
भारत का स्पेस सेक्टर उड़ान भर रहा है। जिस क्षेत्र में दशकों तक ISRO और दूसरे सरकारी संस्थानों की प्रमुख भूमिका रही, वहां अब निजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और विदेशी निवेश की हिस्सेदारी बढ़ रही है। सरकार की ओर से स्पेस सेक्टर में FDI नियमों को आसान किया गया है और ISRO की विकसित की गई परिपक्व तकनीकों को उद्योग तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इन्हीं बदलावों के बीच कुछ मीडिया रिपोर्टों में अटकलें लगाई जाने लगीं। इसमें ISRO के निजीकरण, उसकी भूमिका कम किए जाने और उसके काम को निजी क्षेत्र को सौंपे जाने जैसी बात कही गई।
कुछ चर्चाओं में ISRO में हो रहे संस्थागत बदलावों और वरिष्ठ वैज्ञानिकों के बाहर जाने को भी इन सुधारों से जोड़कर देखा गया। इन दावों और अटकलों के बाद ISRO को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। सवाल है कि ऐसी नौबत ही क्यों आई? निजी क्षेत्र और FDI आने से इसरो की भूमिका वास्तव में कैसे बदल जाएगी? और क्या स्पेस टेक्नोलॉजी में विदेशी निवेश को एक ही नजर से देखा जा सकता है? चलिए, पूरी बहस को आसान भाषा में समझते हैं।
ISRO ने क्या कहा
ISRO ने कहा- न तो निजीकरण किया जा रहा है और न ही इसरो की अहमियत कम की जा रही है। वह भारत की एडवांस्ड स्पेस रिसर्च, स्ट्रेटेजिक मिशन और फ्रंटियर टेक्नोलॉजीज का प्रमुख संस्थान बना रहेगा। बदलाव उसकी भूमिका कम करने का नहीं, बल्कि भारत के पूरे स्पेस इकोसिस्टम का विस्तार करने का है।
जिन तकनीकों को ISRO विकसित कर चुका है और जो अब मैच्योर हो चुकी हैं, उनके बड़े पैमाने पर उत्पादन और कमर्शियलाइजेशन में निजी उद्योग की भूमिका बढ़ाई जाएगी, जबकि ISRO अपना ध्यान अगली पीढ़ी की और ज्यादा जटिल तकनीकों और मिशनों पर लगाएगा।
तो फिर विवाद की असल वजह क्या है?
अब सवाल उठता है कि आखिर इसरो को सामने आकर बयान क्यों देना पड़ा। पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले एक फर्क समझना जरूरी है। ISRO और भारत का स्पेस सेक्टर एक ही चीज नहीं हैं।
ISRO का मुख्य काम नई और अत्याधुनिक तकनीक विकसित करना, वैज्ञानिक मिशन चलाना और देश की रणनीतिक जरूरतों के लिए नई क्षमताएं तैयार करना है। वहीं जिन तकनीकों को ISRO सफलतापूर्वक विकसित कर चुका है और जो अब परिपक्व हो चुकी हैं, उन्हें बड़े पैमाने पर बनाने और बाजार तक पहुंचाने में निजी उद्योग की भूमिका बढ़ाई जा रही है।
यानी आसान भाषा में कहें तो- नई तकनीक विकसित करने में ISRO आगे रहे और परिपक्व तकनीक के बड़े पैमाने पर उत्पादन और व्यावसायिक इस्तेमाल में उद्योग भागीदार बनें।
Clarification regarding media reports on concerns relating to Space Sector Reforms and the role of ISRO
— ISRO (@isro) September 6, 2026
ISRO’s Next Chapter: Leading India’s National Space Ecosystem
There has been considerable reporting in parts of the media around the future role of ISRO including speculations…
आखिर निजी कंपनियों की जरूरत क्यों पड़ी?
एक समय था जब भारत के पास स्पेस सेक्टर में सीमित संसाधन और औद्योगिक क्षमताएं थीं। ऐसे में रिसर्च, डिजाइन, निर्माण और लॉन्च से जुड़े कई काम ISRO को खुद करने पड़ते थे।
लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। भारत में बड़ी संख्या में स्पेस स्टार्टअप्स और निजी कंपनियां सामने आ चुकी हैं। रॉकेट, सैटेलाइट, सेंसर, ग्राउंड सिस्टम और स्पेस डेटा जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र अपनी क्षमता बना रहा है।
भारतीय स्पेस इकोनॉमी अगस्त 2026 तक बढ़कर 9 अरब डॉलर की हो चुकी है। 2036 का इसे 40–45 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है। सरकार के कुछ आधिकारिक आंकड़े देखिए-
भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की ग्रोथ
- 2014 में जहां अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप्स की संख्या महज एक थी
- 2026 में स्पेस स्टार्टअप्स बढ़कर 440 से अधिक हो चुके हैं।
स्पेस सेक्टर में निजी निवेश
- 2021–22 - 100.5 मिलियन डॉलर
- मार्च 2026 - 618.5 मिलियन डॉलर
- सिर्फ 2026 में- 187 मिलियन डॉलर
ऐसे में सवाल है कि अगर ISRO किसी तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित कर चुका है और वह तकनीक अब परिपक्व हो चुकी है, तो क्या उसका उत्पादन भी हर बार ISRO ही करे? यहीं टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की भूमिका आती है।
किसी तकनीक को उद्योग को ट्रांसफर करने का मतलब यह नहीं है कि ISRO उस क्षेत्र से बाहर निकल रहा है। इसका मतलब यह है कि तकनीक का बड़े पैमाने पर उत्पादन और कमर्शियल इस्तेमाल उद्योग के जरिए बढ़ाया जा सकता है। यानी ISRO अपने संसाधनों को अगली पीढ़ी की और ज्यादा कठिन तकनीकों पर लगा सकता है।
कितनी प्राइवेट कंपनियों को मौका
113 मंजूरियां मिलीं- 2026 के मध्य तक सरकार ने अंतरिक्ष से जुड़े कार्यों के लिए 113 ऑथराइजेशन जारी किए
52 प्राइवेट संस्थाएं: ये ऑथराइजेशन 52 गैर-सरकारी यानी प्राइवेट कंपनियों (NGE) को दिए गए
18 नए स्टार्टअप्स: इन 52 कंपनियों में से 18 नए स्पेस स्टार्टअप्स शामिल हैं
इस काम के लिए मिली मंजूरी
ये कंपनियां और स्टार्टअप्स मुख्य तौर पर तीन बड़े काम करेंगे-
- सैटेलाइट ऑपरेशन (उपग्रहों को संचालित करना)
- पेलोड निर्माण (सैटेलाइट में लगने वाले उपकरण बनाना)
- लॉन्च सर्विस (रॉकेट के जरिए सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजना)
ISRO के पूर्व वैज्ञानिक विनोद कुमार श्रीवास्तव की बात टेक्नोलोजी ट्रांसफर की इस बहस को एक दूसरा पक्ष देती है। RT हिंदी से बातचीत में श्रीवास्तव ने कहा कि इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए ISRO के शुरुआती दौर को देखना जरूरी है। जब भारत ने रॉकेट प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी पर काम शुरू किया, तब कई महत्वपूर्ण तकनीकें देश के पास नहीं थीं। खासतौर पर क्रायोजेनिक प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी (cryogenic propulsion technology) हासिल करना भारत के लिए बड़ी चुनौती थी।

ISRO ने इस तकनीक के लिए विदेश से सहयोग लेने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार भारत ने अपनी क्षमता विकसित करते हुए यह तकनीक खुद तैयार की। श्रीवास्तव के मुताबिक, इतिहास को देखते हुए रॉकेट प्रोपल्शन जैसे रणनीतिक और अत्याधुनिक क्षेत्रों में विदेशी निवेश को लेकर सावधानी जरूरी है। ऐसे क्षेत्रों में तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक नियंत्रण बेहद महत्वपूर्ण हैं।
श्रीवास्तव यह भी मानते हैं कि स्पेस सेक्टर के सभी हिस्सों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। मसलन, सैटेलाइट निर्माण में भारत पहले से काफी आत्मनिर्भर है, जबकि सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा के इस्तेमाल और उसके रियल टाइम interpretation जैसे क्षेत्रों में प्राइवेट और विदेशी निवेश की ज्यादा संभावनाएं हो सकती हैं।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) आए या नहीं, बल्कि यह भी है कि FDI किस क्षेत्र में आए और उस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व कितना है।

फिर FDI का मकसद क्या है?
दरअसल भारत ने स्पेस सेक्टर में विदेशी निवेश के नियमों को काफी आसान बना दिया है। इसका मकसद भारतीय स्पेस इंडस्ट्री के लिए विदेशी पूंजी, तकनीक और वैश्विक बाजार तक पहुंच को खोलना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई विदेशी कंपनी आकर ISRO को खरीद लेगी या फिर किसी भी क्षेत्र में खुलकर निवेश कर सकेगी।
FDI प्राइवेट स्पेस कंपनियों और स्पेस सेक्टर की चुनिंदा व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ा है, ISRO के सरकारी संस्थान के रूप में अस्तित्व से नहीं। हां, विदेशी निवेश के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील तकनीक का सवाल जरूर जुड़ता है। इसलिए जरूरी होगा कि रणनीतिक तकनीक, महत्वपूर्ण डेटा और संवेदनशील क्षमताओं पर भारत का नियंत्रण बना रहे।
ISRO को कमर्शियल कंपनी की तरह देखना कितना सही?
FDI और प्राइवेट सेक्टर की भूमिका के साथ एक दूसरा सवाल भी उठता है- अगर ISRO की तकनीकों का व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है तो क्या उसे कमर्शियल संस्थान की तरह देखा जाना चाहिए?
इसरो के पूर्व साइंटिस्ट विनोद कुमार श्रीवास्तव के मुताबिक, ISRO को मूल रूप से कभी कमर्शियल कंपनी के तौर पर बनाया ही नहीं गया था। ISRO का प्राथमिक उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि देश के लिए अंतरिक्ष तकनीक विकसित करना रहा है।
हालांकि समय के साथ सैटेलाइट डेटा के इस्तेमाल और उसकी बिक्री की दिशा में भी काम हुआ। खासतौर पर कार्टोग्राफी (नक्शा बनाने का विज्ञान) और अर्थ ऑब्जरवेशन के विकास के बाद सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल जमीन की निगरानी, टाउन प्लानिंग, सड़क निर्माण की योजना और लैंड रजिस्ट्रेशन जैसे कामों में होने लगा।
2023 की स्पेस पॉलिसी से क्या बदला?
श्रीवास्तव के अनुसार, 2023 की स्पेस पॉलिसी के बाद भारतीय स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों के लिए स्पेस टेक्नोलॉजी को बड़े पैमाने पर उत्पादन और व्यावसायिक इस्तेमाल तक ले जाने का रास्ता और खुला है। इसका मकसद केवल सरकारी संस्थान के जरिए तकनीक विकसित करना नहीं, बल्कि उस तकनीक के आसपास एक बड़ा औद्योगिक इकोसिस्टम तैयार करना भी है।
यानी ISRO नई तकनीक और नई क्षमताओं की सीमाओं को आगे बढ़ाए, जबकि उद्योग उन तकनीकों को बड़े पैमाने पर उत्पादन और बाजार तक ले जाए।
ISRO के वैज्ञानिकों का बाहर जाना नया है?
हाल में ISRO के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के समय से पहले या वॉलंटरी एग्जिट का मामला भी चर्चा में आया था। लेकिन इन वैज्ञानिकों का दूसरे संस्थानों से जुड़ना भी कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है।
तो असली बदलाव क्या है?
2020 के बाद के सुधारों और इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023 को अगर व्यापक रूप से देखें तो मकसद ISRO को रिप्लेस करना नहीं, बल्कि उसके आसपास एक बड़ा नेशनल स्पेस इकोसिस्टम तैयार करना है।
इसे आसान भाषा में चार हिस्सों में समझा जा सकता है-
- ISRO: नई और अत्याधुनिक तकनीक विकसित करे।
- निजी उद्योग: परिपक्व तकनीक का बड़े पैमाने पर उत्पादन और कमर्शियल इस्तेमाल करें।
- स्टार्टअप्स: नए प्रयोग और बिजनेस मॉडल लेकर आएं।
- सरकार/रेगुलेटर: नियम, सुरक्षा और रणनीतिक नियंत्रण सुनिश्चित करें।
इस मॉडल में ISRO का काम खत्म नहीं होता। बल्कि वह अपने वैज्ञानिक संसाधनों को मानव अंतरिक्ष उड़ान, डीप-स्पेस मिशन, प्लैनेटरी एक्सप्लोरेशन, अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम और नई प्रोपल्शन टेक्नोलोजी जैसी फ्रंटियर तकनीकों पर ज्यादा फोकस कर सकता है। लेकिन इस बदलाव में एक संतुलन जरूरी है- जहां निजी पूंजी, तकनीक और विदेशी निवेश को जगह मिले, वहीं रणनीतिक तकनीक, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता से समझौता न हो।




