
“मैं पिछले दो साल से कोटा में हूं। 10वीं के बाद JEE (जॉइंट एंट्रेंस एग्जाम) की तैयारी के लिए यहां आया था। शुरुआती दो साल की कोचिंग की फीस करीब 1 लाख रुपये थी। दो साल की तैयारी के बाद जेईई में मेरा 97.4 पर्सेंटाइल आया। लेकिन इतने पर्सेंटाइल पर अच्छा कॉलेज मिलना मुश्किल है। इसलिए अब मैं एक साल और तैयारी करूंगा।”
आरटी हिंदी से ये कहना है माधव (बदला हुआ नाम) का, जो बिहार के गया जिले के रहने वाले हैं। मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाले माधव बताते हैं कि आगे की तैयारी के लिए उन्होंने अपना कोचिंग इंस्टिट्यूट बदल लिया है। अब वो दूसरे कोचिंग में जाएंगे, जहां एक साल की फीस डेढ़ लाख रुपये है। रहने और खाने का खर्च अलग है।
माधव जहां आईआईटी में प्रवेश पाना चाहते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के आगरा के रहने वाले राजीव (बदला हुआ नाम) का सपना यूपीएससी परीक्षा पास करना है। वह पिछले तीन वर्षों से दिल्ली में रहकर यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। आरटी हिंदी से बातचीत में वह बताते हैं,
माधव और राजीव जैसे देश के लाखों छात्र जेईई, नीट, यूपीएससी, एसएससी जैसी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। इन परीक्षाओं में पास होने के लिए कोचिंग का रास्ता चुनते हैं।
भारत में कोचिंग का जबर्दस्त क्रेज है। इसे सफलता की सीढ़ी माना जाता है। हर युवा इसके सहारे कामयाबी की मंजिल तक पहुंचना चाहता है। सोच ये बन चुकी है कि ये एग्जाम क्रैक करना है तो कोचिंग का सहारा लेना ही होगा। इसी सोच के दम पर कोचिंग इंडस्ट्री खूब फल-फूल रही है।
भारत का कोचिंग साम्राज्य कितना बड़ा?
भारत में कोचिंग एक फायदेमंद बिजनेस माना जाता है, और यह तेजी से बढ़ रहा है। क्रेडिट रेटिंग और आर्थिक-औद्योगिक शोध के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था CRISIL की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का कोचिंग उद्योग 58,000 करोड़ रुपये से अधिक का था और इसके 13 प्रतिशत से अधिक की एनुअल ग्रोथ रेट से बढ़ने का अनुमान लगाया गया था। इसी अनुमान के आधार पर 2030 तक इसका आकार लगभग 1.74 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

पुणे स्थित कंसल्टेंसी फर्म इनफिनियम ग्लोबल रिसर्च के अनुसार, 2022 में भारतीय कोचिंग उद्योग का आकार 64,244 करोड़ रुपये था। अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 1,79,527 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। इस दौरान उद्योग के 14.07 प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाई एजुकेशन, कॉम्पिटिटिव एग्जाम और प्रोफेशनल कोर्सेज की तैयारी करने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या इस बाजार के विस्तार की प्रमुख वजह है।

कोचिंग उद्योग के बढ़ते कारोबार का असर सरकारी राजस्व में भी दिखाई दे रहा है। 2024 में शिक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा को बताया कि कोचिंग संस्थानों से केंद्र सरकार की वस्तु एवं सेवा कर (GST) वसूली 2019-20 के 2,240.73 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 5,517.45 करोड़ रुपये हो गई। यानी चार साल में जीएसटी कलेक्शन लगभग 150 प्रतिशत बढ़ा है।
एडटेक का बढ़ता दायरा
शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती तकनीकी पहुंच के बीच एडटेक (Education Technology) देश के एजुकेशन सिस्टम का अहम हिस्सा बनकर उभरा है। इसमें सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और अन्य डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि छात्रों को अधिक इंटरैक्टिव, आकर्षक और व्यक्तिगत रूप से सीखने का अनुभव मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि एडटेक ने शिक्षा की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए सीखने के नए अवसर पैदा किए हैं।
आंकड़ों की बात करें तो सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च (CPPR) की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक एडटेक बाजार का आकार वर्ष 2022 में लगभग 7.94 लाख करोड़ रुपये था, जिसके 2029 तक बढ़कर करीब 23.58 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं भारत का एडटेक बाजार 2022 में लगभग 47,160 करोड़ रुपये का था, जो वैश्विक बाजार का करीब 6 प्रतिशत हिस्सा था। इसमें किंडरगार्टन से 12वीं कक्षा (K-12) तक के शिक्षा क्षेत्र का योगदान लगभग 21,220 करोड़ रुपये रहा।

रिपोर्ट के अनुसार, जहां वैश्विक एडटेक बाजार 16.4 प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ रहा है, वहीं भारतीय एडटेक बाजार की ग्रोथ रेट करीब 40 प्रतिशत आंकी गई है। निवेश के पैटर्न को देखें तो विदेशी निवेशकों के लिए भारत एडटेक क्षेत्र में निवेश का सबसे पसंदीदा सेक्टर में से एक बनकर उभरा है।
भारतीय एडटेक बाजार में प्रतिस्पर्धा भी तेजी से बढ़ी है। सिकंदर और अन्य शोधकर्ताओं (2021) के अनुसार, देश में 4,000 से अधिक एडटेक स्टार्टअप सक्रिय हैं। वैश्विक एडटेक यूनिकॉर्न कंपनियों में से लगभग 19 प्रतिशत भारत में स्थित हैं। जून 2022 तक इन भारतीय एडटेक यूनिकॉर्न कंपनियों का कुल वैल्यूएशन लगभग 2.68 लाख करोड़ रुपये था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैल्यूएशन भारतीय एडटेक उद्योग की विशाल संभावनाओं और निवेशकों के मजबूत भरोसे को दर्शाता है।
कोचिंग इंडस्ट्री के तेजी से बढ़ने की वजह
कोचिंग उद्योग एक समानांतर शिक्षा अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है, जिसका विस्तार मिडिल क्लास की आकांक्षाओं और भविष्य की चिंताओं से प्रेरित है। लाखों छात्र एक ऐसी रेस का हिस्सा हैं, जहां सीमित सीटों वाले मेडिकल, इंजीनियरिंग में दाखिले के साथ-साथ सिविल सेवा, रेलवे और अन्य सरकारी नौकरियों के लिए होड़ मची है।
नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के 80वें राउंड के तहत कॉम्प्रिहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे (CMS) ऑन एजुकेशन 2025 के मुताबिक, मौजूदा शैक्षणिक वर्ष के दौरान लगभग एक तिहाई छात्र (27.0 प्रतिशत) निजी कोचिंग ले रहे थे या ले चुके थे। यह ट्रेंड ग्रामीण क्षेत्रों (25.5 प्रतिशत) की तुलना में शहरी क्षेत्रों (30.7 प्रतिशत) में अधिक देखने को मिला। यह जानकारी देशभर के 52,085 परिवारों और 57,742 छात्रों से जुटाई गई थी।
इंजीनियरिंग से लेकर मेडिकल तक में एडमिशन के लिए भारी कॉम्पिटिशन देखने को मिल रहा है। JEE मेन परीक्षा की बात करें तो 2021 से 2026 के बीच आवेदनों की संख्या में लगभग 145 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2026 में सरकारी कॉलेजों की 67 हजार सीटों के लिए 16 लाख से ज्यादा छात्रों ने JEE का फॉर्म भरा था।
ऐसा ही हाल मेडिकल प्रवेश परीक्षा यानी NEET का भी है। सरकारी मेडिकल कॉलेज की 60 हजार सीटों के लिए इस साल 22 लाख से ज्यादा छात्रों ने आवेदन किया। पिछले 5 साल में मेडिकल एग्जाम के लिए एप्लाई करने वालों की संख्या में 42.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है।

एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान के एकेडमिक हेड कहते हैं, “हमारे यहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या ज्यादा है, लेकिन ऐसे अच्छे स्कूल और कॉलेजों की संख्या कम है, जहां से बच्चा सफल हो सके। ऐसी स्थिति में छात्र कोचिंग का रुख करते हैं।”
बिहार के नालंदा जिला के रहने वाले अमित (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि उनकी बेटी पिछले तीन साल से नीट की तैयारी कर रही है। अभी तक 7-8 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। वह बेटी को डॉक्टर ही क्यों बनाना चाहते हैं? इस सवाल पर वह एक लाइन में कहते हैं, “मेडिकल प्रोफेशन लड़कियों के लिए एक बेहतर विकल्प है।”
“ये अस्मिता का प्रश्न है”
एक तरफ जहां इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश के लिए होड़ मची है। दूसरी तरफ यूपीएससी की तैयारी करने वालों की भी बड़ी संख्या है। इस साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि कुल 1,016 पदों पर भर्तियां निकाली हैं। प्रारंभिक परीक्षा में करीब साढ़े 5 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे, जिनमें से 13,343 उम्मीदवारों ने मुख्य परीक्षा के लिए जगह बनाई है।
यूपीएससी का सक्सेस रेट बेहद कम है, लेकिन फिर भी इसकी तैयारी में युवा सालों-साल लगा देते हैं।
प्रकाश ने करीब दो साल तक यूपीएससी की कोचिंग की। पारिवारिक वजहों से उन्हें तैयारी बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। वह दोबारा से तैयारी में जुटे हैं। लेकिन अब उनका फोकस सेल्फ स्टडी पर है।
इसी तरह अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भारी प्रतिस्पर्धा की वजह से भी छात्र कोचिंग का सहारा ले रहे हैं। आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। SSC-CGL परीक्षा 2025 के 15,125 पदों के लिए 28 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। इस साल ये संख्या और बढ़ सकती है।
इस कॉम्पिटिशन का एक बड़ा कारण बेरोजगारी भी है। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के मुताबिक, ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर 11.2 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत (3.1) से तीन गुना से भी अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों के ग्रेजुएट्स की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक खराब है, जहां बेरोजगारी दर 11.8 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि शहरी ग्रेजुएट्स में यह 10.6 प्रतिशत है।
पोस्ट-ग्रेजुएट युवाओं में भी लगभग यही स्थिति देखने को मिलती है, जहां बेरोजगारी दर 10 प्रतिशत है। वहीं केवल माध्यमिक या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त लोगों में बेरोजगारी दर 6.5 प्रतिशत दर्ज की गई, जो डिग्रीधारकों की तुलना में कम है।




