नए नौ दिन, पुराने सौ दिन... भारत-रूस की दोस्ती पर क्यों फिट बैठता है ये मुहावरा?
RT हिंदी से एक्सक्लूसिव बातचीत में रूस के डिप्टी एंबेसडर रोमन बाबुश्किन ने भारत-रूस के रिश्तों की गहराई को समझाते हुए कहा कि इस दोस्ती पर ‘नए नौ दिन, पुराने सौ दिन’ वाला मुहावरा फिट बैठता है।
नए नौ दिन, पुराने सौ दिन... भारत-रूस की दोस्ती पर क्यों फिट बैठता है ये मुहावरा?
रूस के डिप्टी एंबेसडर रोमन बाबुश्किन ने की RT हिंदी से खास बातचीत

भारत और रूस की दोस्ती को अक्सर दशकों पुराने रिश्ते, भरोसे और रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन जब RT हिंदी ने भारत में रूस के डिप्टी एंबेसडर रोमन बाबुश्किन से पूछा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों और दबावों के बीच यह रिश्ता आज भी इतना मजबूत कैसे बना हुआ है, तो उन्होंने जवाब में एक दिलचस्प हिंदी मुहावरा याद किया- ‘नए नौ दिन, पुराने सौ दिन।’ यह पूरा इंटरव्यू हिंदी में हुआ। बाबुश्किन काफी अच्छी हिंदी बोलते हैं। 

RT India की न्यूज हेड रुनझुन शर्मा ने इंटरव्यू के दौरान फिल्म 'शोले' के मशहूर गीत ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ का जिक्र किया और भारत-रूस रिश्तों की मजबूती की बात उठाई। बाबुश्किन ने जवाब में पुराने और भरोसेमंद रिश्तों की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि रूस में भी इसी भाव से मिलता-जुलता विचार लोकप्रिय है- ‘नए नौ दिन, पुराने सौ दिन।’

दरअसल, हिंदी की इस मशहूर कहावत का अर्थ यह है कि पुरानी चीजें, रिश्ते या अनुभव ज्यादा टिकाऊ, भरोसेमंद और उपयोगी होते हैं, जबकि नई चीजें थोड़े समय का आकर्षण या उत्साह पैदा कर पाती हैं।

'सिर्फ पुराना इतिहास नहीं दोस्ती की वजह'

बाबुश्किन ने हालांकि साफ किया कि भारत और रूस के रिश्तों की मजबूती की वजह केवल उनका पुराना इतिहास नहीं है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के विकास के रास्ते ऐसे हैं, जहां भारत और रूस एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। यानी उनके मुताबिक दोनों देशों का रिश्ता सिर्फ बीते दशकों की दोस्ती के भरोसे नहीं चल रहा, बल्कि आज भी दोनों के हित कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इसी दौरान बाबुश्किन ने एक और अहम बात कही, ‘मजबूत भारत रूस की प्राथमिकता है।’

भारत में रूस के डिप्टी एंबेसडर
इतिहास के अलावा ये भी मुख्य तौर पर है कि हमारे देशों के विकास के रास्ते में हम एक-दूसरे को पूरक करते हैं। मजबूत भारत रूस की प्राथमिकता है।
रोमन बाबुश्किन
रोमन बाबुश्किन
भारत में रूस के डिप्टी एंबेसडर

‘हिंदी-रूसी भाई-भाई’ आज भी प्रासंगिक क्यों?

इंटरव्यू में बाबुश्किन से यह भी पूछा गया कि दशकों पुराना ‘हिंदी-रूसी भाई-भाई’ का नारा क्या आज के दौर में भी प्रासंगिक है? बाबुश्किन ने इसका जवाब ‘जरूर’ में दिया।

उन्होंने कहा कि भारत और सोवियत संघ के बीच रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान और शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग रहा है। उनके मुताबिक इन क्षेत्रों में हुए पुराने सहयोग की भूमिका भारत के विकास में भी रही है। बाबुश्किन ने कहा कि आज भी यह नारा प्रासंगिक है, क्योंकि भारत और रूस के रिश्ते दोस्ती और पूर्ण विश्वास पर आधारित हैं और दोनों देशों के लिए लाभदायक हैं।

‘दोस्त एक-दूसरे पर दबाव नहीं बनाते’

बाबुश्किन ने हिंदी में इंटरव्यू देते हुए भारत-रूस संबंधों की एक और खासियत बताई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते प्राकृतिक हैं और अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के मुताबिक आगे बढ़ते हैं। इनमें एक देश की ओर से दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं होती। इसी बात को उन्होंने एक लाइन में समझाया, ‘दोस्त एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं करते हैं।’

तेल-गैस से कहीं आगे है भारत-रूस की साझेदारी 

भारत-रूस साझेदारी को सिर्फ तेल, गैस या हथियारों के सौदों से समझना अधूरा होगा। RT इंडिया से खास बातचीत में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कहा था कि यह रिश्ता 20-30 साल पुराना नहीं, बल्कि भारत की आजादी के समय से बना है। उनके मुताबिक, समय के साथ दोनों देशों के संबंध साझेदारी से रणनीतिक साझेदारी और फिर विशेष रणनीतिक साझेदारी तक पहुंचे।

लावरोव ने यह भी याद दिलाया कि आजादी के बाद जब पश्चिमी देश भारत को अपनी रक्षा क्षमता विकसित करने में मदद देने से हिचक रहे थे, तब सोवियत संघ ने हथियारों के साथ तकनीक भी साझा की। यही सहयोग आगे चलकर संयुक्त उत्पादन तक पहुंचा। ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर कलाश्निकोव राइफल और भारत में बनने वाले T-90 टैंकों तक। यानी भारत-रूस रिश्ता सिर्फ खरीद-बिक्री का नहीं, बल्कि दशकों में बने भरोसे, तकनीक साझा करने और साथ मिलकर क्षमता खड़ी करने का रिश्ता है।  

इस तरह बाबुश्किन के लिए ‘नए नौ दिन, पुराने सौ दिन’ सिर्फ पुराने रिश्ते का जिक्र नहीं है। उनके जवाब में भारत-रूस दोस्ती की मजबूती के तीन आधार दिखाई देते हैं। पुराना इतिहास, एक-दूसरे के पूरक हित और आपसी विश्वास। यही वजह है कि बदलती दुनिया के बीच भी बाबुश्किन भारत और रूस की पुरानी दोस्ती को आज के दौर में उतना ही प्रासंगिक मानते हैं।

सोवियत दौर जैसी नजदीकी क्यों नहीं?  

भारत और रूस की दोस्ती दशकों पुरानी है। सोवियत दौर में दोनों देशों के बीच सिर्फ सरकारों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच भी मजबूत जुड़ाव दिखाई देता था। ऐसे में सवाल है कि क्या आज भारत और रूस के लोगों के बीच वह संपर्क कुछ कम हुआ है?

RT हिंदी से बातचीत में रूसी दूतावास के डिप्टी चीफ रोमन बाबुश्किन ने माना कि दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क बढ़ाने के लिए अभी और काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में भी संस्कृति, युवाओं और छात्रों को जोड़ने के लिए कई कार्यक्रम चल रहे हैं।

बाबुश्किन ने कहा कि भारत और रूस के बीच हर साल सांस्कृतिक और युवा फेस्टिवल आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा छात्रों का आदान-प्रदान भी होता है। उन्होंने बताया कि ये कार्यक्रम द्विपक्षीय स्तर के साथ-साथ BRICS जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी होते हैं। हालांकि उन्होंने माना कि मौजूदा संपर्क पर्याप्त नहीं है। बाबुश्किन ने कहा, ‘मैं सहमत हूं कि इसे और बढ़ाना पड़ेगा।’

भारत-रूस संबंधों के 80 साल पर बड़ी तैयारी

बाबुश्किन ने इंटरव्यू में कहा कि अगले साल भारत और रूस के कूटनीतिक संबंधों के 80 साल पूरे होने जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस मौके पर कई कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की जा रही है। बाबुश्किन ने कहा, ‘हम एक बड़ी योजना तैयार कर रहे हैं।’

उनके मुताबिक दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रम, युवा फेस्टिवल और छात्र आदान-प्रदान पहले से होते हैं, लेकिन लोगों के बीच संपर्क को और बढ़ाने की जरूरत है।

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