
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बहुत सी चीजें सतह के नीचे आकार लेती हैं। ऊपर से भले ही शुरू में उनका प्रभाव कम दिखे, लेकिन असर काफी दूर तक जाता है। कई बार तो उसमें दशक लग जाते हैं, यह समझने में कि जो परिवर्तन हुआ था, उसका मतलब क्या था और उसका नतीजा क्या होगा।
ऐसा ही एक परिवर्तन भारत में अभी हुआ है- 'RT हिंदी' के रूप में। भारत के वैश्विक सूचना परिदृश्य में यह नई चीज भारत में आई है। आ तो वह पिछले साल ही गई थी, पर अंग्रेजी में थी। लेकिन अब उसका असर अधिक होगा, क्योंकि अब वह हिंदी में भी उपलब्ध है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पिछले साल 2025 के दिसंबर महीने में जब भारत आए थे, तो उन्होंने अपने बहुत सारे कार्यक्रमों के बीच एक टीवी चैनल 'RT इंडिया' का भी उद्घाटन किया था। उस समय कहा गया था कि 'RT इंडिया' समाचारों और सूचना के पश्चिमी मानदंडों से भारत को मुक्त करके सही और विश्वसनीय जानकारी देगा। यानी पश्चिम की तथाकथित सेंसरशिप को हटाकर भारत में समाचारों को पेश करेगा।
अब पुतिन दोबारा भारत आ रहे हैं। वह 12-13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। लेकिन उन्होंने 'RT हिंदी' के लॉन्च के लिए प्रतीक्षा नहीं की। 7 सितंबर को इसे लॉन्च कर दिया गया। माना जा रहा है कि ब्रिक्स की कवरेज और उसके बारे में सही सूचनाएं लोगों तक पहुंचाने के लिए 'RT हिंदी' को पहले लॉन्च किया गया है।
अब आप देखें कि इसमें बहुत सारी चीजें ऐसी हैं, जो सीधे-सीधे समझ में नहीं आतीं। एक तो यह कि रूस की अचानक भारत में इतनी दिलचस्पी बढ़ने की वजह क्या हो सकती है? और दूसरा ये कि (भारत के सूचना परिदृश्य में) क्या कोई खाली जगह थी, जिसको रूस का संचार माध्यम भरने जा रहा है? वह खाली जगह इसलिए थी क्योंकि जब दूसरा विश्व युद्ध हुआ था, तो उस समय जो एक्सिस फोर्सेज थीं यानी जर्मनी और दूसरे देश, उनके मुकाबले अलाइड फोर्सेज ने जमीन पर युद्ध लड़ने के साथ ही, सूचना के स्तर पर भी बहुत ज्यादा काम किया।
मैं अपने अनुभव से बता सकता हूं कि BBC से 45 भाषाओं में दुनिया भर के लिए प्रसारण होते थे। लेकिन विश्व युद्ध समाप्त हुए एक अरसा बीत गया, और उसके बाद पश्चिमी देशों को यह लगने लगा कि शायद अब भारत की उन्हें उतनी आवश्यकता नहीं है। यह उनकी एक रणनीतिक चूक कही जा सकती है। उन्होंने धीरे-धीरे अपने प्रसारण तंत्रों को समेटना शुरू किया। यही हाल जर्मनी के डॉयचे वेले (Deutsche Welle), वॉइस ऑफ अमेरिका और रेडियो चाइना इंटरनेशनल का हुआ। उन्होंने भी अपने प्रसारण, अपनी उपलब्धता और अपने लोगों की यहां मौजूदगी पर उतना ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उन्हें लगता था कि स्थितियां बदल गई हैं।
'RT हिंदी' के बारे में पूर्व विदेश मंत्री और कांग्रेस पार्टी के नेता सलमान खुर्शीद ने लिखा है कि यह एक संकेत है, एक ऐसा इनिशिएटिव है, जिसकी धमक बहुत दूर तक और बहुत देर तक सुनी जाएगी।
जो 'RT हिंदी' लॉन्च हुआ है, उसकी टैगलाइन बहुत मजेदार है- 'फर्क नज़रिए का'। यानी खबर आपके पास होगी, लेकिन उसको देखने का ढंग क्या होगा, वह नज़रिया क्या होगा आपका, यह उस टैगलाइन का संदेश है। उस टैगलाइन के संदेश से भी ज्यादा महत्वपूर्ण उसका हिडन मैसेज है, जो आपको सीधे दिखाई नहीं देता।
'फर्क नज़रिए का' कहते हुए आप यह कहते हैं कि जो कुछ आप अब तक देख रहे थे, वह एक नज़रिया था, हम दूसरा नज़रिया आपके सामने रखना चाहते हैं। यह पश्चिमी सेंसरशिप को तोड़ने का और खबरों पर से उसकी छाप मिटाने का प्रयास दिखाई देता है। इस टैगलाइन का हिडन मैसेज यही है कि अब आप खबरों को उस तरह देख सकेंगे, जैसे उन्हें होना चाहिए था। उस तरह नहीं, जैसा कि पश्चिमी संचार माध्यम आपको दिखाना चाहते थे।
'RT हिंदी' की शुरुआत के लिए रूस के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन रोमन बाबुश्किन को चुना गया। रोमन बाबुश्किन के बारे में यह जानना बहुत दिलचस्प है कि वह न केवल भारत में रूस के डिप्टी हेड ऑफ मिशन हैं, बल्कि भारतीय भाषाओं में भी बहुत दक्ष हैं। वह हिंदी इतने धड़ल्ले और सफाई से बोलते हैं कि हैरानी होती है कि यह विदेशी आदमी इतनी अच्छी हिंदी कैसे जानता होगा। यह एक मैसेजिंग है, एक तरह से संकेत और संदेश देना है कि वो क्या चाहते हैं।
बाबुश्किन ने एक और चीज बहुत दिलचस्प कही। उन्होंने कहा कि आप किसी एक चश्मे से भारत को पूरी तरह न देख सकते हैं, न समझ सकते हैं। उसके लिए आपको जो खुलापन चाहिए, वह पश्चिमी मीडिया आपको उपलब्ध नहीं करा रहा था और वह एक कमी थी, जिसकी भरपाई 'RT हिंदी' करेगा।
बाबुश्किन की यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि जब पिछले साल 'RT इंडिया' अंग्रेजी में लॉन्च हुआ था, तो उस समय उसकी पहुंच जहां तक भी थी, रूस को लगा कि यह पहुंच सीधे उन लोगों तक होनी चाहिए, जो वाकई भारत के लिए और भारत-रूस संबंधों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बचपन में मुझे याद है, रूस से छपने वाली तमाम पत्रिकाएं भारत आती थीं। तमाम चीजें यहां हुआ करती थीं और बच्चों तक पर उनका ध्यान होता था। एक पत्रिका निकलती थी- स्पूतनिक। अयोध्या में अपने घर में बैठे हुए मुझे 'स्पूतनिक' का अंक पढ़ने के लिए मिल जाया करता था। यह सूचनाएं सामान्य नहीं हैं।
बाबुश्किन ने जब यह कहा कि “हम 50 करोड़ हिंदी भाषी लोगों तक पहुंचना चाह रहे हैं”, तो इसको गंभीरता से लेने और देखने की जरूरत है कि रूस दरअसल भारत से किस हद तक अपना जुड़ाव चाहता है और उसे कहां तक ले जाने में सक्षम होगा।
आप चाहें सलमान खुर्शीद का बयान देख लीजिए जिन्होंने 'RT हिंदी' को एक बहुत महत्वपूर्ण इनिशिएटिव कहा, या बाबुश्किन के बयान देख लीजिए। भारत में जो लोग इसके साथ जुड़े हैं, वो एक बहुत जिम्मेदारी का काम करने जा रहे हैं। विदेश नीति और कूटनीति में किसी संचार माध्यम की उपस्थिति कितना बड़ा अंतर ला सकती है, यह देखने की चीज होगी, जिसे हम आज सतह पर देखकर शायद पूरी तरह नहीं समझ सकते।
(मधुकर उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। करीब तीन दशक तक सक्रिय पत्रकारिता करने वाले उपाध्याय लंबे समय तक BBC इंडिया से भी जुड़े रहे। ये विचार उन्होंने 'अवध पंच' नाम के अपने यूट्यूब चैनल पर व्यक्त किए हैं।)




