
अगर कोई कहे कि बिना स्टेरॉयड या सप्लीमेंट्स के भी आप एक अच्छे बॉडी बिल्डर बन सकते हैं तो शायद आपको यकीन न हो। आज के युवाओं में फिटनेस को लेकर एक अलग क्रेज है। किसी को बॉलीवुड का अगला ‘सलमान खान’ या सिक्स पैक एब्स वाला धांसू एक्टर बनना है, तो कोई इस होड़ में बॉडी बनाना चाहता है कि सोशल मीडिया पर फिटनेस इंफ्लुएंसर बन जाए। इसके लिए कई लोग तरह-तरह के सप्लीमेंट्स या कहें स्टेरॉयड ले रहे हैं, लेकिन आज से करीब 100 साल पहले पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता (कोलकाता नाम तो 2001 में मिला था) में एक ऐसे योग गुरु थे, जिन्होंने न कोई स्टेरॉयड लिया, न कोई सप्लीमेंट्स… पर योग और फिटनेस के फ्यूजन से ऐसी बॉडी बनाई कि आज के बड़े-बड़े बॉडी बिल्डर फेल हो जाएं। नाम था- बिष्णु चरण घोष। योग गुरु शब्द सुनकर आपके दिमाग में जो इमेज बन रही है, ये उससे बिल्कुल अलग थे। आज कहानी भारत के इन्हीं अनोखे बॉडी बिल्डर योग गुरु की-
स्वामी विवेकानंद के पड़ोसी
बिष्णु चरण घोष किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी’ (योगी की आत्मकथा) के लेखक परमहंस योगानंद के छोटे भाई थे, जिनका असली नाम मुकुंद लाल घोष था। स्वामी विवेकानंद भी घोष के पड़ोस में ही रहा करते थे। बिष्णु चरण घोष योग के उन शुरुआती प्रचारकों में से थे, जो अपने ज्ञान को सात समंदर पार ले गए। अमेरिका से लेकर जापान तक उन्होंने सुर्खियां बटोरीं। अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी जैसी चर्चित जगहों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया।
जापान ने तो 2017 में घोष के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था। घोष के कई शिष्यों ने अपने हैरतअंगेज कारनामों से दुनिया को हैरान किया। लेकिन यह शायद दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि भारत के इतिहास में बिष्णु चरण घोष, उनके शिष्य बुद्ध बोस और कलकत्ता की इस अनोखी विरासत के बारे में लंबे समय तक बहुत कम चर्चा हो पाई।
घोष और शिष्यों के कमाल, सीने पर चला हाथी
करीब 2 साल पहले 2024 में अमेरिकी फिटनेस कोच और इन्फ्लुएंसर जेफ कैवेलियर (Jeff Cavaliere) ने इंस्टाग्राम पर कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें शेयर की थीं। ये तस्वीरें बिष्णु चरण घोष और उनके कुछ शिष्यों की थीं। इन तस्वीरों को देखकर कई लोग दंग रह गए थे। एक तस्वीर में घोष के शिष्य बुद्ध बोस पेट की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाला एक बहुत ही कठिन आसन करते दिख रहे थे।

एक तस्वीर में घोष की शिष्या रेबा रक्षित के सीने पर से एक विशालकाय हाथी गुजरता नजर आ रहा था। उन्होंने कई बड़े बॉडीबिल्डिंग सितारे भी तैयार किए थे, जो बाद में ‘मिस्टर यूनिवर्स’ जैसा खिताब जीतने वाले पहले एशियाई बने। जेफ कैवेलियर ने जिन तस्वीरों का इस्तेमाल किया, उनमें से कुछ तस्वीरें बिष्णु चरण घोष की पहली किताब ‘मसल कंट्रोल एंड बारबेल एक्सरसाइज’ से ली गई थीं। इस किताब को उन्होंने 1930 में केशब चंद्र सेन गुप्ता के साथ मिलकर प्रकाशित किया था। इन तस्वीरों तक पहुंचने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।
अमेरिका में तस्वीरों ने दिखाया नया इतिहास
अमेरिकी लेखक और योग प्रेमी जेरोम आर्मस्ट्रांग (Jerome Armstrong) को नवंबर 2013 में वाशिंगटन डीसी की अनोखी स्मिथसोनियन (Smithsonian) इमारत में कुछ तस्वीर दिखी थीं। जेफ कैवेलियर की तरह जेरोम आर्मस्ट्रांग को भी योग गुरु बिष्णु चरण घोष के बारे में जानने की उत्सुकता हुई। वहां लगी ये तस्वीरें योग के ऐतिहासिक सफर को दिखा रही थीं कि किस तरह यह भारत के पारंपरिक अभ्यास से बदलकर आधुनिक दुनिया की नई वैश्विक पहचान बन गया है। उन्होंने वहां से ‘योग: द आर्ट ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन’ (The Art Of Transformation) नाम की एक किताब भी खरीदी थी।

आर्मस्ट्रांग ने बताया था,
“योग आसनों की शुरुआत वाले अध्याय में बुद्ध बोस की एक पूरे पन्ने की तस्वीर थी। उस तस्वीर के नीचे लिखा था: बुद्ध बोस योग गुरु बिष्णु घोष के छात्र हैं, लंदन में 1930 के दशक के आस-पास योगाभ्यास का प्रदर्शन करते हुए। बुद्ध की वह तस्वीर लाजवाब थी। उसमें वह पेट की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाला एक बहुत ही कठिन आसन कर रहे थे।”
पहले तो आर्मस्ट्रांग इस बात को लेकर हैरान हुए कि इतनी शानदार चीज के बारे में इतनी कम जानकारी क्यों उपलब्ध थी। बाद में, उन्हें बुद्ध बोस की एक बिना छपी एक पांडुलिपि (हाथ से लिखी किताब) मिली। अलग-अलग आसनों की तस्वीरों वाली इस किताब का नाम ‘योग आसन्स’ था। यह दशकों तक लंदन में बोस परिवार के पास रही और काफी समय बाद एक आर्ट कलेक्टर (कला संबंधी वस्तुएं जुटाने वाले) के पास तक पहुंची।
घोष की विरासत और बिक्रम चौधरी
जब आर्मस्ट्रांग को यह पांडुलिपि मिली, तो उन्होंने ‘कलकत्ता योग’ नाम की किताब लिखने का मन बना लिया। इस किताब के सिलसिले में आर्मस्ट्रांग कोलकाता आए और इसके बाद कोलकाता में योग के इतिहास को जानने का नया दौर शुरू हुआ।
आर्मस्ट्रांग के शब्दों में,
“इस किताब को लिखने की एक वजह यह थी कि मैं इस नए इतिहास से बहुत प्रभावित था। दूसरी वजह वैश्विक स्तर पर चर्चित योगगुरु बिक्रम चौधरी का तरीका था, जो इसी परंपरा को सीखकर कामयाबी के शिखर पर पहुंचे, लेकिन उन्होंने कोलकाता में घोष की विरासत के बारे में दुनिया को बताने के लिए कुछ खास नहीं किया। एक दिलचस्प बात यह भी थी कि जब मैं यह किताब लिख रहा था, तब बिक्रम चौधरी का प्रभाव उनके ऊपर लगे दुर्व्यवहार के मामलों के कारण कम हो रहा था, और बिष्णु चरण घोष व कलकत्ता की विरासत के बारे में एक बार फिर से चर्चा होने लगी थी।”
बिष्णु चरण घोषः एक बॉडी बिल्डर योगगुरु

योग और फिटनेस का फ्यूजन
आमतौर पर योग गुरुओं की जो एक पारंपरिक छवि होती है, उसके विपरीत जिस दौर में ये तस्वीरें ली गई थीं, घोष पूरी तरह से बॉडीबिल्डिंग से जुड़े हुए थे। वे वॉल्टर चिट टुन और यूजेन सैंडो जैसे बॉडीबिल्डर्स से काफी प्रभावित थे, जो 1900 के दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया में मशहूर थे। योग की यह परंपरा विष्णु दास को अपने भाई योगानंद से मिली थी, जो खुद भी एक बेहद लोकप्रिय गुरु थे। दो अलग-अलग परंपराओं के इस मेल ने व्यायाम के प्रति घोष के नजरिए को अनोखा बना दिया। उन्होंने इसे दो हिस्सों में बांटा-ताकत के लिए ‘रेसिस्टेंस ट्रेनिंग’ (वजन उठाने वाली कसरत) और अंदरूनी सेहत के लिए ‘योग’।
लेखक, रिसर्चर और योग शिक्षिका इडा पाजुनन ने RT India को बताया कि कसरत और ज्ञान को लेकर घोष का यह नजरिया उस दौर के बंगाल की देन था। उस समय बंगाल के अखाड़ों में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद (secular nationalism) पनप रहा था, और ये अखाड़े दुनियाभर के ज्ञान व भारतीय परंपराओं के मिलन केंद्र बन रहे थे। उस दौर में सामाजिक, राजनीतिक और शारीरिक (फिटनेस) आंदोलन एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए थे। स्वामी विवेकानंद भी घोष के पड़ोस में ही रहते थे और वह अक्सर अखाड़ों में जाया करते थे।
पाजुनन कहती हैं कि घोष कोलकाता में शारीरिक फिटनेस के उस दौर के बड़े प्रतीकों में से एक बन गए थे, जो राष्ट्रवाद की भावना के साथ-साथ आगे बढ़ रहा था। योग से जुड़ी बातें पुरानी संस्कृत के बजाय बंगाली और अंग्रेजी भाषाओं में लिखी जा रही थीं, जिससे आम लोगों के लिए इन्हें समझना आसान हो गया था। घोष ने अपनी किताब ‘मसल कंट्रोल एंड बारबेल एक्सरसाइजेस’ में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद का भी जिक्र किया है। उन्होंने अपनी यह किताब ‘यंग बंगाल’ आंदोलन को समर्पित की थी, जो 1830 के दशक में रूढ़िवादी हिंदू धर्म के विरोध में खड़ा हुआ था।
महिलाओं का हठयोग, मसल्स कंट्रोल
उस दौर में एक बड़ा बदलाव यह आया कि जिन महिलाओं को पहले हठयोग करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था, उन्हें भी योग शिक्षिकाओं और योगियों के रूप में सराहना मिलने लगी थी। ऐसी ही एक महिला रेबा रक्षित थीं। वह बिष्णु घोष की शिष्या थीं। उनके जीवन पर पाजुनन की किताब ‘स्ट्रांग वुमन’ (Strong Woman) आधारित है। रेबा रक्षित के सबसे चर्चित कारनामों में से एक था- एक पूरे बड़े हाथी का उनके सीने के ऊपर से गुजरना।
पाजुनन बताती हैं, ‘शुरुआत में बिष्णु चरण घोष को मिली लोकप्रियता की एक वजह यह भी थी कि उनके छात्र अपनी मांसपेशियों पर नियंत्रण की कला से हैरान कर देने वाले कारनामे कर दिखाते थे। उन्होंने मोनोतोष रॉय जैसे कई बड़े बॉडीबिल्डिंग सितारे भी तैयार किए, जो ‘मिस्टर यूनिवर्स’ का खिताब जीतने वाले पहले एशियाई बने।’
योग पर उनके कई विचारों के बारे में उनके शिष्य बुद्ध बोस के लेखन से पता चलता है। बुद्ध बोस के मुताबिक, घोष का मानना था कि योगासनों का सही अभ्यास उम्र (longevity) को बढ़ा सकता है। यह शरीर की सभी जीवित या कमजोर पड़ रही मांसपेशियों व टिश्यूज (ऊतकों) को मजबूत करने का प्राकृतिक तरीका होता है।

घोष की पोती संभाल रहीं विरासत
बिष्णु चरण घोष के नाम पर आज भी एक योग कॉलेज चल रहा है, जहां भारत और दुनिया भर से छात्र आते हैं। घोष योग कॉलेज की जिम्मेदारी बिष्णु चरण घोष की पोती मुक्तामाला मित्रा संभालती हैं। वह बताती हैं कि घोष योग कॉलेज में आज भी इसी तरीके का पालन किया जाता है। हमारा फोकस योग के जरिए बीमारियों को ठीक करने या इलाज पर होता है। हम व्यक्ति की सेहत को ध्यान में रखकर उसके लिए योगासनों की एक लिस्ट बनाते हैं और किसी डॉक्टर के पर्चे (prescription) की तरह तैयारी करते हैं। सभी छात्र और शिक्षक इसी नियम को मानते हैं।
मित्रा कहती हैं कि कॉलेज में आज भी स्थानीय (लोकल) और विदेशी छात्र नियमित रूप से आते हैं। कुछ लोग दर्द और शारीरिक समस्याओं से छुटकारा पाने या सिर्फ फिट होने के लिए आते हैं, तो कुछ लोग इस कला को सीखने और ट्रेनर बनने के लिए आते हैं हालांकि, इस तरह के इलाज के वैज्ञानिक आधार को पूरी तरह साबित किया जाना अभी बाकी है, फिर भी शारीरिक तंदुरुस्ती के इस तरीके को चाहने वाले आज भी बहुत से लोग हैं। उन्हीं में से एक हैं मशहूर बंगाली अभिनेता तोता रायचौधरी, जो हफ्ते में तीन बार एक-एक घंटे योग का अभ्यास करते हैं।
(यह लेख कोलकाता के स्वतंत्र पत्रकार दीपांजन सिन्हा ने RT India के लिए लिखा है)




