
भारत की खरीदारी और खपत की कहानी अक्सर दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों के आंकड़ों से समझी जाती है। लेकिन जुलाई 2026 में जारी PRICE और Tata Sons की रिपोर्ट ‘The Many Urban Indias’ बताती है कि देश का उपभोक्ता नक्शा महानगरों की सीमाओं से बाहर निकल चुका है। कई छोटे शहरों में परिवारों की औसत आय मुंबई-बेंगलुरु से कम है, लेकिन उनका सालाना खर्च उनसे ज्यादा है। सूरत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां का परिवार बेंगलुरु के परिवार से करीब ₹6 लाख कम कमाता है, फिर भी साल भर में उससे थोड़ा ज्यादा खर्च करता है।
यह तुलना किसी एक महीने की बिक्री या बाजार में हुई खरीदारी पर आधारित नहीं है। रिपोर्ट ने देश के 100 बड़े शहरों में परिवारों की आय, खर्च, बचत और कर्ज का विश्लेषण किया है। इससे पता चलता है कि किसी शहर का परिवार कितना कमाता है और उस कमाई का कितना हिस्सा जीवन चलाने तथा सुविधाएं जुटाने में खर्च कर देता है।
सूरत और बेंगलुरु की तुलना क्या बताती है?
बेंगलुरु देश में सबसे अधिक औसत घरेलू आय वाले शहरों में शामिल है। यहां एक परिवार की सालाना औसत आय ₹28.3 लाख और खर्च ₹15.3 लाख है। यानी परिवार अपनी आय का करीब 54% खर्च करता है। वहीं सूरत में एक परिवार की औसत आय करीब ₹22 लाख है, लेकिन उसका सालाना खर्च लगभग ₹15.6 लाख है। इस तरह सूरत का परिवार बेंगलुरु के परिवार से करीब ₹6 लाख कम कमाने के बावजूद साल में लगभग ₹30 हजार ज्यादा खर्च करता है।

इस रिपोर्ट का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सूरत का कुल उपभोक्ता बाजार बेंगलुरु से बड़ा हो गया है। आबादी और कुल खर्च को मिलाकर देखें तो बेंगलुरु अब भी आगे है। यहां तुलना केवल एक परिवार के औसत सालाना खर्च की है।
सबसे ज्यादा खर्च करने वाले परिवार किन शहरों में हैं?
प्रति परिवार औसत खर्च में चंडीगढ़ देश में पहले स्थान पर है। यहां एक परिवार साल में करीब ₹19.3 लाख खर्च करता है। इसके बाद तिरुवनंतपुरम का स्थान है, जहां परिवार का औसत खर्च करीब ₹17.7 लाख है।
वडोदरा और तिरुपुर भी इस सूची में आगे हैं। इनके बाद करीब ₹15.6 लाख के घरेलू खर्च के साथ सूरत आता है। बेंगलुरु में यह खर्च ₹15.3 लाख है।
रैंकिंग | शहर | एक परिवार का सालाना औसत खर्च |
|---|---|---|
| 1 | चंडीगढ़ | करीब ₹19.3 लाख |
| 2 | तिरुवनंतपुरम | करीब ₹17.7 लाख |
| 3 | वडोदरा | करीब ₹17.5 लाख |
| 4 | तिरुपुर | करीब ₹17.4 लाख |
| 5 | सूरत | करीब ₹15.6 लाख |
| 6 | बेंगलुरु | ₹15.3 लाख |
इस सूची की सबसे दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शीर्ष पांच शहरों में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता में से कोई भी शामिल नहीं है।
मुंबई से कम कमाई, लेकिन खर्च ज्यादा
मुंबई में एक परिवार की औसत सालाना आय ₹24.2 लाख और खर्च ₹14 लाख है। परिवार अपनी आय का करीब 58% खर्च करता है।
PRICE-Tata Sons की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि अमृतसर, अहमदाबाद और जबलपुर के परिवार औसतन मुंबई के परिवार से ज्यादा खर्च करते हैं। हालांकि इन शहरों की औसत पारिवारिक आय मुंबई से काफी कम है।
तिरुवनंतपुरम, सूरत और तिरुपुर में भी औसत पारिवारिक आय मुंबई से कम है, लेकिन प्रति परिवार खर्च उससे अधिक है।
शहर | मुंबई के मुकाबले आय | मुंबई के मुकाबले घरेलू खर्च |
|---|---|---|
| तिरुवनंतपुरम | कम | ज्यादा |
| सूरत | कम | ज्यादा |
| तिरुपुर | कम | ज्यादा |
| अमृतसर | कम | ज्यादा |
| अहमदाबाद | कम | ज्यादा |
| जबलपुर | कम | ज्यादा |
यहां 'कम कमाई, ज्यादा खर्च' का मतलब यह नहीं है कि परिवार अपनी आय से अधिक पैसा खर्च कर रहे हैं। इसका मतलब है कि उनकी आय मुंबई या बेंगलुरु से कम है, लेकिन उनका खर्च इन महानगरों के परिवारों से ज्यादा है।
छोटे शहरों में कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा
रिपोर्ट ने 100 शहरों को आबादी के आधार पर चार हिस्सों में बांटा है। इनमें छह सबसे बड़े शहर, तेजी से बढ़ते 19 शहर, उनसे छोटे 25 शहर और शेष 50 शहर शामिल हैं।
छह सबसे बड़े शहरों में एक परिवार औसतन ₹23.2 लाख कमाता और ₹13.5 लाख खर्च करता है। यानी आय का 58.3% खर्च होता है।
इसके मुकाबले सूरत, पुणे, अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ और इंदौर जैसे तेजी से बढ़ते 19 शहरों में औसत पारिवारिक आय ₹16.7 लाख और खर्च ₹12.2 लाख है। यहां परिवार अपनी कमाई का 73.1% खर्च कर देते हैं।
इससे साफ है कि बड़े महानगरों के बाहर परिवारों की आय कम होने के बावजूद उसका बड़ा हिस्सा खर्च में चला जाता है। अगले 25 शहरों में तो परिवार अपनी आय का औसतन करीब 79% खर्च कर रहे हैं।
पैसा आखिर कहां खर्च हो रहा है?
तेजी से बढ़ते 19 शहरों में एक परिवार के कुल खर्च का 31.1% खाने-पीने पर जाता है। घर, बिजली, पानी और दूसरी घरेलू सुविधाओं पर 25.8%, आने-जाने पर 19.2% और शिक्षा पर 6.8% खर्च होता है।
खर्च का क्षेत्र | कुल घरेलू खर्च में हिस्सा |
|---|---|
| खाना | 31.1% |
| घर, बिजली-पानी और दूसरी सुविधाएं | 25.8% |
| परिवहन | 19.2% |
| शिक्षा | 6.8% |
रिपोर्ट के मुताबिक, तेजी से बढ़ते शहरों में परिवार घर और उससे जुड़ी सेवाओं पर छह बड़े महानगरों के परिवारों से रकम के हिसाब से करीब 3.5% ज्यादा खर्च करते हैं। इन शहरों के विस्तार, नए मकानों और परिवारों के बसने से घरेलू बजट पर दबाव बढ़ रहा है।
इसलिए छोटे शहरों का ज्यादा खर्च केवल महंगी चीजें खरीदने की कहानी नहीं है। मकान, परिवहन और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें भी इसका बड़ा कारण हैं।
कार और घरेलू उपकरणों की खरीद में भी आगे
इन 19 शहरों में 32% परिवारों के पास कार है। यह हिस्सा छह सबसे बड़े शहरों के लगभग बराबर है। लेकिन मोटरसाइकिल रखने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 72% है, जबकि बड़े छह शहरों में यह 50% है।
वॉशिंग मशीन रखने वाले परिवारों की हिस्सेदारी इन शहरों में 40% और माइक्रोवेव रखने वालों की 31% है। छह बड़े शहरों में यही आंकड़े क्रमशः 30% और 27% हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, सालाना आय ₹12 से ₹14 लाख के बीच पहुंचने पर परिवार के कार खरीदने की संभावना बढ़ने लगती है। करीब ₹14 लाख की आय के बाद वॉशिंग मशीन की खरीद तेजी पकड़ती है। इससे पता चलता है कि उभरते शहरों में बढ़ती आय का एक हिस्सा बेहतर सुविधाओं पर खर्च हो रहा है।
सूरत छह महानगरों के बाहर सबसे बड़ा बाजार
सूरत की अहमियत केवल प्रति परिवार ज्यादा खर्च तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत का कुल सालाना उपभोक्ता बाजार 34 अरब डॉलर का है। रिपोर्ट में इस्तेमाल ₹88.35 प्रति डॉलर की औसत दर से यह करीब ₹3 लाख करोड़ बैठता है।
कुल बाजार के आकार में सूरत देश के 100 शहरों में सातवें स्थान पर है। उससे आगे केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई और हैदराबाद हैं। छह सबसे बड़े शहरों से बाहर सूरत देश का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है।
रिपोर्ट सूरत की इस स्थिति को कपड़ा कारोबार, हीरा उद्योग, छोटे उद्यमों और बाहर से आकर शहर में आगे बढ़े कामगारों से जोड़ती है। सूरत में मध्यम और ऊंची आय वाले परिवारों की संख्या भी देश में सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ने वाली संख्या में शामिल है।
खर्च के साथ बचत भी कर रहा सूरत
सूरत की कहानी केवल ज्यादा खर्च की नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत और वडोदरा में 92% परिवार किसी आपात स्थिति के लिए बचत करते हैं। यह रिपोर्ट में शामिल शहरों में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।
तेजी से बढ़ते 19 शहरों में एक परिवार औसतन ₹4.5 लाख सालाना बचाता है। इन शहरों का कर्ज और आय का अनुपात 15.4% है, जो छह बड़े शहरों के 18.5% से कम है।
इसका मतलब है कि सूरत में ज्यादा खर्च को केवल परिवारों पर बढ़ते आर्थिक दबाव से नहीं जोड़ा जा सकता। बढ़ती आय, मजबूत बचत और सुविधाओं पर ज्यादा खर्च, तीनों मिलकर शहर के उपभोक्ता बाजार को बड़ा बना रहे हैं।
भारत के 100 शहरों में ₹74.5 लाख करोड़ का खर्च
रिपोर्ट के मुताबिक, देश के ये 100 शहर कुल आबादी का केवल 19% हिस्सा समेटते हैं, लेकिन भारत की 35% आय और 31% खपत इन्हीं शहरों से आती है।
साल 2025-26 में इन शहरों का कुल घरेलू खर्च ₹74.5 लाख करोड़ आंका गया है। यहां परिवारों का खर्च पिछले एक दशक में सालाना औसतन 10.4% बढ़ा है, जबकि पूरे भारत में इसकी वृद्धि 8.5% रही।
छह सबसे बड़े शहर अब भी इन 100 शहरों के कुल खर्च का 46% हिस्सा रखते हैं। इसलिए महानगरों का दबदबा खत्म नहीं हुआ है। बदलाव यह है कि नई मांग अब सूरत, अहमदाबाद, पुणे, तिरुवनंतपुरम, कोयंबटूर और लखनऊ जैसे शहरों से तेजी से आ रही है।
इन आंकड़ों को कैसे तैयार किया गया?
’The Many Urban Indias’ रिपोर्ट PRICE और Tata Sons ने जुलाई 2026 में जारी की थी। इसमें दिए गए 2025-26 के आंकड़े अनुमान हैं।
गौरतलब है कि रिपोर्ट का आधार PRICE के 2014, 2016, 2021 और 2023 के ICE 360° घरेलू सर्वेक्षण हैं। अलग-अलग वर्षों में इन सर्वेक्षणों में 18 हजार से 35 हजार परिवार शामिल थे। रिपोर्ट तैयार करने वालों ने घरेलू आय के अनुमानों को राष्ट्रीय आय और घरेलू खर्च को राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (National Accounts Statistics) में दर्ज निजी उपभोग खर्च (Private consumption expenditure) से मिलाया है। इसके साथ राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, जनगणना और संयुक्त राष्ट्र के आबादी अनुमानों का भी सहारा लिया गया।
हालांकि, सरकार शहरवार आय का सीधा अनुमान जारी नहीं करती। इसलिए रिपोर्ट ने घरेलू सर्वेक्षण में मिले अलग-अलग शहरों के हिस्से के आधार पर राष्ट्रीय आय और खर्च को शहरों में बांटा है।




