क्या परमाणु युद्ध को लेकर दुनिया का नजरिया बदल चुका है?
सीमाएं कमजोर पड़ रही हैं, हथियारों को नियंत्रण में रखने वाले समझौते टूट रहे हैं और परमाणु युद्ध का डर कम होता दिख रहा है। खतरा सिर्फ तबाही का नहीं, बल्कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के सामान्य होते जाने का भी है तो क्या सच में दुनिया का नजरिया बदल रहा है?
विचार
क्या परमाणु युद्ध को लेकर दुनिया का नजरिया बदल चुका है?
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कई दशकों तक महाशक्तियों के बीच एक-दूसरे को रोकने की क्षमता ने दुनिया को कुछ हद तक स्थिरता दी। पिछली सदी के मध्य से इस व्यवस्था के केंद्र में परमाणु हथियार रहे। बड़ी शक्तियां एक-दूसरे को रोकती थीं और ऐसा करके वे खुद को भी हद में रखती थीं।

वे बखूबी जानती थीं कि सीमा से बाहर जाकर ताकत आजमाने का अंजाम कितना भयानक हो सकता है। जिसे दुनिया 'रणनीतिक स्थिरता' का सुकून देने वाला नाम देती थी, वह असल में 'आपसी विनाश की साझा ताकत' थी। अंतरराष्ट्रीय संगठन इसी संतुलन की छत्रछाया में फले-फूले लेकिन तमाम कूटनीतिक समझौतों के नीचे एक सीधा सच छिपा था- महाशक्तियों के बीच सीधे टकराव के अंजाम का खौफ। अब वही व्यवस्था बिखर रही है।

क्या परमाणु युद्ध का डर कम हो गया है?

कई लोगों का मानना है कि असली समस्या डर का कम होना है। सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों ने यह मानना ​​बंद कर दिया है कि न्यूक्लियर वॉर सच में मुमकिन है। यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया के तनाव और एशिया में बढ़ते टकरावों के पीछे इसी घटते संयम का हाथ है।

इसका आसान हल यह सुझाया जा रहा है कि दुनिया को फिर से याद दिलाया जाए कि परमाणु युद्ध कितना खौफनाक हो सकता है। तर्क यह है कि अगर यह डर दोबारा पैदा हो जाए, तो देश फिर से संयम बरतने लगेंगे और नए नियमों पर बातचीत को तैयार होंगे। इस सोच में तर्क तो है, लेकिन इसके साथ एक बहुत बड़ा खतरा भी जुड़ा है।

परमाणु हथियार का इस्तेमाल हुआ तो?

सवाल है कि अगर परमाणु हथियारों का वास्तव में इस्तेमाल हुआ तो क्या होगा? इसकी दो संभावनाएं हैं:

  1. ठीक वैसी ही तबाही होगी जिसका डर इंसानियत को आठ दशकों से है। ऐसे नतीजे होंगे जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं होगी।
  2. भयानक तबाही तो मचेगी, लेकिन न दुनिया खत्म होगी और न ही वह हथियार इस्तेमाल करने वाले को कोई पक्की जीत दिला पाएगा।

अगर ऐसा हुआ, तो परमाणु हथियार सिर्फ राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक डर पैदा करने का साधन नहीं रह जाएंगे। बल्कि दूसरे हथियारों की तरह युद्ध में इस्तेमाल होने लग सकते हैं, हालांकि उनकी ताकत कहीं ज्यादा होगी।

ऐसे में सवाल उठता है, क्या इससे परमाणु युद्ध का डर फिर बढ़ेगा? या फिर देश युद्ध के मैदान में ज्यादा असरदार परमाणु हथियार बनाने की रफ्तार तेज कर देंगे? मौजूदा माहौल में दोनों ही बातें संभव हैं।

हथियार सिर्फ युद्ध रोकने के लिए नहीं थे

परमाणु हथियार इंसान द्वारा बनाए गए सबसे शक्तिशाली हथियार हैं और इन्हें युद्ध लड़ने के लिए बनाया गया था। लेकिन बाद में पता चला कि ये सबसे बड़ी जंगों को टालने की गारंटी बन सकते हैं। मगर आज दुनिया की सोच फिर से उसी पुरानी जगह लौटती दिख रही है कि 'हथियार तो बस हथियार है- चाहे वह परमाणु ही क्यों न हो।'

लेकिन हथियारों के दम पर देशों के बीच के मतभेदों को सुलझाने की उम्मीद करना बेमानी है, खासकर तब जब युद्ध का तरीका लगातार बदल रहा है और उसका असर हर क्षेत्र तक फैलता जा रहा है।

कमजोर हो रहीं सीमाएं

दुनिया भर के देशों के लिए अपनी सीमाओं और अहम संसाधनों की रक्षा करना अब पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में सीमाओं के लचीलेपन और खुली दुनिया को एक बड़ी कामयाबी माना गया था, लेकिन आज वही खुली सीमाएं देशों के लिए गंभीर चिंता और खतरे की वजह बन रही हैं।

तकनीक की दुनिया की कोई सीमा नहीं होती। आज ड्रोन बिना रोक-टोक सीमाओं के पार जा रहे हैं और नई तकनीकें देशों की अपने क्षेत्र की रक्षा करने की क्षमता को लगातार कमजोर कर रही हैं। नौबत यहां तक आ गई है कि कई बार यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि असली सीमा कहां खत्म होती है।

सरकारें अपने इस घटते नियंत्रण को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगी। जब हर कार्रवाई का पलटवार होगा, तो यह टकराव और भी तीखा होता जाएगा। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब युद्ध का मैदान सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इंसानी जिंदगी का हर पहलू इसकी जद में आ जाएगा।

ऐसी दुनिया में स्थिरता कैसे होगी?

ऐसे माहौल में सवाल उठता है कि 'रणनीतिक स्थिरता' का असल मतलब क्या रह गया है और इसे कैसे बनाए रखा जा सकता है?

आज युद्ध किसी विवाद का अंतिम समाधान नहीं, बल्कि देशों के बीच बातचीत और साथ रहने का एक स्थायी तरीका बनता जा रहा है। यहां न किसी की पूरी जीत होगी और न किसी की हार; बस एक-दूसरे को आर्थिक, सैन्य, राजनीतिक और मानसिक रूप से थका देने की लगातार कोशिशें चलती रहेंगी।

हालांकि, लंबे समय तक खिंचने वाले इस तनाव के दो उल्टे असर होते हैं:

  1. देश लगातार टकराव झेलने के आदी और सक्षम हो जाते हैं।
  2. दूसरी तरफ, थकान और हताशा इतनी बढ़ जाती है कि इस कभी न खत्म होने वाले संघर्ष को एक झटके में समाप्त करने के लिए सबसे विनाशकारी हथियार (जैसे परमाणु हथियार) उठाने का लालच पैदा हो जाता है।

चिंता की बात यह है कि दुनिया उन वैश्विक नियमों और सुरक्षा दायरों को खोती जा रही है जो पहले ऐसे आत्मघाती कदमों को रोकते थे। आज का माहौल ऐसा दिखता है मानो कोई खुला शिकार का मैदान हो।

तो फिर बचने का रास्ता क्या है?

फिलहाल सिर्फ समझदारी और अपनी महत्वाकांक्षाओं व वास्तविक ताकत का सही आकलन ही एकमात्र सहारा है। यह एक बेहद कमजोर डोर है, लेकिन कम से कम यह हमें आग में घी डालने से रोक सकती है और लपटों से दूर रख सकती है। कम से कम तब तक, जब तक दुनिया एक बार फिर संयम और आत्म-नियंत्रण की असली कीमत न समझ ले।

(फ्योदोर लुक्यानोव: रूस इन ग्लोबल अफेयर्स के प्रधान संपादक, विदेश एवं रक्षा नीति परिषद के प्रेसीडियम के अध्यक्ष और वाल्दाई इंटरनेशनल डिस्कशन क्लब के रिसर्च डायरेक्टर।)

(यह लेख सबसे पहले Russia in Global Affairs में प्रकाशित हुआ था। बाद में आरटी हिंदी की टीम ने इसको ट्रांसलेट और एडिट किया है।)

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