
अमोनिया… टॉयलेट क्लीनर जैसी तीखी, नाक में चुभने वाली गंध… अक्सर खबरें आती हैं कि अमोनिया गैस लीक होने से इतने लोगों की जान चली गई, उतने लोगों का दम घुट गया। 21 जून को चेन्नई के कनिगईपायर गांव में अमोनिया लीक हुई। 7 महिलाओं की जान चली गई। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जान लेने वाली, सामान्य सी लगने वाली ये गैस, इसका लिक्विड और ठोस रूप असल में इंसानी सभ्यता की रीढ़ है। अगर 20वीं सदी की शुरुआत में अमोनिया बनाने का तरीका न खोजा गया होता, तो शायद आज दुनिया की आधी आबादी भूखी मर रही होती! अमोनिया से खेतों को जीवन मिलता है, खाने-पीने की चीजें महीनों तक ताजा रहती हैं, और तो और, इसके बिना अंतरिक्ष की गहराइयों में इंसानी वजूद की कल्पना नहीं की जा सकती। ये कहानी है, वैश्विक तरक्की के अपरिहार्य इंजन बन चुके इसे डरावने और सुहाने केमिकल की।
अमोनिया नाम कैसे पड़ा?
पहला सवाल- अमोनिया को अमोनिया नाम मिला कैसे? कहते हैं, इसका संबंध प्राचीन मिस्र के देवता अमुन (Amun या Ammon) से है। प्राचीन काल में लीबियाई रेगिस्तान के सिवा ओसिस (Siwa Oasis) के पास जुपिटर अमोन (या आमुन) का मंदिर था। मंदिर के पास मिट्टी में एक तरह का केमिकल पाया जाता था। जिसे बाद में सल अमोनियाक (Sal Ammoniac या Ammonium Chloride) नाम मिला। ये मंदिर उस समय व्यापारिक रास्तों का बड़ा केंद्र था। काफी लोग वहां आते थे। वीरान रेगिस्तान में सूखी लकड़ियां नहीं मिलती थीं, तो लोग ठंड भगाने और खाना पकाने के लिए जानवर खासकर ऊंट के गोबर और मिट्टी को मिलाकर बने उपले जलाते थे। इससे तीखी गंध निकलती थी, जिससे कीड़े-मकोड़े भी भाग जाते थे। बाद में, रोमन इतिहासकार प्लिनी ने इसे हैमोनिएकम (Hammoniacum) नाम दिया। 18वीं शताब्दी में स्वीडिश केमिस्ट टोरबर्न बर्गमैन ने अमोन मंदिर से जोड़कर इस गैस को अमोनिया नाम दिया।
अमोनिया गैस है क्या?
अमोनिया (NH₃) एक जहरीली गैस है। यह नाइट्रोजन के एक और हाइड्रोजन के तीन परमाणुओं (न्यूक्लियर) को मिलाकर बनती है।
इसकी गंध बहुत तेज होती है। इसका कोई रंग नहीं होता है। जैसे ही यह हवा में लीक होती है, इसकी गंध से तुरंत पता चल जाता है।
यह पानी में घुलनशील और हवा से भी हल्की होती है। यह प्राकृतिक रूप से पर्यावरण में मिलती है।
यह इकोसिस्टम में नाइट्रोजन साइकल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अमोनिया बहुत तेजी से गर्मी सोखती है।
ऐसे में भारी मात्रा में बर्फ जमाने या तापमान को माइनस डिग्री में ले जाने के लिए इसे सबसे बेहतर गैस माना जाता है।
बड़ी आबादी का पेट भरती है अमोनिया
दुनिया में तैयार होने वाले लगभग 80% अमोनिया का उपयोग रासायनिक उर्वरक जैसे कि यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट आदि बनाने में होता है। सन 1774 में वैज्ञानिक जोसेफ प्रिस्टले ने अमोनियम क्लोराइड को चूने के साथ गर्म करके इस गैस को अलग किया। 1785 में क्लॉड लुई बर्थोलेट ने इसके रासायनिक घटक (N और H) की पुष्टि की। 1908-09 में जर्मन केमिस्ट फ्रिट्ज हैबर ने Haber-Bosch प्रोसेस डेवलप किया, जिसमें नाइट्रोजन (हवा से) और हाइड्रोजन को हाई प्रेशर टेंपरेचर पर मिलाया जाता है। कार्ल बोश ने इसे इंडस्ट्रियल लेवल पर लागू करना शुरू किया। कहने का मतलब ये कि अगर 20वीं सदी की शुरुआत में अमोनिया बनाने की कृत्रिम विधि (हैबर-बॉश प्रक्रिया) न खोजी गई होती, तो आज दुनिया में इतना अनाज नहीं होता।

कहां-कहां होता है इस्तेमाल?
फर्टिलाइजर : अमोनिया का खाद बनाने में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इसकी नाइट्रोजन सामग्री पौधों के विकास में मददगार होती है। नाइट्रोजन पौधों का प्रमुख पोषक तत्व है, जो प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) और ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कृषि में इसे दो तरीके से यूज किया जाता है। एक सीधे मिट्टी में डालकर, और दूसरा- अमोनियम नाइट्रेट और यूरिया के रूप में। इसमें अमोनिया के अन्य रूप शामिल है, जिनमें अमोनिया अन्य तत्वों के साथ केमिकली मिलकर धीरे-धीरे नाइट्रोजन रिलीज करता है।
रेफ्रिजरेशन : अमोनिया गैस माइनस 33.3 डिग्री सेल्सियस पर ठंडी होकर लिक्विड बन जाती है, और इससे अधिक तापमान मिलते ही उबलकर वापस गैस बनने लगती है। इतने कम बॉइलिंग प्वाइंट के कारण यह एक बेहतरीन कूलिंग एजेंट का काम करती है। अमोनिया रेफ्रिजरेशन सिस्टम का खासतौर से फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और कोल्ड स्टोरेज आदि में इस्तेमाल होता है, जहां बड़े पैमाने पर चीजों को ठंडा रखने की जरूरत होती है। हालांकि अमोनिया एक जहर की तरह है, इसलिए इसे सावधानी से प्रयोग करना होता है।
अंतरिक्ष में कूलिंग : धरती पर ही नहीं, अमोनिया का स्पेस में भी प्रयोग होता है। अमोनिया ही अंतरिक्ष में तैरते इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) को ठंडा रखती है। दरअसल अंतरिक्ष में मौसम बेहद अजीब होता है। सूरज की रोशनी में तापमान 121 डिग्री तक गर्म हो जाता है, तो अंधेरे में माइनस 157 डिग्री तक ठंडा हो जाता है। ऐसे में उपकरणों को बचाए रखने के लिए थर्मल कूलिंग सिस्टम में अमोनिया का इस्तेमाल होता है।
क्लीनिंग प्रोडक्ट : साफ-सफाई में भी अमोनिया का यूज होता है। ये कई घरेलू सफाई उत्पादों विशेष रूप से कांच और सतहों की सफाई करने वाले उत्पादों में मौजूद होता है। यह चिकनाई और गंदगी को अच्छी तरह से हटाता है। इससे सतहें साफ और चमकदार हो जाती हैं। हालांकि इसका उपयोग सावधानी से करना होता है, क्योंकि ब्लीच जैसे अन्य केमिकल के साथ मिलाने पर यह जहरीली गैस बन जाती है।
वॉटर ट्रीटमेंट : पानी को साफ करने में भी अमोनिया काम आती है। इसका उपयोग बायो ट्रीटमेंट प्रोसस में सूक्ष्मजीवों के लिए नाइट्रोजन के सोर्स के रूप में किया जाता है। यह दूषित पदार्थों को हटाने और पानी में केमिकल को स्थिर करने में सहायक होता है। अमोनिया क्लोरीन के साथ मिलकर क्लोरैमाइन भी बना सकता है, जिसका उपयोग पीने की पानी में कीटाणुओं को मारने में किया जाता है।
मैन्युफैक्चरिंगः अमोनिया का मेटल प्रोसेसिंग और मैनुफैक्चरिंग में भी प्रयोग किया जाता है। यह नाइट्राइडिंग वातावरण बनाने में सहायक होती है। धातुओं की सतह की कठोरता बढ़ाती है। इसके अलावा प्लास्टिक, विस्फोटक, कपड़े, कीटनाशक और रंगों के निर्माण में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
अमोनिया गैस कहां पाई जाती है?
प्रकृति में अमोनिया मुख्य रूप से नाइट्रोजन साइकल का अहम हिस्सा है। यह मिट्टी, हवा के साथ ही पानी में मिलती है। जब पौधे और जानवर मर जाते हैं या जब जीव मल-मूत्र त्याग करते हैं तो मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया उन्हें सड़ाते हैं। इस प्रक्रिया (Decomposition) से भारी मात्रा में अमोनिया गैस पैदा होती है, जो मिट्टी को उपजाऊ बनाती है।
ज्वालामुखी फटने से जो गैसें निकलती हैं, उनमें भी अमोनिया होती है। इसके अलावा जंगलों की आग और गोबर/खाद के निकलने वाली भाप से भी यह गैस हवा में पहुंचती है। तालाबों, नदियों और समुद्रों के पानी में जलीय जीवों के कचरे के कारण अमोनिया कम मात्रा में प्राकृतिक रूप से घुली होती है।
सुनकर भले हैरानी हो लेकिन हमारा शरीर रोजाना प्रोटीन को पचाने के दौरान अमोनिया बनाता है। जब हमारा शरीर भोजन में मौजूद ‘प्रोटीन’ को तोड़ता (Metabolism) है, तो लिवर और आंतों में अमोनिया का निर्माण होता है। चूंकि यह शरीर के लिए जहरीली है, इसलिए हमारा लिवर इसे तुरंत ‘यूरिया’ में बदल देता है। इसके बाद ये किडनी के रास्ते यूरिन (मूत्र) बनकर निकल जाती है। सार्वजनिक शौचालयों में जो तीखी गंध आती है, वो इसी यूरिया के फिर से अमोनिया में बदलने से आती होती है। हमारे पसीने और सांसों में भी अमोनिया के अंश पाए जाते हैं।
चूंकि अमोनिया के बिना आधुनिक खेती और कई उद्योग असंभव हैं, इसलिए फैक्ट्रियों में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। बड़ी-बड़ी सी-फूड फर्मों, मीट प्रोसेसिंग यूनिट्स और बर्फ के कारखानों के कूलिंग प्लांट्स (Refrigeration Systems) में लिक्विड अमोनिया भारी मात्रा में प्रयोग होता है। दवाइयां, नायलॉन जैसे सिंथेटिक कपड़े बनाने और कुछ खास तरह के प्लास्टिक व रंगों को बनाने में भी ये काम आती है।
पृथ्वी से दूर, ब्रह्मांड में भी अमोनिया प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। हमारे सौरमंडल के विशाल गैसीय ग्रहों जैसे कि बृहस्पति (Jupiter) और शनि (Saturn) के वायुमंडल में अमोनिया के घने बादल होने के संकेत मिले हैं। इसके अलावा अंतरिक्ष में तैरने वाले कई धूमकेतुओं की बर्फ में भी जमी हुई अमोनिया पाई गई है।

अमोनिया के नुकसान भी हैं
अमोनिया गैस हवा से हल्की होती है। ऐसे में लीक होने की स्थिति में यह ऊपर की तरफ उठती है। हालांकि पानी के संपर्क में आते ही यह तेजी से घुलकर अमोनियम हाइड्रॉक्साइड (एसिड) का रूप ले लेती है। जब अमोनिया गैस हवा में मिलती है और इसकी सांद्रता (Concentration) 16% से 25% के बीच हो जाती है। ऐसे में ये खुली आग के संपर्क में आने पर जलकर विस्फोट कर सकती है। अमोनिया केमिकल को किसी बर्तन में रखकर गर्म करने पर भी विस्फोट हो सकता है।
अमोनिया गैस का इंसानी शरीर पर बहुत आक्रामक असर होता है। अमोनिया सांस के साथ शरीर में जाने पर मनुष्यों के लिए विषैली हो सकती है। यह मुख्य रूप से शरीर की नमी जैसे आंख, गला, फेफड़े और पसीना के प्रति आकर्षित होती है। जब यह शरीर में प्रवेश करती है तो यह सांस प्रणाली को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे जलन और खुजली होती है।
केमिकल बर्न : अमोनिया जैसे ही स्किन या आंखों की नमी के संपर्क में आती है, यह बेहद खतरनाक (Corrosive) हो जाती है। यह शरीर की कोशिकाओं (Cells) को तुरंत जला देती है। इससे आंखों की रोशनी भी जा सकती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने पर चकत्ते और फफोले बन जाते हैं।
दम घुटना: सांस के जरिए फेफड़ों में जाने पर यह वहां मौजूद पानी से क्रिया करके ‘अमोनियम हाइड्रॉक्साइड’ बनाती है। इससे फेफड़ों के टिशू जल जाते हैं, उनमें पानी भर जाता है (Pulmonary Edema) और इंसान का दम घुटने लगता है।
यदि हवा में अमोनिया की सांद्रता (Concentration) बहुत अधिक हो तो यह सांस के साथ अंदर शरीर में जाने पर श्वसन तंत्र को पूरी तरह चोक (Block) कर सकती है, जिससे दिल का दौरा पड़ सकता है या दम घुटने से मौत हो सकती है। अमोनिया का स्तर अधिक हो तो जहरीली हो जाती है। इससे भ्रम, चक्कर आना और दौरे जैसे लक्षण हो सकते हैं। गंभीर मामलों में यह घातक भी हो सकता है।
अमोनिया लीक से बचने के उपाय
अमोनिया गैस का रिसाव (Leakage) बेहद खतरनाक और जानलेवा हो सकता है, क्योंकि यह बहुत तेजी से फैलती है। यदि किसी औद्योगिक इलाके, कोल्ड स्टोरेज या सी-फूड प्रोसेसिंग प्लांट के पास अमोनिया गैस लीक हो जाए और इसे कंट्रोल न किया जा सके तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। अगर कभी आप ऐसी स्थिति में फंस जाएं जहां अमोनिया लीक हुई हो तो अपनी हिफाजत के लिए ये काम तुरंत करने चाहिए।
हवा की उल्टी दिशा में भागें
ऊंची जगह की तरफ जाएं
चेहरे को गीले कपड़े से ढक लें
आंखें बंद रखें और रगड़े नहीं
यदि घर-ऑफिस में हैं तो..
घर को पूरी तरह सील करने का प्रयास करें। सभी दरवाजे, खिड़कियां, वेंटिलेटर और एग्जॉस्ट फैन तुरंत बंद कर दें।
एसी, कूलर या वेंटिलेशन सिस्टम को बंद कर दें क्योंकि ये बाहर की जहरीली हवा को खींचकर अंदर ला सकते हैं।
दरवाजे और खिड़कियों के नीचे मौजूद झिर्रियों को गीले तौलिये या कपड़ों से ब्लॉक कर दें ताकि गैस अंदर न आ सके।
ग्रीन फ्यूल के रूप में अमोनिया
ग्रीन अमोनिया को भविष्य का सबसे बेहतरीन क्लीन फ्यूल भी माना जाता है। दुनिया में वर्ष 2070 तक नेट-जीरो (शून्य कार्बन उत्सर्जन) का लक्ष्य हासिल करने के लिए इसे एक गेम-चेंजर की तरह देखा जा रहा है। पारंपरिक अमोनिया के उलट, ग्रीन अमोनिया का प्रोडक्शन पूरी तरह सोलर या विंड एनर्जी जैसी Renewable Energy का उपयोग करके पानी से ग्रीन हाइड्रोजन निकालकर किया जाता है। इसलिए इसके प्रोडक्शन और इस्तेमाल के दौरान कार्बन उत्सर्जन जीरो होता है। लिक्विड अमोनिया को जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड नहीं, बल्कि सिर्फ नाइट्रोजन और पानी निकलता है।
अब वैज्ञानिक बड़े समुद्री जहाजों को चलाने के लिए अमोनिया इंजन पर भी काम कर रहे हैं। दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में इनका लगभग 2.5% का योगदान है। विशाल मालवाहक जहाजों के लिए भारी बैटरियां व्यावहारिक नहीं हैं। ऐसे में ग्रीन अमोनिया अपनी हाई एनर्जी डेंसिटी के कारण डीजल का मजबूत विकल्प बनकर उभरी है। उम्मीद है कि साल 2035-2040 तक कई जहाजों को पूरी तरह अमोनिया पर चलाया जाने लगेगा।
दुनिया में पिछले कई दशकों से रासायनिक खाद के लिए अमोनिया का ट्रांसपोर्टेशन हो रहा है। इसके स्टोरेज टैंक, पाइपलाइन और समुद्री बंदरगाह पहले से तैयार हैं, जिन्हें थोड़े से बदलाव के साथ फ्यूल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत जैसे देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए महंगे कच्चे तेल के आयात पर निर्भर हैं, वो भी ग्रीन अमोनिया का विकल्प अपना सकते हैं। इससे ऊर्जा सुरक्षा तो मजबूत होगी ही, पर्यावरण भी साफ रहेगा।




