आज के उथल - पुथल भरे माहौल में भारत और चीन कहां खड़े हैं?
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पूर्व एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का हिस्सा रहे सुरजीत एस भल्ला ने भारत-चीन संबंधों, अर्थव्यवस्था जैसे तमाम मुद्दों पर RT इंडिया से खास बातचीत की।
भारत

दुनिया इस वक्त भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। कई देशों में ऊर्जा और आर्थिक संकट छाया हुआ है। इस सबके बावजूद कई वजहों से दुनिया भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। RT इंडिया के शो ‘In conversation with Salman Khurshid’ में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पूर्व निदेशक और अर्थशास्त्री सुरजीत एस. भल्ला ने भारत और चीन को लेकर महत्वपूर्ण बात कही। वैश्विक अर्थव्यवस्था का हाल समझाते हुए उन्होंने यह भी कहा कि चीन का फोकस भारत पर है। पढ़िए सुरजीत भल्ला के साथ भारत के पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की बातचीत के प्रमुख अंश। 

नेताओं से सच कहना सलाहकार का काम

सवाल: जब आप 2017 के आसपास प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का हिस्सा थे, तब राजनीतिक संदर्भ में सबसे मुश्किल सलाह कौन सी थी जो लगता है कि आपको देनी पड़ी?...जिसके बारे में कोई भी सत्ताधारी राजनीतिक दल चिंतित रहता है?

सुरजीत भल्लाः सलाहकार की भूमिका में नेताओं से सच कहना होता है। जहां गलतियां होती हैं, फॉल्ट लाइन्स हैं, उन्हें बिल्कुल स्पष्ट और साफ-साफ बताना है। फिर फैसला उनका है। लेकिन मुझे लगता है कि न तो पहले ऐसा कभी होता था और न अब ही होता है कि सलाहकार बिना किसी सवाल के सलाह देते हैं। यानी ये सोचकर सलाह देते हैं कि लीडर क्या सुनना चाहते हैं- जो मेरी समझ से पूरी तरह गलत है। आपको अपनी राय देनी चाहिए। आप विशेषज्ञ हैं, सलाहकार हैं। इस हिसाब से प्रधानमंत्री या किसी और से आपके पास डोमेन नॉलेज ज्यादा है इसलिए आपको वैसा ही करना चाहिए। मगर हम नहीं करते और इसका एक हिस्सा शायद हमारे डीएनए में है कि हम चुनौती नहीं देना चाहते।

सवाल: आपके काम का एक रोचक हिस्सा वैश्विक गरीबी और असमानता के अनुमानों को चुनौती देता है। क्या आपको लगता है कि इसमें समस्या है? क्या भारत को वैश्विक संस्थानों तक यह बात पहुंचाने में समस्या या कोई खास चुनौती है?

सुरजीत भल्लाः मुझे नहीं लगता कि हम में समस्या है। समस्या संस्थानों में है। मुझे मालूम है कि विश्व बैंक को 1990 के दशक के अंत में खास समस्या थी। मैंने अपनी पहली किताब “इमैजिन देयर्स नो कंट्री” में इस बारे में लिखा भी था। मैंने उसमें गरीबों पर विश्व बैंक और दूसरे के आंकड़ों के सुबूतों को दिखाया। विश्व बैंक अपने स्वार्थ में काम कर रहा था। हमें यह स्वीकारना होगा कि संस्थान हमसे अलग नहीं हैं। वे आपके या मेरे जैसे लोगों से ही बने हैं। वे चुनौती नहीं लेना चाहते, इसलिए विश्व बैंक में रिसर्चर्स और पॉलिसी मेकर्स के बीच खुला संवाद था। वे महसूस करते थे कि उनको पैसा लाना है, ताकि संस्थान को बड़ा बनाया जा सके। मैंने वहां 8-10 साल तक काम किया था। मैंने विश्व बैंक के गरीबी अनुमानों को चुनौती दी, उन्होंने इसे अपनी सत्ता के लिए खतरा माना मगर समस्या यही है… शायद इसीलिए मैं मुश्किल में रहता हूं। डेटा देख लीजिए, मेरा पूरा ध्यान डेटा खोजने में ही लगा रहता है। 

भारत पर चीन का फोकस क्यों?

सवालः आज दुनिया में उथल-पुथल के बीच जो भारत पर फोकस है, उसकी वजह क्या है? क्या ये ऑर्गेनिक है, क्या हम कुछ खास और सही कर रहे हैं, जिसकी वजह से यह फोकस हो रहा है?

सुरजीत भल्लाः बहुत अच्छा और गंभीर सवाल, लेकिन मैं एक बात कहूं तो भारत पर चीन का फोकस है। चीन वह देश है, जिसने बाकी दुनिया से बहुत ज्यादा फायदा उठाया है। उसके पास वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में अमेरिका से दोगुना हिस्सा है, जितना यूएस के पास द्वितीय विश्वयुद्ध के समय था। अब बाकी दुनिया आर्थिक नीतियों में इस ड्रैगन का मुकाबला कैसे करे? दुनियाभर में ज्यादातर देशों का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस है। वहीं, चीन के साथ बहुत बड़ा व्यापार घाटा है। 

सवाल: जो हमारे लिए भी सच है?

सुरजीत भल्लाः हां, हमारे लिए भी सच है। अमेरिका समेत कोई भी देश चीन का मुकाबला नहीं कर सकते। अब सीधे आपके सवाल पर आता हूं कि भारत दुनिया के लिए बहुत महत्वूपर्ण है?... सिर्फ भारत के लिए नहीं, अमेरिका, यूरोपीय संघ और पश्चिमी लोकतांत्रिक सहयोगियों के लिए भी जरूरी है। हम वो देश हैं जो दुनिया को टेक्नोलॉजी, श्रमिक, उत्पादन और लोग दे सकते हैं।

दुनियाभर में फर्टिलिटी दर में भारी गिरावट आई है। भारत में यह 2 से नीचे है जबकि रिप्लेसमेंट रेट 2.1-2.2 है। यह बड़ी कहानी है, क्योंकि हम चीन से थोड़ा बाद में फर्टिलिटी डेक्लाइन की तरफ बढ़े हैं। इसकी वजह चीन की वन चाइल्ड पॉलिसी थी इसलिए हम दुनिया को मानव पूंजी देंगे, श्रम देंगे। नीति निर्माता भी ‘चीन प्लस वन’ की बात कर रहे हैं। भारत यहीं फिट बैठता है।

भारत के लिए अपने श्रम और लोकतंत्र का लाभ उठाने का यही सही समय है। ऐसा नहीं है कि वे इसे जानते नहीं, यही वह स्थान है, जहां भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के लिए यह अपने तुलनात्मक लाभ का पूरा फायदा उठाने का आदर्श समय है। यह लाभ केवल श्रमशक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके खुलेपन और लोकतंत्र में समाया है। 

'चीन के मुकाबले भारत पर भरोसा ज्यादा'

सवालः क्या रूसी तेल को लेकर कोई अंतिम सीमा तय की गई है, क्या कोई स्पष्ट रुख है?

सुरजीत भल्लाः अमेरिका चाहता था कि हम रूसी तेल खरीदें। विशेष रूप से बाइडेन प्रशासन ऐसा चाहता था, क्योंकि इससे वैश्विक तेल की कीमतों को कम रखने में मदद मिलती। 

सवालः ठीक, तो यह सिस्टम को बड़ा झटका देने के बजाय उनका एक तरीका था। उन्होंने कहा ठीक है, आप रूसी तेल खरीद शुरू करो, जो हमने किया। अब निवेश के लिए क्या सीख है? हमने निवेश के लिए कुछ बुरे साल देखे हैं, लोग भारत को छोड़कर दुबई और एशियन रीजन में जा रहे हैं। यह ट्रेंड रिवर्स होगा? क्या यह रुकेगा और निवेश का माहौल सुधरेगा?

सुरजीत भल्लाः जी हां, मुझे लगता है कि यह असल मुद्दा है। आप कह रहे कि भारत में निजी इन्वेस्टमेंट गिर गया है मगर पब्लिक इन्वेस्टमेंट है और बढ़ा भी है, लेकिन निजी इन्वेस्टमेंट भारत में अपने पीक वर्षों में 25 फीसदी से करीब 10 प्रतिशत पाइंट गिर गया। इन सबके बावजूद अगर चीन को छोड़ दें, तो भारत दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है।

भारत ने दुनिया के लगभग किसी भी देश से बेहतर प्रदर्शन किया है। बात चाहे रहन-सहन का स्तर बढ़ाने की हो, गरीबी घटाने की हो, शिशु मृत्यु दर कम करने की हो या फिर शिक्षा की हो… हर क्षेत्र में भारत ने अच्छा किया है। एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते यूरोप से लेकर पश्चिम तक और खाड़ी से लेकर अरब देशों तक का भारत पर भरोसा चीन के मुकाबले ज्यादा है इसलिए भारत की चीन पर बढ़त है। अब हमें अगले 25 साल तक लगातार प्रति व्यक्ति ग्रोथ को 8 से 8.5 फीसदी तक ले जाना होगा। 

(यह इंटरव्यू 22 अप्रैल 2026 को प्रसारित किया गया था।)

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