
देश में बढ़ती महंगाई के बीच एक तरफ चीनी की मिठास फीकी पड़ती जा रही है, तो दूसरी तरफ प्याज भी लोगों को रुलाने लगा है। प्याज की कीमतों में लगातार तेजी जारी है। उपभोक्ता मामले विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, रविवार, 23 अगस्त को प्याज की औसत खुदरा कीमत बढ़कर 42 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। यह पिछले साल के मुकाबले 48% और पिछले महीने की तुलना में 20% अधिक है।
वहीं, प्याज की औसत थोक कीमत बढ़कर करीब 40 रुपये प्रति किलो हो गई। यह पिछले साल के मुकाबले 52% और पिछले महीने की तुलना में 24% अधिक है।
बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार अब अपने बफर स्टॉक से प्याज बाजार में उतारेगी। कीमतों में क्षेत्रीय अंतर को देखते हुए सरकार सोमवार, 24 अगस्त से ‘कांदा एक्सप्रेस’ चलाने जा रही है। इसके जरिए नासिक से उन शहरों तक ट्रेन के जरिए प्याज पहुंचाया जाएगा, जहां इसकी कीमतें ज्यादा हैं।
क्या है ‘कांदा एक्सप्रेस’?
‘कांदा एक्सप्रेस’ सरकार की विशेष ट्रेन व्यवस्था है, जिसके जरिए नासिक से प्याज को देश के उन हिस्सों तक पहुंचाया जाता है, जहां इसकी कीमतें ज्यादा होती हैं। इसका मकसद कम समय में बड़ी मात्रा में प्याज पहुंचाकर बाजार में आपूर्ति बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है।
शुरुआती तौर पर इस योजना के तहत दिल्ली, चेन्नई, कोच्चि और गुवाहाटी जैसे शहरों तक प्याज भेजने की योजना है। सरकार अपने बफर स्टॉक में रखे प्याज को भी बाजार में कम कीमत पर उतारेगी, ताकि आम लोगों को महंगे प्याज से राहत मिल सके।
सरकार ने पहली बार अक्टूबर 2024 में ‘कांदा एक्सप्रेस’ चलाई थी। तब नासिक से दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में प्याज पहुंचाने के लिए विशेष ट्रेनों का इस्तेमाल किया गया था।
दिल्ली में एक साल में प्याज 86% महंगा
देश के प्रमुख शहरों में प्याज की कीमतों में पिछले एक साल में तेज बढ़ोतरी हुई है। उपभोक्ता मामले विभाग की मूल्य निगरानी प्रणाली के मुताबिक, 23 अगस्त 2026 को दिल्ली में प्याज की कीमत 65 रुपये प्रति किलो थी, जबकि एक साल पहले यह 35 रुपये प्रति किलो थी। यानी दिल्ली में प्याज के दाम एक साल में 85.71% बढ़े हैं।
मुंबई में 23 अगस्त को प्याज 43 रुपये प्रति किलो रहा, जो पिछले साल के 32 रुपये के मुकाबले 34.38% ज्यादा है। चेन्नई में प्याज की कीमत 58 रुपये प्रति किलो पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह 33 रुपये थी। यानी यहां प्याज 75.76% महंगा हुआ है।
रांची में भी प्याज के दाम बढ़े हैं। यहां 23 अगस्त को प्याज 38 रुपये प्रति किलो था, जबकि एक साल पहले इसकी कीमत 25 रुपये थी। यानी कीमत में 52% की बढ़ोतरी हुई है।

प्याज के दाम क्यों बढ़ रहे हैं? 5 बड़े कारण
रबी यानी सर्दियों की प्याज देश की सालाना प्याज सप्लाई में करीब 60–65% हिस्सेदारी रखती है और मार्च से बाजार में इसकी आवक शुरू होती है। इस साल रबी प्याज के उत्पादन पर कम रकबे और मौसम की मार का असर पड़ा है।
महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है। मार्च में हुई बेमौसम बारिश से रबी प्याज की फसल की गुणवत्ता और उपलब्धता प्रभावित हुई। इसका असर बाजार में आने वाली प्याज की मात्रा पर भी पड़ा।
एक्सपर्ट के मुताबिक,
“हमारे यहां लाल प्याज की प्रमुख किस्में होती हैं। इनकी भंडारण क्षमता इतनी अधिक नहीं होती कि इन्हें छह महीने या उससे ज्यादा समय तक अच्छी गुणवत्ता के साथ रखा जा सके। जो प्याज हम स्टोर करते हैं, उसमें सितंबर के बाद अंकुरण शुरू हो सकता है और प्याज की गुणवत्ता में बदलाव आने लगता है। इसके कारण बाजार में इसकी मांग कम हो सकती है।”
- आमतौर पर रबी प्याज की सप्लाई मार्च से सितंबर तक बाजार में रहती है। इसके बाद अक्टूबर के आसपास खरीफ यानी मानसून की प्याज बाजार में आने लगती है। लेकिन इस साल मानसून में देरी के कारण खरीफ प्याज की फसल भी देर से आने की संभावना है।
- नासिक की प्याज, जो आमतौर पर अक्टूबर से बाजार में आने लगती है, करीब एक महीने देर से आने की आशंका है। इससे सितंबर-अक्टूबर के बीच बाजार में प्याज की उपलब्धता कम हो सकती है।
- रबी फसल और अगली खरीफ फसल के बीच की कमी को कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, खासकर साउथ बेल्लारी की प्याज से पूरा किया जाता है। लेकिन इस बार वहां भी बारिश कम और देर से हुई है। इसका असर फसल की बुआई और उत्पादन पर पड़ा है। ऐसे में दक्षिण भारत से मिलने वाली अतिरिक्त सप्लाई भी कमजोर रहने की आशंका है।
हालांकि, सरकार का दावा है कि देश में प्याज का उत्पादन पिछले साल के लगभग बराबर है। पिछले साल 307.67 लाख टन प्याज का उत्पादन हुआ था, जबकि इस बार 307.37 लाख टन उत्पादन का अनुमान है।
सरकार के पास कितना प्याज बफर स्टॉक?
पीआईबी की प्रेस रिलीज के मुताबिक, 2024-25 में पांच लाख टन प्याज खरीदने का लक्ष्य था। पिछले साल इसे घटाकर तीन लाख टन किया गया और इस बार दो लाख टन खरीद का लक्ष्य रखा गया है।
इस साल मई से प्याज की खरीद शुरू कर दी गई थी, लेकिन जुलाई के आखिर तक सरकार केवल 1.20 लाख टन प्याज ही खरीद सकी।
बफर स्टॉक में कम खरीद को देखते हुए सरकार ने 4 जुलाई को खरीद मूल्य 1,875 रुपये से बढ़ाकर 2,125 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया। इसके बाद हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसे फिर बढ़ाकर 2,645 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया। यानी मई से अब तक खरीद मूल्य में करीब 108% की बढ़ोतरी हुई है।
भारत में सबसे ज्यादा प्याज कहां होता है?
भारत में प्याज उत्पादन के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे है। देश के कुल प्याज उत्पादन में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी करीब 44.07% है और राज्य में 135.58 लाख टन प्याज का उत्पादन होता है।
इसके बाद मध्य प्रदेश 44.43 लाख टन उत्पादन के साथ दूसरे स्थान पर है। देश के कुल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 14.44% है।
कर्नाटक 25.76 लाख टन उत्पादन और 8.37% हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर है, जबकि गुजरात 25.41 लाख टन उत्पादन और 8.25% हिस्सेदारी के साथ चौथे स्थान पर है।

राजस्थान 15.68 लाख टन उत्पादन के साथ पांचवें स्थान पर है। देश के कुल प्याज उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 5.09% है।
इसके बाद बिहार 13.31 लाख टन उत्पादन के साथ छठे, उत्तर प्रदेश 7.66 लाख टन उत्पादन और 2.49% हिस्सेदारी के साथ सातवें तथा पश्चिम बंगाल 7.17 लाख टन उत्पादन और 2.33% हिस्सेदारी के साथ आठवें स्थान पर है।
आंध्र प्रदेश 6.07 लाख टन उत्पादन के साथ नौवें और ओडिशा 4.48 लाख टन उत्पादन के साथ दसवें स्थान पर है।
चीनी के भी बढ़े दाम, सरकार ने 10 साल बाद खोला आयात का रास्ता
प्याज के साथ-साथ त्योहारों से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों ने भी लोगों की चिंता बढ़ा दी है। 45-50 रुपये किलो बिकने वाली चीनी का खुदरा भाव 70-75 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है।
कीमतों को नियंत्रित करने और घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने करीब 10 साल में पहली बार चीनी के आयात का फैसला किया है। सरकार ने 20 अगस्त को बिना ड्यूटी के चीनी आयात की अनुमति दे दी।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि रेड रॉट बीमारी और अल नीनो के असर से भारत ही नहीं, दुनियाभर में कृषि उत्पादन, खासकर चीनी का उत्पादन प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार स्थिति को लेकर चिंतित है और इसी वजह से कई तत्काल कदम उठाए गए हैं।
जानकारों के मुताबिक, सरकार के इस फैसले से चीनी का स्टॉक रोककर रखने वाले व्यापारियों पर दबाव बनेगा। साथ ही, आयातित चीनी के बाजार में आने से उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे कीमतों पर भी दबाव कम होने की उम्मीद है।




