
14 अक्टूबर 2026 की तारीख बांग्लादेश के दो परिवारों के लिए कभी न भूलने वाला दर्द दे गई। सऊदी अरब में रोजी-रोटी कमाने गए नज्रुल इस्लाम अब्दुल बासिर और स्वीटी अख्तर को उस दिन फांसी दे दी गई। उनके परिवारों को शायद उम्मीद थी कि एक दिन वे घर लौट आएंगे। बांग्लादेशी अधिकारियों के मुताबिक, उन्हें फांसी से पहले जानकारी नहीं दी गई जबकि 30 सितंबर को सऊदी से मिली करीब 2,500 कैदियों की लिस्ट में दोनों के नाम दर्ज थे। लिस्ट में उनके खिलाफ अलग-अलग आरोपों का जिक्र था, लेकिन मौत की सजा के बारे में कुछ नहीं लिखा था।
इन्हें फांसी देने के तीन दिन बाद, 17 अक्टूबर को सऊदी में पांच और लोगों को फांसी दी गई। इनमें हसन जकी अल-फराज भी शामिल थे, जिनके मामले में मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि उन्हें बचपन में किए कथित कृत्यों के लिए मौत की सजा दी गई।
बांग्लादेशी नागरिकों पर क्या आरोप थे?
सऊदी की सरकारी समाचार एजेंसी SPA पर जारी गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक, नज्रुल इस्लाम अब्दुल बासिर और स्वीटी अख्तर पर मक्का की एक मस्जिद में ‘अनैतिक काम’ करने का आरोप था।
मंत्रालय ने बताया कि सुरक्षा अधिकारियों ने दोनों को गिरफ्तार किया। अदालत ने दोनों को दोषी मानते हुए इस्लामी कानून के तहत मौत की सजा सुनाई। अदालत ने अपराध की गंभीरता और पवित्र जगह की मर्यादा का उल्लंघन करने को सजा की वजह बताया। शाही आदेश के बाद 14 अक्टूबर 2026 को दोनों को फांसी दे दी गई।
बांग्लादेश ने सऊदी अरब से अदालत के फैसले, मुकदमे की पूरी जानकारी और इस बात का जवाब मांगा है कि दोनों को अपना पक्ष रखने का मौका मिला था या नहीं।
जेद्दा स्थित वाणिज्य दूतावास के रिकॉर्ड में नज्रुल पर साइबर अपराध कानून और सिटी पर व्यभिचार से जुड़े आरोप दर्ज थे। इन आरोपों का मस्जिद वाले मामले से क्या संबंध था, यह अभी साफ नहीं है।
अब्दुल बासिर: परिवार को आखिरी बातचीत याद है
बांग्लादेश के ब्राह्मणबाड़िया जिले के रहने वाले नज्रुल इस्लाम अब्दुल बासिर नवंबर 2022 में काम करने के लिए सऊदी अरब गए थे। वह वहां क्लीनर का काम करते थे। परिवार ने उनकी विदेश यात्रा के लिए कर्ज लिया था और उम्मीद थी कि उनकी कमाई से घर की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी।

बांग्लादेशी अखबार 'द डेली स्टार' के मुताबिक, नज्रुल को 1 अगस्त 2023 को सऊदी अरब के साइबर अपराध कानून के तहत हिरासत में लिया गया था। वह जेद्दा की एक सुधार गृह जेल में बंद थे।
परिवार के अनुसार, नज्रुल की मां रहीमा बेगम की उनसे आखिरी बातचीत 11 अक्टूबर को हुई थी। इसके तीन दिन बाद, 14 अक्टूबर को उन्हें फांसी दिए जाने की खबर आई। परिवार ने आरोपों पर सवाल उठाए हैं और उनका शव बांग्लादेश लाने की मांग की है।
स्वीटी अख्तर: काम की तलाश में गई थी
दूसरी बांग्लादेशी नागरिक स्वीटी अख्तर थीं। वह भी रोजगार के लिए सऊदी अरब गई थीं। परिवार ने उनकी यात्रा के लिए करीब डेढ़ लाख टका कर्ज लिया था। डेली स्टार को मिले बांग्लादेशी वाणिज्य दूतावास के सीक्रेट मेमो के मुताबिक, वह जेद्दा की महिला जेल में बंद थीं। परिवार का कहना है कि उन्होंने जेल में बंद होने की वजह कार्यस्थल से जुड़ा विवाद बताई थी और घर लौटने की उम्मीद भी जताई थी।

सऊदी अधिकारियों ने उनके और नज्रुल के मामले को एक ही कथित घटना से जोड़कर पेश किया, लेकिन बांग्लादेशी वाणिज्य दूतावास को मिली लिस्ट में दोनों पर अलग आरोप दर्ज थे।
बांग्लादेश से हुई चूक!
25 अक्टूबर को बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि मिशन के अधिकारियों को लगा था कि दोनों को छह महीने से 15 साल तक की जेल हो सकती है। उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि दोनों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है या फांसी का आदेश लागू होने वाला है।
बांग्लादेश की संसदीय समिति ने मामले की पड़ताल करने और यह पता लगाने को कहा है कि मिशन की तरफ से कोई चूक हुई थी या नहीं। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले इसे आधिकारिक रूप से साबित हुई लापरवाही कहना सही नहीं होगा।
कितने लोगों को फांसी दी गई?
अक्टूबर के मध्य में सऊदी अरब में फांसी के कम से कम दो बड़े मामले सामने आए। 14 अक्टूबर को दो बांग्लादेशी नागरिकों को फांसी दी गई। इसके तीन दिन बाद, 17 अक्टूबर को पांच और लोगों को फांसी दिए जाने की जानकारी सामने आई। यूरोपियन सऊदी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (ESOHR) के मुताबिक, इनमें हसन जकी मोहम्मद अल-फराज भी शामिल थे।
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, हसन अल-फराज को उन कथित अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था, जो उन्होंने 14 साल की उम्र में किए थे।
सऊदी अरब ने नाबालिगों के अपराधों के लिए मौत की सजा पर रोक लगाने का ऐलान किया था। हालांकि, यह रोक सभी मामलों पर लागू नहीं होती।
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, सऊदी अरब ने 2018 के जुवेनाइल कानून और 2020 के शाही आदेश के तहत 18 साल से कम उम्र में किए गए अपराधों के लिए मौत की सजा पर रोक लगाने की बात कही थी, लेकिन आतंकवाद से जुड़े मामलों को इस व्यवस्था से बाहर रखा गया।
अल-फराज को आतंकवाद से जुड़े आरोपों में सजा दी गई थी। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इसी कानूनी अपवाद के चलते नाबालिग रहते हुए कथित अपराध करने वाले लोगों को भी मौत की सजा का सामना करना पड़ रहा है।
सऊदी में मौत की सजा का आंकड़ा कितना बड़ा है?
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में सऊदी अरब में कम से कम 356 लोगों को फांसी दी गई। यह संगठन के रिकॉर्ड में एक साल में मौत की सजा का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल के सबसे ताजा अपडेट के मुताबिक, 5 अक्टूबर 2026 तक सऊदी अरब में इस साल कम से कम 175 लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी थी। इनमें 94 विदेशी नागरिक थे, जो 20 से ज्यादा देशों से ताल्लुक रखते थे।

सऊदी अरब में मौत की सजा के आंकड़ों की तुलना करें तो क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के दौर में इसमें बढ़ोतरी दिखाई देती है। 2008 से 2016 के बीच, यानी MBS के क्राउन प्रिंस बनने से पहले के नौ साल में, एमनेस्टी इंटरनेशनल के आंकड़ों के मुताबिक कम से कम 840 लोगों को फांसी दी गई।
वहीं, 2017 से 2025 के बीच सऊदी अरब में कुल 1,640 लोगों को फांसी दिए जाने के आंकड़े सामने आते हैं।

विदेशी कामगारों के लिए क्यों अहम है यह मामला?
सऊदी अरब में मौत की सजा का बढ़ता आंकड़ा भारत जैसे देशों के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में भारतीय काम करने जाते हैं। भारतीय दूतावास के मुताबिक, सऊदी अरब में करीब 27.4 लाख भारतीय रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो नौकरी और बेहतर कमाई की उम्मीद में वहां जाते हैं।
ऐसे में वहां के कानून, आपराधिक मामलों की सुनवाई और भारतीय नागरिकों को समय पर कानूनी मदद मिलना उनके लिए बेहद अहम है।

हाल के मामलों में भारतीय नागरिक अबूती फलील का नाम सामने आया है। सऊदी के पूर्वी प्रांत में उन्हें मेथामफेटामाइन की तस्करी के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद मौत की सजा दी गई। अदालत ने उन्हें दोषी पाया था और संबंधित अधिकारियों की मंजूरी के बाद सजा लागू की गई।
इससे पहले केरल के अब्दुल रहीम का मामला भी चर्चा में रहा था। उन्हें एक सऊदी किशोर की मौत के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन पीड़ित परिवार के माफ करने और करीब 34 करोड़ रुपये की ब्लड मनी जुटाए जाने के बाद मौत की सजा टल गई।
करीब 20 साल जेल में रहने के बाद 2026 में उनकी रिहाई का रास्ता साफ हुआ। ब्लड मनी यानी हत्या के मामले में पीड़ित के परिवार को दिया जाने वाला आर्थिक मुआवजा। कुछ इस्लामिक कानूनी व्यवस्थाओं में परिवार यह मुआवजा लेकर दोषी को माफ कर सकता है, जिससे मौत की सजा टल सकती है।







