कलाम का वो ‘तीसरा बेटा’ जिससे थर-थर कांपते हैं दुश्मन; 35 साल पहले ‘कबाड़’ से कमाल की पूरी कहानी
रूसी लैब के उसी 'कबाड़' में कलाम ने वो हीरा कैसे ढूंढा, कैसे 1991 का वह टूटा सपना 2001 में एक अजेय मिसाइल के रूप में सामने आया, कैसे वो भारत की सबसे भरोसेमंद मिसाइल बनी, RT India पर पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के खास शो में कलाम के पूर्व सलाहकार सृजन पाल सिंह ने उनके इसी ‘तीसरे बेटे’ की दिलचस्प कहानी साझा की।
कलाम का वो ‘तीसरा बेटा’ जिससे थर-थर कांपते हैं दुश्मन; 35 साल पहले ‘कबाड़’ से कमाल की पूरी कहानी
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भारत के मिसाइलमैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से एक बार पूछा गया- ‘आपकी कोई संतान नहीं है, क्या आपको इसकी कमी खलती है? तब कलाम ने हंसकर कहा था- “मेरे तीन बेटे हैं- पृथ्वी, अग्नि और ब्रह्मोस।” आज का दिन है, इन्हीं में से एक ‘बेटे’ का नाम सुनते ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते हैं। वही ब्रह्मोस, जिसने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को दहशत में डाल दिया। 

लेकिन आपको पता है कि जिस ब्रह्मोस को आज दुनिया ‘सुपर योद्धा’ मानती है, उसके इंजन को 35 साल पहले रूस के कुछ वैज्ञानिक कबाड़ मानकर एक कोने में पटक चुके थे। लेकिन कलाम की पारखी नजरों ने कबाड़ में भी उसकी अहमियत पहचान ली। रूसी लैब के उसी ‘कबाड़’ में कलाम ने वो हीरा कैसे ढूंढा, कैसे 1991 का वह टूटा सपना 2001 में एक अजेय मिसाइल के रूप में सामने आया, कैसे वो भारत की सबसे भरोसेमंद मिसाइल बनी, RT India पर पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के खास शो में कलाम के पूर्व सलाहकार सृजन पाल सिंह ने उनके इसी ‘तीसरे बेटे’ की दिलचस्प कहानी साझा की।

कलाम के PA सृजन पाल सिंह ने सुनाई कहानी

इस पूरी कहानी को समझने के लिए 35 साल पीछे चलना होगा। साल था 1991, खाड़ी में आज की तरह ही टेंशन (Gulf War) चल रही थी। जैसे आज अमेरिका ईरान से लड़ रहा है, उस वक्त अमेरिका और ईराक में जंग छिड़ी हुई थी। इस जंग के केंद्र में थे ईराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन और US प्रेसिडेंट जॉर्ज बुश सीनियर। उस युद्ध में दुनिया ने पहली बार अमेरिका की टोमाहॉक (Tomahawk) क्रूज मिसाइल का व्यापक इस्तेमाल और विनाशकारी ताकत देखी थी। 

जिस तरह आज ड्रोन टेक्नोलॉजी उभार पर है, उस समय क्रूज मिसाइलों का दौर शुरू हो रहा था। भारत को लगा कि अगर देश की सुरक्षा मजबूत करनी है तो हमारे पास भी अपनी क्रूज मिसाइल होनी चाहिए। यह विचार डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के दिमाग में घर कर गया। कलाम उस वक्त DRDO यानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के महानिदेशक और इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के प्रमुख थे। वह रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में भी सेवाएं दे रहे थे। 

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रूस की वो लैब, जहां कबाड़ में पड़ा था ‘हीरा’

1991 का यही वो साल था, जब USSR का विघटन होकर रूस अस्तित्व में आया था। सोवियत संघ के टूटने के कारण रूस के पास हथियारों पर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के लिए फंड नहीं बचा था। प्रोजेक्ट बंद हो रहे थे। उसी वक्त डॉ. कलाम रूस की एक स्पेस/रॉकेट लैब NPO (Mashinostroyeniya) के दौरे पर गए थे। 

उस लैब के एक कोने में एक पुराना लावारिस इंजन पड़ा हुआ था। डॉ. कलाम ने पूछा- “ये क्या है?” तो रूसी वैज्ञानिकों ने बताया कि यह एक छोड़ा हुआ प्रोजेक्ट है, उनके पास इस पर आगे काम करने के लिए बजट या कहें फंड नहीं है। 

वह कोई आम इंजन नहीं, बल्कि एक रैमजेट (Ramjet) इंजन था। पहले मिसाइल को हवा में उड़ने के लिए ईंधन के साथ ऑक्सीजन भी ले जानी पड़ती थी, लेकिन रैमजेट इंजन उड़ते समय वायुमंडल से ही ऑक्सीजन खींच लेता है, जिससे मिसाइल को अलग से ऑक्सीजन नहीं ले जानी पड़ती और उसका वजन कम हो जाता है। इससे मिसाइल की रफ्तार कई गुना बढ़ जाती है। 

कलाम का आइडिया और विरोध

कलाम साहब ने तुरंत आइडिया दिया कि भारत के DRDO और रूस के NPO को मिलकर इस इंजन का इस्तेमाल करके एक नई क्रूज मिसाइल बनानी चाहिए। आइडिया में दम था। सरकार ने तुरंत तैयारी शुरू कर दी। 1993 के आसपास इस आइडिया पर काम शुरू हो गया। 

रूस और भारत का ये प्रोजेक्ट रूसी वेपन लॉबी को नहीं सुहाया। विरोध शुरू हो गया। उनका कहना था कि हमें भारत को अपनी तैयार मिसाइल बेचनी चाहिए, न कि भारत को खुद मिसाइल और रॉकेट बनाने में मदद करनी चाहिए। अगले 5 साल एक तरफ रूस की हथियार लॉबी विरोध करती रही। दूसरी तरफ, अंदरखाने बातचीत और सीक्रेट नेगोशिएशंस चलती रहीं। 

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2001 में पहली बार दिखी ब्रह्मोस की ताकत

आखिरकार बातचीत रंग लाई और 1998 में ब्रह्मोस के संयुक्त उत्पादन की डील हुई। खुद डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने डील पर हस्ताक्षर किए। तेजी से काम हुआ। 3 साल में मिसाइल बनकर तैयार हो गई। साल 2001 में पहली बार भारत ने ओडिशा के चांदीपुर में ब्रह्मोस की पहली सफल टेस्टिंग की। ब्रह्मोस का गाइडेंस सिस्टम पूरी तरह भारतीय था, जबकि उसका प्रोपल्शन सिस्टम (Propulsion/Engine) वही रूस का बंद पड़ा इंजन था, जिसे रूसी वैज्ञानिक बेकार मान चुके थे। 

अमेरिका की टोमाहॉक मिसाइल 0.7 मैक (Subsonic) की स्पीड से उड़ती है, वहीं ब्रह्मोस 2.5 से 3 मैक (Supersonic) यानी आवाज की गति से लगभग तीन गुना और टोमाहॉक से करीब 4 गुना तेज भागती है। इसकी रफ्तार इतनी तेज है कि दुश्मन का रडार या डिफेंस सिस्टम इसे ट्रैक ही नहीं कर पाता।

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ब्रम्होस के ये दो भाई भी खतरनाक

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पोखरण-2, नरसिम्हा राव और वाजपेयी

RT India के खास प्रोग्राम में सलमान खुर्शीद से बातचीत के दौरान डॉ. कलाम के पीए रहे सृजन पाल सिंह ने पोखरण-2 की भी रोचक कहानी बताई। सृजन पाल ने बताया कि भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने का काम और पोखरण-2 परीक्षण का पूरा प्रोजेक्ट दरअसल 1995-96 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में तैयार हो चुका था। डॉ. कलाम इस गुप्त मिशन की अगुवाई कर रहे थे। परीक्षण की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। 1996 में चुनाव हुए और बदकिस्मती से राव की सरकार सत्ता से दूर रह गई। आमतौर पर ऐसे बड़े और संवेदनशील प्रोजेक्ट सरकार बदलने के साथ ठंडे बस्ते में चले जाते हैं या राजनीति का शिकार हो जाते हैं।

चुनाव हारने के बावजूद नरसिम्हा राव ने अभूतपूर्व राजनीतिक परिपक्वता दिखाई। उन्होंने डॉ. कलाम को तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पास जाकर मिलवाया।

नरसिम्हा राव ने डॉ. कलाम से साफ कहा-

 

पीवी
यह देश के हित में एक बेहद जरूरी और शानदार प्रोजेक्ट है। अब आप इस प्रोजेक्ट का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपिए और इसे आगे बढ़ाइए।
पीवी नरसिम्हा राव
पीवी नरसिम्हा राव
पूर्व प्रधानमंत्री, भारत

नरसिम्हा राव ने तय किया कि इसका श्रेय आने वाली नई सरकार (अटल बिहारी वाजपेयी) को ही मिलना चाहिए। इसके बाद वाजपेयी जी ने राजनीतिक साहस दिखाया और प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि परीक्षण के बाद अमेरिका, जापान और यूरोपीय देश भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा देंगे, फिर भी उन्होंने देशहित में जोखिम उठाया और मई 1998 में पोखरण-2 को हरी झंडी दी। भारत ने सफल परीक्षण किया। तीखी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया हुई। भारत पर प्रतिबंध भी लगे, लेकिन इसने भारत को एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। 

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