
BRICS समिट 2026 खत्म हो गया। दो दिनों तक दिल्ली दुनिया की बड़ी ताकतों के नेताओं की मुलाकातों और कूटनीतिक हलचल का गवाह बनी।
इस दौरान पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की दोस्ती के पल कैमरे में कैद हुए। पीएम मोदी और शी जिनपिंग का 23 सेकंड का हैंडशेक भी चर्चा में रहा। वहीं, ईरानी राष्ट्रपति का हाथ पकड़कर पीएम मोदी के साथ चलने की तस्वीर भी सुर्खियों में रही।
BRICS के सदस्य देशों के नेताओं के साथ बैठकों और कई बाइलेटरल मीटिंग्स के बाद अब बड़ा सवाल है कि आखिर BRICS 2026 से भारत को क्या हासिल हुआ?
इसे 6 अहम सवालों के जरिए समझने की कोशिश करेंगे। जवाब 5 एक्सपर्ट्स देंगे।
1. भारत के लिए कैसा रहा ब्रिक्स 2026?
राज्यसभा सांसद और इंटरनेशनल ब्रिक्स काउंसिल के मेंबर पद्मश्री डॉ. विक्रमजीत सिंह साहनी कहते हैं-
भारत की अध्यक्षता के दौरान 25 शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम हुए।
भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को BRICS के एजेंडे के केंद्र में रखा गया। कृषि, हेल्थ, डिजिटल टेक्नोलॉजी, एनर्जी, स्किल्स, MSME और डिजास्टर मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में ठोस कोऑपरेशन की दिशा में कदम उठे।
कृषि में एक्सीलेंस सेंटर और डिजिटल एग्रीकल्चर नेटवर्क, स्मार्ट ग्रिड और एनर्जी स्टोरेज के लिए कोऑपरेशन और मेंटल हेल्थ के क्षेत्र में भारत की अगुवाई में नेटवर्क इसके उदाहरण हैं।
कुल मिलाकर, नई दिल्ली ब्रिक्स ने भारत को वैश्विक दक्षिण की आवाज, विकासशील देशों के हितों के समर्थक और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक निर्णायक शक्ति के रूप में और मजबूत किया है।
2. नई दिल्ली शिखर सम्मेलन ने BRICS को कितनी मजबूती दी?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, वरिष्ठ पत्रकार अतुल अनेजा कहते हैं-
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से कई बड़ी उपलब्धियां निकलकर सामने आई हैं। नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन ने इस बात को और मजबूती दी है कि बहुध्रुवीय दुनिया में ग्लोबल सिस्टम की दिशा तय करने में ब्रिक्स देश सबसे आगे रहेंगे।
दुनिया बदल रही है और BRICS में हमने बहुध्रुवीय दुनिया के कॉन्सेप्ट को ठोस प्रपोजल के साथ आगे बढ़ाया है।
3. जिनपिंग का BRICS में आना दोनों देशों के रिश्तों के लिए कैसा रहा?
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अनुराधा चिनॉय कहती हैं-
पीएम मोदी और शी जिनपिंग की यह मुलाकात बेहद अहम है, दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से। एक साल में शी जिनपिंग और पीएम मोदी तीन बार मिल चुके हैं। शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत आए हैं क्योंकि भारत-चीन के रिश्ते गलवान के बाद बिगड़ गए थे।
सीमा विवाद का मुद्दा एक संवेदनशील मुद्दा है और दोनों देश सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ब्रिक्स से इतर दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक में इस बात पर सहमति बनी है कि मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए।
शी जिनपिंग के भारत आने के साथ ही कई मुद्दों को सुलझा भी लिया गया है जैसे नई दिल्ली से गुआनझाऊ तक फ्लाइट शुरू हो गई है, वीजा नियमों पर भी नरमी के संकेत हैं।
4. भारत में ईरान-यूएई की लीडरशिप की मुलाकात के क्या मायने हैं?
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ फेलो मीना सिंह रॉय कहती हैं-
युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और यूएई से अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल-नाहयान के बीच बातचीत हुई है।
इस बातचीत से एक सकारात्मक बातचीत का माहौल तैयार हुआ है। अब बात हो रही है कि मिडिल ईस्ट की लड़ाई को कैसे मैनेज किया जाए, होर्मुज संकट का मुद्दा कैसे सुलझाया जाए।
मध्य-पूर्व की जो समस्याएं हैं, वो 2 दिन में सॉल्व नहीं होने वाली हैं। लेकिन ये एक बहुत बड़ा कदम है कि दो देश, जिनके बीच घमासान युद्ध चल रहा था, मिसाइल अटैक हो रहे थे और दोनों एक-दूसरे को सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे थे, वो बातचीत की टेबल पर आए हैं।
मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान उस क्षेत्र के देश ही ढूंढ पाएंगे। हूती, ईरान, सऊदी, यमन, यूएई... इन्हीं देशों को आपस में बैठकर अपनी समस्याएं सुलझानी होंगी।
5. रूस के साथ भारत के संबंधों के लिहाज से कैसा रहा सम्मेलन?
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अनुराधा चिनॉय कहती हैं-
भारत में चाहे कोई भी सरकार हो, रूस के साथ रिश्ते हमेशा अच्छे ही रहे हैं। भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल और खाद खरीदता है। भारत-रूस के बीच लोकल करेंसी में भी व्यापार हो रहा है। दोनों देशों के बीच हालांकि, व्यापार असंतुलन ज्यादा है जिसे पाटने की जरूरत है।
राष्ट्रपति पुतिन इस बार बिजनेस डेलिगेशन के साथ आए हैं और इससे भारत के कारोबारियों को बहुत कुछ मिल सकता है। पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं और उनकी कोशिश हमेशा यही रही है कि रूस को कमजोर किया जाए।
भारत पश्चिमी प्रतिबंधों की अनदेखी कर रूस से तेल और खाद खरीदता है लेकिन यहां के कारोबारी पश्चिम के सेकेंडरी प्रतिबंधों को देखते हुए झिझकते हैं। उन्हें समझाना होगा कि कैसे अन्य सेक्टर्स में भी भारत से रूस को निर्यात बढ़े। मुझे लगता है कि पुतिन के भारत दौरे में इस पर जरूर बात हुई होगी।
6. शिखर सम्मेलन कितना सफल रहा?
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की असिस्टेंट प्रोफेसर राज यादव कहती हैं-
इसके साथ ही, यूएई और ईरान को भारत ने पश्चिम एशिया में युद्ध और एनर्जी सिक्योरिटी से जुड़ी चर्चा के लिए एक अच्छा प्लेटफॉर्म दिया। यह 'ग्लोबल साउथ' के लिए फायदे की स्थिति है, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ को पहली पंक्ति में होना चाहिए और नियम मानने वाले के बजाय नियम बनाने वाले की भूमिका निभानी चाहिए।
ब्रिक्स घोषणापत्र में ग्लोबल गवर्नेंस में सुधार, इकोनॉमिक और ट्रेड पहल, जियोपॉलिटिक्स और आतंकवाद-विरोधी उपायों पर फोकस किया गया। साथ ही, ब्रिक्स ट्रोइका (BRICS TROIKA), एग्रो-इकोलॉजी पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और डिजिटल एग्रीकल्चर नेटवर्क के जरिए संस्थागत तंत्र बनाने पर भी जोर दिया गया।
निस्संदेह ब्रिक्स के पास देने के लिए बहुत कुछ है, बातचीत, कूटनीति और संस्था-निर्माण की दिशा में लगातार कोशिशें ही ब्रिक्स की इस दीवार को और मजबूत और लचीला बना सकती हैं।





