
एयर मार्शल (रि.) अनिल चोपड़ा
भारत का डिफेंस प्रोडक्शन फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में रिकॉर्ड $18.6 बिलियन तक पहुंच गया। वहीं, डिफेंस एक्सपोर्ट 63% बढ़कर $4.6 बिलियन हो गया। एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी का कारण बेसिक सुरक्षा उपकरणों और गोला-बारूद से आगे बढ़कर ब्रह्मोस और आकाश मिसाइलों, एयरो-स्ट्रक्चर, रडार और प्लेटफॉर्म जैसे हाई-टेक सिस्टम तक विस्तार करना रहा। मुस्तैद प्राइवेट कंपनियों और स्टार्ट-अप्स ने कंपोनेंट्स, सब-सिस्टम और ड्रोन के जरिए कुल एक्सपोर्ट वैल्यू में लगभग आधे का योगदान दिया।
भारत के एक्सपोर्ट किए जाने वाले प्रमुख हार्डवेयर में, भारत और रूस के मिलकर विकसित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, डोर्नियर-228 यूटिलिटी एयरक्राफ्ट शामिल है। इसके साथ ही एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH ध्रुव), स्वाति वेपन-लोकेटिंग रडार, एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS), नेवल ऑफशोर पेट्रोल वेसल, तेज इंटरसेप्टर बोट, हल्के टॉरपीडो, रडार सिस्टम, एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक सब-सिस्टम भी एक्सपोर्ट का हिस्सा है।
ब्रह्मोस में 12 से अधिक देशों की दिलचस्पी
फिलीपींस, भारत और रूस के जॉइंट प्रोजेक्ट 'ब्रह्मोस' का पहला खरीदार था। क्षेत्रीय समझौतों के बाद इंडोनेशिया ने भी इसे खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। वियतनाम भी इसे खरीदने के लिए बातचीत के अंतिम चरण में है। मलेशिया, UAE, सऊदी अरब, मिस्र, चिली और दक्षिण अफ्रीका समेत एक दर्जन से अधिक देशों ने ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम को रिव्यू किया है किया है या इसमें औपचारिक दिलचस्पी दिखाई है।
रूसी राजदूत ने अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस हाइपरसोनिक मिसाइलों की योजनाओं का खुलासा किया। बुलेटप्रूफ जैकेट, खास तरह के हेलमेट और अलग-अलग क्षमता वाले पारंपरिक गोला-बारूद और फ्यूज का निर्यात किया जाता है। आर्मेनिया तैयार हथियार प्रणालियों, तोपखाने और मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर का एक बड़ा खरीदार है। अमेरिका और फ्रांस भारत में बने कच्चे माल, एयरोस्पेस सब-सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा सॉफ्टवेयर के बड़े खरीदार हैं।
हाल ही में यह खबर आई है कि भारत रूस में बने और युद्ध में परखे जा चुके T-90 भीष्म टैंक के अपग्रेड पैकेज को अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को बेच रहा है। यह पैकेज पूरे टैंक बेड़े को बदलने के मुकाबले एक किफायती विकल्प है। इसमें एडवांस्ड थर्मल साइट्स, डिजिटल फायर-कंट्रोल सिस्टम और बेहतर सुरक्षा व मोबिलिटी पैकेज शामिल हैं। इन्हें स्थानीय स्तर पर ऑपरेशन के लंबे अनुभव के आधार पर डेवलप किया गया है।
T-90 टैंक का मैन्युफैक्चरिंग हब
T-90 रूस का तीसरी पीढ़ी का मुख्य बैटल टैंक है। इसे मशहूर T-72 की जगह लेने के लिए बनाया गया था। T-90 को रूस के निजनी टैगिल में उरलवगोनजावॉड ने डिजाइन और तैयार किया था। और यह 1992 में रूसी सेना में शामिल हुआ। सीरिया और नागोर्नो-काराबाख समेत कई बड़े संघर्षों में इस टैंक का इस्तेमाल किया गया है। रूस अपनी ज़मीनी सेना में सैकड़ों T-90, T-90A और आधुनिक T-90M वैरिएंट का इस्तेमाल करता है। अल्जीरिया के पास लगभग 570 T-90SA टैंक हैं और अज़रबैजान के पास लगभग 200 T-90S यूनिट हैं। इराक, तुर्कमेनिस्तान, युगांडा और वियतनाम के पास भी इनकी छोटी संख्या मौजूद है।
भारत T-90 मुख्य बैटल टैंक का सबसे बड़ा ऑपरेटर है। देश ने अब तक अनुमानित 2,100 T-90 टैंक खरीदे हैं, जिससे रूस की युद्ध के समय की भारी खरीद के बावजूद, भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा T-90 बेड़ा होने की संभावना है। भारत के 1,300 से अधिक T-90 टैंक, बड़े पैमाने पर भारत में तैयार किए गए T-90S 'भीष्म' हैं, जो भारतीय सेना की भारी बख्तरबंद मैकेनाइज्ड डिवीजनों की मुख्य ताकत हैं।

भारतीय रक्षा मंत्रालय का लक्ष्य है कि स्थानीय स्तर पर प्रोडक्शन और अपग्रेड के जरिए T-90 टैंकों की कुल संख्या को 1,805 तक पहुंचाया जाए। भारत 464 अपग्रेडेड T-90 Mk-III (T-90MS) वेरिएंट्स को शामिल कर रहा है। इनमें एडवांस्ड डिजिटल फायर कंट्रोल और थर्मल इमेजिंग साइट्स जैसी सुविधाएं हैं। शुरुआत में इन्हें रूस से इंपोर्ट किया गया था या रूसी किट से असेंबल किया गया था, लेकिन अब भारत में बनने वाले T-90 टैंकों में लगभग 80% पार्ट्स देश में ही बने होते हैं। इन टैंकों को एडवांस्ड मिड वेव थर्मल इमेज (MWIR) कमांडर साइट के साथ अपग्रेड किया गया है।
3 फरवरी, 2025 को सेना ने T-90S/SK टैंक बेड़े के लिए एक 'एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम' तैयार करने के लिए संभावित वेंडर्स की पहचान करने के लिए 'रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन' (RFI) जारी किया। यह सिस्टम 'टॉप-अटैक मोड' में 'टैंडेम वॉरहेड्स' से सुरक्षा के लिए जरूरी है। एक 'काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम' (C-UAS) मौजूदा क्षमताओं को और बढ़ाएगा। इसमें एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों, रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड और केमिकल व काइनेटिक एनर्जी वाले हथियारों से सुरक्षा की योजना है। यह सब टैंक की मोबिलिटी से समझौता किए बिना किया जाएगा। नए वेरिएंट वाले टैंकों में नई जेनरेशन के गोला-बारूद और तोप से दागी जाने वाली मिसाइलें होंगी। रिपोर्ट्स में अधिक प्रभावी और पावरफुल इंजन के यूज की भी बात कही गई है।
भारतीय सेना के इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर ने T-90 भीष्म का पहला पूरा ओवरहॉल (रिपेयर और नए बदलाव) पूरा कर लिया है। इससे सेना में इसकी सर्विस लाइफ काफी बढ़ जाती है। पिछले साल, भारत सरकार ने T-90 टैंकों के लिए 1350 HP के इंजन खरीदने की प्रक्रिया भी शुरू की थी, ताकि ऊंचे इलाकों में इनकी पावर-टू-वेट रेश्यो और गतिशीलता मोबिलिटी को बेहतर बनाया जा सके। यूक्रेन संघर्ष से मिले सबक के बाद, अपग्रेड करना जरूरी हो गया था।
यह अपग्रेड भारत को सिर्फ खरीदार के बजाय एक किफायती, युद्ध में परखी हुई टेक्नोलॉजी और मॉडर्नाइजेशन की सुविधा देने वाले देश के तौर पर स्थापित करता है। साथ ही, यह दुनिया भर में T-90 का इस्तेमाल करने वालों को नए टैंक खरीदे बिना पुराने हार्डवेयर को आधुनिक बनाने का मौका देता है। साथ ही, भारत के बड़े डिफेंस एक्सपोर्ट टारगेट को भी पूरा करने में मदद करता है।
एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग: बढ़ रही इंजीनियरिंग क्षमता
भारत पहले से ही अमेरिकी विमानों के लिए बड़े एयरो-स्ट्रक्चर बनाता है। इनमें F-16 के लिए विंग्स, AH-64 अपाचे के लिए पूरे फ्यूजलेज और CH-47 चिनूक के लिए क्राउन और टेल-कोन स्ट्रक्चर शामिल हैं। भारतीय कंपनियां बोइंग 737 के लिए वर्टिकल फिन स्ट्रक्चर, फैन काउल और दूसरे सब-कंपोनेंट भी बनाती हैं। साथ ही बोइंग 787-9 ड्रीमलाइनर के लिए कॉम्प्लेक्स कम्पोजिट फ्लोर बीम भी बनाती हैं।
P-8I नेपच्यून के लिए, वे पावर और मिशन इक्विपमेंट कैबिनेट के लिए कम्पोजिट पैनल और ऑक्सिलरी पावर यूनिट डोर फेयरिंग सप्लाई करती हैं। एक भारतीय कंपनी ग्लोबल C-130 सप्लाई चेन के लिए ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के पार्ट्स और स्ट्रक्चरल असेंबली भी बनाती है। अमेरिका और यूरोप में फैक्टरियों पर दबाव होने के कारण, बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
सिकोरस्की S-92 हेलीकॉप्टर के केबिन भारत में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और सिकोरस्की एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन के जॉइंट वेंचर के जरिए बनाए जाते हैं। हैदराबाद में स्थित यह फ़ैसिलिटी पूरी तरह से स्वदेशी केबिन और 5,000 से अधिक सटीक पुर्जे (प्रिसिजन कंपोनेंट्स) बनाती है।
इन्हें बाद में एयरक्राफ्ट की फाइनल असेंबली के लिए अमेरिका भेजा जाता है। टाटा ग्रुप, डायनामैटिक टेक्नोलॉजीज, आजाद इंजीनियरिंग, महिंद्रा एयरोस्ट्रक्चर्स और जेह एयरोस्पेस जैसी प्रमुख घरेलू कंपनियां मुख्य स्ट्रक्चरल पार्ट्स और सब-असेंबली बनाती हैं।
मैन्युफैक्चरिंग अब छोटे, सिंपल पार्ट्स से आगे बढ़कर सुपर-अलॉय और हाई-ग्रेड एल्युमीनियम से बने जटिल, कई मीटर लंबे एयरो-स्ट्रक्चर और सब-सिस्टम बनाने की ओर बढ़ गई है। कुल मिलाकर, भारत का एयरोस्पेस कंपोनेंट्स मार्केट फाइनेंशियल ईयर 2029 तक 1.5 बिलियन डॉलर से बढ़कर 4 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। इसकी सालाना विकास दर 28% होगी।
डिफेंस में प्राइवेट सेक्टर
फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में, भारत के प्राइवेट सेक्टर का कुल डिफेंस प्रोडक्शन में 24% हिस्सा रहा। ये लगभग $5 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। कुल डिफेंस एक्सपोर्ट भी $4.6 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसमें प्राइवेट सेक्टर का योगदान 45% था, जबकि बाकी हिस्सा सरकारी डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स का था। यह बढ़ोतरी लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों, घरेलू खरीद के लिए बड़े बजट और इंपोर्ट पर लगी पाबंदियों की वजह से हुई है।
भारत के प्राइवेट डिफेंस सेक्टर में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स, भारत फोर्ज (कल्याणी ग्रुप) और अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस जैसे बड़े इंडस्ट्रियल ग्रुप्स की यूनिट्स शामिल हैं। हाल ही में, भारत के सबसे बड़े प्राइवेट ग्रुप्स में से एक, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भारत में एयरो-इंजन बनाने के लिए UK की रोल्स-रॉयस के साथ साझेदारी की घोषणा की।
डेटा पैटर्न्स और एस्ट्रा माइक्रोवेव जैसी कंपनियां एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक-वॉरफेयर सिस्टम और रडार के पार्ट्स बनाती हैं, जबकि जेन टेक्नोलॉजीज़ एंटी-ड्रोन सिस्टम और कॉम्बैट सिमुलेशन पर ध्यान देती है। सोलर इंडस्ट्रीज सटीक निशाना लगाने वाले गोला-बारूद और मिलिट्री एक्सप्लोसिव बनाती है। MKU बैलिस्टिक सुरक्षा और मिलिट्री इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल इक्विपमेंट (जिसमें नाइट-विजन और थर्मल सिस्टम शामिल हैं) की एक बड़ी सप्लायर है।
यह बढ़ोतरी उन नीतियों की वजह से हुई है जिनके तहत मिलिट्री के मॉर्डनाइजेशन के लिए कैपिटल बजट का 75% हिस्सा घरेलू कंपनियों के लिए रिजर्व किया गया है। साथ ही छह 'पॉजिटिव इंडिजनाइजेशन लिस्ट' (स्वदेशीकरण की सूची) के जरिए 5,500 से अधिक डिफेंस आइटम और सब-असेंबली के इंपोर्ट पर रोक लगाई गई है। गौरतलब है कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को बढ़ावा देने के लिए भारत ऑटोमैटिक रूट से 74% तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की अनुमति देता है।
लाइसेंस के तहत प्रोडक्शन से इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी तक
कई दशकों से, भारत लाइसेंस के तहत रूसी डिफेंस इक्विपमेंट बनाता आ रहा है। भारत में अभी भी जो चीजें बनती हैं, उनमें से अधिकतर 'बिल्ड-टू-प्रिंट' कैटेगरी की होती हैं। इनमें डिजाइन और अक्सर रॉ मटीरियल – विदेशी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) के जरिये सप्लाई किए जाते हैं। असल में, भारत मैन्युफैक्चरिंग का काम तो करता है, लेकिन इसके अंतिम इस्तेमाल पर कंट्रोल OEM के पास ही रहता है।
लाइसेंस के तहत प्रोडक्शन से किसी प्रोडक्ट को बनाने या बेचने का सिर्फ कुछ समय के लिए और सीमित अधिकार मिलता है। मुख्य टेक्नोलॉजी, सोर्स कोड, डिजाइन डेटा और पेटेंट विदेशी लाइसेंस देने वाली कंपनी के पास ही रहते हैं। इसका मतलब है कि भारत बिना परमिशन के प्रोडक्ट में कोई बदलाव नहीं कर सकता और न ही उसे एक्सपोर्ट कर सकता है।
ब्रह्मोस के मामले में भी, इसका ओरिजिनल डिजाइन रूसी है। हालांकि, अब इसमें भारत के नेतृत्व में सुधार किए जा रहे हैं। चूंकि यह एक स्वतंत्र जॉइंट वेंचर है, इसलिए यह अधिक फ्लेक्सिबिलिटी देता है, खासकर एक्सपोर्ट के लिए। इसी तरह, भारत की ओर से T-90 के जो अपग्रेड पेश किए जाते हैं, वे काफी हद तक देश में डेवलप सिस्टम पर आधारित होते हैं।
इससे भारत-रूस मॉडल दोनों के लिए फायदेमंद साबित होता है। लेकिन डिफेंस टेक्नोलॉजी बहुत एडवांस्ड होती है। इसे डेवलप करने में सालों की रिसर्च लगती है। यह जल्दी ही पुरानी हो जाती है और इसे शायद ही कभी आसानी से शेयर किया जाता है। देश इस तरह की क्षमताओं को बहुत सुरक्षित रखते हैं। अगर भारत सचमुच अपने दम पर डिफेंस मैन्युफैक्चरर और एक्सपोर्टर बनना चाहता है, तो उसे अपना खुद का डिजाइन बेस बनाना होगा।
इसका मतलब है रिसर्च और डेवलपमेंट में कहीं अधिक निवेश करना होगा। भारत अभी रिसर्च और डेवलपमेंट पर अपनी GDP का सिर्फ 0.6% खर्च करता है। वहीं, चीन में यह 2.7% और अमेरिका में 3.6% है। देश में असली इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बनाने के लिए, भारत को सिर्फ असेंबली-लाइन प्रोडक्शन से आगे बढ़कर ओरिजिनल डिजाइन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और पेटेंट व जानकारी (know-how) के घरेलू मालिकाना हक की ओर बढ़ना होगा।
भविष्य के कॉन्ट्रैक्ट, जॉइंट वेंचर और रोजगार के समझौतों में यह पक्का किया जाना चाहिए कि भारत में बनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी विदेशी पार्टनर के पास जाने के बजाय भारतीय कंपनियों के पास ही रहे।
लेखक भारतीय वायु सेना के अनुभवी फाइटर टेस्ट पायलट और नई दिल्ली में 'सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज' के पूर्व महानिदेशक हैं।
(इस कॉलम में व्यक्त किए गए बयान, विचार और राय पूरी तरह से लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे RT के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों। इस लेख को आरटी हिंदी की टीम ने अनुवाद किया है। आप मूल लेख यहां पढ़ सकते हैं।)




