
वीराने में खड़ी पुरानी हवेली…दूर तक घुप्प अंधेरा…अंदर उड़ते चमगादड़ और सन्नाटे को चीरती दरवाजे की चर्र-चर्र की आवाज…भारत में हॉरर फिल्मों की कहानी कुछ ऐसी ही रही है। 70 के दशक में रामसे ब्रदर्स ने अपनी भूतिया फिल्मों से डर और दहशत का ऐसा सम्राज्य खड़ा किया कि लोग आज भी उसे याद करते हैं। फिर वो चाहे ‘दो गज जमीन के नीचे’ हो, ‘वीराना’, ‘तहखाना’ या फिर ‘डाक बंगला’…रामसे फैमिली ने बड़े पर्दे पर खौफ का ऐसा तड़का लगाया कि लोग दीवाने हो गए। समय के साथ विक्रम भट्ट, राम गोपाल वर्मा जैसे निर्देशकों ने भी ‘राज’, ‘1920’ और ‘भूत’ जैसी फिल्मों से ये एहसास कराने की कोशिश की कि इंसानों के अलावा भूत-प्रेत, आत्माओं की भी एक दुनिया होती है।
भारत की तरह ही रूस में भी एक शख्स थे, जिन्होंने लोगों को डरना सिखाया था। नाम था- निकोलाय गोगोल। ये कोई फिल्म डायरेक्टर नहीं थे, बल्कि एक साहित्यकार थे, जिन्होंने रामसे ब्रदर्स से काफी पहले से ही अपनी किताबों के जरिए रूसी जनता को रोमांचित करना शुरू कर दिया था। बाद में, भूतिया संसार की सैर करातीं उनकी किताबों पर बनी फिल्मों ने बड़े पर्दे पर दहशत भर दी। आज बात रूस के साहित्यकार निकोलाय गोगोल की, जिन्होंने असल मायने में रूसी जनता को अपनी लेखनी से डरना सिखाया।
निकोलाय गोगोल की डरावनी दुनिया
निकोलाय गोगोल को अगर रूस में हॉरर या डरावनी कहानियों का रचियता कहें तो शायद गलत नहीं होगा। रूस में जब भी हॉरर का जिक्र आता था, तो सबसे पहले गोगोल की कहानी “विय” (Viy) और उस पर बनी सोवियत जमाने की डरावनी फिल्म दिमाग में आती थी। इसके मॉडर्न रीमेक की खराब क्वालिटी को अगर किनारे कर दें, तो आज भी पुराने लोगों को मॉसफिल्म स्टूडियो का वह स्कूल टूर याद है, जहां असली फिल्म के सेट को देखकर ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। लेकिन Viy की कहानी सिर्फ चुड़ैल, राक्षसों या लोककथाओं के अलौकिक जीवों के बारे में नहीं थी।
असल में, ज्यादातर हॉरर साहित्य (Horror Literature) ऐसे ही विषयों से प्रेरणा लेता है। जैसे हॉफमैन की राक्षसों और शैतानों वाली डरावनी कहानियां या फिर आज के जमाने की वैम्पायर (पिशाच) वाली कहानियां, जिनका काफी कुछ अंदाजा पहले से लगाया जा सकता है।

हकीकत और कल्पनाओं की कहानी
गोगोल की कहानियां इससे कहीं ज्यादा गहराई में जाती थीं। उनकी कहानी “विय” (Viy) उस गहरे और वर्षों पहले दफन उस रहस्य को छूती है, जो लोककथाओं की सतह के नीचे कहीं छिपा था। भयानक राक्षस ‘विय’ और उसके शैतान साथी पाताल लोक की उन आदिम और रहस्यमयी ताकतों को दिखाते हैं, जो पूरी शिद्दत के साथ बेबस होमा ब्रूटस का पीछा करती हैं।
गोगोल के हॉरर की असली ताकत पौराणिक कथाओं, दर्शन (फिलोसोफी) और समाज के मेल में है। ये सिर्फ डराने वाली कहानी नहीं है बल्कि ऐसी दास्तां है जिसके पीछे गहरे और छिपे मायने हैं। उनका दर्शन बताता है कि बिना शब्दों के हकीकत को समझने के दो तरीके होता हैं: या तो हंसी (जैसा कि डेमोक्रिटस मानते थे) या फिर आंसू (जैसा कि हेराक्लीटस मानते थे)।
ये दोनों प्राचीन यूनान के महान दार्शनिक थे। इसीलिए गोगोल का रहस्यवाद और उनका बेतुकापन (absurdity) जैसा कि उनकी कहानी “द नोज” (The Nose) में दिखता है, रूसी हकीकत को समझने की कोशिश करता नजर आता है। एक ऐसी कोशिश, जो पागलों जैसी हंसी और खौफ के उन आंसुओं से होकर गुजरती है, जो इंसान को पागलपन की हद तक ले जाते हैं।
गोगोल की डराने की कला कितनी अलग?
गोगोल की लिखी किताबों को पढ़ते समय हकीकत और अलौकिक ताकतों के बीच का अंतर लगातार धुंधला होता नजर आता है। “द ओवरकोट” में भूत नजर आते हैं, “द पोर्ट्रेट” में जिंदा तस्वीरें दिखती हैं, और यहां तक कि उनकी अनोखी कॉमेडी “द गवर्नमेंट इंस्पेक्टर” भी एक अजीब और खामोश कर देने वाले खुलासे के साथ खत्म होती है।
ये सभी कहानियां मिलकर उस चीज को बनाती हैं जिसे आज के आलोचक “रूसी चथोन” (Russian chthon) कहते हैं यानी हॉरर और अजीबोगरीब अहसास का एक खास रूसी रूप। ऐसा नहीं है कि निकोलाय गोगोल से पहले, रूसी जनता को डराने वाले नहीं हुए। फर्ज के तौर पर बेस्टुजेव-मार्लिंस्की और ओरेस्ट सोमोव जैसे लेखकों का नाम लिया जा सकता है, लेकिन रूसी साहित्य में इस तरह का अनोखा रूप पहले नहीं था।
गोगोल की मशहूर और बेतुकी कहानी “द नोज” (The Nose) सिर्फ एक प्रतीक नहीं बल्कि जीवन के खोखलेपन और उलझनों को सामने लाती है। ये एक नाक की अपने मालिक से अलग होकर आजाद घूमने की अजीब कहानी है।
गोगोल की मशहूर और बेतुकी कहानी “द नोज” (The Nose) सिर्फ एक प्रतीक नहीं बल्कि जीवन के खोखलेपन और उलझनों को सामने लाती है। ये एक नाक की अपने मालिक से अलग होकर आजाद घूमने की अजीब कहानी है।
सबसे ज्यादा डराने वाली रचना
असली हॉरर तब पैदा होता है, जब हकीकत और नामुमकिन चीजें इस तरह मिल जाएं कि उनमें फर्क करना मुश्किल हो जाए। गोगोल की “ए टेरिबल वेंजेंस” (A Terrible Vengeance) शायद उनकी सबसे ज्यादा डराने वाली रचना है। ऐसा सिर्फ जादू-टोने की वजह से नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि यह कहानी रोजमर्रा की रूसी हकीकत के साथ बड़ी सहजता से घुली-मिली हुई थी।
ए टेरिबल वेंजेंस की कहानी रीडर्स को मृत्यु और नैतिकता की कड़वी सच्चाई से रूबरू कराती है। आज का लगभग पूरा रूसी हॉरर साहित्य गोगोल के बनाए इसी ढर्रे पर चलता है। फिर भी, यह कहना कि हॉरर का आविष्कार पूरी तरह से उन्होंने ही किया था, शायद सही नहीं होगा।
खौफ के साथ खास संदेश भी
*गोगोल ने परियों की कहानियों और मिथकों का बड़ी कुशलता से इस्तेमाल किया, जहां पारलौकिक तत्व कभी भी सिर्फ प्रतीक नहीं थे बल्कि गहरे सच को सामने लाने के जरूरी तत्व थे।
*उनकी कहानियां पाठकों को आंसुओं या हंसी के जरिए हकीकत देखने पर मजबूर करती हैं। सिर्फ सामाजिक या नैतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि बेहद गहरे और पवित्र नजरिए से।
*लोककथाओं की उस रूसी डरावनी कहानी को ही लीजिए, जहां एक भाई नियम तोड़ता है और पैरों की जगह नुकीले खूंटों वाला राक्षस बन जाता है।
*गोगोल भी अपने अनोखे अंदाज में इसी तरह के उतार-चढ़ाव को अपनाते थे। कहानी का नायक किसी सामाजिक या नैतिक नियम को तोड़ता था, और उसके बाद एक भयानक सपना शुरू हो जाता।
हॉरर, बेतुकापन और दार्शनिक चिंतन
गोगोल ने भले ही अकेले दम पर इस जॉनर का आविष्कार न किया हो, लेकिन सुपरनैचुरल ताकतों और रूस की कड़वी हकीकत के उनके अनोखे मेल ने यकीनन कुछ ऐसा शक्तिशाली रचा, जिसकी गूंज दशकों तक सुनाई देती रही।
रूसी हॉरर साहित्य में गोगोल की कल्पनाशक्ति एक बड़ी ताकत रही है, क्योंकि यह न सिर्फ अनजाने और रहस्यमयी तत्वों से सामना कराती है बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की कड़वी और अक्सर बेतुकी हकीकत से भी जोड़ती है। इस मायने में गोगोल ने सिर्फ डरावनी कहानियां नहीं लिखीं, उन्होंने रूस को दुनिया देखने का अनोखा नजरिया दिया। ऐसा नजरिया जिसमें हॉरर, बेतुकापन और गहरा दार्शनिक चिंतन बराबर मौजूद है।
ऐसे शुरु हुई रामसे ब्रदर्स की भूतिया कहानी
भारत में हॉरर फिल्में शुरू करने का बड़ा श्रेय रामसे ब्रदर्स को जाता है। निकोलाय गोगोल की तरह, रामसे ब्रदर्स में से कोई भी साहित्यकार नहीं था। सभी फिल्मी लाइन से जुड़े थे। एक रोचक तथ्य ये है कि तुलसी रामसे और श्याम रामसे के पिता फतेहचंद रामसे खुद एक फिल्म बना चुके थे। नाम था ‘एक नन्ही मुन्नी लड़की थी’।
पिता की प्रोड्यूस की गई इसी फिल्म को देखकर तुलसी और श्याम रामसे ने उन्हें हॉरर फिल्म बनाने का आइडिया दिया था। तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे ने एक इंटरव्यू में बताया था कि दोनों भाई ‘एक नन्ही मुन्नी लड़की थी’ फिल्म देखने हॉल में गए थे। फिल्म में मास्क पहने एक किरदार का डराकर चोरी करने वाला अंदाज उन्हें भा गया। और यहीं से भारत में हॉरर फिल्मों का नया दौर शुरु हुआ।
रामसे ब्रदर्स की गोगोल जैसी स्टाइल
रामसे ब्रदर्स की हॉरर फिल्में भी केवल भूत-प्रेत और डरावने दृश्यों तक सीमित नहीं थीं, उनके पीछे समाजिक और सांस्कृतिक संदेश भी छिपे होते थे।
- रामसे ब्रदर्स की लगभग हर फिल्म- जैसे पुराना मंदिर, वीराना, पुरानी हवेली का अंत एक निश्चित ढर्रे पर होता था। फिल्म का खूंखार राक्षस या भूत कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो, अंत में उसे भगवान के त्रिशूल, क्रॉस या धार्मिक मंत्रों के सामने घुटने टेकने ही पड़ते थे। इससे दर्शकों को संदेश दिया जाता था कि बुराई चाहे कितनी भी भयावह हो, ईश्वर की शक्ति और धार्मिक आस्था के सामने उसका अंत तय है।
- रामसे की फिल्मों में अक्सर भूत या राक्षस के जागने या अभिशाप के पीछे इंसानी लालच, धोखा या वासना होती थी। उदाहरण के लिए 1986 में आई ‘तहखाना’ की कहानी जमीन और छिपे खजाने के लालच के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां धन की भूख इंसान को अपनों का ही खून बहाने पर मजबूर कर देती है। फिल्म का छिपा संदेश साफ था- अत्यधिक लालच और अपनों से गद्दारी इंसान को विनाश की ओर ले जाती है।

उनकी कई फिल्मों में भूत वास्तव में अतीत में हुए किसी अन्याय या अपराध का शिकार हुआ करता था, जो अपनी मौत का बदला लेने वापस आता था। ‘बंद दरवाजा’ या ‘पुराना मंदिर’ जैसी फिल्मों में सदियों पुराना अभिशाप अगली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। यह ‘कर्मों के सिद्धांत’ का संदेश था- गुनाह कभी मरता नहीं, और इंसान के बुरे कर्मों की सजा उसकी आने वाली पीढ़ियों तक को भुगतनी पड़ सकती हैं।
(नोट- ओरिजनल लेख लेखक डेनिस लुकयानोव ने लिखा था जो पेशे से एक बुक रिव्यूवर भी हैं। इसे आरटी हिंदी की टीम ने एडिट किया है।)




