दिल्ली हादसा: वो चला गया, लेकिन उसकी आंखें दुनिया देखेंगी
दिल्ली के सत्य निकेतन हादसे में 18 साल के अर्पित की जिंदगी अचानक थम गई। उसके जाने के बाद परिवार ने ऐसा फैसला लिया, जिसने इस दर्दनाक कहानी को एक अलग मायने दे दिए। आखिर ऐसा क्या था उस फैसले के पीछे, जिसने अर्पित की मौत के बाद भी उसकी कहानी को अधूरा नहीं रहने दिया?
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दिल्ली हादसा: वो चला गया, लेकिन उसकी आंखें दुनिया देखेंगी
सत्य निकेतन हादसे में अर्पित ने गंवाई जान

‘मेरे बेटे को अभी बहुत कुछ देखना बाकी था…’

दिल्ली के सत्य निकेतन में 6 सितंबर को एक 50 साल पुरानी इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। मलबे में सात जिंदगियां दब गईं, जिनमें पांच युवा छात्र थे। लेकिन इस हादसे की सबसे दर्दनाक कहानियों में से एक है 18 साल के अर्पित जाज की- ऐसा लड़का, जिसकी आंखों में CA बनने का सपना था और जिसके पास जिंदगी देखने के लिए अभी पूरी दुनिया बाकी थी।

अर्पित मध्य प्रदेश के देवास के रहने वाले थे और दिल्ली यूनिवर्सिटी के आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज में B.Com के दूसरे साल में पढ़ रहे थे। साथ ही वह CA की तैयारी भी कर रहे थे।

हादसे में जान गंवाने वाले अर्पित (फाइल फोटो)

हमेशा के लिए बंद हो गई जिंदगी की किताब

रक्षाबंधन और जन्माष्टमी पर वह अपने परिवार के पास देवास गए थे। रविवार सुबह करीब 8 बजे वह दिल्ली स्थित अपने PG लौटे। कमरे में पहुंचते ही उन्होंने पिता भूपेंद्र को फोन किया और बताया कि वह सुरक्षित पहुंच गए हैं। इसके बाद अर्पित ने अपनी किताबें खोलीं। उन्हें CA की परीक्षा की तैयारी करनी थी।

कुछ घंटे बाद उनकी किताबें खुली रह गईं लेकिन जिंदगी की किताब हमेशा के लिए बंद हो गई।

दोपहर करीब 1:30 बजे सत्य निकेतन की ‘Hostel Daze’ वाली इमारत भरभराकर गिर गई। उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि मलबे के नीचे अर्पित भी दबे हैं। घर पर मां बार-बार बेटे को फोन करती रहीं। कोई जवाब नहीं आया। उन्हें लगा शायद अर्पित पढ़ते-पढ़ते सो गया होगा। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, चिंता बढ़ती गई।

Arpit Family
अर्पित की मौत से सदमे में परिवार

अस्पताल के गलियारे में परिवार ने लिया एक फैसला 

परेशान परिवार दिल्ली पहुंचा, तो NDRF की टीमें मलबे में जिंदगी तलाश रही थीं। करीब 27 घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलता रहा। 

पिता भूपेंद्र जाज के मुताबिक- दिल्ली पहुंचकर हमने मलबे में भी ढूंढा, अस्पताल में भी भटके, कुछ पता ही नहीं चल पा रहा था। अगली सुबह ये कन्फर्म हुआ कि जान गंवाने वालों में मेरा बेटा अर्पित भी है। 

अस्पताल के गलियारे में पिता भूपेंद्र अपने बेटे को आखिरी बार देख रहे थे। सामने उनका 18 साल का बेटा था-जिसके लिए जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी।

लेकिन इसी अंधेरे पल में परिवार ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने अर्पित की कहानी को एक नई रोशनी दी। उन्होंने अर्पित की कॉर्निया दान करने का फैसला किया।

पिता ने कहा-

“मेरे बेटे को अभी बहुत कुछ देखना बाकी था। अगर वह यहां नहीं है, तो उसकी आंखें किसी और को दुनिया देखने में मदद करें।”

अंतिम संस्कार के लिए अर्पित को ले जाने से पहले AIIMS में उनकी कॉर्निया दान कर दी गई। हालांकि, हादसे में एक आंख खराब हो गई थी, ऐसे में दूसरी आंख का कॉर्निया ही दान किया गया। 

किसी और की जिंदगी होगी रोशन 

अर्पित CA नहीं बन सके। अपनी B.Com की डिग्री भी पूरी नहीं कर सके। जिन किताबों को उन्होंने हादसे से कुछ घंटे पहले पढ़ने के लिए खोला था, वे शायद वहीं रह गईं। लेकिन उनके माता-पिता ने उनके अधूरे सफर में भी एक ऐसी चीज पूरी करने की कोशिश की- किसी और की जिंदगी में रोशनी पहुंचाने की।

एक मां-बाप ने अपने बेटे को खो दिया... लेकिन उसी बेटे की आंखों से किसी और को जिंदगी देखने का मौका दे दिया। 

दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी इलाके सत्य निकेतन में 6 सितंबर 2026 को दोपहर करीब 1:30 बजे एक पांच मंजिला इमारत अचानक के गिरने से ये हादसा हुआ था। इस इमारत में छात्रों के लिए PG चल रहा था। हादसे के वक्त इमारत में मरम्मत का काम भी चल रहा था। हादसे में कुल 7 लोगों की मौत हुई, जबकि 12 लोगों को मलबे से सुरक्षित निकाला गया। 

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