
लोबान और इत्र की खुशबू वाला यमन कैसे बना जंग का मैदान? हूतियों की बढ़त की पूरी कहानी
लोबान, इत्र और कॉफी, ये कभी मध्य-पूर्व के देश यमन की पहचान हुआ करते थे। इन चीजों पर एकाधिकार रखने वाला यमन काफी संपन्न था लेकिन पिछले कई दशकों से गृहयुद्ध में घिरा यह देश बेहद गरीब हो चुका है। यमन पर नियंत्रण की लड़ाई में एक तरफ ईरान समर्थित हूती विद्रोही हैं, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार है। यमन की सरकार को सऊदी अरब का सैन्य और राजनीतिक समर्थन हासिल है।
पिछले कुछ दिनों में हूती विद्रोहियों और यमन की सरकारी फोर्स के बीच लड़ाई तेज हो गई हैं। रविवार को सरकारी बलों ने लाल सागर के पास ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के ठिकानों पर हमले किए। जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब पर पलटवार किया।
पिछले हफ्ते हूती विद्रोहियों ने यमन के मोखा बंदरगाह शहर से सरकारी बलों को खदेड़कर वहां अपना कब्जा कर लिया था। इसके बाद बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के एक द्वीप को भी अपने कब्जे में ले लिया।
बाब-अल-मंदेब में हूतियों की बढ़त को सऊदी अरब के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। ईरान युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट के व्यापार का अहम समुद्री रास्ता होर्मुज स्ट्रेट फरवरी के अंत से ही बंद है। इसे देखते हुए सऊदी ने अपना व्यापार बाब-अल-मंदेब की तरफ मोड़ दिया था लेकिन अब हूतियों ने सऊदी के जहाजों के लिए ये रास्ता भी बंद कर दिया है।
The Armed Forces -
— Yemen Army Media (@Yemenarmyeng) September 13, 2026
Video shows the warplanes targeting Houthis militia personnel & material within the "kill box" in Dhubab & Mocha pic.twitter.com/TDPZILMKQf
हमले में सऊदी अरब की प्रमुख तेल पाइपलाइन ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को नुकसान हुआ है। सऊदी ने बताया कि ड्रोन हमले में पाइपलाइन को नुकसान हुआ है जिसके बाद उसे अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया है।
सऊदी अरब के तेल ठिकानों और लाल सागर में उसके जहाजों पर हमले से ग्लोबल क्रूड सप्लाई और तेल की कीमतों पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं।

इसी के साथ ही यमन में एक बार फिर गृहयुद्ध का खतरा बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत से अब तक इस संघर्ष के कारण इस गरीब देश में 80 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं।
आज युद्ध का मैदान बन चुका यमन कभी बेहद संपन्न देश हुआ करता था जिसे रोम के लोग खुशहाल अरब (Arabia Felix) कहते थे।
क्या है खुशहाल अरब की कहानी?
एक दौर था, जब यमन अरब प्रायद्वीप की सबसे धनी सभ्यता मानी जाती थी, जिसे प्राचीन रोमन और यूनानी खुशहाल अरब कहते थे। यमन की जमीन बेहद उपजाऊ थी जबकि आसपास के बाकी रेगिस्तानी अरब को वीरान अरब (Arabia Deserta) कहा जाता था।
यमन की समृद्धि की वजह थी दो बेहद कीमती चीजें-
- लोबान(पेड़ से निकलने वाला एक तरह का सुगंधित गोंद)- धूपबत्ती जैसी सुगंधित चीजों में इसका इस्तेमाल होता है।
- गंधरस- इसका इस्तेमाल शवों को सुरक्षित रखने और इत्र बनाने में होता था।
करीब 3,000 साल पहले यमन में शीबा नाम का साम्राज्य फला-फूला, जिसकी मल्लिका ‘शीबा की रानी’ का जिक्र बाइबल और कुरान दोनों में मिलता है। इसके बाद हिमयारी साम्राज्य ने भी इस इलाके पर राज किया। यह साम्राज्य इतने समृद्ध थे कि इन्होंने मारिब बांध जैसी बड़ी सिंचाई परियोजनाएं बनाईं, जो प्राचीन दुनिया के इंजीनियरिंग चमत्कारों में गिनी जाती हैं।
इन साम्राज्यों ने अपनी दौलत यानी लोबान और गंधरस को मिस्र, रोम और भूमध्य सागर के बाजारों तक बेचा। ये सुगंधित रेजिन (पदार्थ) उस दौर में सोने जितने कीमती माने जाते थे। धार्मिक अनुष्ठानों, अंतिम संस्कार और शाही दरबारों में इनकी भारी मांग रहती थी।

यमन ने दुनिया तक पहुंचाई कॉफी
कॉफी का पौधा मूल रूप से इथियोपिया का माना जाता है, लेकिन इसकी खेती, भूनना और व्यापार की चीज बनाना सबसे पहले यमन में शुरू हुआ। 14वीं-15वीं सदी में यह इथियोपिया से यमन पहुंची, जहां सूफी संतों ने रात-भर की इबादत में जागते रहने के लिए इसे पीना शुरू किया।
1544 में यमन के इमाम ने कॉफी को आधिकारिक बढ़ावा दिया, जिसके बाद पहाड़ी ढलानों पर कॉफी के खेत बनने लगे और बंदरगाह शहर मोखा (Al-Mukha) व्यापार का केंद्र बन गया। यमन का मोखा बंदरगाह इतना मशहूर हुआ कि आज भी एक खास कॉफी ‘मोका’ कहलाती है।
अगले करीब 200 सालों तक मोखा दुनिया का इकलौता कॉफी निर्यात केंद्र रहा। दुनिया में पी जाने वाली हर कॉफी यमन से आती थी, क्योंकि यमनी व्यापारी बीजों को निर्यात से पहले जानबूझकर भून देते थे ताकि कोई और इसकी खेती न कर सके।
कॉफी पर यमन का एकछत्र राज 1670 में तब खत्म हुआ जब कर्नाटक के चिकमंगलूर के रहने वाले एक सूफी संत हजरत शाह जनाब मगताबी, जिन्हें लोग बाबा बुदन के नाम से जानते हैं, सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में हज यात्रा से लौटते वक्त मोखा गए।
कहा जाता है कि उन्होंने पहली बार वहां कॉफी पी और यह उन्हें इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसे भारत लाने का फैसला किया। कॉफी के कच्चे बीज बाहर ले जाने की मनाही थी इसलिए उन्होंने सात बीज अपने कुर्ते के अंदर सीने से बांधकर छिपा लिए और भारत ले आए।
बाबा बूदन ने अपनी कुटिया के पास की पहाड़ी पर सातों बीजों को बो दिया। आज चिकमंगलूर की ये पहाड़ी बाबा बुदनगिरि पहाड़ी के नाम से जानी जाती है। भारत आज दुनिया का सातवां सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक देश है जो हर साल 60 लाख कॉफी बैग (प्रति बैग 60 किलो) कॉफी का उत्पादन करता है।
17वीं-18वीं सदी में डच-फ्रांसीसी व्यापारियों ने कॉफी के पौधे जावा और कैरेबियाई इलाकों तक पहुंचा दिए, जिससे कॉफी से यमन का सदियों पुराना एकाधिकार पूरी तरह खत्म हो गया।

भारत-यमन के दो हजार साल पुराने रिश्ते
करीब दो हजार साल पहले भारतीय व्यापारी केरल और गुजरात के तटों से मसाले, काली मिर्च, नारियल और कपड़ा लेकर यमन के अदन और मुकल्ला जैसे बंदरगाहों तक जाते थे। 7वीं शताब्दी में इस्लाम के विस्तार के साथ यमनी व्यापारी भारत आने लगे। केरल और दक्षिण कर्नाटक में शुरुआती मस्जिदों की स्थापना में उनकी भूमिका मानी जाती है।
बाद में यमन के व्यापारी हैदराबाद, गुजरात और महाराष्ट्र भी पहुंचे। 18वीं और 19वीं शताब्दी में दक्षिणी यमन के हद्रमाउत इलाके से बड़ी संख्या में लोग भारत आए। इन लोगों को हद्रामी कहा जाता था जिन्होंने मराठा शासक नाना फडणवीस और हैदराबाद के निजाम की सेनाओं में सेवा दी।
1996 में छपी किताब ‘Mediaeval Deccan History’ में इतिहासकार उमर खालिदी ने हैदराबाद में यमन के हद्रामी अरबों के इतिहास पर एक लेख लिखा था।
इसमें वो लिखते हैं, ‘20वीं सदी में कई अरब लोग सेना, पुलिस और सरकारी नौकरियों के ऊंचे पदों तक पहुंचे। निजाम ने 20 से ज्यादा अरब लोगों को सम्मानजनक उपाधियां भी दीं। सुल्तान नवाज जंग के एक वंशज की 1930 के दशक में सालाना आमदनी करीब 2 लाख रुपये थी, जो उस समय बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी।’

लेख के मुताबिक, हैदराबाद के निजाम ने अपनी सेना और बॉडीगार्ड में यमन के लोगों को अच्छी-खासी संख्या में भर्ती कर रखा था क्योंकि वे अरबों पर बहुत भरोसा करते थे। इन्हें ‘चौश’ कहा जाता था।
हैदराबाद का बरकस इलाका जिसे ‘मिनी यमन’ कहते हैं, आज भी भारत में यमनी संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां करीब 2 से 3 लाख यमनी मूल के लोग और उनके वंशज रहते हैं। यहां यमनी खान-पान, अरबी कहवा, मंडी, पारंपरिक पहनावा, अरबी भाषा और रमजान की कई पुरानी परंपराएं जीवित हैं। यमन के लोग अपने साथ हरेसा नाम की एक डिश लेकर आए थे जो कि भारत में अब हलीम नाम से प्रचलित है।
आज का यमन कैसे बना?
बीसवीं सदी के मध्य तक यमन दो अलग देश थे। उत्तरी यमन पर सदियों पुरानी इमामत (धार्मिक-राजनीतिक शासन) का राज था, जबकि दक्षिणी यमन जिसमें राजधानी अदन भी शामिल थी,1839 से ब्रिटेन का उपनिवेश था।
1962 में उत्तर में क्रांति होने पर इमामत खत्म हुई और यमन अरब गणराज्य बना। 1967 में ब्रिटेन से आजादी के बाद दक्षिणी यमन सोवियत-समर्थक, मार्क्सवादी झुकाव वाला यमन गणराज्य बना। भारत उन शुरुआती देशों में शामिल था जिन्होंने दोनों ही देशों को मान्यता दी।

1990 में उत्तर और दक्षिण यमन मिलकर आज का यमन गणराज्य बने, लेकिन यह एकीकरण टिकाऊ साबित नहीं हुआ। 1994 में सत्ता बंटवारे को लेकर गृहयुद्ध हुआ, जिसमें उत्तर ने दक्षिण के अलगाववादी विद्रोह को दबा दिया।
इसके बावजूद दोनों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक मतभेद बने रहे, जिनसे आगे चलकर उत्तर में हूती विद्रोह और दक्षिण में STC जैसे अलगाववादी आंदोलन उभरे।
अरब स्प्रिंग और हूती आंदोलन की शुरुआत
2010-11 में मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में बड़े पैमाने पर लोकतंत्र समर्थक और सरकार विरोधी प्रदर्शन देखने को मिले थे जिसे अरब स्प्रिंग कहा गया।
विरोध की यह लहर यमन तक भी पहुंची और 33 सालों से सत्ता में रहे राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को हटना पड़ा। उनकी जगह अब्दुर रब्बु मंसूर हादी राष्ट्रपति बने लेकिन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कमजोर सरकार से असंतोष बना रहा।

इसी माहौल में हूती आंदोलन तेजी से उभरा। हूती कोई बाहरी सेना नहीं, बल्कि उत्तरी यमन के सादा प्रांत के जैदी शिया समुदाय से जुड़े विद्रोही हैं, जिनका नाम संस्थापक हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती के नाम पर पड़ा।
ये खुद को अंसार अल्लाह (अल्लाह के समर्थक) कहते हैं और यमन के एक-तिहाई भूभाग और दो-तिहाई आबादी पर इनका नियंत्रण है।
शुरुआत में हूती आंदोलन की मांगें राजनीतिक भागीदारी, भ्रष्टाचार खत्म करना और उत्तरी यमन की उपेक्षा रोकने तक सीमित थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन हथियारबंद विद्रोह में बदल गया।
अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और कई पश्चिमी देशों की रिपोर्टों में आरोप लगाया गया है कि ईरान ने हूतियों को हथियार, मिसाइल और ड्रोन तकनीक के साथ सैन्य प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया है। हालांकि, ईरान हूतियों को हमेशा सीधे सैन्य समर्थन देने से इनकार करता रहा है।
2014 में हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और राष्ट्रपति हादी को देश छोड़कर भागना पड़ा। सऊदी अरब को डर था कि हूतियों की पूर्ण सत्ता का मतलब उसकी दक्षिणी सीमा पर एक ईरान-समर्थक सरकार होगी। इसलिए 2015 में सऊदी अरब ने यूएई समेत कई अरब देशों के साथ मिलकर हादी सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया।

एक तरफ हूती, उनके पीछे ईरान और दूसरी तरफ सऊदी अरब-यूएई, बाद में अमेरिका-ब्रिटेन भी सीधे तौर पर हवाई कार्रवाइयों में शामिल हो गए।
2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में यमन में संघर्षविराम हुआ जिसके बाद वहां काफी हद तक लड़ाई रुक गई लेकिन यह कभी स्थायी शांति समझौते में नहीं बदली।
जब हूतियों ने रोक दी लाल सागर में जहाजों की रफ्तार
अक्टूबर 2023 में गाजा में इजरायल-हमास युद्ध शुरू हुआ, और महज कुछ ही हफ्तों में इसकी लपटें लाल सागर तक पहुंच गईं। 19 अक्टूबर 2023 को हूतियों ने गाजा के समर्थन में इजरायल की तरफ मिसाइलें और ड्रोन दागे, और 19 नवंबर 2023 को उन्होंने ब्रिटिश कार्गो जहाज गैलेक्सी लीडर को जब्त कर उसके 25 क्रू सदस्यों को बंधक बना लिया।
फरवरी 2024 तक करीब 40 जहाजों पर हमले हो चुके थे। हूतियों के हमले का असर इतना बड़ा था कि स्वेज नहर से गुजरने वाले जहाजों की संख्या नवंबर 2023 के करीब 2,068 से गिरकर अक्टूबर 2024 तक महज 877 पर आ गई।
हालांकि, जब गाजा में स्थिति सामान्य हुई तब लाल सागर में हूतियों के हमले भी रुक गए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्टों के मुताबिक, सितंबर 2025 के बाद लाल सागर में हूतियों ने कोई नया हमला नहीं किया लेकिन जुलाई 2026 में मामला पूरी तरह पलट गया।
ईरान-अमेरिका की जंग में हूतियों की एंट्री
फरवरी 2026 में शुरू हुए ईरान-अमेरिका युद्ध से हूती शुरुआत में दूर रहे। लेकिन 13 जुलाई को सऊदी समर्थित यमनी सरकार ने सना एयरपोर्ट पर बमबारी की, जिसके जवाब में हूतियों ने 20 जुलाई को सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी का ऐलान कर दिया।

उन्होंने बाब-अल-मंदेब से गुजर रहे सऊदी से जुड़े जहाजों एन्सेलिया और लैला पर हमला किया। इन हमलों के बाद सऊदी अरामको को अपनी एक रिफाइनरी कुछ समय के लिए बंद करनी पड़ी।
भारत पर यमन की अस्थिरता का असर
भारत से लगभग 3,266 किलोमीटर दूर स्थित यमन भारत की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति, तीनों से जुड़ा हुआ है। शीत युद्ध के दौर में जब भारत के कई अरब-मुस्लिम देशों से रिश्ते मजबूत नहीं थे, यमन के साथ अच्छे संबंधों ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) में भारत को समर्थन दिलाने में मदद की।
भारत के प्रति यमन का यह समर्थन उस दौर में बेहद अहम था क्योंकि ओआईसी अक्सर कश्मीर मसले पर भारत विरोधी रुख अपनाता रहा है। भारत और यमन दोनों इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA) के भी सदस्य हैं।
यमन के साथ रिश्ते भारत की समुद्री सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद अहम हैं। भारत का पश्चिम एशिया और यूरोप से जुड़ा एक बड़ा हिस्सा व्यापार यमन के ठीक बगल से गुजरने वाले बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट से होकर जाता है। जब भी यहां हूतियों के हमले बढ़ते हैं या नाकाबंदी जैसी स्थिति बनती है, दुनिया भर की शिपिंग कंपनियों को अपने जहाजों का रास्ता बदलना पड़ता है और भारत का व्यापार भी इससे अछूता नहीं रहता।
भारत अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से मंगवाता है, और यह तेल ज्यादातर होर्मुज स्ट्रेट और बाब अल-मंदेब इन्हीं दो स्ट्रेट से होकर आता है।

ईरान के होर्मुज बंद रखने और हूतियों के सऊदी तेल टैंकरों पर हमले से तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं। भारत अपने इस्तेमाल का 88% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है जिसमें सऊदी, यूएई जैसे खाड़ी देशों का अहम योगदान है। तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में महंगाई बढ़ती है और इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।
यमन में कितने भारतीय रहते हैं?
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जनवरी 2025 तक यमन में करीब 700 भारतीय नागरिक (NRI) और 420 भारतीय मूल के विदेशी नागरिक हैं, यानी कुल लगभग 1,120 लोग। गृहयुद्ध से पहले यह संख्या काफी ज्यादा थी। 2015 में गृहयुद्ध तेज होने और सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य हस्तक्षेप के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन राहत’ चलाकर यमन से करीब 5,600 लोगों को सुरक्षित निकाला। इनमें लगभग 4,700 भारतीय और 40 से अधिक देशों के करीब 1,000 विदेशी नागरिक शामिल थे।
सालों पहले भी भारत से बड़ी संख्या में लोग कारोबार के लिए यमन जाते थे। 1839 में ब्रिटेन के अदन बंदरगाह पर कब्जे के बाद यह ब्रिटिश भारत का अहम समुद्री केंद्र बन गया और बड़ी संख्या में भारतीय वहां जाकर बसने लगे।
1950 के दशक में युवा धीरूभाई अंबानी ने भी अदन में नौकरी की, जहां से उनके कारोबारी सफर की शुरुआत हुई। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी का जन्म भी अदन में ही हुआ था। आज सना, अदन और अल-हुदैदा जैसे शहरों में कम से कम तीन लाख भारतीय मूल के यमनी नागरिक रहते हैं।
भारत ने यमन में काफी निवेश भी किया था। युद्ध से पहले रिलायंस जैसी भारतीय कंपनियों ने यमन के तेल-गैस क्षेत्र में निवेश किया था, और दोनों देशों का व्यापार करीब 3 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। युद्ध की वजह से ये प्रोजेक्ट्स रुक गए हैं लेकिन अगर यमन में शांति लौटती है तो उसके पुनर्निर्माण में भारत की भूमिका अहम हो सकती है।