
पाकिस्तान के लिए अमेरिका से दोस्ती सबसे बड़ी मजबूरी क्यों है? भारत-रूस के संबंध इतने खास क्यों हैं? राष्ट्रपति पुतिन और पीएम मोदी की केमिस्ट्री इतनी गहरी क्यों है? रूस के मुकाबले भारत के चीन से रिश्तों में क्या अलग है? भारत-रूस व्यापार को आने वाले समय में कैसे पंख लगने वाले हैं?... इसी तरह के तमाम सवालों पर रूस में भारत के राजदूत रहे पंकज सरन से RT India की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा ने खास बातचीत की। ‘India, Russia And the World’ टॉक शो में पूर्व राजदूत ने ये भी बताया कि नई दिल्ली में हो रही ब्रिक्स समिट की चुनौतियां क्या हैं।
पुतिन से मोदी की मित्रता कितनी पुरानी
सवालः आप (पंकज सरन) 2016 से 2018 तक रूस में भारत के राजदूत रहे और यह वो वक्त था, जब रूस पश्चिमी देशों के भारी प्रतिबंधों का सामना कर रहा था। कुछ लोगों का कहना है कि वो भारत-रूस संबंधों की परीक्षा का भी दौर था। जब आप मॉस्को पहुंचे, तो वहां कैसा माहौल था?
पंकज सरन: वहां का माहौल बहुत अच्छा था। जब मैं पहुंचा, वह दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी की मॉस्को यात्रा के ठीक बाद का समय था। राष्ट्रपति पुतिन के साथ उनकी शानदार शिखर बैठक हुई थी। हमें यह जिम्मेदारी दी गई थी कि हम इस रिश्ते को आगे बढ़ाएं और नई ऊंचाइयों तक ले जाएं। इसलिए द्विपक्षीय संबंधों से लिहाज से रूस में माहौल बेहद सकारात्मक था।
जहां तक प्रतिबंधों की बात है तो 2014 में क्रीमिया विवाद के बाद से ही रूस पर कुछ प्रतिबंध लगा दिए गए थे। लेकिन 2016-17 में अमेरिकी कांग्रेस के जरिए CAATSA जैसे कुछ और प्रतिबंध लगाए गए, वो काफी कड़े प्रतिबंध थे। रूसी अधिकारी उनके परिणामों को समझने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन भारत-रूस के नजरिए से देखें तो 2014 में नरेंद्र मोदी भले ही पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन राष्ट्रपति पुतिन से उनकी मित्रता गुजरात के मुख्यमंत्री के दिनों से थी। दोनों नेताओं के बीच मजबूत रिश्ते के वो शुरुआती दिन थे। इसलिए वह दौर महत्वपूर्ण था। फिर 2017 में हमने अपने राजनयिक संबंधों की 70वीं वर्षगांठ मनाई, जो कि अपने आप में एक बड़ी बात थी। ...तो कुल मिलाकर यही माहौल था। जहां तक अमेरिकी प्रतिबंधों का सवाल था, तो उस वक्त रूस के आम लोगों पर इनका कोई खास असर नहीं पड़ा था।
मैंने रूस में बहुत व्यापक यात्राएं की हैं। मैं कैलिनिनग्राद से लेकर सखालिन तक, साखा याकुत्या से ठीक एस्त्रखान तक और यहां तक कि चेचन्या भी गया। चेचन्या का दौरा करने वाला शायद मैं पहला भारतीय राजदूत था। इसके अलावा मैं पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से दक्षिण और यूराल पर्वतों के उस पार तक गया। इन यात्राओं से समझ आया कि इस ग्रह का सबसे बड़ा देश होने का असली मतलब क्या है।
सवाल: आप बहुत धाराप्रवाह रूसी भाषा बोलते हैं। क्या आपको लगता है कि रूसी भाषा जानने के कारण आपको रूस के उस पहलू को करीब से देखने का मौका मिला, जो अधिकांश पश्चिमी राजनयिक कभी नहीं देख पाए?
पंकज सरन : देखिए, कुछ पश्चिमी राजनयिक भी धाराप्रवाह रूसी बोलते थे, लेकिन मोटे तौर पर कहें तो संस्कृति के प्रति समझ और भाषा का हमारा ज्ञान बहुत बेहतर था। तो हां, उनकी भाषा सीखने से काफी मदद मिली। रूस में भारतीयों को बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता है। यदि आप भारतीय हैं तो वहां आपको दोस्त माना जाता है। उनकी भाषा बोलने के कारण हम उनके साथ बैठकर खाना खाते थे, उनकी पारंपरिक वोदका का लुत्फ उठाते थे और तमाम बातें होती थीं। हमारे पेशे में किसी भी समाज को समझने के लिए उनकी संस्कृति में घुलना-मिलना जरूरी होता है।
भारत-रूस की दोस्ती और चीन
सवाल: आपने कहा है कि भारत की मुख्य रणनीतिक चुनौती रूस नहीं, चीन है... और भारत मॉस्को को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकता। इस बयान का मतलब क्या है?
पंकज सरन : भारत और रूस की दोस्ती 70-80 वर्ष पुरानी है, जो सोवियत काल से लेकर अब तक चली आ रही है। चीन के साथ हमारा इतिहास बिल्कुल अलग है। चीन के साथ कहानी तिब्बत पर उसके कब्जे और पिछले कई दशकों से चले आ रहे सीमा विवादों से शुरू होती है। इसके अलावा तिब्बती पठार और समुद्र में चीन का सैन्य जमावड़ा, और भारत को दबाव में रखने के लिए पाकिस्तान को मोहरे के रूप में इस्तेमाल करना... ये सब हमारे सामने है। इसलिए चीन के नेता चाहे जो भी कहें, उनकी कथनी और करनी मेल नहीं खाती।
जहां तक रूस-चीन संबंधों का सवाल है, तो यह रूस का अपना फैसला है कि वो चीन से कैसे संबंध रखना चाहता है। ...हमें सुनिश्चित करना होगा कि रूस-चीन के संबंध हमारे रिश्तों को प्रभावित न करें। चीन इस पर कोई वीटो न चला पाए कि रूस भारत के साथ क्या करता है। ये एक जटिल मामला है।
रूस-चीन भले ही अच्छे दोस्त हैं, लेकिन कई मामले में दोनों के रास्ते अलग हैं. मिसाल के लिए यूरोप-अमेरिका से उनके व्यक्तिगत संबंध बिल्कुल अलग हैं। चीन पूरी तरह से यूरोपीय और अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, वहीं रूस को अलग-थलग कर दिया गया है। इसलिए जब बात भारत, रूस और चीन की आती है तो हमारे लिए भारत-रूस ट्रैक को बनाए रखना और इसकी ईमानदारी को बचाना बेहद जरूरी है। हम ऐसी कोई स्थिति नहीं चाहते कि हमारे किसी कदम से रूस मजबूर होकर चीन के ज्यादा करीब चला जाए।
रूस के पुनर्निर्माण में भारत निभा सकता है बड़ी भूमिका- नेटस्ट्रैट के संयोजक पंकज सरन
— RT Hindi (@RT_hindi_) May 22, 2026
RT इंडिया की न्यूज़ हेड @Runjhunsharmas से बात करते हुए, पूर्व राजनयिक ने कहा कि कुशल श्रमिकों की आवाजाही एक तार्किक कदम है क्योंकि रूस इस समय जनसंख्या की बड़ी समस्या से जूझ रहा है। उन्होंने यह… pic.twitter.com/S2YadMR0E3
भारत का रूस से गेमचेंजर समझौता
सवाल : भारत और रूस के बीच कुशल श्रमिकों को लेकर जो नया समझौता हुआ है, उसे मीडिया में ज्यादा सुर्खियां नहीं मिलीं। क्या आपको लगता है कि इस क्षेत्र में संभावनाएं काफी हैं और यह आगे चलकर बड़ा रूप ले सकता है?
पंकज सरन : कभी-कभी अच्छी खबरें भी सुर्खियों में नहीं आ पातीं.. मेरे विचार से यह समझौता दोनों देशों के संबंधों में एक गेमचेंजर है। यह एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करने से जुड़ा है। पारस्परिक फायदे की ये बात पिछले 20-30 वर्षों से सच्चाई रही है, लेकिन रूस की अपनी कुछ झिझक के कारण इस पर ज्यादा काम नहीं हो पाया था। अब हालात बदले हैं।
हम हमेशा उनसे कहते थे कि देखिए खाड़ी देशों में 1 करोड़ भारतीय हैं, अमेरिका में 50 लाख भारतीय हैं और यूरोप में लाखों भारतीय रह रहे हैं। दुनिया के किसी भी कोने में देखिए, अत्यधिक कुशल प्रोफेशनल्स से लेकर ब्लू कॉलर और अकुशल श्रमिकों तक, भारतीयों ने साबित किया है कि वह विदेशों में दौलत बनाने में योगदान दे सकते हैं। यही काम हम रूस में भी कर सकते हैं।
संघर्ष की वजह से रूस इस वक्त मैनपावर की भारी कमी से जूझ रहा है। वहां का नेचुरल डेमोग्राफिक प्रोसेस प्रतिकूल रहा है। राष्ट्रपति पुतिन खुद कई बार कह चुके हैं कि रूस के सामने सबसे बड़ी चुनौती घटती आबादी है। ऐसे में भारतीय कामगार रूस के निर्माण या पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
किन क्षेत्रों में बढ़ रहा द्विपक्षीय सहयोग
सवाल : तेल और रक्षा के अलावा अगले 5-10 वर्षों में कौन से क्षेत्र भारत-रूस व्यापारिक संबंधों के लिहाज से अहम रहेंगे?
पंकज सरन : हमने अपने संबंधों को पारंपरिक 3-4 रणनीतिक स्तंभ- जैसे कि रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु तकनीक और ऊर्जा से आगे ले जाकर डाइवर्सिफाई करना शुरू कर दिया है। पिछले 10 वर्षों में ऊर्जा संबंध काफी आगे बढ़े हैं। यह 2022 के बाद सिर्फ तेल खरीदने तक सीमित नहीं रहे हैं। 2022 से पहले भी हम रूस के एनर्जी एसेट्स में निवेश कर रहे थे।
अब हम रेलवे, खाद, अंतर्देशीय जलमार्ग, शिप बिल्डिंग, रेयर अर्थ मटीरियल्स और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे अन्य क्षेत्रों में सहयोग की तरफ देख रहे हैं। इनके लिए समानांतर वैकल्पिक कनेक्टिविटी कॉरिडोर भी डेवलप कर रहे हैं ताकि व्यापार को आसान, तेज और सस्ता बनाया जा सके। इसलिए पर्दे के पीछे बहुत कुछ हो रहा है।
मिसाल के लिए शिक्षा क्षेत्र फिर से उभर रहा है। सोवियत संघ के विघटन के बाद इसमें गिरावट आई थी, लेकिन अब रूस जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी सहयोग के नए द्वार खुल रहे हैं। परमाणु क्षेत्र में तो सब जानते हैं कि भारत में न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने वाला इकलौता देश रूस ही है।
BRICS या G20, भारत के लिए कौन ज्यादा अहम?
सवाल : भारत BRICS में है, SCO , G20 और Quad में भी है। इनमें से कुछ संगठनों में पश्चिमी देश भी हैं। भारत के लिए इस समय इनमें से कौन सा संगठन सबसे ज्यादा मायने रखता है?
पंकज सरन : कोई संगठन हमारे लिए कितना उपयोगी है, ये समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ब्रिक्स की बात करें तो वह चाहता कि विकासशील देशों की बात भी सुनी जाए। वो ऐसी वैश्विक व्यवस्था चाहते हैं जिसमें वे केवल नियमों को मानने वाले या याचक बनकर न रहें, बल्कि उनका भी वजूद हो और उनकी बात को तवज्जो मिले।
क्वाड (Quad) ऐसा ग्रुप है जो इंडो पैसिफिक क्षेत्र के चार लोकतांत्रिक देशों को एक साथ लाता है। यह अपने तंत्र को विकसित कर रहा है। इसके प्रभाव में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं लेकिन हां, इसकी अपनी एक भूमिका है।
एससीओ (SCO) का अपना एक अलग तर्क और महत्व है। हम रूसियों की वजह से वहां पर हैं, न कि चीन की वजह से। यह एक यूरेशियन ढांचा है जिसका भारत एक अहम हिस्सा है।
रही बात जी-20 की तो वहां सब मौजूद हैं- रूस, चीन, भारत, अमेरिका, यूरोप... हर कोई। ऐसे में अगर आप अपने राजनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक या ऊर्जा हितों के नजरिए से देखें, तो इन सभी संगठनों की अपनी-अपनी जगह एक खास भूमिका है।
ब्रिक्स की अध्यक्षता कितनी मुश्किल?
सवाल : भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। दुनिया इस वक्त युद्ध जैसे संकटों में घिरी है। क्या आपको लगता है कि भारत के लिए ब्रिक्स की अध्यक्षता कठिन होने वाली है?
पंकज सरन : यह हमेशा ही कठिन होती है। हमने यूक्रेन संघर्ष के ठीक एक साल बाद 2023 में जी-20 समिट की मेजबानी की थी। तब हर कोई कह रहा था कि यह एक आपदा साबित होगा। यह बेहद मुश्किल था, लेकिन हमने कर दिखाया। हम जॉइंट डिक्लेरेशन जारी कराने में भी सफल रहे, जिसे इंडोनेशिया भी नहीं करा पाया था। हमने एक तरफ रूस को साधा, दूसरी तरफ यूरोप को। बीच में चीन अपनी चालें चल रहा था, अमेरिका भी था, लेकिन हमने सबको एक कमरे में बिठाकर आम सहमति बनाई। यह हमारी असाधारण राजनयिक कुशलता का प्रमाण था।
जहां तक ब्रिक्स का सवाल है, यह पहले समान विचारधारा वाले देशों का समूह हुआ करता था। लेकिन ब्रिक्स के अंदर भी हमेशा यह हकीकत रही कि रूस-चीन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं, जबकि ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका नहीं हैं। इसलिए ये तीनों देश हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रहते हैं कि एक तरफ रूस-चीन हैं, जिससे मुकाबला पूरी तरह बराबरी का नहीं रहता। दो साल पहले हुए विस्तार के बाद अब यह ग्रुप बड़ा हो चुका है। अब इसमें दो ऐसे सदस्य भी हैं, जो आपस में टकराव की स्थिति में रहते हैं- यूएई और ईरान। ऐसे में इतना कह सकते हैं कि ब्रिक्स समिट में मुश्किलें तो आएंगी, लेकिन हम उनसे पार पा लेंगे, ऐसी मुझे उम्मीद है।
लेकिन पश्चिमी मीडिया का नैरेटिव रहा है कि वह अध्यक्षता को तभी सफल मानता है, जब आपके पास आम सहमति या संयुक्त घोषणापत्र है। मेरे लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि क्या ग्रुप मध्यम से लॉन्ग टर्म अवधि में अपनी अहमियत बनाए रखने में सक्षम है, और क्या उसके सदस्यों को अभी भी लगता है कि समूह का हिस्सा बने रहना फायदा का सौदा है। मेरे ख्याल से दस्तखत वाले कागज का टुकड़ा होना या न होना मायने नहीं रखता। कभी-कभी आप बहुत सी ऐसी बातों पर आम सहमति बना लेते हैं जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम जैसी होती हैं और जिनका कोई खास मतलब नहीं होता, वो सहमति भी किसी काम की नहीं होती। ...अधिकतर पश्चिमी मीडिया यही कहता है कि देखिए ब्रिक्स में कितनी समस्याएं हैं, यह एकरूप नहीं है, सब अलग-अलग हैं, लेकिन देखा जाए तो यह बात दुनिया के लगभग हर अंतरराष्ट्रीय समूह पर लागू होती है. ऐसे में इस तरह की टिप्पणियों को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।
भारत पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए 'तटस्थ रुख' के आरोपों पर पंकज सरन बोले- नई दिल्ली 'वही कदम उठा रही है जो जरूरी है'
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RT इंडिया की न्यूज़ हेड @Runjhunsharmas से बात करते हुए पूर्व राजनयिक ने कहा कि भारत पश्चिम के निर्देशों पर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर… https://t.co/qDgQmwIYg3pic.twitter.com/GTIKejvN0T
भारत पर ठप्पा क्यों लगाता है पश्चिम?
सवाल : पश्चिमी मीडिया भारत को फेंस-सिटर (अनिश्चय में रहने वाला) कहता है, लेकिन भारत अपने 140 करोड़ लोगों की रणनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सबसे ऊपर रखता है। पर क्या आपको लगता है कि फेंस-सिटर का यह ठप्पा तब लगाया जाता है, जब भारत पश्चिम की लीक पर चलने से इनकार कर देता है?
पंकज सरन : इस आरोप का हमारे विदेश मंत्री ने बहुत अच्छा जवाब दिया है। यह बातचीत में इस्तेमाल किया जाने वाला एक सुविधाजनक मुहावरा मात्र है। मुझे नहीं लगता कि हम वाकई ऐसी किसी परिस्थिति में बैठे हैं। हम तो मैदान में उतरकर खेलते हैं। जहां गेंद को हिट करने की जरूरत होती है, हम वहां हिट करते हैं। हम वही करते हैं, जो हमारे लिए ठीक होता है।
देखा जाए तो आज की दुनिया में हर देश यही कर रहा है, चाहे अमेरिकी हों, ईरानी हों, कनाडाई हों, जर्मन, फ्रांसीसी, रूसी या चीनी... हर कोई खेल को उसी तरह खेल रहा है, जैसा वो चाहता है. अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना आज सभी ताकतों की पहली प्राथमिकता बन चुकी है। जो शक्तिशाली हैं वो ऐसा करके बच निकलते हैं और जो कमजोर हैं, वो ऐसा नहीं कर पाते और उन्हें भुगतना पड़ता है। लेकिन भारत का रिकॉर्ड रहा है कि सत्ता में चाहे जो भी पार्टी रही हो, उसने मुख्य राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर हमेशा स्वतंत्र रुख बनाए रखा है।
मोदी-पुतिन के रिश्ते इतने खास क्यों?
सवाल : राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले एक दशक में करीब 17 बार मुलाकात कर चुके हैं। दोनों नेताओं के रिश्ते में ऐसा क्या है, जो भारत-रूस संबंधों को इतना स्थिर बनाए रखता है?
पंकज सरन : इसका एक सबसे बड़ा और अहम कारण यह है कि शिखर सम्मेलनों के दौरान दोनों नेता निजी और आमने-सामने की बातचीत करते हैं। इसकी लंबी परंपरा रही है। इससे उन्हें कुछ घंटे एक-दूसरे से खुलकर बात करने के लिए मिलते हैं, जहां वे न सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों पर बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्थितियों पर भी चर्चा करते हैं। बातचीत में स्पष्टता और खुलापन होता है। ईमानदारी, पारदर्शिता और हितों का एक होना, ये वो फैक्टर हैं जो इन दो नेताओं के रिश्ते को आगे बढ़ा रहे हैं।
सवाल : 2022 में यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद रूस दुनिया में भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का सप्लायर बना। लेकिन उससे पहले दोनों के बीच द्विपक्षीय व्यापार महज 10 अरब डॉलर के करीब था। अगर नई दिल्ली और मॉस्को के संबंध वास्तव में इतने खास थे, तो व्यापार का आंकड़ा इतना कम क्यों था? आर्थिक बुनियाद इतनी कमजोर क्यों रही?
पंकज सरन : व्यापार कम होने के बावजूद भारत और रूस का रिश्ता बेहद खास रहा है। अगर व्यापार ही किसी अच्छे रिश्ते का पैमाना होता, तो चीन से हमारे संबंध सबसे बेहतरीन होने चाहिए थे, है ना? भारत-रूस संबंधों की खूबसूरती यही है कि महज 10 अरब डॉलर के व्यापार के बावजूद यह रिश्ता न केवल कायम रहा, बल्कि बहुत अच्छा भी रहा। इसलिए आपको खुद से यह सवाल पूछना होगा कि आर्थिक आधार सीमित होने के बाद भी भारत-रूस संबंध समय के साथ इतने ठोस, मजबूत और टिकाऊ क्यों बने रहे? यह तो हुआ जवाब का पहला हिस्सा।
जवाब का दूसरा हिस्सा आर्थिक है। यह साफ तौर से दोनों अर्थव्यवस्थाओं की ताकत से जुड़ा है। अगर रूसी अर्थव्यवस्था आंतरिक गहराई, लचीलापन और गतिशीलता को दिखाती है और दोनों देशों के बीच एक आपसी समझ विकसित होती है तो यह आंकड़ा निश्चित रूप से बढ़ेगा। लेकिन यह एक चुनौती है। मेरे ख्याल से व्यापारियों के बीच जागरूकता की कमी, भाषा की बाधा, एक-दूसरे की कानूनी प्रणालियों से परिचित न होना, और एक-दूसरे के शेयर बाजारों या बैंकिंग प्रणालियों में भरोसे की कमी... ये सभी इस समस्या के हिस्से रहे हैं।
सवाल : रूस और भारत चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मैरीटाइम कॉरिडोर को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसका मकसद पश्चिम के नियंत्रण वाले कुछ चोक पॉइंट्स को बाईपास करना है। भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा एवं व्यापार सुरक्षा के लिए यह कितना महत्वपूर्ण है?
पंकज सरन : यह एक बहुत ही भविष्योन्मुखी प्रोजेक्ट है, जो भारत और रूस के पूर्वी तटों को सीधा जोड़ेगा। आने वाले समय में ऊर्जा, कच्चे माल, कोयला, स्वच्छ पानी जैसी चीजों के लेनदेन के लिहाज से यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण होगा। यह स्वेज नहर और हिंद महासागर के चोक पॉइंट्स को भी बाईपास करता है। लेकिन इसे आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने पर काम करना होगा। ...अगले 10 या 20 वर्षों की हमारी विकास योजनाओं को देखते हुए यह एक बेहतरीन विचार है। हमें उन चोक पॉइंट्स का विकल्प ढूंढना होगा। यह रूट आगे चलकर आर्कटिक में पिछलती बर्फ से खुलने वाले संभावित आर्कटिक रूट से भी जुड़ सकता है, जो नेविगेशन और व्यापार के नए रास्ते खोलेगा।
पाकिस्तान पश्चिम का मोहरा?
सवाल : इस्लामाबाद अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता करने या कम से कम इसकी कोशिश करने का दावा कर रहा है। नई दिल्ली या ब्रिक्स जैसा संगठन ऐसा क्यों नहीं कर सकता?
पंकज सरन : हम भी कर सकते हैं, क्यों नहीं कर सकते? मुझे नहीं पता कि क्या हम ऐसा करना चाहते भी हैं या नहीं। जहां तक पाकिस्तान की बात है... तो देखिए, पाकिस्तान का निर्माण अंग्रेजों और पश्चिमी देशों ने एक ऐसे टुकड़े के रूप में किया था, जो जरूरत पड़ने पर उनके उद्देश्यों की पूर्ति कर सके। इसलिए जब जरूरत होती है, उसका इस्तेमाल किया जाता है। इस वक्त भी हम ऐसा ही देख रहे हैं। लेकिन भारत उस कैटिगरी में नहीं आता।
पाकिस्तान को ऐसी भूमिकाएं निभाना आवश्यक और उपयोगी लगता है क्योंकि वह हमेशा अवसरों की फिराक में रहता है ताकि भू-राजनीतिक लाभ ले सकें। वो जो कुछ भी करता है, उसकी एक नजर हमेशा भारत पर होती है। उसके दिमाग में हमेशा ये रहता है कि जब उसे जरूरत पड़े, तब अमेरिकियों, ब्रिटिश, पश्चिमी देशों या खाड़ी देशों से मदद कैसे मिले। पाकिस्तानी ऐसे ही हैं। आज भी वो कुछ ऐसा ही कर रहे हैं, मेरा तो यही मानना है।
सवाल : ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई अमेरिकी-इजरायली हमलों में मारे गए। ईरान को एक नया सुप्रीम लीडर, एक नया खामेनेई मिला। अमेरिका ने इससे क्या हासिल किया?
पंकज सरन : मुझे पक्का नहीं पता कि अमेरिकियों ने वहां किस तरह का सत्ता परिवर्तन किया है। आम धारणा तो यही है कि आने वाले समय में जो नई व्यवस्था वहां बनेगी, वह पिछली की तुलना में और भी ज्यादा कट्टर हो सकती है। वहां एक बड़ी आबादी में यह भावना निश्चित रूप से होगी कि वो बदला लें और ईरान की संप्रभुता को कायम रखें।
पूरा वीडियो यहां देखें-
(यह इंटरव्यू 21 मई को प्रसारित हुआ था।)




