नेपाल 26 अगस्त को आई आपदा के विनाशकारी प्रभावों से निपटने के लिए जूझ रहा है। इस तबाही के बीच, भारत के एक बड़े हिस्से में हालात बिगड़ रहे हैं। पहाड़ों से मैदानों तक नदियां उफान पर हैं और कई इलाकों में बाढ़ का पानी बस्तियों तक पहुंच चुका है।
हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक बारिश और बढ़ते जलस्तर ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रहा है, जहां लगातार बारिश और ऊपरी कैचमेंट से बढ़े जलप्रवाह के चलते कई नदियां खतरे के निशान के आसपास या उसके ऊपर पहुंच गई हैं।
उत्तर प्रदेश में अब तक 35 जिले बाढ़ से प्रभावित हो चुके हैं। इनमें 23 जिलों में बुधवार तक बाढ़ की स्थिति थी। हालात को देखते हुए प्रशासन ने बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान शुरू किया है। अब तक 16,784 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है, जबकि अकेले बुधवार को 3,042 लोगों का रेस्क्यू किया गया। बाढ़ और बारिश से जुड़े हादसों में प्रदेश में अब तक तीन लोगों की मौत की भी सूचना है।

गंगा और यमुना समेत कई प्रमुख नदियों के बढ़ते जलस्तर ने नदी किनारे बसे इलाकों के लिए खतरा बढ़ा दिया है। प्रयागराज में गंगा और यमुना का पानी कई निचले इलाकों और नदी किनारे की बस्तियों में घुस गया है। वहीं, चंबल क्षेत्र से आने वाले जलप्रवाह और मध्य प्रदेश से यमुना में छोड़े जा रहे पानी ने भी चिंता बढ़ाई है।
वाराणसी, प्रयागराज, बलिया, गाजीपुर और चित्रकूट समेत कई जिलों में नदी किनारे बसे गांवों और निचले इलाकों पर बाढ़ का असर दिखाई दे रहा है। प्रशासन को संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखने और जरूरत पड़ने पर लोगों को तत्काल सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
#WATCH | Prayagraj, Uttar Pradesh: Amid the flood situation, rising water levels in the Ganga and Yamuna rivers have caused water to enter settlements along the riverbanks. pic.twitter.com/YaCToHliuM
— ANI (@ANI) September 3, 2026
PM मोदी ने वाराणसी के हालात की जानकारी ली
वाराणसी में गंगा का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक, गुरुवार सुबह 6 बजे राजघाट गेज साइट पर जलस्तर 70.54 मीटर दर्ज किया गया। यह 70.262 मीटर के चेतावनी स्तर से ऊपर है। जलस्तर फिलहाल करीब 2 सेंटीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहा है। राजघाट पर गंगा का खतरे का निशान 71.262 मीटर है, जबकि यहां अब तक का उच्चतम बाढ़ स्तर यानी HFL 73.901 मीटर दर्ज किया गया है। जलस्तर बढ़ने के साथ वाराणसी के कुछ हिस्सों में बाढ़ जैसे हालात बने हुए हैं। जिला प्रशासन गंगा और वरुणा नदी के किनारे बसे प्रभावित इलाकों पर लगातार नजर रख रहा है और राहत-बचाव व्यवस्था की निगरानी की जा रही है।
#WATCH | Prayagraj, Uttar Pradesh: Amid the flood situation, rising water levels in the Ganga and Yamuna rivers have caused water to enter settlements along the riverbanks. pic.twitter.com/YaCToHliuM
— ANI (@ANI) September 3, 2026
बाढ़ की स्थिति के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के मेयर और जिलाधिकारी से फोन पर बात कर हालात का जायजा लिया। उन्हें शहर में चलाए जा रहे राहत कार्यों और प्रशासन की तैयारियों की जानकारी दी गई। प्रधानमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि बढ़ते जलस्तर के बीच आम लोगों को कम से कम परेशानी हो, यह सुनिश्चित किया जाए। साथ ही राहत और बचाव अभियान में किसी तरह की कमी न रहने देने के निर्देश दिए।
भारी बारिश की चेतावनी को देखते हुए वाराणसी, चंदौली, सोनभद्र और बलिया में गुरुवार को स्कूल बंद रखने का फैसला किया गया है।
चित्रकूट-बाराबंकी में भी हालात गंभीर
चित्रकूट में हालात और गंभीर हैं। यहां मंदाकिनी नदी खतरे के निशान से करीब ढाई मीटर ऊपर बह रही है और 36 गांव बाढ़ से प्रभावित हैं। बाराबंकी में सरयू और लखीमपुर खीरी में शारदा नदी का जलस्तर भी खतरे के निशान के आसपास या ऊपर पहुंच गया है। कई जिलों में बाढ़ के साथ-साथ कटान का खतरा भी बना हुआ है।
चित्रकूट समेत कई जिलों में भारी बारिश के चलते 3 सितंबर को कक्षा 12 तक के स्कूल बंद रखे गए हैं। बारिश और बाढ़ से जुड़े हादसों में दीवार गिरने समेत कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें लोगों की जान गई है। मौसम विभाग ने ललितपुर में भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना जताई है। वहीं बांदा, चित्रकूट, कानपुर, झांसी और हमीरपुर समेत कई जिलों में भी भारी बारिश का अलर्ट है।
अवध में सरयू-शारदा का बढ़ता पानी
अवध क्षेत्र में भी नदियों का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। बाराबंकी में सरयू नदी खतरे के निशान से करीब 10 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है। गोंडा के करनैलगंज में सरयू में 3.18 लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद बाढ़ का खतरा और बढ़ गया है। रायबरेली में सई नदी का जलस्तर बढ़ा है, जबकि सीतापुर में शारदा नदी का पानी बढ़ने से रामपुर मथुरा और रेउसा इलाके में बाढ़ की आशंका बनी हुई है।
इन कारणों से बढ़ा UP में बाढ़ का खतरा
उत्तर प्रदेश में बढ़ते जलस्तर की कहानी सिर्फ स्थानीय बारिश तक सीमित नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश और ऊपरी कैचमेंट से आने वाला पानी भी नदियों के प्रवाह को प्रभावित कर रहा है। उत्तराखंड में 3 सितंबर को भी कई इलाकों में तेज बारिश का दौर जारी है। ऊपरी क्षेत्रों में भारी बारिश के स्पेल दर्ज किए गए हैं। रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में हो रही भारी बारिश के चलते नदियां और बरसाती नाले उफान पर हैं। रुद्रप्रयाग में अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ा है और दोनों नदियां चेतावनी स्तर के करीब बह रही हैं।
दूसरी ओर, नेपाल में हालिया भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति ने भारत की ओर आने वाली नदियों के जलप्रवाह को लेकर चिंता बढ़ाई है। खासकर नेपाल के तराई और उससे जुड़े नदी तंत्र का असर घाघरा, राप्ती और गंडक जैसी नदियों के प्रवाह पर पड़ सकता है। यानी ऊपरी कैचमेंट में बारिश, नेपाल से आने वाला जलप्रवाह और यूपी में जारी मॉनसूनी बारिश, तीनों मिलकर राज्य में बाढ़ के खतरे को बढ़ा रहे हैं।
#WATCH | Uttarakhand: Following heavy rainfall in Rudraprayag and Chamoli districts over the past few days, rivers and streams are in spate. In Rudraprayag, the water levels of the Alaknanda and Mandakini rivers have risen and are flowing close to the warning level, according to… pic.twitter.com/7fuGjdPStj
— ANI (@ANI) September 3, 2026
बिहार में भी बाढ़ ने बढ़ाई परेशानी
यूपी के अलावा, बिहार में भी बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है। दरभंगा, पश्चिम चंपारण, पूर्णिया, वैशाली, भागलपुर और मुंगेर समेत 15 से अधिक जिले बाढ़ की चपेट में हैं, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। गंगा, सोन, पुनपुन, कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती और घाघरा नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। गंगा के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए पटना जिला प्रशासन पूरी तरह अलर्ट पर है।
लेकिन खतरा सिर्फ उफनती नदियों तक सीमित नहीं है। हिमालय में तेजी से बदल रही ग्लेशियल झीलों की तस्वीर भी भविष्य के बड़े खतरे का संकेत दे रही है।

नदियों के बाद अब ग्लेशियल झीलों की चिंता
नेपाल में 26 अगस्त की विनाशकारी आपदा के बाद ग्लेशियल झीलों को लेकर चर्चा और तेज हो गई है। विशेषज्ञों की चिंता है कि तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों के पिघलने से इन झीलों का आकार बढ़ रहा है और इनके फटने की स्थिति में अचानक आने वाली बाढ़ यानी Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) का खतरा पैदा हो सकता है। इसी बीच हिमाचल प्रदेश में IIT मंडी के शोधकर्ताओं ने करीब 2,000 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया है। रिसर्च में 9 से 12 झीलों को संभावित रूप से ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में रखा गया है। पिछले एक दशक में कई झीलों के क्षेत्रफल में 30 से 60 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
#WATCH | Mandi, Himachal Pradesh: Climate change emerging as a major annual challenge in Himachal. IIT Mandi research shows dozens of lakes and glaciers are on the verge of causing devastation. pic.twitter.com/1OmqXK513N
— ANI (@ANI) September 2, 2026
अध्ययन के मुताबिक, हिमालयी ग्लेशियरों के आसपास और उनके नीचे हो रहे बदलाव पहाड़ी भू-भाग को भी अस्थिर बना सकते हैं। इनमें पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी जमीन का पिघलना अहम है। इसके कमजोर होने से पहाड़ी ढलानों और पूरे भू-भाग की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, बढ़ता पर्यटन, प्रदूषण और ग्लेशियरों पर जमा धूल बर्फ पिघलने की रफ्तार को और बढ़ा सकते हैं। यानी जिस हिमालय से नदियां निकलकर मैदानों को जीवन देती हैं, वही हिमालय अब बदलती जलवायु के बीच नए और बड़े जोखिमों का संकेत भी दे रहा है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने भी चार ग्लेशियल झीलों को तत्काल निगरानी और कार्रवाई की जरूरत वाली झीलों के तौर पर चिन्हित किया है। इनमें घेपान झील, वासुक झील, काशांग और बासपा के पास स्थित एक झील शामिल है।
GLOF और हिमस्खलन से निपटने की तैयारियों की समीक्षा
इस बीच आज यानी 3 सितंबर को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता कर हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और हिमस्खलन के खतरे से निपटने की तैयारियों की समीक्षा की।
बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के अधिकारी शामिल हुए। इसके अलावा गृह मंत्रालय (MHA), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), केंद्रीय जल आयोग (CWC), भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और डिफेंस जियोइन्फॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (DGRE) के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
बैठक में हिमालयी क्षेत्र में GLOF के बढ़ते खतरे पर विस्तार से चर्चा हुई। खास तौर पर संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और बर्फ से ढके इलाकों की लगातार निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने, अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्रों और बाढ़ के संभावित प्रवाह मार्गों की पहचान, समय पर अलर्ट जारी करने और प्रभावित इलाकों को जल्द खाली कराने की तैयारियों की समीक्षा की गई।अधिकारियों ने आपदा की स्थिति में त्वरित और प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए मौजूदा तंत्र को और मजबूत करने पर भी जोर दिया।




