
नई दिल्ली : भारत की 7.8 पर्सेंट की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) ग्रोथ इस वक्त चर्चा में है। इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आम लोगों के लिए इसके मायने समझे-समझाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब इतनी ज्यादा ग्रोथ है तो भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे नंबर पर क्यों खिसक गया है। इस बीच, पड़ोसी देश चीन के प्रमुख अखबार ग्लोबल टाइम्स ने इन आंकड़ों को लेकर एक पॉजिटिव बात कही है और इसके पीछे के डॉलर फैक्टर को समझाया है।
भारत की शानदार जीडीपी ग्रोथ और अर्थव्यवस्था की ग्लोबल रैंकिंग गिरने के विरोधाभास पर चीनी अखबार ने गणित समझाया है। अखबार लिखता है कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के कमजोर होने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार कम आंका जाता है। यही वजह है कि हकीकत में अर्थव्यवस्था बढ़ने के बावजूद, डॉलर वैल्यू में रैंकिंग नीचे खिसक गई। ग्लोबल टाइम्स साफ लिखता है कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की आर्थिक रफ्तार धीमी हो रही है, बल्कि यह सब एक्सचेंज रेट के उतार-चढ़ाव का असर है।
| क्रम संख्या | देश | जीडीपी (US डॉलर में) | जीडीपी ग्रोथ |
| 1 | अमेरिका | 32.38 ट्रिलियन | 2.32% |
| 2 | चीन | 20.85 ट्रिलियन | 4.41% |
| 3 | जर्मनी | 5.45 ट्रिलियन | 0.79% |
| 4 | जापान | 4.38 ट्रिलियन | 0.72% |
| 5 | यूनाइटेड किंगडम | 4.26 ट्रिलियन | 0.80% |
| 6 | इंडिया | 4.15 ट्रिलियन | 6.48% |
| 7 | फ्रांस | 3.6 ट्रिलियन | 0.86% |
| 8 | इटली | 2.74 ट्रिलियन | 0.52% |
| 9 | रूस | 2.66 ट्रिलियन | 1.09% |
| 10 | ब्राजील | 2.64 ट्रिलियन | 1.91% |
सोर्स : IMF प्रोजेक्शन 2026 (Worldometer)
अखबार भारत की जीडीपी रफ्तार और उसकी ग्लोबल रैंकिंग गिरने से जुड़े सवालों का जिक्र करता है। साथ ही यह भी लिखता है कि अप्रैल-जून तिमाही में GDP सालाना आधार पर 7.8 प्रतिशत बढ़ी, जो ग्लोबल मानकों के हिसाब से काफी प्रभावशाली है। फिर भी, भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर खिसक गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की कोशिश कर रहे देश के लिए, यह अंतर ध्यान देने लायक है।

भारत के वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने पिछले महीने भारत की जीडीपी ग्रोथ को लेकर संसद में लिखित बयान दिया था। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की अप्रैल 2026 की 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की नॉमिनल GDP लगभग $3.92 ट्रिलियन होगी। इसका मतलब ये कि भारतीय इकोनॉमी दुनिया की छठी सबसे बड़ी इकोनॉमी होगी।
जीडीपी ग्रोथ का डॉलर कनेक्शन
भारत की GDP रैंकिंग US डॉलर पर बेस्ड नॉमिनल GDP पर आधारित है। ऐसे में जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है तो अर्थव्यवस्था की डॉलर वैल्यू भी कम नजर आने लगती है, भले ही देश की असल GDP बढ़ रही हो।
दिसंबर 2025 में एक आधिकारिक बयान में कहा गया था कि भारत ने जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान हासिल कर लिया है। इसके 2030 में जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान जताया गया था। हालांकि इसके बाद रुपये की कीमत में गिरावट का असर डॉलर-आधारित रैंकिंग पर पड़ा। लेकिन असल GDP में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ, भारत का आर्थिक विस्तार मजबूत बना हुआ है।
ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था चाहे चौथे नंबर पर हो या फिर छठे नंबर पर, एक बात तो साफ है कि जैसे-जैसे इसकी इकोनॉमी बढ़ रही है, वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ इसके संबंध गहरे और व्यापक होते जा रहे हैं। इससे ग्लोबल इकॉनमी में भारत का महत्व बढ़ रहा है।
इसके अलावा इसकी अपनी ग्रोथ भी इंटरनेशनल मार्केट, इन्वेस्टमेंट और सप्लाई चेन तक पहुंच पर अधिक निर्भर होती जा रही है। यह रिश्ता दोनों तरफ से काम करता है। एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव जैसे शॉर्ट-टर्म कारणों से इसमें कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना नहीं है।
इकोनॉमी की ग्रोथ कितनी टिकाऊ?
ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि भारत की 7.8 प्रतिशत GDP ग्रोथ के आंकड़ों के पीछे के तरीके और ग्रोथ की स्पीड कितनी टिकाऊ हो सकती है, इसे लेकर संदेह जताया गया है। हालांकि, ग्रोथ के घटकों पर बारीकी से नजर डालना अब भी फायदेमंद है।
सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि निवेश में 11.9%, घरेलू खपत में 7.1% और निर्यात में 12.0% की बढ़ोतरी हुई है। यह फैक्ट है कि निर्यात में निवेश और खपत दोनों की तुलना में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। यह बताता है कि बाहरी आर्थिक संबंध भारत की ग्रोथ का एक अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ और भी गहराई और व्यापकता से जुड़ रही है, और ये संबंध निर्यात और सप्लाई चेन के ज़रिए ग्रोथ को और बढ़ावा दे रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, तो ग्लोबल इकॉनमी के साथ अधिक जुड़ाव इस प्रक्रिया का हिस्सा होगा। एक्सपोर्ट में 12% की बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि बाहरी मांग उसकी ग्रोथ का एक बड़ा जरिया बनती जा रही है।
भारत के अगले कदम पर नजर
हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा स्तर पर, रैंकिंग में ऊपर जाने का मतलब सिर्फ घरेलू अर्थव्यवस्था का विस्तार करना नहीं है। यह ग्लोबल सप्लाई चेन में बेहतर एकीकरण, व्यापार और निवेश के लिए अधिक खुलापन और मजबूत मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिवनेस पर भी निर्भर करता है। ये सभी मिलकर एक्सपोर्ट को बढ़ाकर और अर्थव्यवस्था को एक्सचेंज-रेट में उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक मजबूत बनाकर, टिकाऊ ग्रोथ में मदद कर सकते हैं।
इस मामले में अगले हफ्ते दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स (BRICS) समिट भारत के लिए एक प्रमुख अवसर हो सकती है। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां भारत दूसरी उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने संबंधों को और गहरा कर सकता है।
ग्लोबल रैंकिंग में भारत की निचली स्थिति का मतलब यह नहीं है कि इंटरनेशनल इकॉनमी में उसकी अहमियत कम हो गई है। जैसे-जैसे भारत की इकॉनमी बड़ी होती जाएगी और ग्लोबल मार्केट से और अधिक गहराई से जुड़ेगी, वैसे-वैसे फ्री ट्रेड और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने में उसकी बड़ी भूमिका भारत की सार्थक ग्रोथ को बनाए रखने में मदद कर सकती है।

जीडीपी आंकड़ों पर सरकार ने दिया था जवाब
इससे पहले जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों पर चल रही चर्चा और विपक्ष की आशंकाओं पर सरकार की तरफ से जवाब आया था। सरकार का कहना था कि बेहतर डेटा स्रोतों, अपडेटेड तरीकों, इंडिकेटर्स और बेस-ईयर में बदलाव के साथ भारत की GDP के अनुमान बदलते रहते हैं। अलग-अलग बेस-ईयर के आंकड़ों की तुलना करने से ग्रोथ की गलत तस्वीर मिल सकती है। नई सीरीज़ में सांख्यिकीय सुधार दिखते हैं, न कि मौजूदा ग्रोथ को ज़्यादा दिखाने के लिए जान-बूझकर किए गए कटौती वाले बदलाव।




