
सोना... भारत में यह सिर्फ एक धातु नहीं बल्कि परंपरा, बचत और निवेश का भरोसा भी है। शादी-ब्याह हो या त्योहार, गोल्ड खरीदना आज भी कई परिवारों की प्राथमिकता है। सोने को खरीदने के लिए लोग बरसों तक पैसे जोड़ते हैं, तिजोरियों संभालकर रखते हैं। जिस सोने को निकालने के लिए खदानों में खुदाई करनी पड़ती है, अगर वही सोना लैब में बनने लगे तो? अब ये महज कल्पना नहीं, हकीकत बन चुका है। अमेरिका के एक स्टार्टअप ने प्रयोगशाला में सोना बनाने की तकनीक विकसित करने का दावा किया है।
इसके पीछे का विज्ञान क्या है, क्या सचमुच सोने की दुनिया बदलने वाली है? अगर बड़े पैमाने पर सोना लैब में बनने लगा तो क्या गोल्ड सस्ता हो जाएगा? भारत में सोने का बहुत बड़ा बाजार है, उस पर क्या असर पड़ सकता है? आइए, आसान भाषा में एक्सपर्ट की मदद से समझते हैं।
अमेरिकी स्टार्टअप का क्या दावा है?
सैन फ्रांसिस्को के फ्यूजन एनर्जी स्टार्टअप Marathon Fusion ने लैब में सोना तैयार करने का दावा किया है। कंपनी का कहना है कि उसने पारे यानी मर्करी (Mercury) को असली और स्थिर सोने में बदलने की तकनीक विकसित की है।
कंपनी ने इस उपलब्धि को दुनिया में पार्टिकल फिजिक्स की सबसे बड़ी लैब CERN के 2025 में दर्ज किए गए रिकॉर्ड से दस गुना बेहतर बताया है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि अभी सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है।

Lab में बना Gold आखिर है क्या?
प्रयोगशाला में सोना बनाने का मतलब किसी दूसरी धातु पर सोने की परत चढ़ाना या उसे सोने जैसा पीला रंग देना नहीं है। गोल्ड-प्लेटेड (Gold-plated) और आर्टिफिशियल ज्वेलरी (Artificial Jewellery) जैसे विकल्प पहले से मौजूद हैं, लेकिन वे असली सोना नहीं होते।
विज्ञान की नजर से देखें तो दुनिया की हर चीज छोटे-छोटे कणों (एटम्स यानी परमाणुओं) से मिलकर बनी है। हर धातु के एटम का एक सेंटर (न्यूक्लियस) होता है, जिसमें न्यूट्रॉन्स और प्रोटॉन्स होते हैं। किसी भी धातु की पहचान इस बात से होती है कि उसके अंदर ये कण कितनी संख्या में हैं।
Marathon Fusion का कहना है कि फ्यूजन (Fusion) प्रक्रिया से निकलने वाले न्यूट्रॉन्स (Neutrons) की मदद से मर्करी को सोने में बदला जा सकता है।

मर्करी से सोना आखिर बनता कैसे है?
विज्ञान की नजर से देखें तो दुनिया की हर चीज छोटे-छोटे कणों (एटम्स यानी परमाणुओं) से मिलकर बनी है। हर धातु के एटम का एक सेंटर (न्यूक्लियस) होता है, जिसमें न्यूट्रॉन्स और प्रोटॉन्स होते हैं। किसी भी धातु की पहचान इस बात से होती है कि उसके अंदर ये कण कितनी संख्या में हैं।
सोने के एटम के न्यूक्लियस में 79 प्रोटॉन्स होते हैं, जबकि मर्करी के न्यूक्लियस में 80 प्रोटॉन होते हैं। अमेरिकी स्टार्टअप ने मर्करी के परमाणु के न्यूक्लियस में बदलाव करके सोने के परमाणु तैयार करने की कोशिश की है।
फ्यूजन यानी एटम्स की टक्कर कराने की प्रक्रिया से जो न्यूट्रॉन्स निकलते हैं, जब उन्हें मर्करी के न्यूक्लियस पर डाला जाता है तो उसके अंदर के कणों की गिनती बदल जाती है। जब कणों की संख्या बदलकर बिल्कुल सोने जितनी हो जाती है, तो वह मर्करी असल में गोल्ड में बदल जाता है।
Last month, we demonstrated high-rate alchemy: turning mercury into real, stable gold, beating CERN’s record by a factor of 10. Last week, we enriched isotopes in the world’s most powerful plasma centrifuge, beating the Soviet record that stood for 40 years. Now, we’re building a fusion reactor in San Francisco to achieve record power density.
— Marathon Fusion (@MarathonFusion) October 21, 2026
CERN ने बनाया था सोना, क्या हुआ?
वैज्ञानिक प्रक्रिया से कणों की संख्या में बदलाव के बाद उनका स्थिर रहना जरूरी है, नहीं तो सब बेकार। अगर वास्तव में सोने के परमाणु बनते हैं और स्थिर रहते हैं, तो वह सोने जैसी दिखने वाली धातु नहीं, बल्कि वास्तविक सोना होगा। हालांकि, तैयार पदार्थ की शुद्धता और उसमें मौजूद परमाणुओं की प्रकृति की जांच जरूरी होगी। जिनेवा की सबसे बड़ी लैब में एक प्रयोग के दौरान भी सोना बना था।
स्विट्जरलैंड के जिनेवा में स्थित CERN यानी European Organization for Nuclear Research दुनिया की प्रमुख Particle Physics Laboratories में से एक है। इसकी Large Hadron Collider (LHC) मशीन में वैज्ञानिक एटॉमिक न्यूक्लियस को बेहद तेज गति से टकराकर पदार्थ की बुनियादी संरचना की स्टडी करते हैं।
CERN ने 2025 में बताया था कि LHC में 2015 से 2018 के बीच हुए प्रयोगों के दौरान करीब 29 पिकोग्राम सोने के न्यूक्लियस बने थे। एक पिकोग्राम, एक ग्राम का एक लाख करोड़वां हिस्सा होता है। यह मात्रा इतनी छोटी थी कि उसका व्यावसायिक इस्तेमाल संभव नहीं था। वैसे भी पदार्थों की टक्कर से बने सोने के न्यूक्लियस भी इस प्रक्रिया के दौरान नष्ट हो गए।
अमेरिकी स्टार्टअप मैराथन फ्यूजन का दावा इससे अलग है। कंपनी का कहना है कि फ्यूजन से निकले न्यूट्रॉन की मदद से मर्करी को स्थिर सोने में बदला जा सकता है। हालांकि, CERN के रिकॉर्ड से दस गुना बेहतर होने का दावा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कंपनी बड़ी मात्रा में सोना बना सकती है या उसे बाजार में बेच सकती है।
लैब में बना सोना बाजार में बिकेगा?
किसी तत्व को दूसरे तत्व में बदलना और ऐसा करके बाजार में बेचने लायक सोना तैयार करना दो अलग बातें हैं। इसके लिए उत्पादन की मात्रा, शुद्धता, सुरक्षा और लागत सभी पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
All India Bullion and Jewellers Association के अध्यक्ष योगेश सिंघल (Yogesh Singhal) ने RT हिंदी से बातचीत में इसी अंतर पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी तकनीक के जरिए सोना बनाने का दावा करना और उसे व्यावहारिक रूप से बड़े पैमाने पर तैयार करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
सिंघल के मुताबिक, इस तकनीक की व्यावहारिकता (Practical Feasibility) समझने के लिए उत्पादन का सेटअप, मशीनरी, लागत और स्वास्थ्य व सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को देखना होगा। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि इस तरह से तैयार सोना रेडियोएक्टिविटी (विकिरण) से मुक्त और इस्तेमाल के लिए सुरक्षित हो।
रेडियोएक्टिविटी का क्या पेच?
रेडियोएक्टिविटी वह प्रक्रिया है जिसमें किसी अस्थिर परमाणु का न्यूक्लियस टूटता है और खुद को स्थिर करने के लिए ऊर्जा छोड़ता है। इसे विकिरण (Radiation) कहा जाता है। कुछ रेडियोएक्टिव आइसोटोप (Radioactive Isotopes) समय के साथ बदलते हुए रेडिएशन छोड़ सकते हैं।
Marathon Fusion की सोना बनाने की तकनीक में ऐसे परमाणुओं को सुरक्षित इस्तेमाल के योग्य बनाने की चुनौती का भी जिक्र है। रिपोर्टों में इसके लिए करीब 18 साल तक अलग रखने की संभावना बताई गई है।
इसलिए सोना बना लेना और उसे सुरक्षित रूप से बाजार में बेच पाना एक ही बात नहीं है। शुद्धता और सुरक्षा की जांच के बिना ऐसे सोने को सामान्य ज्वेलरी के लिए तैयार उत्पाद नहीं माना जा सकता।

क्या लैब में बना सोना सस्ता होगा?
फिलहाल इसका कोई भरोसेमंद जवाब नहीं है। सोने की कीमत सिर्फ कच्चे माल पर निर्भर नहीं करती। मशीनों, तकनीक, उत्पादन की मात्रा, शुद्धता और सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी अहम है। खदानों से सोना निकालने के लिए भारी निवेश और संसाधनों की जरूरत होती है, लेकिन फ्यूजन रिएक्टर बनाना और उसे चलाना भी बेहद जटिल काम है।
योगेश सिंघल ने इस तकनीक के आर्थिक पहलू पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर लैब में सोना बनाने की लागत प्राकृतिक सोने के बराबर या उससे ज्यादा पड़ती है, तो ग्राहक इसे क्यों खरीदेगा और निर्माता इसे बेचकर मुनाफा कैसे कमाएगा?
यानी विज्ञान की मदद से सोना बना पाना ही काफी नहीं है, यह भी देखना होगा कि उत्पादन की कुल लागत कितनी है और क्या तैयार सोना प्राकृतिक सोने के मुकाबले कोई आर्थिक रूप से फायदेमंद है। फिलहाल Marathon Fusion के दावे से यह साबित नहीं होता कि लैब में बना सोना बाजार में प्राकृतिक सोने से सस्ता उपलब्ध होगा।
लैब में डायमंड भी बना, उसका क्या हुआ?
लैब में बने सोने के भविष्य को समझने के लिए लैब-ग्रोन डायमंड (Lab-grown Diamond) का उदाहरण दिया जाता है। लैब में बने और खदान से निकले प्राकृतिक हीरे, दोनों कार्बन (Carbon) से बने होते हैं। उनके गुण और दिखावट काफी हद तक एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन विशेष उपकरणों से उनकी असलियत का पता लगाया जा सकता है।
लैब में हीरे बनने की तकनीक विकसित होने के बाद निश्चित रूप से हीरों का उत्पादन बढ़ा है और बाजार में उपलब्धता बढ़ी है। समय के साथ लैब में बने हीरों की कीमतें भी काफी कम हो गई हैं। डायमंड उद्योग के विश्लेषक पॉल जिमनिस्की के मुताबिक, लैब-ग्रोन हीरों की थोक कीमतें 2015 के स्तर से करीब 90 से 95 फीसदी तक गिर चुकी हैं।
दुनिया की प्रमुख डायमंड कंपनियों में शामिल De Beers ने 2018 में लैब-ग्रोन डायमंड ब्रांड Lightbox शुरू किया था। बाद में कंपनी ने इसे बंद करने का फैसला किया और प्राकृतिक हीरों पर फोकस करने की बात कही।

असली हीरे की जगह नहीं ले पाए लैब-ग्रोन डायमंड
योगेश सिंघल कहते हैं कि लैब में तैयार डायमंड का अपना बाजार और इस्तेमाल है, लेकिन इन्हें प्राकृतिक हीरों के बराबर नहीं देखा जाता। उन्होंने कहा कि जैसे विशेष उपकरणों की मदद से लैब में बने और प्राकृतिक हीरों में अंतर देखा जा सकता है, वैसे ही भविष्य में लैब में बने सोने और असली सोने को पहचानने की तकनीक भी विकसित होगी।
सोने और हीरे के उत्पादन की तकनीक में हालांकि बुनियादी अंतर है। हीरे मूल रूप से कार्बन का ही एक रूप होते हैं। उन्हें लैब में तैयार किया जा सकता है, जबकि सोने के लिए परमाणु के न्यूक्लियस में बदलाव करना थोड़ा मुश्किल काम है। इसलिए लैब-ग्रोन डायमंड की कीमतों में गिरावट को सोने के भविष्य का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता।
भारत के गोल्ड मार्केट पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत में सोने का रिश्ता सिर्फ गहनों से नहीं, बल्कि परिवार की बचत और आर्थिक सुरक्षा से भी है। शादी-ब्याह और त्योहारों पर इसकी खरीद परंपरा का हिस्सा है। कई लोग इसे लंबे समय के निवेश के तौर पर भी देखते हैं।
सिंघल के मुताबिक, अगर मकसद केवल सोने जैसी दिखने वाली चीज को खरीदना है, तो बाजार में पहले से गोल्ड-प्लेटेड और आर्टिफिशियल ज्वेलरी जैसे विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में लैब में बने सोने की मांग इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कीमत, गुणवत्ता और भरोसे के मामले में ग्राहकों को क्या अतिरिक्त फायदा देता है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर मर्करी से सोना बनाना आसान और किफायती हो जाता है, तो दूसरी धातुओं के इस्तेमाल और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए यह देखना जरूरी होगा कि इस प्रक्रिया से सोना बनाना दूसरे औद्योगिक उपयोगों के मुकाबले कितना फायदेमंद है।
लैब में बना सोना कितना फायदेमंद?
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि देश अपनी सोने की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। World Gold Council की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2025 के दौरान सोने की मांग करीब 710.9 टन रही। ऊंची कीमतों के बावजूद सोने पर खर्च की कुल रकम बढ़कर करीब 7.51 लाख करोड़ रुपये हो गई। यानी कम मात्रा में सोना खरीदने के बावजूद भारतीयों ने उस पर ज्यादा पैसा खर्च किया।
अगर भविष्य में किसी नई तकनीक से बड़ी मात्रा में सोना उपलब्ध होने लगे, तो उसका असर वैश्विक सप्लाई और भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है। हालांकि, अभी व्यावसायिक स्तर पर ऐसे उत्पादन की पुष्टि नहीं हुई है, जिसके आधार पर इस असर का भरोसेमंद अनुमान लगाया जा सके।

भारतीयों के पास कितना सोना है?
World Gold Council की जुलाई 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय परिवारों और धार्मिक संस्थानों के पास अनुमानित 23,000 से 25,000 टन सोना माना जाता है। यह आधिकारिक तौर पर गिना गया भंडार नहीं, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर निकाला गया अनुमान है।
इतने बड़े घरेलू भंडार के बावजूद भारत हर साल बड़ी मात्रा में सोने का आयात करता है। इसकी वजह यह है कि परिवारों के पास मौजूद गहनों और सोने का बड़ा हिस्सा विरासत, शादी या निजी बचत के रूप में रखा जाता है और नियमित रूप से बाजार में वापस नहीं आता।
ऐसे में अगर लैब में सोना बनाने की तकनीक व्यावसायिक रूप से सफल होती है, तो उसका महत्व केवल ज्वेलरी बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। इसका संबंध भारत के आयात बिल, व्यापार घाटे और सोने को निवेश के तौर पर देखने के नजरिये से भी हो सकता है।

तो क्या सोना सस्ता होने वाला है?
फिलहाल इस सवाल का जवाब है- अभी कहना जल्दबाजी होगी।
Marathon Fusion का दावा विज्ञान की एक पुरानी संभावना को फिर चर्चा में लाता है। लेकिन उत्पादन की मात्रा, प्रति ग्राम लागत, सुरक्षा और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की व्यावहारिकता जैसे सवालों के जवाब अभी जरूरी हैं।
सोने की कीमतें केवल उसकी उपलब्धता से तय नहीं होतीं। वैश्विक अनिश्चितता, केंद्रीय बैंकों की खरीद, निवेशकों की मांग, ब्याज दरें और डॉलर की चाल भी अहम भूमिका निभाते हैं।
असली सवाल यह नहीं है कि विज्ञान सोना बना सकता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या विज्ञान इतना सोना बना सकता है कि बाजार की तस्वीर बदल जाए?
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