नाम के आगे 'Dr.', 'Prof.', 'Er.' क्यों लगाते हैं? जानिए Prefix और Title की पूरी कहानी
कर्नाटक सरकार ने राज्य के शिक्षकों को अपने नाम के आगे ‘Tr’ लगाने की अनुमति दी है। जानिए ‘Mr’, ‘Mrs’, ‘Dr’, ‘Prof’ जैसे प्रीफिक्स की शुरुआत कैसे हुई, इनके इस्तेमाल के क्या नियम हैं, और भारत में प्रोफेशनल टाइटल्स पर कानून क्या कहता है?
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नाम के आगे 'Dr.', 'Prof.', 'Er.' क्यों लगाते हैं? जानिए Prefix और Title की पूरी कहानी
प्रतीकात्मक तस्वीर

आपने डॉक्टरों को अपने नाम के आगे Dr. लगाते देखा होगा।

प्रोफेसर अपने नाम के पहले Prof. लिखते हैं।

कई इंजीनियर अपनी नेमप्लेट पर Er. लिखवा लेते हैं। 

अब कर्नाटक में टीचर अपने नाम के आगे Tr लगा सकेंगे। 

कर्नाटक सरकार ने शिक्षक दिवस पर राज्य के शिक्षकों को अपने नाम के आगे ‘Tr’ लगाने की अनुमति दे दी है। इसे शिक्षकों के योगदान और उनकी पेशेवर पहचान को सम्मान देने की कोशिश बताया गया है।

लेकिन क्या आपको पता है कि नाम के आगे पदनाम लगाने की शुरुआत कैसे हुई? नाम से पहले ‘डॉ.’, ‘प्रो.’, ‘मिस्टर’, ‘मिसेज' जैसे प्रीफिक्स (Prefix) लगाने की परंपरा कैसे पड़ी? टाइटल इनसे किस तरह अलग होते है? क्या इन्हें लगाने के कोई नियम भी हैं? क्या कोई व्यक्ति अपनी पसंद का प्रीफिक्स नाम के आगे लगा सकता है?

इन सवालों के जवाब जानेंगे, लेकिन पहले कर्नाटक सरकार के नए फैसले के बारे में जान लीजिए।

कर्नाटक सरकार के आदेश में क्या है?

5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इसी दिन कर्नाटक के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की ओर से एक आदेश जारी किया गया। इसके मुताबिक, अब कर्नाटक के सभी शिक्षक अपने नाम के आगे ‘Tr’ लिख सकेंगे। जैसे डॉक्टर अपने नाम के आगे ‘Dr.’ लिखते हैं, उसी तरफ शिक्षक अब अपने नाम के आगे ये प्रीफिक्स लगा सकेंगे।

अंडर सेक्रेटरी (प्राइमरी) एस. प्रकाश की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि यह फैसला राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों के महत्वपूर्ण योगदान और छात्रों को शैक्षणिक और व्यावहारिक ज्ञान देने में उनके लगातार प्रयासों को सम्मान देने के लिए लिया गया है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा, “एक शिक्षक हर उस व्यक्ति का निर्माण करता है, जो आगे चलकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है। कर्नाटक के करीब 4.5 लाख शिक्षकों समेत देश के एक करोड़ से ज्यादा शिक्षक हर दिन हमारे बच्चों के विचार, चरित्र और भविष्य को आकार दे रहे हैं।”

डीके शिवकुमार, मुख्यमंत्री, कर्नाटक
“‘Tr’ सिर्फ एक संबोधन नहीं है, बल्कि उन लोगों के प्रति समाज की स्वीकृति और सम्मान है, जिन्होंने अपना जीवन दूसरों का जीवन संवारने में समर्पित कर दिया। यह भले ही सिर्फ दो अक्षर हों, लेकिन इनमें जीवन भर की सेवा का सम्मान छिपा है।”
डीके शिवकुमार, मुख्यमंत्री, कर्नाटक
डीके शिवकुमार, मुख्यमंत्री, कर्नाटक

सरकार के मुताबिक, शिक्षकों की लंबे समय से मांग थी कि उनके पेशे की पहचान भी नाम के साथ दिखाई दे। इसी मांग को देखते हुए उन्हें ‘Tr’ इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई।

टाइटल लगाने की शुरुआत कहां से हुई?

अब सवाल आता है कि आखिर इंसान के नाम के आगे इस तरह की पहचान लगाने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? उससे पहले टाइटल, ‘अपेलेशन’ (appellation) और प्रीफिक्स के बीच का अंतर समझना जरूरी है। आमतौर पर इन तीनों को एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन इनमें अंतर होता है। 

  • टाइटल (Title) यह बताता है कि वह शब्द क्या सम्मान या पद दर्शाता है।
  • अपेलेशन (Appellation) यह बताता है कि प्रशासनिक कागजातों में उस व्यक्ति का संबोधन क्या है।
  • प्रीफिक्स (Prefix) यह बताता है कि शब्द कहां लिखा जा रहा है (नाम के आगे)।

टाइटल शब्द का इतिहास

टाइटल का अर्थ व्यापक है- जैसे ‘सर’, ‘महाराजा’, ‘डॉक्टर’ या ‘प्रोफेसर’, जो किसी व्यक्ति की सामाजिक, सम्मानजनक, पेशेवर या शैक्षणिक पहचान बता सकते हैं।

’टाइटल’ शब्द का इतिहास काफी पुराना है। ऑनलाइन एटीमोलॉजी डिक्शनरी के मुताबिक, अंग्रेजी में टाइटल शब्द करीब 1300 ईस्वी से मिलता है। 'टाइटल’ शब्द की उत्पत्ति पुराने फ्रांसीसी शब्द ‘टाइटल’ और लैटिन के ‘टिटुलस’ से हुई है।

शुरुआत में इसका इस्तेमाल किसी लिखे हुए नाम, निशान या शीर्षक के अर्थ में होता था। बाद में इसका अर्थ किसी व्यक्ति या परिवार की पदवी, हैसियत या सम्मानसूचक पहचान बताने वाले संबोधन तक फैल गया। व्यक्ति की रैंक या परिवार को दर्शाने वाले नाम के अर्थ में टाइटल का इस्तेमाल 16वीं सदी से दर्ज मिलता है।

'टाइटल' की संवैधानिक सीमाएं

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18(1) के मुताबिक, राज्य किसी व्यक्ति को सैन्य या शैक्षणिक सम्मान के अलावा कोई ‘टाइटल’ नहीं दे सकता। इसका मकसद ऐसी उपाधियों से बचना था, जो समाज में लोगों के बीच अलग दर्जे या विशेषाधिकार का भाव पैदा करें।

हालांकि, अनुच्छेद 18 का सीधा अर्थ यह नहीं है कि भारत में कोई भी व्यक्ति अपने नाम के आगे कोई संबोधन नहीं लगा सकता। अलग-अलग पेशों में इस्तेमाल होने वाले प्रीफिक्स या पद/रैंक के लिए नियम हैं।

राष्ट्रीय पुरस्कारों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996) मामले में साफ किया कि भारत रत्न और पद्म अवॉर्ड्स अनुच्छेद 18(1) के तहत ‘टाइटल’ नहीं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि इन पुरस्कारों को नाम के आगे या पीछे टाइटल की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

इसी तरह, इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘सीनियर एडवोकेट’ को संविधान के अनुच्छेद 18 में प्रतिबंधित ‘टाइटल’ नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि यह टाइटल नहीं है, बल्कि एक डिमार्केशन है, और इसलिए यह संविधान के आर्टिकल 18 का उल्लंघन नहीं करता है।

वहीं 2024 में मद्रास हाईकोर्ट के सामने एक मामला आया कि क्या कोई वकील अपने नाम के आगे रिटायर होने के बाद सैन्य पद लगा सकता है? 25 जून 2024 को मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि अदालत में केस फाइलिंग, वकालतनामा और अन्य कार्यवाही में वकीलों के नाम के साथ प्रीफिक्स, सफिक्स, टाइटल, डिग्री या सैन्य/शैक्षणिक सम्मान का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा कि सभी वकील अदालत के सामने एक समान हैं और ऐसे संबोधन किसी वकील को दूसरों से अलग दिखाकर पेशेवर लाभ की स्थिति पैदा कर सकते हैं।

फाइल फोटो© ANI

डॉ., प्रो., मिस्टर, मिसेज... जैसे प्रीफिक्स का क्या मतलब?

‘Mr’ की शुरुआत करीब 15वीं सदी के मध्य में हुई। ऑनलाइन एटीमोलॉजी डिक्शनरी के मुताबिक, यह ‘मास्टर’ (Master) का संक्षिप्त रूप था। उसी दौर में ‘मिस्टर’ (mister) पुरुष के नाम से पहले लगाए जाने वाले सम्मानसूचक संबोधन के तौर पर इस्तेमाल होने लगा। ‘मास्टर’ की जड़ लैटिन के ‘मजिस्टर’ (magister) में मिलती है, जिसका अर्थ प्रमुख, शिक्षक या मार्गदर्शक से जुड़ा था।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के मुताबिक, मिसेज यानी ‘Mrs’ शब्द ‘Mistress’ का संक्षिप्त रूप है। लेकिन शुरुआत में ‘Mrs’ का इस्तेमाल सिर्फ विवाहित महिलाओं के लिए नहीं होता था। इतिहासकार एमी लुईस एरिक्सन के रिसर्च के मुताबिक, कई सदियों तक यह सामाजिक हैसियत रखने वाली वयस्क महिलाओं के लिए इस्तेमाल होता था- वे विवाहित हों या नहीं। बाद में ‘Mrs’ का इस्तेमाल खास तौर पर विवाहित महिलाओं के नाम से जुड़ गया।

अपेलेशन का अर्थ और प्रयोग

अंग्रेजी शब्द ‘अपेलेशन’ (appellation) का अर्थ भी किसी व्यक्ति, वस्तु या वर्ग को दिया गया नाम या संबोधन रहा है। इसके इस्तेमाल का रिकॉर्ड 15वीं सदी के मध्य से मिलता है। यह पुराने फ्रांसीसी शब्द ‘अपेलास्यो’ और लैटिन के ‘अपेलातियो’ से निकला है।

भारत सरकार के ई-गवर्नेंस मानकों में प्रीफिक्स के लिए ‘अपेलेशन (Appellation)’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। अपेलेशन किसी व्यक्ति के नाम के आगे लगाए जाने वाला टाइटल या संबोधन है। यह मुख्य रूप से दो बातें दर्शाता है-

  1. लिंग और वैवाहिक स्थिति: जैसे कि पुरुषों के लिए मिस्टर (Mr.), विवाहित महिलाओं के लिए मिसेज (Mrs.), या महिलाओं के लिए सामान्य संबोधन सुश्री / मिस (Ms.)।
  2. पेशेवर या शैक्षणिक योग्यता: जो पढ़ाई या प्रोफेशन के जरिए हासिल की गई हो, जैसे कि डॉक्टर (Dr.), सीए (CA) या इंजीनियर (Er.)।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने नाम के आगे सीए या प्रोफेसर लिख सकता है।

ई-गवर्नेंस मानकों के मुताबिक, किसी नाम के आगे अधिकतम दो अपेलेशन लगाए जा सकते हैं। अगर दो संबोधन लगाए जाते हैं, तो पहले पेशेवर अपेलेशन लिखा जाएगा और उसके बाद लिंग या वैवाहिक स्थिति से जुड़ा अपेलेशन ब्रैकेट में आएगा। उदाहरण के तौर पर, मानक में Dr. (Mrs.) जैसे इस्तेमाल की व्यवस्था दी गई है।

वहीं ब्रिटेन में भी मिस्टर, मिसेज, मिस, मास्टर और मिस जैसे सामान्य संबोधनों को अलग श्रेणी में रखा गया है। वहीं डॉक्टर और प्रोफेसर को पेशेवर संबोधनों की श्रेणी में रखा गया है।

’डॉक्टर’ शब्द की जड़ में ही शिक्षक है

‘डॉक्टर’ की कहानी और भी दिलचस्प है। ‘Doctor’ शब्द लैटिन के ‘डोचेरे’ (docēre) से जुड़ा है, जिसका अर्थ है सिखाना। यूरोपीय विश्वविद्यालयों में ‘डॉक्टर’ उच्च शैक्षणिक योग्यता, विशेषज्ञता और पढ़ाने की योग्यता से जुड़ा था। बाद में इसका इस्तेमाल चिकित्सा के पेशे के साथ भी मजबूती से जुड़ गया।

यानी जिस शब्द को आज भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में सबसे पहले मेडिकल डॉक्टर के लिए समझा जाता है, उसकी ऐतिहासिक जड़ शिक्षा और अध्यापन से जुड़ी है।

इसीलिए आज भी भारत सहित दुनिया के कई देशों में ‘डॉक्टर’ टाइटल मेडिकल के साथ-साथ अन्य विषयों में डॉक्टरेट रखने वाले लोगों के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

डॉ. कौन लगा सकता है? 

भारतीय चिकित्सा डिग्री अधिनियम, 1916 में बिना मान्य मेडिकल योग्यता के ऐसा टाइटल इस्तेमाल करने पर रोक है, जिससे व्यक्ति के मेडिकल प्रैक्टिशनर होने का भ्रम पैदा हो। 1940 के मद्रास संशोधन के जरिए धारा 6-A जोड़ी गई, जिसमें ऐसे टाइटल, विवरण, अक्षर या शॉर्ट फॉर्म के इस्तेमाल पर भी रोक का प्रावधान किया गया है।

’डॉ.’ प्रीफिक्स के इस्तेमाल को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आते रहे हैं। सितंबर 2025 में स्वास्थ्य महानिदेशालय (DGHS) ने कहा था कि मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता नहीं रखने वाले फिजियोथेरेपिस्ट अपने नाम के आगे ‘डॉ.’ नहीं लगा सकते। DGHS ने तर्क दिया था कि इससे मरीजों और आम लोगों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।

हालांकि, जनवरी 2026 में केरल हाई कोर्ट ने फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के ‘Dr.’ प्रीफिक्स के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाएं खारिज कर दी गईं। कोर्ट ने कहा कि ‘डॉक्टर’ शब्द केवल मेडिकल प्रोफेशन तक सीमित नहीं है। फैसले में फिजियोथेरेपिस्ट के लिए ‘Dr.’ के साथ ‘PT’ और ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के लिए ‘OT’ सफिक्स वाले प्रावधान को भी बरकरार रखा गया।

फाइल फोटो© ANI

’आर्किटेक्ट’ और ‘सीए’ के स्पष्ट नियम

भारत में कुछ प्रोफेशनल टाइटल्स ऐसे हैं जिनका इस्तेमाल कानून के तहत नियंत्रित किया जाता है। आर्किटेक्ट और सीए इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

आर्किटेक्ट्स एक्ट, 1972 के तहत काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर बनाया गया है और आर्किटेक्ट के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की गई है। काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर के मुताबिक, इस कानून का उद्देश्य आर्किटेक्ट्स के रजिस्ट्रेशन, मान्यता प्राप्त योग्यता और प्रोफेशनल प्रैक्टिस के स्टैंडर्ड्स को रेगुलेट करना है।

काउंसिल के मुताबिक, आर्किटेक्चर के लिए संबंधित व्यक्ति का काउंसिल में रजिस्टर होना जरूरी है। इसके बाद ही ‘आर्किटेक्ट’ के टाइटल का इस्तेमाल करने का अधिकार मिलता है। वहीं कोई व्यक्ति अगर खुद को रजिस्टर्ड आर्किटेक्ट बताता है या ‘आर्किटेक्ट’ के टाइटल का गलत इस्तेमाल करता है तो यह दंडनीय अपराध हो सकता है।

दूसरी तरफ ‘सीए’ के मामले में भी नियम ज्यादा स्पष्ट हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम, 1949 के तहत ICAI के सदस्य ही ‘चार्टर्ड अकाउंटेंट’ डेजिग्नेशन का इस्तेमाल कर सकते हैं। ICAI ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके सदस्य अपने नाम के आगे ‘सीए’ प्रीफिक्स लगा सकते हैं। सिर्फ CA की परीक्षा पास कर लेना इसके लिए पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति का ICAI का सदस्य होना जरूरी है।

इंजीनियर के नाम के आगे ‘Er’ लगाने का क्या नियम?

भारत में कुछ इंजीनियर अपने नाम के आगे ‘Er.’ या ‘Engr.’ लिखते हैं। हालांकि, ‘सीए’ या ‘आर्किटेक्ट’ की तरह ‘Er.’ को लेकर पूरे देश में लागू कोई एक समान व्यवस्था दिखाई नहीं देती। हालांकि, भारत सरकार के ई-गवर्नेंस मानक में ‘Engineer’ को अपेलेशन के उदाहरण के तौर पर जरूर शामिल किया गया है।

वहीं यूरोप में ‘यूर इंग’ (EUR ING) एक पेशेवर दर्जा है, जिसे इंजीनियर्स यूरोप जारी करता है। इसके लिए इंजीनियर की शिक्षा के साथ पेशेवर अनुभव और निर्धारित मानकों को पूरा करना होता है।

कनाडा में नियम और ज्यादा स्पष्ट हैं। वहां ‘इंजीनियर’ शब्द एक संरक्षित पेशेवर टाइटल है। इंजीनियर्स कनाडा के मुताबिक, किसी व्यक्ति को ‘इंजीनियर’ या ‘प्रोफेशनल इंजीनियर’ के तौर पर खुद को पेश करने के लिए संबंधित प्रांत या क्षेत्र के नियामक से लाइसेंस लेना होता है।

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