
भारत और रूस का कूटनीतिक रिश्ता सिर्फ रक्षा सौदों और कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। परमाणु ऊर्जा भी दोनों देशों के लंबे और भरोसेमंद सहयोग का एक अहम हिस्सा रही है। तमिलनाडु का कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट इस साझेदारी का सबसे बड़ा उदाहरण है।
रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम (Rosatom) के CEO एलेक्सी लिखाचेव ने BRICS समिट के दौरान भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को लेकर कई अहम बातें कहीं।
अगले साल शुरू होगी तीसरी यूनिट
भारत के सबसे बड़े न्यूक्लियर पावर प्लांट की तीसरी यूनिट लगभग बनकर तैयार है। यह यूनिट रूसी डिजाइन पर आधारित है। रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम के प्रमुख के अनुसार, इसका फिजिकल स्टार्टअप अगले साल बसंत (स्प्रिंग) तक होने की उम्मीद है।
कुडनकुलम साइट पर छह यूनिट हैं, जिनमें से प्रत्येक की क्षमता 1,000 मेगावाट है। पहली दो यूनिट ऑपरेशन में हैं, जबकि यूनिट 3 से 6 निर्माणाधीन हैं।
कुडनकुलम की पहली यूनिट दिसंबर 2014 में और दूसरी यूनिट मार्च 2017 में ऑपरेशनल हुई थी। अगस्त 2026 तक दोनों यूनिट मिलकर 1,27,465 मिलियन यूनिट बिजली पैदा कर चुकी थीं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, KKNPP-3 और 4 की कुल क्षमता 2,000 मेगावाट है, जबकि KKNPP-5 और 6 की भी क्षमता 2,000 मेगावाट है। जुलाई 2026 के PIB आंकड़ों के मुताबिक, यूनिट 3-4 की भौतिक प्रगति 82.65 फीसदी और यूनिट 5-6 की 45 फीसदी थी।
यानी जब कुडनकुलम की सभी छह यूनिट चालू हो जाएंगी, तो यहां कुल 6,000 मेगावाट यानी 6 गीगावाट की परमाणु क्षमता होगी। यह इसे भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में सबसे प्रमुख बनाता है।
परमाणु ऊर्जा और भारत-रूस की साझेदारी
तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम प्लांट, भारत और रूस का ज्वाइंट प्रोजेक्ट है। इसे भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम (NPCIL) और रोसाटॉम की इकाई एटमस्ट्रॉयएक्सपोर्ट (Atomstroyexport) ने मिलकर बनाया है। रूस महत्वपूर्ण परमाणु उपकरण, डिजाइन और ईंधन की सप्लाई करता है, जबकि भारतीय इंजीनियर निर्माण और परियोजना के दूसरे हिस्सों में रूसी विशेषज्ञों के साथ काम करते हैं।
लिखाचेव ने कहा, “भारत में इस समय करीब 8 गीगावाट परमाणु क्षमता का निर्माण हो रहा है, जिसमें से करीब 4 गीगावाट यानी लगभग आधी क्षमता रूसी डिजाइन और तकनीक का इस्तेमाल करके बनाई जा रही है।”

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि रूस भारत के 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम के तहत अपनी परमाणु तकनीक का स्थानीयकरण भी बढ़ा रहा है।
रूसी CEO ने जोर देकर कहा कि इस तरह के गहरे परमाणु सहयोग के लिए-
गौरतलब है कि BRICS शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई बातचीत में द्विपक्षीय परमाणु सहयोग एक प्रमुख मुद्दा रहा।
ट्रेनिंग और इंजीनियरिंग में भी सहयोग
रोसाटॉम का फोकस सिर्फ परमाणु ऊर्जा तक सीमित नहीं है। कंपनी डिजिटल तकनीकों पर भी काम कर रही है। डिजिटल इंजीनियरिंग प्लेटफॉर्म की टेस्टिंग के साथ ही इसे कर्मचारियों के ट्रेनिंग प्रोग्राम और प्रोजेक्ट्स में भी शामिल किया गया है।
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ दशकों में उनका लक्ष्य परमाणु सहयोग को और मजबूत करना है। अगली पीढ़ी की परमाणु ऊर्जा को भी लागू करना है। इसके साथ-साथ दर्जनों कंपनियों की भागीदारी से गैर-परमाणु और हाई-टेक सेक्टर का एक मजबूत दूसरा स्तंभ खड़ा करना है।
निजी कंपनियों की एंट्री
अब भारत के परमाणु कार्यक्रम में एक और बड़ा बदलाव हो रहा है। निजी कंपनियों के लिए भी इस क्षेत्र में भागीदारी का रास्ता खुल रहा है।
लिखाचेव ने बताया कि उनकी कंपनी भारतीय निजी कंपनियों के साथ न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने को लेकर बातचीत कर रही है। उन्होंने कंपनियों के नाम नहीं बताए, लेकिन कहा कि भारत की कंपनियों के पास मेटलर्जी, निर्माण और एडवांस्ड डिजिटल टेक्नोलॉजी में ऐसी क्षमताएं हैं, जिनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है।
उन्होंने भारत के SHANTI एक्ट को एक “ब्रेकथ्रू” बताया। उनके मुताबिक, इस कानून के जरिए निजी कंपनियों और ज्वाइंट वेंचर के लिए परमाणु संयंत्रों के निर्माण और संचालन में भागीदारी का रास्ता खुला है। हालांकि, दोनों देशों की सरकारों के बीच होने वाले परमाणु समझौतों में भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग ही रोसाटॉम का प्रमुख पार्टनर है।

2047 तक 100 GW न्यूक्लियर पावर का लक्ष्य
भारत ने 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। मौजूदा क्षमता करीब 9 गीगावाट है। लिखाचेव ने इसे पूरे उद्योग और भारत सरकार के लिए “बहुत बड़ी चुनौती” बताया है। उन्होंने कहा कि भारत को मौजूदा कुछ यूनिट्स से आगे बढ़कर हर साल बड़ी संख्या में यूनिट्स की कमीशनिंग की दिशा में जाना होगा।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में भारत की कुल स्थापित परमाणु क्षमता 8,780 मेगावाट थी। कुल बिजली उत्पादन में 24 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का योगदान 3.1 फीसदी है।
सरकार ने 2047 के 100 GW लक्ष्य को हासिल करने के लिए न्यूक्लियर एनर्जी मिशन भी शुरू किया है। इसके तहत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMRs के डिजाइन, विकास और तैनाती के लिए 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। कम से कम पांच स्वदेशी SMRs को 2033 तक ऑपरेशनल करने का लक्ष्य रखा गया है।
साथ ही, भारत स्वदेशी 700 MW के PHWR रिएक्टरों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से 1,000 MW के रिएक्टरों की क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है। सरकार के अनुसार, 2031-32 तक देश की स्थापित परमाणु क्षमता 22.38 GW तक पहुंच सकती है।
लिखाचेव के मुताबिक, भारत की ऊर्जा खपत 2050 तक करीब 2.5 गुना बढ़ सकती है इसलिए उनकी नजर में इतनी बड़ी ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा जरूरी होगी।
जब मुश्किल समय में रूस ने दिया साथ
एक वक्त ऐसा आया, जब भारत मुश्किल परिस्थितियों में घिरा था। प्रतिबंधों के कारण अमेरिका ने तारापुर न्यूक्लियर प्लांट को ईंधन देने से इनकार कर दिया। ऐसे वक्त में रूस ने दोस्ती निभाते हुए सहयोग जारी रखा।
सीईओ ने कहा, “तारापुर और राजस्थान परमाणु स्टेशनों के अलावा, हमारे पास कई ऐसे प्रोजेक्ट्स भी हैं, जो हमारी ईंधन सप्लाई पर शिफ्ट हो रहे हैं। पिछले कई दशकों से भारत में रूसी डिजाइन के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण को लेकर बेहद सफल सहयोग रहा है।”
परमाणु दोस्ती की शुरुआत कहां से हुई?
इस साझेदारी की जड़ें आज से कई दशक पुरानी हैं। लिखाचेव ने बताया कि भारत उन शुरुआती देशों में था, जिसके साथ सोवियत संघ ने शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक के क्षेत्र में सहयोग शुरू किया था।
उन्होंने 1955 का जिक्र करते हुए कहा कि तत्कालीन भारतीय नेता जवाहरलाल नेहरू ने ओबनिंस्क का दौरा किया था। लिखाचेव के मुताबिक, इसी दौर में दोनों देशों के बीच अंतर-सरकारी परमाणु सहयोग की शुरुआत हुई।
यही वजह है कि लिखाचेव परमाणु सहयोग को सिर्फ तकनीक या कारोबार का रिश्ता नहीं मानते। उनके मुताबिक, ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में सहयोग के लिए राष्ट्राध्यक्षों, सरकारों और दोनों देशों के लोगों के बीच लंबे समय का भरोसा जरूरी है।






