
जिमखाना।
दिल्ली जिमखाना क्लब महज एक क्लब नहीं बल्कि रसूख, रईसी और इतिहास का ऐसा गुप्त दस्तावेज है, जिसकी बंद दीवारों के पीछे ब्रिटिश काल से लेकर आज तक के अनगिनत राज कैद हैं। ये आजादी के पहले से अब तक एलीट वर्ग के मेलजोल, मनोरंजन से लेकर पावरफुल ब्यूरोक्रेसी का ‘पावर हाउस’ रहा है। प्रधानमंत्री आवास के बिल्कुल नजदीक बने इस क्लब को कुछ समय पहले सरकार ने खाली करने का फरमान सुना दिया। हालांकि अब केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में इसे लेकर आश्वासन दिया है। लेकिन एक दौर में ये क्लब जासूसी का भी ठिकाना रह चुका है। आइए बताते हैं 27.3 एकड़ में फैले, 113 साल पुराने दिल्ली जिमखाना क्लब की शुरू से लेकर अब तक की पूरी कथा।
शराबखाना
दवाखाना
पागलखाना
कैदखाना
डाकखाना
मुसाफिरखाना
तोपखाना
तहखाना
छपाईखाना
जिमखाना...
इस लिस्ट में आप कहां पर अटक गए? सभी ‘खाना’ तो समझ आ रहे होंगे, लेकिन जिमखाना दिमाग घुमा रहा होगा। आख़िर शब्द आया कहां से? इसका ठीक-ठीक मतलब है क्या?
जिमखाना शब्द कोई अंग्रेजी या हिंदी का विशुद्ध शब्द नहीं है। यह अंग्रेजी, हिंदी और फारसी के मेल से बना एक एंग्लो इंडियन शब्द है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक, जिमखाना शब्द हिंदी-उर्दू के मूल शब्द ‘गेंदखाना’ से बना है, जिसमें 2 शब्द थे- गेंद और खाना। ‘गेंद’ यानी खेलने वाली बॉल और ‘खाना’ यानी जगह, कमरा। अंग्रेजों के लिए ‘गेंदखाना’ बोलना कठिन होता था, इसलिए उन्होंने अंग्रेजी के शब्द ‘जिमनेजियम’ से लेकर ‘जिम’ शब्द लेकर गेंदखाना को ‘जिमखाना’ बना दिया।

दिल्ली जिमखाना क्लब किसने बनाया?
साल था 1911... भारत में अंग्रेजों का शासन था। सरकार ने भारत की राजधानी को कोलकाता से हटाकर दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला किया था। उसके बाद नई दिल्ली को नए सिरे से डिजाइन करने का काम शुरू किया गया। एडविन लुटियंस और हरबर्ट बेकर जैसे आर्किटेक्ट्स ने जहां लुटियंस दिल्ली में नया शहर बसाया, वहीं रॉबर्ट टोर रसल (Robert Tor Russell) ने कई कमर्शल-सोशल इमारतों को आकार दिया, जिनमें जिमखाना क्लब शामिल था। डच मूल के ब्रिटिश आर्किटेक्ट रसल की बनाई कुछ प्रमुख इमारतें हैं-
- कनॉट प्लेसः यह ब्रिटिश वास्तुकला और साम्राज्य की भव्यता का प्रतीक था। यहां ब्रिटिश अफसर, उनके परिवार और अमीर भारतीय खरीदारी के लिए आते थे।
- तीन मूर्ति भवनः यह ब्रिटिश इंडियन आर्मी के कमांडर इन चीफ का निवास था। बाद में, आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू यहां रहे। अब यहां प्रधानमंत्री म्यूजियम और लाइब्रेरी है।
- दिल्ली जिमखाना क्लबः इसे अंग्रेजों के लिए नितांत प्राइवेट और पर्सनल क्लब के तौर पर बनाया गया था, जहां वो परिवारों के साथ मेलजोल बढ़ा सकें।
- इनके अलावा दिल्ली में गोल डाकखाना, जनपथ के पास ईस्टर्न-वेस्टर्न कोर्ट्स, सफदरजंग एयरपोर्ट तैयार करने में भी रसेल की भूमिका रही।
भारत में ‘क्लब’ का इतिहास
अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के दौरान कई शहरों में क्लब खोले थे। इनमें से कई जेंटलमेन क्लब थे तो कई मिलिट्री गैरीसन क्लब। गोल्फ, क्रिकेट, यॉट जैसे कई खेलों के लिए भी क्लब थे। इनमें से बहुत से क्लब 19वीं और 20वीं सदी में बने थे। भारत ही नहीं, अंग्रेजों ने कई अन्य देशों में भी ऐसे क्लब खोले थे। दिल्ली जिमखाना क्लब की वेबसाइट के मुताबिक, इस क्लब से संबद्ध 60 से ज्यादा क्लब हैं जिनमें से 18 भारत में और 43 विदेश में हैं।
जिमखाना क्लब क्यों खोले गए?
भारत के अधिकतर जिमखाना क्लब एक सदी से भी ज्यादा पुराने हैं। इन्हें अंग्रेजों ने अपने लिए बनाया था। ये क्लब रसूख और रईसी का एलीट प्रतीक हुआ करते थे। इनका इस्तेमाल घुड़सवारी, खेलकूद, खानपान के अलावा सामाजिक मेलजोल, सोशल नेटवर्किंग और संबंध बनाने के लिए ज्यादा किया जाता था। अंग्रेजों ने दिल्ली, मद्रास, बॉम्बे, लाहौर ही नहीं बल्कि केन्या, मॉरीशस में भी जिमखाना क्लब खोले।

राज, रसूख और रहस्यों का ठिकाना
आजादी से पहले दिल्ली जिमखाना क्लब पूरी तरह ब्रिटिश अफसरों और सैन्य अधिकारियों के लिए रिजर्व था। एंट्री के सख्त नियम थे। सिर्फ सदस्यों को ही अंदर जाने की इजाजत थी। ये परंपरा आज तक जारी है। पहले क्लब में गिने-चुने रईस और प्रभावशाली भारतीय ही जा सकते थे। ऐसे गिने-चुने भारतीय राजा, ऊंचे ओहदे पर बैठे सरकारी अफसर, सैन्य अधिकारी, जज और रईस बिजनेसमैन ही इस कैटिगरी में आते थे, जिन्हें अंग्रेज सामाजिक रूप से अपने अनुकूल मानते थे।
दिल्ली जिमखाना क्लब हमेशा से ऊंचे रसूख और प्रतिष्ठा का प्रतीक रहा है। इसकी मेंबरशिप किसी स्टेटस सिंबल से कम नहीं मानी जाती। आजकल वैसे तो कई लग्जरी क्लब खुल गए हैं, लेकिन इस पुराने जिमखाना क्लब के रुतबे और आकर्षण की सबसे बड़ी वजह है- इसकी लेगेसी और दुर्लभ मेंबरशिप। आज भी ये जिमखाना क्लब सीनियर और रिटायर्ड नौकरशाहों, सैन्य अधिकारियों, जजों, दिल्ली के पुराने रसूखदार और बिजनेसमेन परिवारों तक सीमित है।
दिल्ली जिमखाना क्लब के अंदर क्या है?
दिल्ली जिमखाना क्लब का अपना अलग इकोसिस्टम है। इसमें 26 ग्रास टेनिस कोर्ट, 4 हार्ड कोर्ट, फ्लेक्स कुशन कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, बिलियर्ड्स रूम के अलावा बास्केटबॉल, स्विमिंग पूल और एक हेल्थ क्लब भी है। इनके अलावा रेस्टोरेंट्स, लाउंज, बार, बैंक्वेट हॉल, लाइब्रेरी, कार्ड रूम, मसाज रूम, ब्यूटी पार्लर, बच्चों की जगह और 43 ट्रांजिट रूम और कॉटेज भी हैं। मेंबर्स और मेहमानों की आवभगत व सुरक्षा के लिए करीब 500 लोगों का स्टाफ है।

दिल्ली जिमखाना क्लब के स्विमिंग पूल का भी अपना इतिहास है। दिल्ली जिमखाना क्लब की वेबसाइट के मुताबिक, शुरू में यह स्पोर्टिंग क्लब था, 1930 तक यहां स्विमिंग पूल और स्क्वैश कोर्ट नहीं थे। उस वक्त वायसराय हाउस भी बन रहा था, लेकिन वहां भी पूल नहीं था। वायसराय की बीवी लेडी विलिंगडन को स्विमिंग का शौक था। उन्हें अपना शौक पूरा करने रईस भारतीयों के यहां जाना पड़ता था। ऐसे में उन्होंने जिमखाना क्लब को 21 हजार रुपये डोनेट किए और स्विमिंग पूल बनवाया।
दिल्ली जिमखाना के कितने मेंबर
| परमानेंट मेंबर | 5018 |
| लाइफ मेंबर | 27 |
| क्लब यूजर्स | करीब 3000 |
| ग्रीन कार्ड होल्डर्स | लगभग 5000 |
| एमिनेंट कैटिगरी मेंबर | 93 |
| कॉरपोरेट मेंबर्स | 80 |
| लेडी सब्सक्राइबर्स | 1323 |
| डिप्लोमेट | 1 |
| टेंपरेरी मेंबर | 1 |
| *TOI के मुताबिक, मार्च 2024 तक इस क्लब के कुल 14.547 मेंबर थे। |
स्थायी सदस्यता के लिए 40 साल की वेटिंग!
दिल्ली जिमखाना क्लब की मेंबरशिप के लिए कोटा रिजर्व रहता है। 40 फीसदी सीटें सिविल सर्वेंट्स के लिए और 40 पर्सेंट डिफेंस अधिकारियों के लिए रिजर्व रहती हैं। अन्य मेंबर्स को बाकी बची 20 पर्सेंट सीटों में एडजस्ट किया जाता है। NDTV के मुताबिक, अगर आप स्पेशल कैटिगरी में नहीं आते या आपके कनेक्शन नहीं हैं तो परमानेंट मेंबरशिप के लिए 35 से 40 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है। सरकारी कैटिगरी में 15 से 20 साल का वेटिंग पीरियड आम है। क्लब के करीब 5600 परमानेंट मेंबर हैं। इनमें से किसी की मृत्यु या मेंबरशिप छोड़ने पर ही नया परमानेंट मेंबर बनता है। चूंकि ऐसा बहुत कम होता है, इसलिए वेटिंग लिस्ट बहुत लंबी है।

क्लब के अंदर सख्त ड्रेस कोड
क्लब के अंदर ड्रेस को लेकर आज भी अंग्रेजों के जमाने जैसे औपचारिकता है। डाइनिंग एरिया, लाउंज और बार में लाउंज सूट, बंदगला सूट, जोधपुरी कोट, सफारी सूट ही पहनकर जा सकते हैं। इनके अलावा शर्ट-पैंट, अचकन, धोती-कुर्ता, सलवार-कमीज, नेहरू जैकेट, पायजामा-कुर्ता और राष्ट्रीय परिधान पहनने की भी छूट है। गर्मियों में पोलो नेक स्वेटर और जैकेट भी पहन सकते हैं।
शॉर्ट्स-चप्पल में एंट्री नहीं
मेन बिल्डिंग में शॉर्ट्स, कार्गो, फटी या फेडेड जींस, स्पोर्ट्स/कैनवास शूज, स्पोर्ट्स वियर, टाइट ड्रेस, बिना कॉलर वाली टीशर्ट, पहनने पर रोक है। रबड़ की चप्पल और बिना बैक स्ट्रैप वाली चप्पल नहीं पहन सकते। ऐसी शर्ट या टीशर्ट की भी इजाजत नहीं है, जिस पर आकृतियां या स्लोगन छपे हों। बिना मोजे के जूते पहनकर भी मेन बिल्डिंग में जाने की मनाही है। शर्ट पेंट में दबी होगी, तभी एंट्री मिलेगी।
गेम्स के लिए भी अलग ड्रेस
स्पोर्ट्स, हेल्थ क्लब में टीशर्ट-शॉर्ट्स और ट्रैक पैंट पहन सकते हैं, लेकिन ये आमतौर पर व्हाइट होने चाहिए। स्विमिंग पूल के लिए भी कड़े नियम हैं। डांस फ्लोर पर जाने या क्रिसमस, न्यू इयर जैसे खास मौकों के लिए लाउंज सूट, बंदगला सूट, जोधपुरी कोट और पैंट-शर्ट पहनना जरूरी है। लॉन या गार्डन में लंच डिनर के वक्त चप्पल, शॉर्ट्स या स्पोर्ट्स वियर पहनने की भी मनाही है।

1927 की लीज, ₹15/एकड़ किराया
दिल्ली जिमखाना क्लब के लिए 1927 में जमीन लीज़ पर दी गई थी। इंडियन एक्सप्रेस ने हाईकोर्ट में दाखिल दस्तावेजों के हवाले से बताया कि उस वक्त इसका किराया 15 रुपये प्रति एकड़ तय किया गया था। इस तरह पूरे परिसर का सालाना किराया 409 रुपये 50 पैसे हुआ करता था। क्लब का दावा है कि 13 दिसंबर 2023 को आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) ने 90 साल के इतिहास में पहली बार किराया बढ़ाने का नोटिस दिया। किराया बढ़ाकर 4.10 करोड़ रुपये कर दिया गया, जो मूल किराए का 10 हजार गुना था। कहा गया कि किराया इंस्टिट्यूशनल प्रॉपर्टी के मौजूदा लैंड रेट के हिसाब से बढ़ाया गया है। अप्रैल 2026 तक बकाया रकम 47.59 करोड़ हो गई।
कितनी कमाई, कितना प्रॉफिट?
TOI ने ऑडिटर रिपोर्ट के हवाले से बताया कि वित्त वर्ष 2023-24 में दिल्ली जिमखाना क्लब को कुल 9.5 करोड़ रुपये का नेट प्रॉफिट हुआ था। इस साल क्लब की कुल कमाई 79.8 करोड़ थी, कुल खर्चा 69.2 करोड़ का हुआ। इस तरह टैक्स काटने के बाद कुल बचत 9.5 करोड़ की हुई। यह इससे पिछले साल से करीब 10 गुना ज्यादा बचत है, जब महज 93 लाख रुपये का ही प्रॉफिट हुआ था।
वित्तीय गड़बड़ियों से बेदखली तक, ऐसे पहुंचा मामला
अब केंद्र सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) ने 22 मई 2026 को एक नोटिस जारी करके दिल्ली जिमखाना क्लब की 27.3 एकड़ जमीन 5 जून 2026 तक लौटाने को कहा है। इस आइकॉनिक जिमखाना क्लब में वित्तीय गड़बड़ियों, मैनेजमेंट-मेंबरशिप में मनमानी से लेकर रेंट न चुकाने जैसे आरोपों से मामला जमीन खाली कराने तक कैसे पहुंचा, आइए विस्तार से बताते हैं-
- दिल्ली जिमखाना क्लब में गड़बड़ियों की शिकायतें 2010 के दशक से ही आना शुरू हो गई थीं। वित्तीय गड़बड़ियों, प्रशासनिक मनमानी, मेंबरशिप देने में भेदभाव, गुटबाजी जैसे आरोप लगने लगे थे।
- दिल्ली के पीडब्लूडी मिनिस्टर प्रवेश वर्मा के मुताबिक, 2014 में कई साल तक लग्जरी टैक्स न चुकाने पर दिल्ली सरकार ने क्लब के बैंक खाते सीज करने की कार्यवाही शुरू कर दी थी।
- बाद में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (DPCC) ने कचरा प्रबंधन, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग में लापरवाही और बोरवेल के गैरकानूनी इस्तेमाल पर कार्रवाई की। DPCC ने तो क्लब को तुरंत बंद करने का आदेश जारी कर दिया था। बाद में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने क्लब पर भारी जुर्माना लगाया।
- पहले दिल्ली जिमखाना क्लब को 16 सदस्यों की कमिटी चलाती थी। अध्यक्षता आमतौर पर इसके सदस्य सिविल सर्वेंट्स और सैन्य अधिकारियों के बीच बारी-बारी से आती थी। क्लब में दोनों गुटों के बीच खूब गुटबाजी होती थी।
- खबरों के मुताबिक, 2018 में क्लब मेंबर्स के एक ग्रुप ने भारत के सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस में एक शिकायत दर्ज कराई और वित्तीय गड़बड़ियों का आरोप लगाया।
- 2018-19 में क्लब की मेंबरशिप की आवेदन फीस में भारी बढ़ोतरी कर दी गई। सरकारी अधिकारियों के लिए डेढ़ लाख और प्राइवेट लोगों के लिए 7.5 लाख की सिक्योरिटी फीस तय कर दी गई।
- कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री ने इसे आधार बनाते हुए जांच बिठा दी। अप्रैल 2019 में मिनिस्ट्री ने रिपोर्ट में कहा कि गैर सदस्यों से वेटिंग फीस के रूप में 1.5 लाख से लेकर 7.5 लाख लेना कंपनी कानून के तहत ये अवैध है।
- अप्रैल 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्युनल (NCLT) में याचिका दी और कई गंभीर आरोप लगाए।
- एनसीएलटी ने जून 2020 में भेदभाव की आशंका जताते हुए 5 सदस्यीय कमिटी से जांच के निर्देश दिए। क्लब की जनरल कमिटी में 2 सरकारी मेंबर रखने और कोई नई नीति न बनाने के भी आदेश दिए।
- सरकार आदेश से संतुष्ट नहीं हुई, अपीलीय ट्रिब्यूनल में आदेश को चुनौती दी गई। फरवरी 2021 में NCLAT ने आदेश में क्लब को औपनिवेशिक काल का प्रतीक बताते हुए जनरल कमिटी को भंग कर दिया और सरकारी एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त कर दिया।
- क्लब की कमिटी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। कोर्ट ने 4 महीने में एनसीएलटी को विवाद निपटाने का निर्देश दिया। एनसीएलटी ने अपने आदेश में गड़बड़ियों की पुष्टि की और वेटिंग फीस को गैरकानूनी ठहरा दिया।
- इसके बाद कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री ने क्लब को चलाने के लिए 6 सदस्यीय कमिटी गठित कर दी। एनसीएलटी ने सरकार को 15 सदस्यों की नई जनरल कमिटी बनाने का भी अधिकार दे दिया।
- सरकार का दावा है कि क्लब के ऊपर जमीन का कुल 47.58 करोड़ रुपये का रेंट बकाया है। सरकार ने सितंबर 2025, मार्च 2026 और अप्रैल 2026 में पत्र भेजकर रेंट चुकाने को कहा, लेकिन राशि जमा नहीं की गई।
- 22 मई 2026 को आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) ने लीज की शर्तों का उल्लंघन का आरोप लगाया और नोटिस देकर 5 जून 2026 तक क्लब की 27.3 एकड़ जमीन सरकार के हवाले करने का आदेश जारी कर दिया।
- कहा गया कि जमीन स्थायी लीज पर दी गई थी, लेकिन जमीन का मालिकाना हक L&DO के पास होने के कारण अगर वो चाहे तो सार्वजनिक उद्देश्य या जनहित के लिए इसे वापस ले सकता है।
- सरकार का कहना है कि ये क्लब दिल्ली के एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक रूप से अहम इलाके में है। डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, सार्वजनिक सुरक्षा और जनहित के लिए इस जमीन की बहुत जरूरत है।
बहरहाल, मामला दिल्ली हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच चुका है। दिल्ली जिमखाना क्लब के मेंबर विजय खुराना और स्टाफ वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार के बेदखली आदेश को अदालत में चुनौती दी है।
26 मई को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने भरोसा दिलाया कि जमीन का कब्जा लेने के दौरान कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाएगा। जमीन को जबरन खाली नहीं कराया जाएगा।
4 सितंबर को भी केंद्र सरकार की तरफ से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने हाईकोर्ट में आश्वासन दिया कि दिल्ली जिमखाना क्लब के बेदखली मामले में फिलहाल कोई दंडात्मक या सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इससे पहले, आर्म्ड फोर्सेज के करीब 50 रिटायर्ट सदस्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर दिल्ली जिमखाना मामले में दखल देने का अनुरोध किया था। उन्होंने पत्र में लिखा कि अगर यह क्लब बंद होता है तो इसका बेहद गंभीर मानवीय असर होगा। यह उन हजारों पूर्व सैनिकों और रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ा झटका होगा, जो इस क्लब को अपनी सोशल लाइफ का हिस्सा मानते हैं।

विदेशी जासूसी का ठिकाना
दिल्ली का जिमखाना क्लब एक जमाने में विदेशी जासूसों का भी पसंदीदा ठिकाना हुआ करता है। विदेशी जासूस यहां राजनयिक बनकर अक्सर आते थे और सरकार की नजरों में आए बिना भारतीय अधिकारियों से मेलजोल बढ़ाते थे। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व एजेंट रॉबर्ट बेयर ने अपनी बायोग्राफी ‘See No Evil’ में ऐसी ही एक घटना का जिक्र किया है, जिसमें एक भारतीय सेना के एक कर्मचारी ने रूसी टी-27 टैंक से जुड़े अहम दस्तावेज लीक किए थे। इंडिया टुडे ने इसे विस्तार से लिखा है।
CIA एजेंट, T-72 टैंक और जासूसी
1970 का दशक था। सीआई के नए एजेंट रॉबर्ट बेयर की दिल्ली तैनाती हुई थी। शीतयुद्ध का दौर चरम पर था। सोवियत संघ ने 1978 में भारत को अपने 500 नए टी-72 बैटल टैंक दिए थे। अमेरिका इनकी तकनीकी जानकारी हासिल करना चाहता था क्योंकि ये कई मायनों में सबसे एडवांस थे। लेकिन भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो बहुत एक्टिव थी। वह हर अमेरिकी राजनयिक पर पैनी नजर रखती थी। उसने सीआईए के एक अफसर को जासूसी में पकड़ा भी था। बेयर ने अपनी किताब में लिखा कि अगस्त के महीने में उनका जैकपॉट लगा जब एक भारतीय एजेंट ने टी-72 टैंक के पूरे मैनुएल से भरा बैग उन्हें सौंप दिया और फोटोकॉपी करके 2 घंटे में लौटाने को कहा। बेयर ने उसे दिल्ली जिमखाना क्लब में मिलने को कहा क्योंकि वहां आईबी अधिकारियों की पहुंच सीमित थी।
जिमखाना क्लब में बैग की डिलीवरी
बेयर ने लिखा कि टैंक मैनुएल का बैग लेकर वह तुरंत अमेरिकी एंबेसी पहुंचे और फोटोकॉपी करने के बाद दिल्ली जिमखाना क्लब के लिए निकल गए। इस बीच आईबी को भनक लग गई। तीन गाड़ियां उनके पीछे लग गईं। जिमखाना क्लब पहुंचने तक 5 गाड़ियां उनके पीछे थीं। वो मेन बिल्डिंग के सामने जाकर रुकीं और एजेंट उतरकर मुझे ढूंढने लगे। मैंने टी-72 टैंकों का मैनुअल का बैग एक टेनिस बैग में रखा और एक पेड़ के पीछे छिपा दिया, फिर पिछले रास्ते से बार में पहुंच गया। वहां बैठे एक भारतीय के पास जाकर बातें करने लगा। एजेंट दूर से मुझे देख रहे थे। बाद में उन्होंने उस भारतीय से पूछताछ की। मैंने जो टी-72 टैंकों का मैनुएल हासिल किया था, वो पेंटागन तक पहुंच गए। अमेरिकी इंजीनियरों ने उसकी खूबियों और खामियों की पड़ताल की और उसके आधार पर अपने टैंक और मिसाइल बनाईं, जो बाद में बहुत काम आईं। टी-72 टैंकों की कमियों के बारे में पाकिस्तान की सेना को भी बताया गया ताकि जरूरत पड़ने पर वह उन्हें नष्ट कर सके।

क्लब के मेंबर्स में कौन-कौन?
देश की राजधानी दिल्ली का जिमखाना क्लब हमेशा से ही सबसे प्रभावशाली लोगों का केंद्र रहा है। क्लब के मेंबर्स की लिस्ट गोपनीय रखी जाती है, हालांकि खबरों के मुताबिक, इस क्लब के परमानेंट मेंबर्स में भारत के कई पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व सेना प्रमुख, सीनियर और रिटायर्ड IAS, IPS, IFS अधिकारी और कानून व कॉरपोरेट जगत की दिग्गज हस्तियां शामिल रही हैं। मौजूदा चर्चित सदस्यों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, अभिषेक मनु सिंघवी आदि के नाम भी बताए जाते हैं।
डॉग्स एंड इंडियन नॉट अलाउड...
जिमखाना क्लब में भारतीयों के साथ किस कदर नस्लीय भेदभाव होता था, इससे जुड़ी एक घटना का जिक्र रजनीकांत पुराणिक ने अपनी किताब Nehru’s 97 Major Blunders में किया है। उन्होंने लिखा कि आजादी के एक दशक बाद तक कोलकाता के बंगाल क्लब में भारतीयों को घुसने की इजाजत नहीं थी। बॉम्बे के ब्रीच कैंडी क्लब में तो स्वतंत्रता के कई साल बाद तक एक साइन बोर्ड लगा रहता था- डॉग्स एंड इंडियन नॉट अलाउड। अंग्रेज इस तरह के साइन बोर्ड कई क्लबों, ट्रेन की बोगियों और अन्य जगहों पर लगाकर भारतीयों का अपमान किया करते थे।
खुशवंत सिंह को भी नहीं घुसने दिया
उन्होंने प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह का जिक्र करते हुए लिखा कि उन्हें मद्रास क्लब में नहीं घुसने दिया गया था क्योंकि उन्होंने सैंडल पहन रखी थीं। उनके हवाले से पुराणिक ने अपनी किताब में लिखा कि उनके ग्रुप को दिल्ली जिमखाना क्लब में कॉकटेल पार्टी में यह चेक करने के लिए बुलाया गया था कि वह अंग्रेजी सिस्टम और ब्रिटिश लोगों के बीच फिट बैठते हैं या नहीं।
टाटा इतने खफा हुए कि ताज ही बना दिया
प्रसिद्ध पत्रकार वीर सांघवी ने टाटा ग्रुप की नींव रखने वाले जमशेदजी टाटा से जुड़ा किस्सा बताते हुए लिखा है कि उस जमाने में इतने बड़े उद्योगपति होने के बावजूद रॉयल बंगाल यॉट क्लब ने उन्हें एंट्री नहीं दी थी। इससे जमशेदजी इतने नाराज हुए कि उन्होंने उस क्लब के बराबर में ही भारत का सबसे प्रसिद्ध होटल बनाने की कसम खा ली थी। उन्होंने ताज होटल बनाकर अपनी कसम पूरी करके भी दिखा दी। इसी होटल में उन्होंने अंग्रेज कर्मचारियों को रखा, जो भारतीय मालिकों के नीचे काम करते थे। इस तरह उन्होंने अपने अपमान का बदला लिया था।
शशि थरूर को निकाल दिया था बाहर
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी बॉम्बे के अल्ट्रा लग्जरी ब्रीच कैंडी क्लब से बाहर निकाले जाने की घटना का ब्यौरा दिया था। एक ब्लॉग में उन्होंने बताया था कि आजादी के 20 साल बाद, 1960 के दशक के मध्य में उनका गोरा दोस्त उन्हें क्लब में ले जाना चाहता था, लेकिन क्लब ने उन्हें बाहर निकाल दिया था। मीडिया रिपोर्ट्स में कई और हस्तियों के साथ इन अग्रेजीदां क्लबों में भेदभाव की खबरें आ चुकी हैं।




