
“अगर सरकार ने पूरी जांच-पड़ताल के बाद मुझे पासपोर्ट जारी किया है, तो एक नागरिक के तौर पर मेरा भरोसा यही होगा कि मेरी पहचान और दस्तावेज वैध माने गए हैं। अगर इसके बावजूद विदेश यात्रा के दौरान मेरी नागरिकता पर कोई विवाद होता है, तो मुझे नहीं पता कि उस सवाल का जवाब देने के लिए मैं कौन-से दस्तावेज सामने रखूंगी।”
नागरिकता के रूप में पासपोर्ट की वैधता पर उठे सवाल के बीच यह कहना है उत्तर प्रदेश के मऊ की रहने वाली अपर्णा उपाध्याय (बदला हुआ नाम) का।
विदेश मंत्रालय (MEA) ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट नागरिकता का नहीं, बल्कि यात्रा का दस्तावेज है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हालांकि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है, लेकिन इसे भारतीय नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद से देश के करोड़ों पासपोर्ट धारकों सहित नागरिकों के सामने अपनी नागरिकता को लेकर सवाल खड़ा हो गया। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर व्यापक बहस छिड़ गई।
शहबाज (बदला हुआ नाम) दिल्ली में रहते हैं और प्राइवेट जॉब करते हैं। वह बताते हैं कि उनके पास 10 साल से पासपोर्ट है। कुछ महीने पहले ही उन्होंने अपना पासपोर्ट रिन्यू करवाया है। इसके लिए उन्हें अपने होम टाउन, बिहार जाना पड़ा था।
“यह फैसला अभी नहीं लिया गया”
पासपोर्ट विवाद के बीच गुरुवार, 25 जून को केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में उसकी स्थिति न तो नई है और न ही हाल में अपनाई गई कोई नीति है।
एक सरकारी अधिकारी ने कहा, “यह फैसला कल नहीं लिया गया कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। यह फैसला पिछले 12 साल में भी नहीं लिया गया।” उन्होंने कहा कि इस संबंध में कानूनी स्थिति कई दशकों से यही रही है।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 क्या कहता है?
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का बयान और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की मूल अवधारणा विरोधाभासी लगती है, क्योंकि अधिनियम की प्रस्तावना में लिखा है कि यह कानून “भारत के नागरिकों” और अन्य पात्र व्यक्तियों के लिए बनाया गया है।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 5(2) में कहा गया है कि पासपोर्ट प्राधिकरण जांच के बाद आवेदन को पूरी तरह मंजूर, आंशिक रूप से मंजूर या अस्वीकार कर सकता है। वहीं, धारा 6(2)(a) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अगर आवेदक भारत का नागरिक नहीं है, तो पासपोर्ट जारी करने से इनकार किया जा सकता है।
हालांकि, धारा 20 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में गैर-भारतीय नागरिक को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है।
विडंबना यही है कि पासपोर्ट जारी करने से पहले आवेदक से जन्म और निवास से जुड़े दस्तावेज लिए जाते हैं, पुलिस वेरिफिकेशन भी किया जाता है। यह दस्तावेज दुनिया भर में भारतीय नागरिकों की पहचान के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता।
इस मामले के बाद देश में नागरिकता और उससे जुड़े दस्तावेजों को लेकर बहस छिड़ गई है। सबसे पहले समझते हैं कि नागरिक कौन होता है।
नागरिक कौन कहलाता है?
किसी देश या क्षेत्र से कानूनी रूप से जुड़ा वह व्यक्ति, जिसे वहां निर्धारित अधिकार प्राप्त हों और जो उनका उपयोग कर सकता हो, नागरिक कहलाता है। व्यक्ति और देश के बीच इस रिश्ते को बांधने वाली कड़ी को नागरिकता कहा जाता है। नागरिकता व्यक्ति को अपने देश से जुड़ाव और अपनेपन यानी सेंस ऑफ बिलॉन्गिंगनेस का एहसास कराती है।
भारत में कैसे मिलती है नागरिकता?
भारतीय संविधान के भाग-2 (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। संविधान के अनुसार, 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के समय भारत में रहने वाले ऐसे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया, जिनका जन्म भारत में हुआ था या जिनके माता-पिता में से किसी एक का जन्म भारत में हुआ था।
इसके अलावा, संविधान में विभाजन से जुड़े विशेष हालात को भी ध्यान में रखा गया। पाकिस्तान से भारत आए उन लोगों को भी नागरिकता दी गई, जिनके माता-पिता या दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था।
वहीं, ऐसे लोग जो भारत से पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन बाद में स्थायी रूप से भारत लौट आए, उन्हें भी भारतीय नागरिक माना गया। इसके साथ ही, जिन लोगों के माता-पिता या दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था, लेकिन वे उस समय भारत के बाहर रह रहे थे, उनके लिए भी नागरिकता संबंधी प्रावधान किए गए थे।
पासपोर्ट, आधार और वोटर आईडी की वैधता क्या है?
विदेश मंत्रालय ने एक तरफ पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना है। सरकार ने इसके साथ ही 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया। कोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया था कि केवल पासपोर्ट का होना किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता साबित नहीं करता।
जुलाई 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मामले में कहा था कि केवल पासपोर्ट के आधार पर भारतीय नागरिकता का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने अनवर हुसैन अब्दुल कादर शेख समेत चार लोगों को विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियम, 1950 के उल्लंघन का दोषी ठहराए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपियों ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पासपोर्ट, आधार कार्ड और जन्म प्रमाण-पत्र पेश किए थे। हालांकि, अदालत ने कहा कि जिन पासपोर्टों का हवाला दिया गया, वे पहले ही निरस्त किए जा चुके थे। इसलिए, उन्हें भारतीय नागरिकता का वैध कानूनी साक्ष्य मानने का कोई आधार नहीं है।
हालांकि, 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रभलीन कौर बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि पासपोर्ट ऐसा दस्तावेज है, जो किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता दर्शाता है और केवल प्रशासनिक संदेह के आधार पर उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस तरह दो अलग-अलग अदालतों के पहले के फैसलों और विदेश मंत्रालय के बयान की वजह से लोगों में भ्रम और गहरा गया है।

एक और सवाल उठता है कि क्या आधार, पैन और वोटर आईडी नागरिकता का प्रमाण हैं? जवाब है, नहीं। दरअसल, साल 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट नागरिकता के प्रमाण के तौर पर इन दस्तावेजों को खारिज कर चुका है।
बाबू अब्दुल रुऊफ सरदार मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस अमित बोरकर ने कहा था कि भारत में नागरिकता तय करने के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 ही मुख्य कानून है। केवल आधार कार्ड, पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र होने मात्र से कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं बन जाता। ये दस्तावेज पहचान और सरकारी सेवाओं के लिए हैं, लेकिन नागरिकता अधिनियम में निर्धारित कानूनी शर्तों का स्थान नहीं ले सकते।
SIR यानी वोटर लिस्ट रिवीजन के लिए जरूरी दस्तावेजों में चुनाव आयोग ने पासपोर्ट को शामिल किया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर आधार को भी इसमें जोड़ा गया।
मई, 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने SIR से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटने का मतलब उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त होना नहीं है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग मतदाता सूची के लिए पात्रता की जांच कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम फैसला देने का अधिकार उसके पास नहीं है।
इसके साथ ही अदालत ने कहा कि अगर किसी का नाम इस आधार पर हटाया जाता है कि वह भारतीय नागरिक नहीं है, तो उसके मामले का अंतिम निर्णय नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी करेगा।
कैसे तय होगा कि आप भारत के नागरिक हैं?
भारतीय नागरिकता को लेकर संविधान में कुछ प्रावधान किए गए हैं। उन शर्तों को पूरा करने वाला व्यक्ति भारतीय नागरिक कहलाता है। नागरिकता से जुड़े नियमों को स्पष्ट करने के लिए संसद ने 1955 में नागरिकता अधिनियम (Citizenship Act, 1955) पारित किया था। इसमें भारतीय नागरिकता प्राप्त करने और समाप्त होने की परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, पांच आधारों पर नागरिकता का जिक्र है।

भारतीय पासपोर्ट की साख कितनी मजबूत?
हेनले एंड पार्टनर्स की ग्लोबल पासपोर्ट रैंकिंग 2026 के नवीनतम संस्करण में भारत 80वें स्थान पर है। भारतीय पासपोर्ट धारकों को 56 देशों/क्षेत्रों में वीजा-फ्री, वीजा-ऑन-अराइवल या इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवल अथॉराइजेशन (ETA) के साथ यात्रा की सुविधा प्राप्त है।
पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण माने जाने को लेकर चल रही बहस के बीच भारत में पासपोर्ट बनवाना भी महंगा हो गया है। 36 पेज वाले सामान्य पासपोर्ट की फीस 1,500 रुपए से बढ़कर 2,500 रुपए हो गई है। वहीं, तत्काल पासपोर्ट के लिए अब 5,000 रुपए देने होंगे, जो पहले 3,500 रुपए थी।
60 पेज वाले पासपोर्ट की फीस भी बढ़ाई गई है। इसकी सामान्य फीस 2,000 रुपए से बढ़कर 3,500 रुपए और तत्काल फीस 4,000 रुपए से बढ़कर 6,000 रुपए हो गई है।
मंत्रालय ने पासपोर्ट रूल्स, 1980 में संशोधन के बाद नई दरों को लेकर गजट नोटिफिकेशन जारी किया है। ये बढ़ोतरी 14 साल बाद की गई है।




