
विवाह जैसा पवित्र बंधन क्या किसी पुरुष को अपनी पत्नी की मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने का अधिकार देता है?
क्या शादी के बाद किसी महिला की निजी स्वतंत्रता और अपने शरीर पर अधिकार खत्म हो जाता है?
क्या कानून में छूट के बावजूद किसी पति पर पत्नी से जबरन संबंध बनाने के मामले में मुकदमा दर्ज किया जा सकता है?
ये कुछ वो सवाल हैं, जो लंबे समय से अदालतों की चौखटों और कानून के गलियारों में घूम रहे हैं। अब वैवाहिक दुष्कर्म यानी मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मंथन करने का फैसला किया है। केंद्र सरकार की ओर से जवाब दाखिल किए जाने के बाद अब अंतिम सुनवाई के लिए अदालत ने 3 हफ्ते बाद की तारीख लगाने का निर्देश दिया है।
मैरिटल रेप का मामला क्या है?
यह पूरा मामला इस सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है कि क्या शादी के बाद पत्नी की सहमति के बिना या जबरदस्ती से बनाए गए शारीरिक संबंधों को रेप माना जाए या नहीं। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि जबरन संबंध बनाना किसी भी महिला की व्यक्तिगत गरिमा का हनन है, चाहे वो शादी करके ही क्यों न बनाया हो।
बार एंड बेंच के मुताबिक, बुधवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि हम इस तर्क को समझते हैं कि शादी के बाद महिला की निजी स्वतंत्रता खत्म नहीं होती, लेकिन कानून में अपवाद मौजूद है। ऐसे में पति पर ऐसा मुकदमा चलाने की इजाजत देने से पहले अदालत को यह देखना होगा कि कानून में मिली छूट जायज या अनुचित।
कानून में क्या अपवाद है?
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 का अपवाद-2 कहता है कि किसी पुरुष द्वारा अपनी बालिग पत्नी के साथ बनाया गया शारीरिक संबंध बलात्कार की कैटेगरी में नहीं आता। आईपीसी की जगह लागू हुई नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 में भी इस अपवाद को कायम रखा गया है। यही वह कानूनी छूट है, जिसे हटाने या सीमित करने की मांग करते हुए कई याचिकाएं कोर्ट में दाखिल की गई हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट का क्या मामला है
सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक हाईकोर्ट के मार्च 2022 के एक फैसले को भी चुनौती दी गई है। इस मामले में हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ अपनी पत्नी से बलात्कार और सेक्सु्अल असॉल्ट के आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट का कहना था कि पुरुष सिर्फ इस आधार पर छूट नहीं ले सकता कि पीड़िता उसकी पत्नी है।
हाईकोर्ट ने कहा था कि आईपीसी की धारा 375 में जो छूट दी गई है, वह पूर्ण नहीं है। ऐसे में पत्नी से जबरन यौन संबंध बनाने वाले पति पर केस चलाया जा सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सबसे पहले सुनवाई करने का निर्णय लिया है।
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को क्या हुआ?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले पर सुनवाई की।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ शादी की वजह से किसी महिला की निजी स्वतंत्रता खत्म नहीं हो सकती, लेकिन साथ ही एक आपराधिक कानून के तहत सजा देने से पहले कानून में दर्ज मौजूदा छूट के प्रावधानों पर विचार करना भी उतना ही अनिवार्य है।
लाइव लॉ के अनुसार, कर्नाटक हाईकोर्ट वाले मामले में पीड़िता पत्नी की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा कि वह इस बात पर दलील देंगी कि कानून में छूट के बावजूद पति पर मुकदमा कैसे कायम रखा जा सकता है।
एक अन्य पिटीशनर की तरफ से सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने कहा कि इस कानूनी प्रावधान की संवैधानिकता पर विचार करते समय यह देखना जरूरी है कि क्या उस कानून के दायरे को सीमित किया जा सकता है?
इस पर चीफ जस्टिस ने आश्वासन दिया कि अदालत इन दोनों पहलुओं पर भी पक्षकारों की बात सुनेगी। कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि हम निश्चित रूप से पीड़िताओं की रक्षा करेंगे, लेकिन क्या ऐसे व्यक्ति पर केस चलाना हमारे अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसे धारा 375 के तहत साफतौर पर छूट मिली हुई हो?
केंद्र सरकार का क्या कहना है?
लाइव लॉ के मुताबिक, केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अगर मैरिटल रेप को अपराध घोषित करना होगा तो ये काम संसद का है, अदालत का नहीं।
इससे पहले, सरकार ने 2024 में कोर्ट में हलफनामा दाखिल करके कहा था कि वह वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध के दायरे में लाने का विरोध किया था। सरकार ने इसके पीछे कुछ तर्क भी दिए थे-
- यह कानूनी से ज्यादा एक सामाजिक मुद्दा है।
- शादी में रेप जैसे कठोर अपराधों पर लागू करना बहुत ज्यादा सख्त और असंगत हो सकता है।
- शादीशुदा महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने के लिए कानून में पहले से ही कई उपाय मौजूद हैं।
- वैसे भी यह मामला संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है और इस पर समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए सभी राज्यों से विचार-विमर्श की जरूरत है।
महिला याचिकाकर्ता का क्या कहना है
याचिकाकर्ताओं और पीड़ित महिलाओं की ओर से पेश वकीलों का तर्क है कि शादी के बाद भी महिला की अपनी शारीरिक स्वायत्तता और सहमति का अधिकार सुरक्षित रहता है। उनका कहना है कि बलात्कार जैसा गंभीर अपराध सिर्फ इसलिए अपराध बनने से नहीं रुक सकता क्योंकि पीड़ित महिला आरोपी की पत्नी है। इसे अपराध से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।
कोर्ट के सामने 2 बड़े सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह तीन हफ्ते बाद बुधवार-गुरुवार को इस मामले पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत मुख्य रूप से दो बड़े सवालों पर विचार करेगा-
- क्या मैरिटल रेप का कानूनी अपवाद कायम रहने के बावजूद, पति पर केस चलाया जा सकता है?
- क्या मैरिटल रेप को दी गई यह कानूनी छूट अपने आप में असंवैधानिक है? और क्या इसे रद्द कर दिया जाना चाहिए?
बता दें कि मैरिटल रेप को अपराध माना जाए या नहीं, इस मामले पर 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट की दो जजों की बेंच ने विभाजित फैसला दिया था। एक जज ने जहां इसे असंवैधानिक बताया था, वहीं दूसरे जज ने कानून में दिए गए अपवाद को सही ठहराया था। अब चूंकि ये मामला सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने है तो कोर्ट के आगामी फैसले से एक बड़े विवादित मुद्दे के समाधान की उम्मीद की जा सकती है।




