T-90: ‘जुगाड़’ से तैयार हुआ वो रूसी योद्धा, जो बना भारत का अभेद्य कवच
टी90 टैंक बनाने वाली टीम का हिस्सा रहे व्लादिमीर डोमनिन का हाल ही में निधन हो गया। 80 साल की उम्र में, 6 जुलाई 2026 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। डोमनिन ने 1999 में भारत में T-90S टैंकों के ट्रायल में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
T-90: ‘जुगाड़’ से तैयार हुआ वो रूसी योद्धा, जो बना भारत का अभेद्य कवच
T-90 Bhishma Tank India RussiaRT© RT Hindi

90 के दशक की बात है। सोवियत संघ यानी USSR का विघटन हो चुका था। रूस भयंकर मंदी से जूझ रहा था। सेना के पास नए टैंक खरीदने के लिए फंड की कमी थी। रूस की हथियार बनाने वाली कंपनी Uralvagonzavod (यूरालवागोनजावॉड)  भी बंद होने के कगार पर थी। हालात खराब थे। फैक्ट्रियों के पास ऑर्डर नहीं थे। अनुभवी वैज्ञानिक, इंजीनियर काम छोड़कर जा रहे थे। कंपनियों का सप्लायर्स से नेटवर्क टूट रहा था। उधर रूस के मित्र भारत को भी युद्ध के मोर्चे पर नई ताकत की जरूरत थी। भारत को ऐसा ‘योद्धा’ चाहिए था, जो जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान के टी-80 टैंकों का माकूल जवाब दे सके। दोनों की इसी जरूरत से पैदा हुई, वो डील जिसने आगे चलकर पूरी मिलिट्री टैंक इंडस्ट्री का भविष्य ही बदल दिया। ये थी टी-90 बैटल टैंक की डील, जिसे हिंदुस्तान में नाम मिला- ‘भीष्म’। ये वाकई भारतीय युद्धक टैंकों का ‘भीष्म पितामह’ साबित हुआ। आज भी इसकी धमक से दुश्मन थर्रा जाता है। 

..लेकिन इस वक्त इस टैंक की चर्चा क्यों? दरअसल टी90 टैंक बनाने वाली टीम का हिस्सा रहे व्लादिमीर डोमनिन का हाल ही में निधन हो गया। 80 साल की उम्र में, 6 जुलाई 2026 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। डोमनिन ने 1999 में भारत में T-90S टैंकों के ट्रायल में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्होंने 2001 की उस ऐतिहासिक डील की राह आसान करने में भी मदद की, जिससे ये टैंक भारतीय सेना का हिस्सा बने। ये डील रूस की दो बड़ी कंपनियों Uralvagonzavod और Ural Design Bureau के साथ हुई थी। ये सौदा आगे चलकर भारत-रूस रक्षा सहयोग की मजबूत नींव बना।

T-90 के पीछे था इस रूसी वैज्ञानिक का दिमाग

व्लादिमीर डोमनिन के बारे में जानने से पहले व्लादिमीर पोतकिन की कहानी जान लीजिए। ये शख्स कौन हैं? पोतकिन, व्लादिमीर डोमनिन के साथी इंजीनियर थे। पोतकिन को टी-90 ‘भीष्म’ (T-90 Bhishma) प्रोग्राम और इसके चीफ डिजाइनर के रूप में जाना जाता है। सोवियत संघ के बिखरने के बाद दिवालिया हो रही रूसी टैंक कंपनी Uralvagonzavod को बचाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। दुर्भाग्य ही कह लीजिए कि भारत-रूस के बीच टी-90 टैंक की डील से दो साल पहले उनकी मौत हो गई थी। उन्होंने इस डील के लिए जी-जान लगा दी थी। रूस सरकार ने उनके इस बलिदान के सम्मान में वेल्डेड बुर्ज वाले टी-90ए (T-90A) वर्जन टैंक का आधिकारिक नाम “T-90 Vladimir” रखा। भारत में इसी टैंक को हम टी-90 ‘भीष्म’ के नाम से जानते हैं। 

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T-90 टैंक से कैसे जुड़े व्लादिमीर डोमनिन?

1999 में भारत-रूस के बीच टी-90 टैंक की डील उस वक्त नाजुक मोड़ पर आ गई थी, जब व्लादिमीर पोतकिन का निधन हो गया। इसके बाद डील आगे बढ़ाने की बागडोर व्लादिमीर डोमनिन के हाथों में ही थी। भारत के रेगिस्तान में टैंक के ट्रायल्स होने वाले थे। ऐसे में डोमिनिन ने यूराल्स डिजाइन ब्यूरो की प्रशासनिक व तकनीकी लीडरशिप और टी-90 प्रोजेक्ट की बागडोर संभाली। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब प्लांट का दौरा करने आए थे, तब डोमनिन ने खुद उन्हें ब्रीफ किया था। उन्होंने बताया था कि भारत की खास जरूरतों के मुताबिक टैंक में क्या-क्या तब्दीलियां की गई हैं। उन्होंने बताया था कि टैंक में लगाए गए खास ऑप्टिकल-इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, उसके ज्यादा पावरफुल इंजन और अत्याधुनिक नाइट विजन किस तरह दुश्मन के हमले को बेअसर करने में सक्षम है।  साफ शब्दों में कहें तो अगर व्लादिमीर पोतकिन टी-90 भीष्म के ‘शिल्पकार’ थे, तो व्लादिमीर डोमनिन भारत के साथ इस मेगा-डील को सफलतापूर्वक पूरा कराने वाले ‘मैनेजर और मार्गदर्शक’ थे।  

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‘जुगाड़’ से बनाया घातक टैंक

90 के दशक से पहले, सोवियत संघ के पास तीन मुख्य युद्धक टैंक थे- टी-64, टी-72 और टी-80। ये तीनों दिखने में एकजैसे थे लेकिन इनके कल-पुर्जे और इंजन बिल्कुल अलग थे। इससे सेना के लिए इनका मेंटिनेंस और ट्रेनिंग बहुत जटिल और खर्चीला हो गया था। खर्च घटाने के लिए सिंगल स्टैंडर्डं टैंक चाहिए था। रूस को ज्यादा बेहतर टैंक की जरूरत थी। उसके बाद तैयार हुआ टी-90 टैंक। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के पास अगली पीढ़ी का टैंक बनाने का बजट नहीं था। ऐसे में रूसी इंजीनियरों ने अपने बेहद भरोसेमंद और सस्ते टी-72बी टैंक के चेसिस को आधार बनाया और उसके ऊपर एडवांस टी-80यू टैंक के फायर कंट्रोल सिस्टम (FCS) और तकनीक फिट कर दी। इस हाइब्रिड फॉर्मूले से कम बजट में एक घातक टैंक तैयार हो गया, जिसे टी-90 नाम दिया गया। 

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भारत ने T-90 टैंक क्यों खरीदे?

भारत के पास सोवियत काल के टी-72 टैंक थे। लेकिन 1996 में पाकिस्तान ने अचानक यूक्रेन से 320 ‘T-80UD’ टैंक खरीदने की डील फाइनल कर ली थी। इसके बाद भारत को अपनी ताकत बढ़ानी थी। भारत अपना स्वदेशी टैंक ‘अर्जुन’ (MBT Arjun) विकसित करने पर काम कर रहा था, लेकिन इसमें काफी देर हो रही थी। इसकी वजह से भारत को तत्काल टैंक आयात करने की जरूरत थी। 

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टैंक के साथ टेक्नोलोजी भी मिली

इस डील की खास बात ये भी थी कि रूस भारत को इस टैंक को बनाने की तकनीक और लाइसेंस देने को भी तैयार था। मतलब ये कि भारत भविष्य में चेन्नई के पास आवडी (Avadi) में मौजूद हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) में खुद भी ये टैंक बना सकता था। 

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कितने टी-90 टैंकों की डील हुई?

1999 में भारत ने रूस के साथ ‘T-90S’ टैंक खरीदने का एक बड़ा सौदा किया। इसके तहत 310 टैंक तीन अलग-अलग तरीकों से मिलने वाले थे। 

  • 124 टैंक पूरी तरह से बने-बनाए (रेडीमेड) आने थे। 

  • 80 टैंक आधे खुले हुए (semi-knocked down) आने थे, जिन्हें भारत में लाकर असेंबल किया जाना था। 

  • 100 टैंक सिर्फ पुर्जों (completely knocked down) में आने थे, जिन्हें भारत में असेंबल करना था। 

शुरू में जब T-90S टैंक का टेस्ट किया गया तो रेगिस्तान की भीषण गर्मी से इसके थर्मल सेंसर (रात में देखने वाले सिस्टम) सही से काम नहीं कर पा रहे थे। मिसाइल सिस्टम में भी कुछ कमियां थीं, लेकिन सेना ने इन्हें ‘शुरुआती छोटी-मोटी दिक्कतें’ माना और टैंक खरीदने का फैसला किया। फिर 6 जनवरी 2004 को रूस की मदद से भारत में असेंबल किया गया पहला T-90S टैंक भारतीय सेना को सौंपा गया, और इसे नाम दिया गया ‘भीष्म’।

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सेना का 30% वाला प्लान

उस समय के सेना प्रमुख जनरल एन.सी. विज के मुताबिक, भारतीय सेना का लक्ष्य था कि उसके कम से कम 30% हथियार और उपकरण लेटेस्ट टेक्नोलॉजी वाले होने चाहिए। सेना के इस टारगेट को पूरा करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ‘भीष्म’ (T-90S) और ‘अर्जुन’ टैंकों पर थी। ‘भीष्म’ टैंकों का का मुख्य काम पाकिस्तान के ‘T-80UD’ टैंकों का मुकाबला करना था।

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टी-90 टैंक के और भी वैरिएंट्स हैं? जवाब है- हां। 

T-90 (शुरुआती मॉडल)

➤ यह इस सीरीज का सबसे पहला टैंक था, जिसे बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए चुना गया

➤ फैक्ट्री में यह 1989 में बनकर तैयार हुआ, कोड नेम था- ‘ऑब्जेक्ट 188’। 1992 से सेना के लिए बनना शुरू हुआ

T-90M (सबसे नया और आधुनिक मॉडल)

➤ यह T-90A का सबसे लेटेस्ट और हाई-टेक रूप है

➤ इसमें पुरानी कमियों को दूर करके कई बड़े बदलाव किए गए

➤ इसका ऊपरी हिस्सा (बुर्ज) नए डिजाइन का और ज्यादा मजबूत है

➤ इसमें आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम ‘कालीना’ है। युद्ध की हर डिटेल एक जगह दिखती है

➤ टैंक के अंदर जहां गोले रखे होते हैं, उस हिस्से (एमो कैरोसेल) की सुरक्षा बढ़ाई गई है

➤ इसमें एक नई और ज्यादा सटीक तोप (2A46M-5) लगाई गई है

➤ इसमें ऐसी एंटी-एयरक्राफ्ट गन (UDP T05BV-1) है, जिसे टैंक के अंदर से रिमोट से चलाया जा सकता है

T-90S (विदेशों के लिए बना टैंक)

➤ यह T-90 का वो मॉडल है जिसे दूसरे देशों को बेचने के लिए बनाया गया था 

➤ बाद में रूसी सेना ने भी इसे T-90A के रूप में अपनाया

➤ इन्हें यूराल्वैगनजावोद फैक्ट्री ने बनाया था

➤ इसमें चेल्याबिंस्क ट्रैक्टर प्लांट का बनाया 1,000 हॉर्सपावर का दमदार इंजन लगा था

bhishma tank file photoRT© RT Hindi

अभी भारत में कितने टी-90 टैंक हैं?

भारतीय सेना में वर्तमान में लगभग 1,200 से 1,300 टी-90 (भीष्म) टैंक सक्रिय सेवा में हैं। भारत ने शुरुआती दौर में कुछ टैंक सीधे रूस से आयात किए थे, लेकिन अब इनका निर्माण तमिलनाडु के अवादी में स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) में किया जाता है। मई 2026 में भारत ने इस फैक्ट्री से अपना 1,000वां स्वदेशी टी-90 टैंक बनाकर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

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