

क्या आपने ऊपर दिए आंकड़ें देखे? नहीं देखा तो जरा फिर देखिए। ये वो आंकडें हैं जो बताते हैं कि पॉल्यूशन कितनी तेजी से हमारी जान का दुश्मन बनता जा रहा है। चौंकाने वाली नई बात ये है कि प्रदूषण अब इंसानों की अगली नस्ल को भी प्रभावित करने लगा है। एक नई स्टडी बताती है कि प्रदूषण के घातक कण अब पुरुषों के स्पर्म तक पहुंच रहे हैं और ये स्पर्म के डीएनए को बदल सकते हैं, जिसका सीधा असर फर्टिलिटी पर पड़ सकता है।
लंदन में हाल ही में यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी (ESHRE) की सालाना कॉन्फ्रेंस हुई थी। इस मीटिंग में स्पर्म के डीएनए पर पॉल्यूशन के दुष्प्रभाव को लेकर सोसाइटी की स्टडी पर चर्चा हुई। स्टडी से पता चला है कि वायु प्रदूषण पुरुषों के स्पर्म के जींस के काम करने के तरीके को बदल सकता है। शरीर में जब स्पर्म बन रहे होते हैं, उस दौरान जो पुरुष प्रदूषित हवा के संपर्क में आते हैं, उनके स्पर्म के डीएनए में कुछ बारीक बदलाव देखे गए। यही बदलाव तय करते हैं कि कौन सा जीन काम करेगा और कौन सा नहीं।
स्पर्म को कैसे बदल रहा प्रदूषण?
इससे पहले की रिसर्च में भी प्रदूषण से पुरुषों की फर्टिलिटी कम होने की आशंकाएं जाहिर की गई थीं, लेकिन शरीर के अंदर यह सब कैसे होता है, ये साफ नहीं था। स्टडी बताती है कि स्पर्म में बदलाव के लिए ओज़ोन (Ozone) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (Nitrogen Dioxide) जैसे प्रदूषणकारी तत्व सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं।
नई रिसर्च से पता चला कि स्पर्म की वर्किंग में बदलाव के पीछे ‘डीएनए मिथाइलेशन’ (DNA Methylation) एक बड़ी वजह हो सकती है। यह डीएनए पर लगने वाले कुछ ऐसे केमिकल टैग्स की तरह है, जो असली जेनेटिक कोड को बदले बिना ही यह तय कर देते हैं कि कौन सा जीन कब चालू होगा और कब बंद होगा। वायु प्रदूषण इन्हीं केमिकल टैग्स को प्रभावित कर देता है।
पॉल्यूशन से DNA में 39 बदलाव
ये स्टडी अमेरिका के उटाह शहर में 2013 से 2017 के बीच 2,000 से ज्यादा पुरुषों पर की गई। रिसर्च में शामिल पुरुषों ने शुरुआत में अपने स्पर्म के सैंपल दिए, और फिर दो, चार और छह महीने के बाद उनके सैंपल लिए गए। सैंपल लेने से पहले वैज्ञानिकों ने ये भी देखा कि तीन महीने पहले ये पुरुष ओज़ोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और पीएम 2.5 जैसे प्रदूषण के संपर्क में कितना आए थे।
वैज्ञानिकों ने ऐसे 1,220 पुरुषों के स्पर्म के ‘डीएनए मिथाइलेशन’ की जांच की, जिन्होंने छह महीने बाद अपना सैंपल दिया था। हवा में फैले प्रदूषण के कारण इनके डीएनए में 39 बदलाव पाए गए। इनमें ओज़ोन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का सबसे ज्यादा असर दिख रहा था। वैज्ञानिकों को GNAS नाम का एक जीन भी मिला, जो स्पर्म की कमजोर क्वालिटी और गर्भ में बच्चे के खराब विकास से जुड़ा पाया जा चुका है।

गर्भ में बच्चे के लिए भी जानलेवा
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि उस साल दुनिया में 5,29,000 नवजात शिशुओं की मौत जहीरीली हवा के चलते हुई थी। जब बच्चा मां के गर्भ में पल रहा होता है, तो प्रदूषण के संपर्क में आने से दो बड़े खतरे बढ़ जाते हैं।
- प्रदूषण गर्भवती और उसके पेट में पल रहे बच्चे को ठीक वैसे ही नुकसान पहुंचाता है, जैसे सिगरेट का धुआं।
- एक तो बच्चे का वजन कम हो जाता है, दूसरा बच्चा तय समय से पहले पैदा हो सकता है।
- इन बच्चों के गंभीर बीमारियां की चपेट में आने का खतरा बहुत ज्यादा होता है।
- फेफड़ों का इन्फेक्शन, डायरिया, दिमागी सूजन, पीलिया, खून संबंधी बीमारियां घेर सकती हैं।
- बच्चा जितना छोटा या समय से पहले पैदा होगा, यह खतरा उतना ही बढ़ता जाता है।
हालांकि रिसर्च की लीड साइंटिस्ट डॉक्टर कैरी नोबल्स का ये भी कहना था कि वायु प्रदूषण से स्पर्म के डीएनए में होने वाले इन बदलावों का फर्टिलिटी (संतान उत्पन्न करने की क्षमता) से सीधा क्या कनेक्शन है, इसे पूरी तरह साबित करने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है।
स्पर्म एक्सपर्ट और मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एलन पेसी का भी कहना था कि इस स्टडी से साफ है कि प्रदूषण का स्पर्म पर ऐसा असर पड़ता है, जिसे मापा जा सकता है, लेकिन फिलहाल हम दावे से यह नहीं कह सकते कि डीएनए में दिखने वाले ये बदलाव मेडिकली पुरुषों में बांझपन (Infertility) की वजह बनते हैं या नहीं। इसकी पुष्टि के लिए आगे रिसर्च करनी होगी
नॉटिंघम यूनिवर्सिटी में रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी के प्रोफेसर रिचर्ड ली ने कहा कि ये रिसर्च उन तमाम सबूतों को और पुख्ता करती है, जो बताते हैं कि हवा में मौजूद प्रदूषण पुरुषों के स्पर्म की क्वालिटी को बुरी तरह नुकसान पहुंचा रहा है।
फेफड़ों के कैंसर का खतरा
प्रदूषण पर 2025 में भी एक स्टडी की गई थी। उसमें पुरुषों की फर्टिलिटी पर तो नहीं, मगर ये पता चला कि खराब एयर क्वॉलिटी डीएनए को इस तरह बदल रहा है जिससे फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है। जो लोग PM 2.5 (हवा में मौजूद 2.5 माइक्रोन से भी छोटे बेहद बारीक धूल के कणों) के संपर्क में ज्यादा रहते हैं, उनके फेफड़ों की कोशिकाओं में कैंसर पैदा करने वाले बदलाव होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। यह स्टडी एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के 870 से ज्यादा लोगों पर की गई थी।
हैरानी की बात ये है कि वायु प्रदूषण उन लोगों को भी प्रभावित कर रहा है, जिन्होंने जिंदगी में कभी सिगरेट वगैरा को हाथ तक नहीं लगाया। यहां तक कि सिगरेट के धुएं के संपर्क में भी नहीं आए। फिर भी उनके फेफड़ों में वैसे ही जेनेटिक बदलाव होते दिखे, जो चेन-स्मोकर्स में मिलते हैं। ये बदलाव सालों तक शरीर में बिना सक्रियता के चुपचाप पड़े रह सकते हैं, लेकिन प्रदूषण के कारण होने वाली सूजन इन्हें सक्रिय कर देती है और ट्यूमर बढ़ना शुरू हो जाता है।
प्रदूषण से कैसे पनपता है कैंसर?
- सांसों के सहारे अंदर घुसे PM 2.5 के कण आपके खून में मिल जाते हैं
- यह प्रदूषण आपके फेफड़ों में जलन पैदा करता है
- इससे निपटने के लिए आपका इम्यून सिस्टम बार-बार एक्टिव होने लगता है
- लंबे समय तक ऐसा होते रहने से खराब कोशिकाएं बहुत तेजी से बढ़ने लगती हैं
- प्रदूषण से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है
- यह डीएनए की कड़ियों को तोड़ देता है और शरीर की खुद को ठीक करने की क्षमता बिगड़ती है
- शरीर में स्लीपिंग (निष्क्रिय) म्यूटेशन मौजूद हैं तो प्रदूषण से होने वाली सूजन उन्हें जगा देती है
- इसके बाद कैंसर के ट्यूमर तेजी से बढ़ने लगते हैं


सबसे ज्यादा कौन शिकार?
बच्चे
- बच्चे बड़े लोगों के मुकाबले ज्यादा तेजी से सांस लेते हैं
- उनके फेफड़े विकसित हो रहे होते हैं, और वो ज्यादा समय बाहर बिताते हैं
- उनकी कोशिकाएं DNA म्यूटेशन के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं
- जिसका मतलब है कि प्रदूषण उन्हें जिंदगी भर का नुकसान दे सकता है
बुज़ुर्ग
- उम्र के साथ इम्युनिटी कमजोर होने लगती है
- कमजोर फेफड़े और पहले से मौजूद अस्थमा या दिल की बीमारी जैसे रोग घेर लेते हैं
- गंभीर वायु प्रदूषण बुजुर्गों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है
ऑफिस जाने वाले
- ऑफिस जाने वालों को भारी ट्रैफिक से होकर गुजरना पड़ता है
- रोजाना का सफर का मतलब, लगातार PM 2.5 के संपर्क में रहना
- अक्सर ऑफिस के अंदर की हवा में प्रदूषण लगातार कैद होकर बना रहता है
फिटनेस के शौकीन
- AQI खराब हो, तब बाहर खुले में दौड़ लगाना या साइकिल चलाना नुकसानदेह हो सकता है
- वर्कआउट करते वक्त सांस लेने की रफ्तार बढ़ जाती है
- जिससे प्रदूषण के बारीक कण फेफड़ों में और भी गहरे तक चले जाते हैं
AQI.IN में छपी रिपोर्ट की मानें तो नवजात शिशुओं की मौतों में दो-तिहाई से ज़्यादा (77%) मौतें घर के अंदर के प्रदूषण (HAP) से होती हैं। अफ्रीका और दक्षिण एशिया (जिसमें भारत भी है) में प्रदूषण से नवजातों की कुल मौतों में से 20% के लिए घर के अंदर का प्रदूषण जिम्मेदार है। यह प्रदूषण ज्यादातर घर के अंदर खाना पकाने या गर्मी के लिए लकड़ी, कोयला या उपले (Solid Fuels) जलाने से होता है। बाकी मौतें घर के बाहर मौजूद PM 2.5 कणों के कारण होती हैं, जो गाड़ियों, बिजलीघरों और फैक्ट्रियों से निकलते हैं। प्रदूषण से बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें गरीब इलाकों में होती हैं, जहां आज भी चूल्हे पर लकड़ी या कोयले से खाना पकाया जाता है।
बच्चों को इस तरह बचाएं
- नवजात शिशुओं को इस खतरे से बचाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उन्हें और गर्भवती महिलाओं को प्रदूषित हवा से दूर रखा जाए।
- कई देशों ने साफ ईंधन (जैसे एलपीजी गैस) पर सब्सिडी देकर या गैस कनेक्शन पहुंचाकर घर के अंदर धुआं घटाने में कामयाबी पाई है।
- गाड़ियों, फैक्ट्रियों के धुएं पर सख्ती, ट्रैफिक जाम कम करके, सोलर-विंड एनर्जी जैसे कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोत अपनाकर बाहरी प्रदूषण घटाया जा सकता है।
- इनके साथ-साथ गर्भावस्था में महिलाओं को पौष्टिक खाना और बेहतर मेडिकल सुविधाएं देने से भी शिशुओं की जान बचाने में मदद मिल सकती है।




