
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब-जब मिलते हैं, दोनों के बीच गहरी दोस्ती और एक अनोखी केमिस्ट्री देखने को मिलती है। ऐसे में एक सवाल है कि दोनों नेताओं में जैसा शानदार तालमेल दिखता है, क्या वैसा ही तालमेल दोनों देशों की ब्यूरोक्रेसी के बीच भी रहता है?
इस सवाल का जवाब दिया पूर्व राजदूत राजीव सीकरी ने RT India के स्पेशल शो India, Russia & The World में। आरटी इंडिया की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा से बातचीत में राजीव सीकरी ने अन्य बातों के अलावा, ये भी बताया कि सोवियत संघ के जमाने से लेकर रूस तक भारत से संबंधों में क्या-कैसा बदलाव आया है? और ये भी कि भारत-रूस की दोस्ती से पश्चिमी देश इतने परेशान क्यों रहते हैं।

सोवियत संघ से रूस तक… कितने बदले रिश्ते?
भारत और रूस के रिश्ते सोवियत संघ के जमाने से अब कितने बदल गए हैं?
इस सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय में सचिव रहे राजीव सीकरी ने कहा, "हां, मुझे लगता है कि वो अलग थे, क्योंकि उस वक्त भारत के प्रति सोवियत नजरिए में एक खास विचारधारा वाला पहलू भी था, जैसे कम्युनिज्म, सोशलिज्म वगैरह। इससे हमें अपनी इंडस्ट्री, भारी इंडस्ट्री और तेल व गैस सेक्टर जैसे क्षेत्रों में संस्थान बनाने में मदद मिली। लेकिन आज मुझे लगता है कि ये रिश्ता ज्यादा बराबरी का है, क्योंकि रूस अब वैसा नहीं रहा. जैसा सोवियत संघ था, और भारत ने भी काफी तरक्की कर ली है।"
भरोसा वही, भावुकता नहीं…
सीकरी ने कहा कि मुझे यह भी लगता है कि अब ज्यादा व्यावहारिकता है, कोई भावुकता नहीं है, और हम देखते हैं कि हम दोनों के लिए अच्छा क्या है। लेकिन एक चीज वैसी ही बनी हुई है, और वह है दोनों पक्षों का आपसी भरोसा। ये भरोसा कि दूसरा पक्ष ऐसा कुछ नहीं कर रहा है जिससे हमारे हितों को नुकसान पहुंचे। ये बहुत, बहुत जरूरी है।
पूर्व राजनयिक ने कहा कि मुझे लगता है कि भारत के कई नेता जिनमें पीएम मोदी भी शामिल हैं, के साथ राष्ट्रपति पुतिन के बहुत अच्छे रिश्ते हैं। इसे बनाए रखने के लिए बहुत कुछ किया गया है। लेकिन इतना काफी नहीं है। मुझे लगता है कि हमें दोनों देशों की नई पीढ़ी को और प्रभाव वाले नए क्षेत्रों को इसमें शामिल करने की जरूरत है, ताकि वो करीबी रिश्तों के फायदे समझ सकें।
भारत-रूस रिश्तों से पश्चिम परेशान क्यों?
राजीव सीकरी से पूछा गया कि भारत-रूस के रिश्तों से पश्चिमी देशों को परेशानी क्यों हैं? क्या ये हमेशा से ऐसा ही रहा है, या कुछ नया है जो अब हो रहा है?
इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, ये हमेशा से ऐसा नहीं था। मतलब, हमारे रिश्ते सामान्य थे, और हो सकता है कि पश्चिम को यह पसंद न हो, लेकिन उन्होंने कभी दखल नहीं दिया। जैसे-जैसे रूस और पश्चिम के रिश्ते बिगड़े हैं, वो इसका इस्तेमाल रूस, और भारत पर भी दबाव डालने के लिए कर रहे हैं।
पूर्व राजदूत ने कहा कि पश्चिम की मानें तो आप रूस से तेल नहीं खरीद सकते, आप चाबहार प्रोजेक्ट पर काम नहीं कर सकते, आप S-400 (एयर डिफेंस सिस्टम) नहीं खरीद सकते। सीकरी ने कहा कि उन्हें लगता है कि भारत ने इसका विरोध करके काफी अच्छा काम किया है।
भारत-रूस की ब्यूरोक्रेसी में कैसा तालमेल?
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच बहुत अच्छा तालमेल और सहज संबंध हैं, लेकिन क्या दोनों देशों की ब्यूरोक्रेसी में भी वैसा ही सहज तालमेल है?
इस सवाल के जवाब में राजीव सीकरी ने कहा कि मुझे इसके बारे में पक्का नहीं पता क्योंकि अब मैं ब्यूरोक्रेसी का हिस्सा नहीं हूं। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि सोवियत दौर में भी, दोनों तरफ की ब्यूरोक्रेसी एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह नहीं समझती थी। उन्होंने कहा कि जब आप असल में सोवियत संघ या रूस के साथ काम करना शुरू करते थे, तभी आपको एहसास होता था कि ये रिश्ता कितना अहम है। इसलिए हमेशा ऊपर से दिशा-निर्देश और दबाव की जरूरत होती है।
राजीव सीकरी ने बताया, कमी कहां है
उनका कहना था कि मुझे लगता है कि नेता कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कमी कहां है... ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है? आर्थिक संबंध उतने मजबूत नहीं हैं। मेरा मतलब है, अगर रूस के साथ 100 अरब डॉलर का व्यापार होता, तो हर कोई रूस को अधिक गंभीरता से लेता। लोगों के बीच आपसी संपर्क भी अधिक होता, पर ऐसा नहीं है। मतलब, अमेरिका या यूके वगैरह जाने वाले छात्रों की संख्या देखिए, और वहां की कंपनियों में काम करने वाले भारतीय मूल के लोगों को देखिए। (रूस के मामले में) लोगों के बीच आपसी संपर्क की यही कमी है, यही कमजोरी है।
क्या रिश्तों को चाहिए नया नजरिया?
..तो क्या आने वाले दशकों में इसके लिए किसी अलग नजरिए की जरूरत है?
इस सवाल पर पूर्व राजनयिक सीकरी का कहना था कि मैं दशकों की बात नहीं करूंगा, मुझे लगता है कि चीजें तेजी से बदल सकती हैं। उन्होंने कहा कि मेरा मतलब है कि पहले से ही कोशिशें हो रही हैं, जैसे भारत से सुदूर पूर्व वगैरह में मैनपावर भेजने के कुछ प्रस्ताव हैं। और मुझे लगता है कि रूस भी यह समझ गया है कि उसका भविष्य, कम से कम अगले कुछ वर्षों या शायद एक दशक या उससे अधिक समय के लिए, यूरोप के साथ नहीं है।
सीकरी ने कहा कि चीन है, जिसके साथ रिश्ते मजबूत हुए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि एक रूसी के तौर पर वे यह नहीं कहेंगे कि ‘हम चीन पर बहुत अधिक निर्भर नहीं रहना चाहते। निश्चित रूप से वो चीन के जूनियर पार्टनर के तौर पर नहीं दिखना चाहते। तो दूसरा बड़ा देश कौन सा है? वह भारत है।
(विदेश मंत्रालय में पूर्व सचिव राजीव सीकरी के RT India को दिए इंटरव्यू पर आधारित)
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