Opinion: यूक्रेन संघर्ष को किसी बिजनेस डील की तरह खत्म नहीं किया जा सकता!
यह लेख ‘रशिया इन ग्लोबल अफेयर्स’ के प्रधान संपादक फ्योदोर लुक्यानोव ने लिखा है। वह विदेश एवं रक्षा नीति परिषद के प्रेसिडियम के अध्यक्ष और वाल्दाई इंटरनेशनल डिस्कशन क्लब के रिसर्च डारेक्टर भी हैं।
विचार
Opinion: यूक्रेन संघर्ष को किसी बिजनेस डील की तरह खत्म नहीं किया जा सकता!
US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)

किसी भी भीषण और खूनी संघर्ष को खत्म करने की कूटनीतिक कोशिशों का स्वागत होना चाहिए। अमेरिका का डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन पिछले डेढ़ साल से अधिक समय से इसके लिए प्रयास करता दिख रहा है। भले ही अब तक मिले नतीजों को बहुत प्रभावशाली नहीं कहा जा सकता। कम से कम पश्चिमी देशों में अमेरिका ही ऐसा देश है, जिसके पास हालात बदलने की ताकत भी है। संभव है कि ट्रंप और उनके करीबी सहयोगी सचमुच इस संघर्ष को खत्म करना चाहते हों। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यूक्रेन संघर्ष के चलते अमेरिका उन विदेश नीति के मुद्दों पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहा, जिन्हें ट्रंप प्रशासन ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है।

लेकिन सवाल है कि ट्रंप की शांति पहल बार-बार घूम कर वहीं क्यों पहुंच जाती है? हर नई कोशिश आखिर में एक और निराशा में क्यों बदल जाती है?

संघर्ष नहीं, एक मुश्किल सौदा?

ट्रंप और उनके प्रमुख दूत यूक्रेन संघर्ष को एक बेहद कठिन, लेकिन तकनीकी समस्या की तरह देखते हैं। मानो यह कोई उलझी हुई पहेली हो, जिसे दुनिया की व्यापक राजनीतिक व्यवस्था से अलग रखकर सुलझाया जा सकता है। यह नजरिया मौजूदा व्हाइट हाउस की सोच को दिखाता है।

ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय मामलों को ऐसी व्यावहारिक समस्याओं के रूप में देखता है, जिनका हल अमेरिका की स्थिति मजबूत करे, और हो सके तो उससे कोई कारोबारी फायदा भी मिले। राष्ट्रपति ट्रंप और उनके दो प्रमुख मध्यस्थों स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की कारोबारी बैकग्राउंड को देखते हुए यह सोच हैरान नहीं करती।

बातचीत आगे बढ़ाने में ऐसा नजरिया कुछ हद तक उपयोगी हो सकता है। लेकिन परेशानी तब शुरू होती है, जब यही सोच उन राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों की समझ की जगह ले लेती है, जिनसे संघर्ष पैदा हुआ। रूस इन्हें संघर्ष के ‘मूल कारण’ कहता है।

स्थायी शांति के लिए यह समझना जरूरी होगा कि बड़ी शक्तियों के आपसी संबंधों में क्या बदलाव किया जाए, ताकि भविष्य में यूक्रेन जैसे टकराव दोबारा पैदा न हों।

क्या सिर्फ बाइडेन की नाकामी से संघर्ष हुआ?

US के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन (Photo-ANI)

ट्रंप बार-बार कहते हैं कि यदि 2022 में वह अमेरिका के राष्ट्रपति होते तो यूक्रेन संघर्ष शुरू ही नहीं होता। उनके इस दावे का संकेत यह है कि जो बाइडेन और डेमोक्रेटिक पार्टी इस संघर्ष को रोकने में नाकाम रहे। ट्रंप ने कभी-कभी यह भी माना है कि नाटो के लगातार पूर्व की ओर विस्तार ने संकट को बढ़ाया।

इसके बावजूद वह उन व्यापक सैन्य और राजनीतिक घटनाओं पर बहुत कम ध्यान देते हैं, जिनके कारण यह टकराव पैदा हुआ। यूक्रेन को लेकर अमेरिका और नाटो की नीति किसी एक राष्ट्रपति या वॉशिंगटन और ब्रसेल्स में बैठे कुछ अधिकारियों ने नहीं बनाई थी। यह नीति कई दशकों में पश्चिम के रणनीतिक हितों की एक खास सोच के आधार पर विकसित हुई।

मॉस्को की नजर से देखें तो 2022 में अपने सबसे खतरनाक दौर में पहुंचा यह संकट शीतयुद्ध खत्म होने के बाद शुरू हुई लंबी प्रक्रिया का नतीजा था।

रूस और यूक्रेन के लिए यह नॉर्मल समझौता नहीं

यही वजह है कि अमेरिका अब भी यह समझने में चूक रहा है कि इस संघर्ष का नतीजा सीधे तौर पर शामिल देशों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। रूस और यूक्रेन, दोनों के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा है। उनके हित एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं, लेकिन दोनों ही इस संघर्ष के परिणाम को अपने भविष्य से जुड़ा हुआ मानते हैं। इसलिए इसे उस तरह के लेन-देन से खत्म नहीं किया जा सकता, जैसा ट्रंप आम तौर पर पसंद करते हैं।

पश्चिमी यूरोप ने भी यूक्रेन के समर्थन में भारी राजनीतिक और आर्थिक निवेश किया है। इसलिए संघर्ष के नतीजे में उसका भी सीधा राजनीतिक हित जुड़ा है। यही कारण है कि वॉशिंगटन के मध्यस्थों की हर नई कोशिश एक ही दीवार से टकराती है। इस संघर्ष में शामिल कोई भी पक्ष इसे केवल एक और सौदे की तरह नहीं देखता।

अमेरिका मध्यस्थ भी, यूक्रेन का मददगार भी

अमेरिकी नीति में एक बड़ा विरोधाभास भी है। वॉशिंगटन उस संघर्ष में मुख्य मध्यस्थ बनना चाहता है, जिसे जारी रखने में उसकी सैन्य और आर्थिक सहायता की भी भूमिका रही है। ट्रंप के आने के बाद अमेरिका का रुख जरूर बदला है। पहले के मुकाबले यूक्रेन पर वॉशिंगटन का ध्यान काफी कम हुआ है। ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका इस संघर्ष से कुछ दूरी बना ले, लेकिन आगे होने वाली घटनाओं पर उसका निर्णायक प्रभाव भी बना रहे।

यूक्रेन युद्ध की एक हालिया तस्वीर।© ANI

असल मुश्किल यहीं से शुरू होती है। अमेरिका चाहता है कि संघर्ष का आर्थिक बोझ, राजनीतिक जिम्मेदारी और उससे जुड़े खतरे यूरोपीय देश उठाएं, लेकिन शर्तें तय करने का अधिकार वॉशिंगटन के पास रहे। इसके लिए यूरोपीय सहयोगियों को अमेरिका की बात माननी होगी, लेकिन वॉशिंगटन अब इसकी गारंटी नहीं दे सकता। यूरोपीय यूनियन की सरकारें और कीव भी अब ट्रंप के काम करने का तरीका समझने लगे हैं। जब वे ट्रंप को अपनी बात के लिए राजी नहीं कर पाते, तब वे उनके दबाव से बचने के दूसरे रास्ते तलाश लेते हैं।

क्या अमेरिका सैन्य सहायता पूरी तरह रोक सकता है?

यूक्रेन के खिलाफ अमेरिका के पास सबसे प्रभावी कदम सैन्य सहायता को पूरी तरह रोक देना है। इससे बचाव करना कीव के लिए बेहद मुश्किल होगा। लेकिन ट्रंप शायद ऐसा कदम नहीं उठाएंगे, भले ही निजी तौर पर वह इसके पक्ष में हों। इसकी वजह यह है कि वह रूस की पूरी जीत का रास्ता खोलना नहीं चाहते।

अंतिम शांति समझौता कैसा होगा, इसकी बारीकियों को लेकर ट्रंप भले ही बाइडेन जितनी चिंता न करते हों, लेकिन यूक्रेन की पूरी हार अलग बात होगी। यूक्रेन को पूरी तरह छोड़ देने के पक्ष में अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के भीतर भी बहुत ज्यादा समर्थन नहीं है। रूस के साथ संबंधों को बुनियादी रूप से बदलने और बड़े स्तर पर मेल-मिलाप करने की मांग करने वाला कोई प्रभावशाली राजनीतिक वर्ग अमेरिका में दिखाई नहीं देता।

व्हाइट हाउस इसलिए अमेरिकी नीति में उस बड़े बदलाव की कल्पना नहीं कर रहा, जो इस संघर्ष की दिशा पूरी तरह बदल सके। लेकिन ऐसे बदलाव के बिना घटनाएं बार-बार पुराने रास्ते पर लौट जाती हैं। एक लंबे और बेहद हिंसक टकराव की ओर, जिसके खत्म होने का समय कोई भरोसे से नहीं बता सकता।

मध्यस्थों से ज्यादा अहम वो हैं, जो जंग लड़ रहे हैं

लंबे टकराव में आखिरकार उन लोगों और देशों की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है, जो सीधे संघर्ष लड़ रहे हैं और उससे जुड़े खतरे उठा रहे हैं। मध्यस्थ और बाहर से सहायता देने वाले देश महत्वपूर्ण जरूर होते हैं, लेकिन अंतिम फैसला केवल उनके हाथ में नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं है कि स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की अलग-अलग पक्षों से चल रही बातचीत बेकार है। विरोधी देशों के बीच संपर्क बना रहना जरूरी है।

डोनाल्ड ट्रंप अपने दामाद जेरेड कुशनर के साथ।© X/@jaredkushner

इस समय रूस, यूक्रेन और पश्चिम के बीच आधिकारिक बातचीत की व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं है। जहां औपचारिक कूटनीति टूट चुकी हो, वहां अनौपचारिक संपर्क एक-दूसरे की स्थिति समझने में सहायता कर सकते हैं। लेकिन ऐसी कूटनीति की भी अपनी सीमाएं होती हैं।

राष्ट्रपति के रिश्तेदार या कारोबारी सहयोगी संपर्क स्थापित कर सकते हैं। वे यह पता लगा सकते हैं कि किन मुद्दों पर समझौते की गुंजाइश है। लेकिन वे अपने दम पर शांति स्थापित नहीं कर सकते। राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद और एक भरोसेमंद कारोबारी सहयोगी की मध्यस्थता आगे चलकर गंभीर शांति वार्ता का रास्ता खोल सकती है। लेकिन यदि वह समय आता है तो समझौता ऐसे अधिकारियों और संस्थाओं को करना होगा, जिनके पास सरकार की वैध शक्ति हो और जो हस्ताक्षर की गई शर्तों को लागू भी करा सकें।

व्यक्तिगत संबंध बातचीत का दरवाजा खोल सकते हैं, लेकिन केवल इनके सहारे कोई संघर्ष खत्म नहीं किया जा सकता।

(यह लेख मूल रूप से ‘रशिया इन ग्लोबल अफेयर्स’ में प्रकाशित हुआ था। RT हिंदी ने इसका अनुवाद और संपादन किया है।)

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