
एक नदी को नियंत्रित करने के लिए बना बांध कैसे किसी देश की अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक बन सकता है? मिस्र का असवान हाई डैम इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। 55 साल पहले शुरू हुई इस परियोजना ने न सिर्फ नील नदी की बाढ़ पर लगाम लगाई, बल्कि मिस्र के औद्योगीकरण की नींव रखी और शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ के साथ उसकी साझेदारी को भी नई पहचान दी। आज भी यह बांध इंजीनियरिंग उपलब्धि के साथ-साथ भू-राजनीतिक इतिहास का अहम अध्याय माना जाता है।
असवान हाई डैम ने मिस्र के भविष्य को दी नई दिशा
इस साल असवान हाई डैम के उद्घाटन की 55वीं सालगिरह है। इसे 20वीं सदी की सबसे महत्वाकांक्षी इंजीनियरिंग परियोजनाओं में से एक माना जाता है। 15 जनवरी 1971 को मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात ने इस बांध का औपचारिक शुभारंभ किया था। इसके साथ ही बांध की विशाल टर्बाइनों ने बिजली उत्पादन शुरू कर दिया। इस परियोजना ने न केवल नील नदी की धारा को प्रभावित किया, बल्कि पूरे मिस्र के भविष्य को भी नई दिशा दी।
असवान शहर के पास स्थित यह विशाल बांध तकनीकी विकास का प्रतीक बन गया। साथ ही यह मिस्र और सोवियत संघ के बीच गहरे सहयोग का भी एक अहम प्रतीक था। इस बांध के निर्माण में सोवियत संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और परियोजना को सफल बनाने में उसका बड़ा योगदान रहा।

असवान स्थित लोटस स्मारक पर अंकित शब्द इस साझेदारी की कहानी बयां करते हैं। स्मारक पर लिखा है, “संयुक्त श्रम के कई वर्षों से गढ़ी गई अरब-सोवियत मित्रता असवान हाई डैम जितनी ही मजबूत बन गई है।” ये शब्द मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के थे, जिन्होंने इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत की थी। हालांकि बांध के पूरा होने से कुछ महीने पहले, 28 सितंबर 1970 को हर्ट अटैक के कारण उनका निधन हो गया था।
इस बांध के निर्माण में लगभग दस साल लगे। इसे पूरा करने के लिए लाखों नहीं, बल्कि सैकड़ों-हजारों श्रमिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों ने लगातार काम किया। उस दौर में इस परियोजना की कुल लागत एक अरब डॉलर से अधिक थी, जो अपने समय के हिसाब से बेहद बड़ी राशि मानी जाती थी। इस बांध ने नील नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही इसने मिस्र के औद्योगीकरण की नींव भी रखी। बांध से मिलने वाली बिजली ने कारखानों, शहरों और सिंचाई प्रणालियों को ऊर्जा उपलब्ध कराई, जिससे देश के आर्थिक विकास को नई गति मिली।
आर्थिक प्रभाव
असवान हाई डैम चट्टानों और मिट्टी से बना 3.6 किलोमीटर लंबा विशाल बांध है। इसकी ऊंचाई 111 मीटर है, जबकि इसके बेस की चौड़ाई 980 मीटर है। इस बांध के कारण बना लेक नासिर दुनिया का सबसे बड़ा आर्टिफिशियल रिजरवॉयर (जलाशय) माना जाता है, जिसकी कुल क्षमता 169 अरब घन मीटर है।
2.1 गीगावाट की स्थापित क्षमता वाला यह बांध हर साल लगभग 10 अरब किलोवाट-घंटे बिजली का उत्पादन करता है। जब यह पहली बार चालू हुआ था, तब यह मिस्र की कुल बिजली जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा पूरा करता था। हालांकि समय के साथ जनसंख्या बढ़ने, ऊर्जा की मांग में बढ़ोतरी और नए पावर प्लांट बनने से राष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति में इसकी हिस्सेदारी कम हो गई है।
फिर भी इस बांध की भूमिका केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। यह नील नदी के पानी को काबू में करके विनाशकारी बाढ़ को रोकता है और सिंचाई व्यवस्था का प्रबंधन करता है। इसके कारण खेती योग्य भूमि में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

दिलचस्प बात यह है कि असवान बांध का निर्माण दो बार किया गया था और इन दोनों बड़े निर्माण कार्यों के बीच पांच दशक से अधिक का अंतर था। पहला असवान बांध ब्रिटिश शासन के दौरान 1899 से 1902 के बीच बनाया गया था। यह अपेक्षाकृत छोटा था और इसकी जल भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए बाद में दो बार इसका विस्तार किया गया।
हालांकि ये उपाय नील नदी के जल स्तर को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुए। इसी वजह से 20वीं सदी के मध्य में मौजूदा बांध से लगभग छह किलोमीटर ऊपर एक नए और बड़े बांध के निर्माण की योजना पर चर्चा शुरू हुई। इस परियोजना की डिजाइन तैयार करने की जिम्मेदारी सोवियत हाइड्रोटेक्निकल डिजाइन संस्थान ‘हाइड्रोप्रोजेक्ट’ को सौंपी गई। निर्माण कार्य 1960 में शुरू हुआ और 1970 में पूरा हुआ। इस दौरान सोवियत संघ ने परियोजना को महत्वपूर्ण तकनीकी और आर्थिक सहायता प्रदान की।
इस बांध का आर्थिक प्रभाव बेहद व्यापक था। 1960 के दशक में मिस्र गरीबी और ऊर्जा संकट से जूझ रहा था। उस समय देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी 200 डॉलर से भी कम थी। लेकिन असवान हाई डैम के संचालन शुरू होने के बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ने लगा।
बांध ने देश में औद्योगिक विकास को नई गति दी। इसके कारण एल महल्ला अल कुबरा की कपड़ा मिलों, हेलवान स्थित लौह एवं इस्पात कारखाने तथा देशभर के विभिन्न रासायनिक उद्योगों के उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। साल 1975 तक औद्योगिक उत्पादन दोगुना हो चुका था और बेरोजगारी में भी कमी दर्ज की गई।
हालांकि इस परियोजना के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए। बांध के निर्माण के कारण लगभग एक लाख से 1.2 लाख नूबियाई लोगों को अपने घर छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में बसना पड़ा। इसके अलावा जलमग्न होने वाले ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों को बचाने के लिए यूनेस्को की निगरानी में बड़े पैमाने पर बचाव अभियान चलाया गया। इनमें अबू सिंबल जैसे विश्व प्रसिद्ध स्मारक भी शामिल थे।
इसके साथ ही, नील नदी द्वारा लाई जाने वाली पोषक तत्वों से भरपूर गाद लेक नासिर में ही जमा होने लगी। इसका असर नील डेल्टा की कृषि भूमि की उर्वरता पर पड़ा और किसानों की कृत्रिम उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ गई।

स्वेज संकट और मॉस्को
असवान हाई डैम का निर्माण सोवियत संघ और मिस्र के बीच सहयोग का सबसे बड़ा प्रतीक था। इस साझेदारी की शुरुआत 1956 के स्वेज संकट के दौरान हुई थी। शुरुआत में इस परियोजना के लिए वित्तीय सहायता देने का वादा अमेरिका, ब्रिटेन और अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (IBRD) ने किया था। लेकिन मिस्र के सोवियत संघ के साथ बढ़ते संबंधों, चेकोस्लोवाकिया के माध्यम से सोवियत हथियार खरीदने और चीनी जनवादी गणराज्य को मान्यता देने के फैसले के बाद पश्चिमी देशों ने 1956 में अपना ऑफर वापस ले लिया।
इसके जवाब में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने 26 जुलाई 1956 को स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनका उद्देश्य नहर से होने वाली आय का इस्तेमाल असवान हाई डैम के निर्माण में करना था। हालांकि नासिर के इस फैसले ने ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल को नाराज कर दिया और तीनों देशों की सेनाओं ने मिस्र पर हमला कर दिया।
यह संघर्ष तब समाप्त हुआ, जब सोवियत संघ ने खुलकर मिस्र का समर्थन किया और सैन्य हस्तक्षेप की चेतावनी दी। इसके बाद मॉस्को, असवान हाई डैम परियोजना का सबसे बड़ा निवेशक और सहयोगी बनकर उभरा।
1958 में सोवियत संघ और मिस्र के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत मॉस्को ने काहिरा को 11।3 करोड़ मिस्री पाउंड (करीब 40 करोड़ रूबल) का कर्ज दिया। इसके अलावा मशीनरी, कच्चा माल और तकनीकी विशेषज्ञता भी मुहैया कराई गई। बाद के सालों में इस कर्ज का एक हिस्सा माफ भी कर दिया गया।
सोवियत इंजीनियरों ने बांध की डिजाइन तैयार की, 175 मेगावाट क्षमता वाली 12 टर्बाइनें उपलब्ध कराईं और मिस्र के विशेषज्ञों को प्रशिक्षण दिया। 9 जनवरी 1960 को राष्ट्रपति नासिर ने 10 टन डायनामाइट से एक मिट्टी के अवरोध को विस्फोट कराकर निर्माण कार्य का औपचारिक शुभारंभ किया। हालांकि इस विशाल परियोजना को पूरा करना आसान नहीं था और इसे पूरा होने में एक दशक से अधिक समय लगा।
1970 तक बांध निर्माण स्थल पर हजारों सोवियत विशेषज्ञों और मिस्र के लगभग 30,000 मजदूरों की तैनाती थी। वे इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने के लिए लगातार काम कर रहे थे।
सोवियत संघ का योगदान केवल इंजीनियरिंग सहायता तक सीमित नहीं था। उसने मिस्र को ऐसी तकनीक और विशेषज्ञता भी उपलब्ध कराई, जिसने देश को जलविद्युत क्षेत्र और भारी उद्योगों के विकास में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर दिया।

ख्रुश्चेव: अफ्रीका की धरती पर कदम रखने वाले पहले सोवियत नेता
निकिता ख्रुश्चेव का नाम सोवियत संघ और मिस्र के संबंधों के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। साल 1964 में उन्होंने मिस्र की यात्रा की और अफ्रीका की धरती पर कदम रखने वाले पहले सोवियत नेता बने। इस दौरान उन्होंने असवान हाई डैम के पहले चरण के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया।
ख्रुश्चेव का भव्य स्वागत किया गया। जगह-जगह सैन्य परेड आयोजित की गईं और मिस्र तथा सोवियत संघ के बीच दोस्ती और एकजुटता का जश्न मनाया गया। अपने भाषणों में ख्रुश्चेव ने असवान परियोजना को साम्राज्यवाद विरोधी प्रयास का प्रतीक बताया। उन्होंने तथाकथित “साम्राज्यवादी शक्तियों और उनके एजेंटों” की आलोचना की और अरब देशों के साथ संबंधों को और मजबूत करने के लिए सोवियत संघ की प्रतिबद्धता दोहराई।
यात्रा के दौरान ख्रुश्चेव ने अपने विशिष्ट अंदाज में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर को सोवियत संघ के सर्वोच्च सम्मानों में से एक ‘हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन’ की उपाधि प्रदान की। इसके साथ ही उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ लेनिन’ और ‘गोल्ड स्टार’ पदक से भी सम्मानित किया गया।
हालांकि मिस्र को सोवियत सहायता केवल असवान हाई डैम तक सीमित नहीं थी। 1950 से 1970 के दशक के बीच सोवियत संघ ने मिस्र के औद्योगीकरण, कृषि विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया। उसकी मदद से देश में 100 से अधिक औद्योगिक इकाइयों की स्थापना हुई, जिनमें कपड़ा मिलें और हेलवान का लौह एवं इस्पात कारखाना भी शामिल था।
सोवियत संघ ने बिजली की लाइनें बनाने और मिस्र के गांवों में बिजली पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन परियोजनाओं ने देश में औद्योगिक विकास की मजबूत नींव रखने में मदद की। सोवियत सहयोग से अलेक्जेंड्रिया में मशीन निर्माण संयंत्र और एक शिपयार्ड स्थापित किया गया। इसके अलावा सोवियत विशेषज्ञों ने रेगिस्तानी भूमि को खेती योग्य बनाने, लेक नासिर में मत्स्य उद्योग विकसित करने, अनाज भंडारण सुविधाओं के निर्माण और परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने में भी सहयोग दिया।
ख्रुश्चेव ने मिस्र को व्यापक सैन्य सहायता भी प्रदान की। अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार, 1955 से 1966 के बीच सोवियत संघ ने मिस्र को 1.16 अरब डॉलर मूल्य के सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए। इनमें एंटोनोव सैन्य परिवहन विमान, टीयू-16 जेट बमवर्षक और एसयू-7 लड़ाकू-बमवर्षक विमान शामिल थे। साल 1970 तक मिस्र की सेना के लगभग 80 प्रतिशत हथियार सोवियत मूल के थे।

सादात और विदेश नीति में बदलाव
1960 के दशक में मिस्र और सोवियत संघ के बीच सहयोग अपने चरम पर पहुंच गया था। लेकिन 1970 में राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के अचानक निधन के बाद सत्ता संभालने वाले अनवर अल-सादात ने देश की विदेश नीति की दिशा बदल दी। सादात का मानना था कि इजरायल का मुकाबला करने के लिए सोवियत सहायता पर्याप्त नहीं है। इसलिए उन्होंने अमेरिका के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश शुरू की और उसे अधिक प्रभावशाली सहयोगी के रूप में देखा। इसी नीति के तहत उन्होंने सोवियत संघ से होने वाली सभी सैन्य आपूर्तियां रोक दीं और 1972 में सोवियत सैन्य सलाहकारों को देश छोड़ने का आदेश दे दिया।
अक्टूबर 1973 में अरब देशों के गठबंधन और इजराइल के बीच छिड़े योम किप्पुर युद्ध के बाद सादात का झुकाव अमेरिका की ओर और अधिक हो गया। युद्ध के परिणाम मिस्र की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे। इसके बाद सादात ने अरब जगत को चौंकाते हुए इजरायल के साथ शांति वार्ता की शुरुआत की। यह प्रक्रिया 1978-79 के कैंप डेविड समझौतों के रूप में सामने आई, जिसने मध्य पूर्व की राजनीति को नई दिशा दी। इससे पहले 1976 में सादात ने 1971 में सोवियत संघ के साथ हुई मित्रता संधि को एकतरफा तरीके से रद्द कर दिया था।

सोवियत विरासत और मौजूदा संबंध
हालांकि विदेश नीति में बदलाव के बावजूद मिस्र में सोवियत संघ की विरासत पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। 1980 के दशक में भी सोवियत संघ असवान हाई डैम के लिए आवश्यक स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति करता रहा। वहीं सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने एक बार फिर मिस्र के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया और खुद को उसके प्रमुख साझेदारों में शामिल किया।
आज रूस और मिस्र के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते मौजूद हैं, खासकर मिस्र की अर्थव्यवस्था में रूसी निवेश को लेकर। दोनों देश अपने संबंधों को अब ‘रणनीतिक साझेदारी’ के रूप में परिभाषित करते हैं।
साल 2003 में मिस्र ने असवान जलविद्युत परियोजना के 12 जनरेटरों के आधुनिकीकरण के लिए एक रूसी-जर्मन कंसोर्टियम के साथ समझौता किया। इस परियोजना में रूस की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत थी। आधुनिकीकरण के बाद बिजली संयंत्र की उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
रूस और मिस्र के संबंधों में एक नया अध्याय 2017 में जुड़ा, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मिस्र यात्रा के दौरान देश के पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण को लेकर ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। एल दबा परमाणु ऊर्जा संयंत्र नामक इस परियोजना का निर्माण रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम (ROSATOM) मिस्र के साझेदारों के सहयोग से कर रही है।
यह संयंत्र भूमध्य सागर तट पर स्थित मातरूह प्रांत के एल दबा क्षेत्र में बनाया जा रहा है, जो राजधानी काहिरा से लगभग 300 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है। 4,800 मेगावाट क्षमता वाला यह परमाणु ऊर्जा संयंत्र 2028 में चालू हो जाएगा, और सभी चार रिएक्टर यूनिट्स के 2030 तक पूरी तरह चालू होने की उम्मीद है।

साल 2025 की शुरुआत में स्वेज नहर के पास ऐन सोखना क्षेत्र में 50 हेक्टेयर में फैला एक रूसी औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की परियोजना को मंजूरी दी गई। इस परियोजना का उद्देश्य रूसी कंपनियों को अफ्रीका और मध्य पूर्व के बाजारों तक सीधी पहुंच उपलब्ध कराना है। उम्मीद की जा रही है कि यह औद्योगिक क्षेत्र 2031 तक पूरी तरह संचालित होने लगेगा।
इसके अलावा, सफेद रंग और लाल-काली धारियों वाली रूस की लंबी दूरी की ट्रेनें, अब पूरे मिस्र में देखी जा सकती हैं। साल 2020 में मिस्र, रूस और हंगरी के बीच हुए एक समझौते के तहत 1,300 यात्री डिब्बों की आपूर्ति शुरू हुई थी। इस परियोजना का कुल मूल्य एक अरब यूरो से अधिक था।
अक्टूबर 2018 में रूस और मिस्र ने सोची में व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस दस्तावेज पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने हस्ताक्षर किए थे। बाद में दोनों देशों की संसदों ने भी इसकी पुष्टि की। यह समझौता राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य-तकनीकी, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा सहित कई क्षेत्रों में सहयोग का आधार बना।
दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध भी लगातार मजबूत हो रहे हैं। साल 2025 में रूस और मिस्र के बीच व्यापार का कुल कारोबार 10.5 अरब डॉलर के स्तर को पार कर गया, जो अब तक का रिकॉर्ड है। मिस्र अफ्रीका में रूस के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में शामिल हो चुका है। रूस मुख्य रूप से अनाज, मशीनरी और उर्वरकों का निर्यात करता है, जबकि मिस्र खाद्य उत्पादों की आपूर्ति करता है।

आज का असवान डैम
आज असवान हाई डैम सोवियत संघ और मिस्र की ऐतिहासिक साझेदारी की जीवित विरासत के रूप में खड़ा है। यह मिस्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बांध नील नदी के जल प्रवाह को नियंत्रित करने, देश के जल संसाधनों को बढ़ाने, बार-बार पड़ने वाले सूखे से सुरक्षा प्रदान करने और कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है।
बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन जैसी आधुनिक चुनौतियों को देखते हुए मिस्र नील नदी पर और बांध बनाने की योजना पर काम कर रहा है। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में देश की आबादी 12 करोड़ तक पहुंच सकती है। इसके बावजूद असवान हाई डैम आज भी मिस्र का सबसे महत्वपूर्ण जल संसाधन ढांचा बना हुआ है।
असवान हाई डैम ने मिस्र को एक कृषि-प्रधान समाज से क्षेत्रीय औद्योगिक केंद्र में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2050 तक मिस्र का लक्ष्य खुद को क्षेत्र की अग्रणी औद्योगिक शक्तियों में शामिल करना है। इसके लिए देश निर्यात-आधारित विकास, पर्यावरणीय नवाचार और डिजिटल परिवर्तन पर विशेष जोर दे रहा है।

मिस्र सरकार हर साल छह प्रतिशत से अधिक आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने और 20 लाख से ज्यादा रोजगार सृजित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। 1960 के दशक में मिस्र के विकास में सोवियत संघ का योगदान केवल कंक्रीट, मशीनों और टर्बाइनों तक सीमित नहीं था। उसने मानव संसाधन विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हजारों मिस्री इंजीनियरों ने सोवियत संघ में शिक्षा प्राप्त की और बाद में वे देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रमुख विशेषज्ञ और पेशेवर बने।
प्राचीन यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ने लिखा था, “मिस्र नील नदी का उपहार है।” असवान हाई डैम ने मिस्र को इस उपहार पर नियंत्रण स्थापित करने की क्षमता प्रदान की। पहले देश हर साल आने वाली अनिश्चित बाढ़ पर निर्भर था, लेकिन इस बांध के बाद उसे अपने जल संसाधनों के प्रबंधन पर कहीं अधिक नियंत्रण मिल गया।
अपने उद्घाटन के 55 साल बाद भी असवान हाई डैम उस दौर का प्रतीक बना हुआ है, जब सोवियत संघ और मिस्र ने मिलकर औपनिवेशिक अतीत की चुनौतियों का सामना किया था। ख्रुश्चेव की ऐतिहासिक यात्राओं से लेकर आज के आर्थिक और ऊर्जा समझौतों तक, दोनों देशों की यह साझेदारी समय की कसौटी पर खरी उतरती दिखाई देती है।
(तमारा रिझेनकोवा: सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी के मध्य पूर्व इतिहास विभाग में वरिष्ठ लेक्चरर और टेलीग्राम चैनल JAMAL की विशेषज्ञ)




