उज्बेकिस्तान से यूरेनियम डील क्यों खास है? भारत 3 बड़े मकसद पर कर रहा काम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा में सबसे ज्यादा चर्चा यूरेनियम डील की रही। दोनों देशों ने यूरेनियम की लंबे समय तक सप्लाई को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है।
उज्बेकिस्तान से यूरेनियम डील क्यों खास है? भारत 3 बड़े मकसद पर कर रहा काम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव© X/@narendramodi

140 करोड़ की आबादी वाले देश ने अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और न्यूक्लियर पावर क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान दोनों देशों ने लंबे समय तक यूरेनियम की सप्लाई की व्यवस्था को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। इसके साथ ही भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने रिश्तों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक ले जाने का फैसला किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा, “यूरेनियम की सप्लाई के लिए दोनों पक्ष लॉन्ग टर्म व्यवस्था बनाएंगे।” माना जा रहा है कि इससे भारत की न्यूक्लियर पावर योजनाओं के लिए लंबे समय तक फ्यूल की सप्लाई बनाए रखने में मदद मिलेगी। यह ऐलान पीएम मोदी और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव की मुलाकात के बाद हुआ।

लेकिन सवाल है कि भारत के लिए उज्बेकिस्तान का यूरेनियम इतना अहम क्यों है?

दरअसल, भारत ने 2047 तक अपनी न्यूक्लियर पावर क्षमता को 100 गीगावाट तक ले जाने का रोडमैप बनाया है। फिलहाल, देश की न्यूक्लियर पावर क्षमता करीब 8.78 गीगावाट है और सरकार के मुताबिक इसे 2031-32 तक करीब 22 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

ऐसे में सिर्फ नए न्यूक्लियर रिएक्टर बनाना ही काफी नहीं होगा। इन रिएक्टरों को चलाने के लिए लगातार न्यूक्लियर फ्यूल भी चाहिए और उस फ्यूल का सबसे अहम हिस्सा है-यूरेनियम।

पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
“भारत के पास अपना नेचुरल यूरेनियम बहुत कम है। 2047 तक भारत के परमाणु ऊर्जा प्रोग्राम को 100 गीगावाट तक ले जाने का लक्ष्य है। ऐसे में अगर आपके पास पर्याप्त यूरेनियम नहीं है, तो आपको कहीं-न-कहीं से इसकी सप्लाई करनी ही पड़ेगी। उज्बेकिस्तान एक बड़ा सप्लायर रहा है और, जहां तक मेरा ख्याल है, भारत पहले भी वहां से यूरेनियम ले चुका है। अगर लॉन्ग-टर्म अरेंजमेंट हो जाता है तो यह बहुत अच्छी बात होगी।”
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार

मार्च 2026 में लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक 2008-09 से 2024-25 के बीच भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी व्यवस्था के तहत आने वाले रिएक्टरों के लिए 18,842.60 मीट्रिक टन यूरेनियम आयात किया है।

सेंट्रल एशिया में भारत की बड़ी रणनीति

उज्बेकिस्तान के साथ यूरेनियम सहयोग को सिर्फ एक एनर्जी डील के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने रिश्तों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक बढ़ाया है। दोनों देशों के बीच खनन, जरूरी खनिज, कारोबार, रक्षा, टेक्नोलॉजी और दूसरे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर है।

यूरेनियम के मामले में भी भारत पहले से उज्बेकिस्तान के साथ जुड़ा हुआ है। 2019 में दोनों देशों के बीच 1,100 मीट्रिक टन यूरेनियम ओर कंसंट्रेट की सप्लाई का लंबे समय का करार हुआ था।

अब दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होने के साथ यूरेनियम सहयोग को आगे बढ़ाना दिखाता है कि भारत सेंट्रल एशिया को अपनी रिसोर्स और एनर्जी रणनीति में ज्यादा अहमियत दे रहा है।

क्या इसे सेंट्रल एशिया में भारत की व्यापक स्ट्रैटेजिक एंट्री का हिस्सा माना जा सकता है? इस पर बागला कहते हैं,

“बिल्कुल माना जा सकता है। भारत कहीं-न-कहीं इस क्षेत्र में अपनी एंट्री और मौजूदगी बढ़ाना चाह रहा था और यह एक अच्छा कदम है। यूरेनियम के क्षेत्र में अगर दोनों देश साझा रूप से काम कर सकते हैं तो यह उज्बेकिस्तान और भारत, दोनों के लिए बहुत अच्छी पहल होगी। उनके पास यूरेनियम है और हमें यूरेनियम की जरूरत है। अगर दोनों हाथ मिला लेते हैं, तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है।”

2008-09 से 2024-25 के बीच भारत ने 18,842.60 मीट्रिक टन यूरेनियम आयात किया। वहीं, आयातित ईंधन से चलने वाले रिएक्टरों ने 2024-25 में 39,180 मिलियन यूनिट, यानी करीब 39.18 अरब यूनिट बिजली पैदा की।

यूरेनियम जरूरत और विदेश से सप्लाई

भारत के पास घरेलू यूरेनियम संसाधन हैं और देश में यूरेनियम की माइनिंग भी होती है। लेकिन घरेलू उत्पादन और जरूरत के बीच अंतर रहा है। इसी वजह से भारत ने इंटरनेशनल सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन के बाद विदेशी सप्लायर्स से यूरेनियम लेना शुरू किया।

भारत ने न्यूक्लियर फ्यूल की सप्लाई को सुरक्षित रखने के लिए स्ट्रैटेजिक रिजर्व की जरूरत भी पहले ही तय कर ली थी ताकि IAEA की निगरानी व्यवस्था के तहत आने वाले न्यूक्लियर रिएक्टरों को फ्यूल की कमी का सामना न करना पड़े। 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत ने अलग-अलग समय पर रूस, कजाखस्तान, कनाडा, उज्बेकिस्तान और फ्रांस से न्यूक्लियर फ्यूल या यूरेनियम के लिए करार किए हैं।

  • 2026: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में एक अहम समझौता हुआ। इसके तहत ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम को भारत तक लंबे समय के लिए सप्लाई करने का रास्ता खुला।
  • 2019: भारत ने उज्बेकिस्तान के साथ 1,100 मीट्रिक टन यूरेनियम ओर कंसंट्रेट की सप्लाई के लिए करार किया था।
  • 2015: कजाखस्तान के साथ 5,000 मीट्रिक टन यूरेनियम ओर कंसंट्रेट का करार किया गया। इसमें अतिरिक्त मात्रा खरीदने का विकल्प भी था।
  • 2015: कनाडा की Cameco के साथ 3,000 मीट्रिक टन यूरेनियम ओर कंसंट्रेट की सप्लाई का करार हुआ।
  • 2009: रूस की TVEL के साथ 2,000 मीट्रिक टन नेचुरल यूरेनियम डाइऑक्साइड पेलेट्स का करार हुआ।इसके अलावा एनरिच्ड यूरेनियम डाइऑक्साइड पेलेट्स की अलग सप्लाई के लिए भी करार किए गए।
  • 2009: कजाखस्तान के साथ 2,100 मीट्रिक टन यूरेनियम ओर कंसंट्रेट का करार हुआ।
  • 2008: फ्रांस की कंपनी AREVA के साथ 300 मीट्रिक टन यूरेनियम ओर कंसंट्रेट का करार हुआ था।

रूस के साथ भारत के परमाणु सहयोग का जिक्र करते हुए बागला ने कहा,

पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
“उज्बेकिस्तान पुराने यूएसएसआर का हिस्सा रहा है। भारत और रूस के बीच न्यूक्लियर के क्षेत्र में बहुत बड़ा सहयोग रहा है। हमारा न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम और कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट इसका बड़ा उदाहरण है। कुडनकुलम के रिएक्टर-1 और 2 काम कर रहे हैं और रिएक्टर-3 और 4 भी रूस की मदद से बन रहे हैं। ये 1,000 मेगावाट के रिएक्टर हैं और इनके लिए रूस से यूरेनियम फ्यूल भी आता है।”
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार

ऑस्ट्रेलिया के बाद उज्बेकिस्तान

हां, ऑस्ट्रेलिया के बाद उज्बेकिस्तान के साथ डील को डायवर्सिफिकेशन के तौर पर भी देखा जा रहा है। 

किसी भी देश के लिए रणनीतिक तौर पर जरूरी ईंधन की सप्लाई में एक या दो सप्लायर पर बहुत ज्यादा निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। अगर किसी देश में राजनीतिक संकट हो, ट्रांसपोर्ट रूट में दिक्कत आए या ग्लोबल मार्केट में सप्लाई बाधित हो, तो इसका असर न्यूक्लियर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। 

इसलिए भारत की कोशिश है कि यूरेनियम के लिए अलग-अलग भरोसेमंद सप्लायरों के साथ लंबे समय की सप्लाई व्यवस्था हो।

बागला कहते हैं, “देखिए, इस वक्त जिस तरह ऑयल पर क्रंच आया था और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया को झटका लगा, उससे यह समझ आता है कि किसी एक सप्लाई पर पूरी तरह निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है।”

पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
“हम रूस और कनाडा से यूरेनियम लेते हैं। चीन से भी एक बार यूरेनियम लिया गया था। ऑस्ट्रेलिया के साथ भी करार हुआ है। अगर हम सेंट्रल एशिया के देशों से भी यूरेनियम ले सकें और अपनी सप्लाई को अलग-अलग स्रोतों में बांट सकें, तो हमारे पास भरोसेमंद स्रोतों की एक मजबूत सप्लाई लाइन बनी रहेगी। किसी समय एक जगह कमी पड़े, तो दूसरे विकल्प मौजूद हों।”
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार

उज्बेकिस्तान दुनिया के बड़े यूरेनियम प्रोड्यूसर देशों में शामिल है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक 2024 में उज्बेकिस्तान का यूरेनियम उत्पादन करीब 2,385 टन था। इसके मुकाबले भारत का उत्पादन करीब 500 टन रहा। वहीं, कजाखस्तान का उत्पादन करीब 23,270 टन था यानी सेंट्रल एशिया दुनिया की यूरेनियम सप्लाई चेन में बेहद अहम जगह रखता है।

उज्बेकिस्तान के साथ समझौते पर बागला ने कहा, “अगर हमारा लॉन्ग-टर्म अरेंजमेंट हो जाता है- अभी तो इस पर बातचीत शुरू हुई है और हमें अच्छे दाम पर यूरेनियम मिलता है, तो यह बहुत अच्छी बात होगी। यह एक बड़ी पहल है। भारत के पुराने यूएसएसआर और अब रूस तथा रूसी संघ के दूसरे देशों के साथ गहरे रिश्ते रहे हैं। इसलिए इसे भी उसी दिशा में एक अच्छे कदम के तौर पर देखा जा सकता है।”

100 GW न्यूक्लियर पावर का लक्ष्य

भारत का लक्ष्य सिर्फ ज्यादा न्यूक्लियर रिएक्टर लगाना नहीं है। इसके पीछे तीन बड़े मकसद हैं:

  1. बढ़ती बिजली की जरूरत पूरी करना
  2. कोयला, तेल और गैस जैसे ईंधनों पर निर्भरता कम करना और
  3. लंबे समय की एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत करना।

सरकार के रोडमैप के मुताबिक भारत की न्यूक्लियर पावर क्षमता 2047 तक 100 गीगावाट करने की योजना है। मौजूदा 8.78 गीगावाट की तुलना में यह करीब 11 गुना से ज्यादा का विस्तार होगा।

मार्च 2026 में सरकार ने लोकसभा में बताया था कि मौजूदा परियोजनाएं अलग-अलग चरणों में पूरी होने के साथ न्यूक्लियर क्षमता 2031-32 तक करीब 22 गीगावाट पहुंचने की उम्मीद है।

भारत 2070 तक 'नेट जीरो' का लक्ष्य भी रखता है। इस लिहाज से न्यूक्लियर पावर को ऐसे स्रोत के तौर पर देखा जा रहा है, जो बड़े पैमाने पर लगातार बिजली दे सकता है।

पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
“भारत का नेट जीरो लक्ष्य 2070 का है। इसमें 100 गीगावाट न्यूक्लियर पावर का लक्ष्य भी योगदान देगा, लेकिन भारत की कुल ऊर्जा जरूरत बहुत बड़ी है। हम जितनी ज्यादा न्यूक्लियर एनर्जी लगाएंगे, जो कि लो-कार्बन एनर्जी सोर्स है, उतना ही फायदा भारत और दुनिया दोनों को होगा।”
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार
पल्लव बागला, ऊर्जा मामलों के जानकार

उन्होंने कहा, “भारत के अपने प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर हैं और आने वाले समय में इन्हीं का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा। इससे भारत को एक लो-कार्बन एनर्जी सोर्स मिलेगा। भारत की एनर्जी की भूख बहुत बड़ी है। ऐसे में आने वाले समय में न्यूक्लियर एनर्जी पर भरोसा करना जरूरत की बात है।”

इसलिए उज्बेकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया के साथ यूरेनियम सप्लाई की व्यवस्था को 100 GW लक्ष्य के लिए जरूरी फ्यूल सिक्योरिटी की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत का न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम

भारत में 7 जगहों पर 24 न्यूक्लियर रिएक्टर काम कर रहे हैं। इनकी कुल क्षमता 8.78 गीगावाट है। इसके अलावा 10 नए रिएक्टर, जिनकी कुल क्षमता 8,000 मेगावाट है, अभी बनाए जा रहे हैं। 10 और रिएक्टरों के लिए शुरुआती तैयारियां भी चल रही हैं।

भारत के न्यूक्लियर पावर प्रोग्राम में अलग-अलग तरह के रिएक्टर इस्तेमाल होते हैं। इनमें प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR), बॉइलिंग वॉटर रिएक्टर (BWR) और लाइट वॉटर रिएक्टर (LWR) शामिल हैं। इनमें PHWR भारत के न्यूक्लियर पावर प्रोग्राम का प्रमुख हिस्सा हैं और इन्हें चलाने के लिए मुख्य तौर पर नेचुरल यूरेनियम फ्यूल का इस्तेमाल किया जाता है।

सोर्स: PIB

भारत की लंबे समय की न्यूक्लियर रणनीति सिर्फ यूरेनियम तक सीमित नहीं है। देश के पास थोरियम के बड़े संसाधन हैं, जो मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के समुद्री तटों की रेत में पाए जाते हैं। लेकिन प्राकृतिक रूप से मिलने वाला थोरियम सीधे न्यूक्लियर फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे न्यूट्रॉन की मदद से रिएक्टर के अंदर फिशाइल मटेरियल में बदलना पड़ता है।

इसी दिशा में भारत फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) पर काम कर रहा है। इन रिएक्टरों में प्लूटोनियम का इस्तेमाल किया जाता है और आगे चलकर थोरियम आधारित न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल की तरफ बढ़ने में मदद मिल सकती है।

इसके साथ ही सरकार स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMRs पर भी काम कर रही है। केंद्रीय बजट 2025-26 में इनके रिसर्च, डिजाइन, डेवलपमेंट और डिप्लॉयमेंट के लिए 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

SMRs आमतौर पर 300 मेगावाट तक बिजली पैदा कर सकते हैं। इनका डिजाइन ऐसा होता है कि इनके कई हिस्से फैक्ट्री में तैयार किए जा सकते हैं और फिर साइट पर असेंबल किए जाते हैं। इससे निर्माण का समय कम करने और एक जैसी क्वालिटी बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

सरकार का लक्ष्य 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी SMRs को ऑपरेशनल करने का है। यानी भारत एक तरफ मौजूदा न्यूक्लियर रिएक्टरों की क्षमता बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ भविष्य के लिए नए तरह के रिएक्टर और फ्यूल टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रहा है।

न्यूक्लियर पावर में यूरेनियम की भूमिका

आसान भाषा में समझें तो यूरेनियम न्यूक्लियर रिएक्टर का फ्यूल है। रिएक्टर में यूरेनियम के परमाणुओं को तोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया को न्यूक्लियर फिशन कहते हैं। इससे बहुत ज्यादा गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी से पानी भाप में बदलता है, भाप टरबाइन को घुमाती है और टरबाइन से बिजली बनती है।

यानी न्यूक्लियर पावर प्लांट के लिए यूरेनियम वही भूमिका निभाता है, जो किसी सामान्य गाड़ी के लिए पेट्रोल या डीजल निभाता है।

न्यूक्लियर पावर का एक बड़ा फायदा यह है कि मौसम पर सोलर या विंड पावर की तरह सीधे निर्भर नहीं करती। रिएक्टर लंबे समय तक लगातार बिजली पैदा कर सकते हैं। इसी वजह से भारत के लिए न्यूक्लियर पावर बढ़ाना सिर्फ बिजली उत्पादन का मामला नहीं, बल्कि एनर्जी सिक्योरिटी का भी सवाल है।

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