर दिखते हैं, तो दुनिया देखती है। अभी वह एससीओ के मंच पर साथ दिखे, अब ब्रिक्स में साथ दिखेंगे। यह पूरे विश्व के लिए खासतौर से पश्चिम के लिए बड़ा संदेश है। दुनिया का ग्लोबल पावर सेंटर अब भारत, रूस और चीन की ओर शिफ्ट हो गया है। वह वैश्विक परिस्थितियों को हैंडल करना जानते हैं।  

विदेशी नेता भी कर रहे तारीफ

बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने पीएम मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और प्रेसिडेंट जिनपिंग के बीच बढ़ते तालमेल और केमिस्ट्री की तारीफ की है। एससीओ समिट के दौरान उन्होंने अपने एक बयान में कहा, “हमारे पास तीन शक्तिशाली देश चीन, भारत और रूस हैं। ये आर्थिक रूप से विकसित देश हैं, जिनके पास पर्याप्त संसाधन हैं। ये परमाणु शक्ति संपन्न देश भी हैं और हम सबसे पहले इन्हीं से पहल की उम्मीद करते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि दुनिया को बहुध्रुवीय बनाने के लिए इन्हीं तीनों देशों को आगे आना चाहिए और बात करनी चाहिए, क्योंकि उम्मीद भी उन्हीं से है।  

ब्रिक्स और भारत का रोल 

 ओआरएफ डेवलपमेंट स्टडीज के उपाध्यक्ष नीलांजन घोष ने कहा, “अगर हम मौजूदा वैश्विक भू-राजनीति और आर्थिक परिदृश्य को देखें, तो ‘ग्लोबल साउथ’के देशों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती जा रही है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) जैसे मंच अब केवल औपचारिक बैठकें बनकर नहीं रह गए हैं, बल्कि ये पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व के खिलाफ एक व्यावहारिक और मजबूत विकल्प पेश कर रहे हैं। विशेष रूप से जब हम भारत की विदेश नीति की बात करते हैं, तो भारत ने हमेशा रणनीतिक स्वतंत्रता का पालन किया है। एक तरफ जहां भारत पश्चिमी देशों और क्वाड के साथ अपने तकनीकी और सुरक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ वह रूस, चीन और मध्य पूर्व के देशों विशेष रूप से ईरान के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों का संतुलन बनाए हुए है। 

 पश्चिम एशिया में हालिया तनाव और ऊर्जा बाजार की अनिश्चितताओं के बीच, भारत का रुख स्पष्ट रहा है कि समस्याओं का समाधान युद्ध या एकतरफा प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति से ही संभव है। चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) जैसे प्रोजेक्ट्स भारत के लिए क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक स्थिरता के दृष्टिकोण से बेहद अहम हैं, और भारत किसी भी दबाव में अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों से समझौता नहीं करेगा।”

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