
होर्मुज में तनाव के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मिस्र जाने की काफी चर्चा है। बीते हफ्ते वह एक दशक में पहली बार मिस्र की राजकीय यात्रा पर गए थे। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के साथ बैठक में शी ने मध्य-पूर्वी देशों से अपनी किस्मत का फैसला खुद करने, बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करने और क्षेत्रीय सुरक्षा के नए ढांचे पर चर्चा करने की अपील की। शी की यात्रा का एजेंडा चीन के उस मॉडल को दिखाता है जिसमें विकास, राज्य की संप्रभुता और अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक शासन व्यवस्था पर जोर है। बीजिंग खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के तौर पर पेश कर रहा है।
दुनिया के कई विकासशील देशों का मानना है कि आज की अस्थिरता की एक बड़ी वजह पश्चिमी देशों का दबदबा, अमेरिका के प्रतिबंध और दूसरे देशों के मामलों में बाहरी दखल है। मध्य-पूर्व में युद्ध, सरकार बदलने की कोशिशों और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद वहां लंबे समय से शांति नहीं आ पाई है। इसके बजाय कई देश आज भी संघर्ष और बड़ी ताकतों पर निर्भरता के बीच फंसे हुए हैं।
चीन पश्चिमी देशों के उलट, देशों को अपने साझेदार और विकास का रास्ता चुनने की आजादी देता है। वो इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार और निवेश पर आधारित मॉडल पेश करता है।

चीन चैरिटी नहीं कर रहा
चीन ये सब चैरिटी के लिए नहीं कर रहा। चीन को नए बाजार, व्यापार के लिए सुरक्षित रास्ते और कच्चे माल की भरोसेमंद आपूर्ति चाहिए। उसके निवेश से कुछ देशों पर कर्ज और टेक्नोलॉजी या व्यापार के मामले में चीन पर निर्भर होने का खतरा भी रहता है। लेकिन चीन आमतौर पर दूसरे देशों की अंदरूनी राजनीति में सीधे दखल नहीं देता। इसी वजह से वो अलग-अलग तरह की सरकारों वाले देशों के साथ भी आसानी से काम कर लेता है।
दोनों देशों ने सुरक्षा-आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाने, डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़े प्रोजेक्ट विकसित करने और द्विपक्षीय व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल पर सहमति जताई। इसका मतलब ये हुआ कि चीन-मिस्र संबंध सिर्फ व्यापार-इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित नहीं, बल्कि आर्थिक-तकनीकी संप्रभुता तय करने वाले क्षेत्रों तक फैल चुके हैं।
चीन की नजर स्वेज पर है?
मिस्र चीन के लिए रणनीतिक रूप से अहम देश है। इसकी आबादी 11 करोड़ से ज्यादा है। यह अरब दुनिया में प्रभावशाली देश है जो अफ्रीका और भूमध्यसागर के बीच स्थित है। सबसे अहम बात यह स्वेज नहर को कंट्रोल करता है।

स्वेज नहर एशिया और यूरोप के बीच व्यापार का एक बड़ा समुद्री रास्ता है इसलिए मिस्र में स्थिरता चीन के लिए भी जरूरी है, क्योंकि चीन का काफी सामान इसी रास्ते से दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचता है। मिस्र चीन के लिए मध्य-पूर्व, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला अहम देश है।
2025 में चीन और अफ्रीका के बीच व्यापार करीब 348 अरब डॉलर तक पहुंच गया। चीन ने 53 अफ्रीकी देशों से आने वाले सामान पर टैरिफ भी हटा दिया। इससे अफ्रीका के साथ चीन के व्यापारिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं।
अफ्रीका चीन के लिए सिर्फ तेल और खनिजों का स्रोत नहीं है। चीन यहां सड़क, बिजली, बंदरगाह, टेलीकॉम और फैक्ट्रियों जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करके अपनी कंपनियों के लिए नए बाजार भी तैयार कर रहा है।
रेलवे से लेकर स्पेस सेक्टर में पैसा दे रहा चीन
मिस्र में चीन का बढ़ता निवेश इसका उदाहरण है। मिस्र सरकार के मुताबिक, स्वेज नहर इकोनॉमिक जोन में चीनी निवेश करीब 4 अरब डॉलर पहुंच चुका है। चीनी कंपनियां बंदरगाह, रेलवे, नई प्रशासनिक राजधानी, पाइप और टायर बनाने वाली फैक्ट्रियों, ग्रीन एनर्जी और सैटेलाइट जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं।
मिस्र में चीन का कुल निवेश 10 अरब डॉलर से ज्यादा है। 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 20.79 अरब डॉलर रहा। 2026 की पहली छमाही में यह व्यापार 21.5 फीसदी बढ़कर 11.3 अरब डॉलर पहुंच गया।
लेकिन इस रिश्ते में एक बड़ी समस्या भी है। चीन से मिस्र जितना सामान खरीदता है, उसके मुकाबले चीन को मिस्र का निर्यात बहुत कम है। 2026 की पहली छमाही में मिस्र ने चीन से करीब 10.4 अरब डॉलर का सामान खरीदा, जबकि चीन को उसका निर्यात सिर्फ 84 करोड़ डॉलर के आसपास रहा।

मिस्र चाहता है कि चीन के निवेश से उसके यहां ज्यादा फैक्ट्रियां लगें, नई तकनीक आए, लोगों को रोजगार मिले और मिस्र में बने सामान को अफ्रीका, अरब देशों और यूरोप के बाजारों में भेजा जा सके। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार ज्यादा संतुलित हो सकता है।
मिडिल ईस्ट से चीन को क्या फायदा है?
चीन और अरब देशों के बीच व्यापार 2024 में 407.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। 2025 में चीन के कुल तेल आयात का करीब 52 फीसदी हिस्सा मध्य-पूर्व से आया। यानी विदेशों से खरीदे गए करीब 3.6 अरब बैरल तेल में लगभग 1.9 अरब बैरल तेल चीन को मध्य-पूर्व से मिला।
खाड़ी के छह अरब देशों ने चीन के कुल तेल आयात में करीब 42 फीसदी योगदान दिया। सऊदी अरब का हिस्सा 14 फीसदी, इराक का 11 फीसदी, UAE का 7 फीसदी और ओमान का 6 फीसदी था। कतर से बड़ी मात्रा में LNG भी चीन पहुंचती है।
इसलिए मिडिल ईस्ट की स्थिरता चीन के लिए सिर्फ कूटनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा का सवाल है।
होर्मुज स्ट्रेट में बढ़े तनाव की वजह से बड़े तेल सप्लायर्स चीन, भारत जैसे एशियाई देशों तक अपना तेल नहीं पहुंचा पा रहे हैं। वहीं लाल सागर और स्वेज नहर में रुकावट से जहाजों को अफ्रीका के चक्कर से जाना पड़ सकता है, जिससे चीन-यूरोप व्यापार का समय और बीमा लागत बढ़ती है।
चीन पाइपलाइन, रणनीतिक तेल भंडार, सप्लायरों में विविधता और नवीकरणीय ऊर्जा के जरिए इस तरह के रिस्क को कम करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन मध्य-पूर्वी तेल की जगह तुरंत किसी दूसरे स्रोत को लाना उसके लिए आसान नहीं है।
चीन के लिए ईरान से ज्यादा जरूरी सऊदी-यूएई
डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर के अनुमान के मुताबिक, चीन ने 2025 में रोज करीब 1.38 मिलियन बैरल ईरानी तेल खरीदा, जो उसके कुल तेल आयात का करीब 12 फीसदी है।
ईरानी तेल आम तौर पर 8-10 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर मिलता है। इससे चीन को सस्ता कच्चा तेल मिलता है, जबकि अमेरिकी प्रतिबंधों से दबे ईरान को आर्थिक सहारा मिलता है।
लेकिन चीन के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का महत्व ईरान से कहीं ज्यादा है। 2025 में चीन का दोनों देशों के साथ व्यापार करीब 108 अरब डॉलर था, जबकि ईरान के साथ यह आंकड़ा अनौपचारिक तेल शिपमेंट को शामिल करने के बाद करीब 41 अरब डॉलर माना गया।
इसलिए बीजिंग की नीति किसी एक पक्ष को जिताने की नहीं है। चीन ईरान के साथ रणनीतिक साझेदारी रखता है, पाकिस्तान के साथ उसके बेहद करीबी संबंध हैं, खाड़ी के राजतंत्रों के साथ रिश्ते बढ़ा रहा है और फिलिस्तीनी राज्य के समर्थन में है। साथ ही वो इजरायल समेत क्षेत्र के सभी प्रमुख पक्षों के साथ कामकाजी संबंध बनाए रखता है।
चीन ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान की रक्षा के लिए अपनी सेना नहीं भेजी और न ही तेहरान के साथ सैन्य गठबंधन बनाया। उसकी प्राथमिकता व्यापार, कूटनीति और समुद्री रास्तों की सुरक्षा है।

चीन को ग्लोबल साउथ का निस्वार्थ समर्थक कहना गलत होगा। चीन अपने हितों के लिए ही काम करता है और अपनी आर्थिक ताकत से चीनी कंपनियों, टेक्नोलॉजी स्टैंडर्ड्स और युआन को बढ़ावा देता है। लेकिन उसका तरीका पश्चिम से अलग है। वो शासन परिवर्तन को नीति का आधार नहीं बनाता, विचारधारा के आधार पर अपने पार्टनर्स को नहीं बांटता, और सैन्य संरक्षण थोपने की कोशिश नहीं करता।
2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब-ईरान संबंध बहाल हुए, BRICS का विस्तार हुआ, चीन-अरब संस्थागत सहयोग बढ़ा और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार की दिशा में कदम बढ़े। इनमें से कोई भी बदलाव अकेले डॉलर या पश्चिमी सैन्य प्रभाव खत्म नहीं करता। ये बदलाव मिलकर ऐसी दुनिया बना रहे हैं जिसमें नियम तय करने की ताकत सिर्फ एक केंद्र के पास नहीं रहती।
मिडिल ईस्ट में चीन की बढ़ती मौजूदगी का मतलब जरूरी नहीं कि वो अमेरिका की जगह लेने जा रहा है। असली बदलाव ये है कि दुनिया ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है जिसमें किसी एक शक्ति के पास हर देश के लिए अंतिम फैसला करने की क्षमता न हो।
इस ओपिनियन पीस को मिडिल ईस्ट स्टडीज सेंटर के अध्यक्ष और मॉस्को स्थित HSE यूनिवर्सिटी में विजिटिंग लेक्चरर मुराद सादिगजादे ने लिखा है। आरटी पर प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का अनुवाद आरटी हिंदी की टीम ने किया है।




