
ब्रिटेन ने आखिरकार स्वीकार कर लिया है कि उसके औपनिवेशिक साम्राज्य में गुलामी की वजह से करोड़ों लोगों को भारी कष्ट झेलने पड़े। ब्रिटेन के राजा चार्ल्स तृतीय ने यह कुबूलनामा अपने कैरेबियाई दौरे के दौरान किया। ऐसा पहली बार है, जब राजशाही परिवार ने ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में दासता की वजह से लोगों को हुई अपार पीड़ा को माना है। चार्ल्स का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब ट्रांसअटलांटिक दास व्यापार में ब्रिटेन की भूमिका के लिए माफी मांगने और मुआवजा देने की मांग बढ़ रही है। इसके बावजूद किंग चार्ल्स ने न तो माफी मांगी और न ही किसी तरह के मुआवजे का ऐलान किया।
📹 King Charles Acknowledges 'Great Suffering Of Past' During Caribbean Tour Don't think he knows how proper apologies go. A reminder that independent India has waited ~80 years for an apology from the Crown. "Acknowledging history" not quite the same. https://t.co/uxyDXa7qhC
— RT_India (@RT_India_news) October 29, 2026
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के कुछ सबसे काले अध्याय भारत में भी लिखे गए थे। इनमें से एक 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड था। उस समय ब्रिटिश सैनिकों ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं। इस गोलीकांड में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 379 लोग मारे गए थे।
एक सदी बाद भी ब्रिटेन ने नहीं मांगी माफी
इस बर्बर घटना को हुए एक सदी से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन ब्रिटेन ने अब तक औपचारिक रूप से माफी नहीं मांगी है।
भारत में ब्रिटिश शासन का एक और काला अध्याय 1943 का बंगाल का भयानक अकाल था। ब्रिटिश युद्धकाल के शासन के दौरान पड़े इस अकाल में करीब 30 लाख लोगों की मौत हो गई थी। भुखमरी ने पूरे क्षेत्र को तबाह कर दिया था। इसके बावजूद ब्रिटेन ने इस घटना के लिए कभी माफी नहीं मांगी।
ब्रिटेन ने लाखों लोगों को बनाया गुलाम
ब्रिटिश जहाजों ने पूरे अफ्रीका और कैरिबियाई क्षेत्रों से बनाए गए लाखों गुलामों को अटलांटिक पार पहुंचाया। गुलामी यानी दास प्रथा में लोगों को झोंकने वाले मालिकों को बाद में मुआवजा दिया गया, जबकि पीड़ितों को कुछ भी नहीं मिला। बोअर युद्ध के दौरान ब्रिटेन के कांस्ट्रक्शन कैंपों में भी बड़े पैमाने पर लोग भुखमरी और बीमारियों के शिकार हुए। दसियों हजार बोअर और अफ्रीकी नागरिक मारे गए, फिर भी यूके ने कभी माफी नहीं मांगी।
‘Maybe They Are Afraid of Opening Pandora’s Box’: Banaras Hindu University Prof. Keshav Mishra on King Charles III Admitting ‘Injustices’ But Failing to Apologise in the Caribbean 'The Commonwealth reflects the continuity of Britain’s colonial mindset and also involves cultural artifacts - many of the precious things being kept in the British Museum,’ he tells RT India.
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यूके माफी क्यों नहीं मांगता?
इस सवाल के जवाब में RT इंडिया से बातचीत में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर केशव मिश्रा ने कहा कि सबसे पहली बात यह है कि उनका यह स्वीकारना औपनिवेशिक मानसिकता की निरंतरता को दर्शाता है। दूसरी बात यह है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य एक वैश्विक साम्राज्य था। उनके लिए सस्ते मजदूरों का प्रवास बहुत जरूरी था। उन्होंने इसकी शुरुआत बागान उद्योगों से की। उन्होंने इससे बहुत बड़ा लाभ कमाया। लेकिन आज तक ब्रिटिश राजा की ओर से कोई माफी नहीं आई है।
मिश्रा ने कहा कि प्रिंस राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक में हिस्सा लेने गए हैं। उनके मुताबिक, कॉमनवेल्थ भी पूर्व औपनिवेशिक साम्राज्य का ही एक रूप है।
उन्होंने यह भी कहा कि सांस्कृतिक अवशेष और कलाकृतियां ब्रिटिश म्यूजियम में रखी गई हैं। शायद ब्रिटेन विवादों की इस पोटली को खोलने से डरता है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड पर यूके चुप क्यों?
प्रोफेसर मिश्रा के मुताबिक, ब्रिटेन जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए भी माफी मांगने को तैयार नहीं है। भारत में साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रवादी विमर्श के दौर से लेकर कांग्रेस के शासनकाल और अब अधिक मुखर राष्ट्रवाद के दौर तक, ब्रिटेन की सरकारों को इस हत्याकांड के लिए माफी मांगने पर राजी नहीं किया जा सका है।
उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि ब्रिटेन अब भी माफी मांगने को तैयार नहीं है।
इसके साथ ही उन्होंने कहा, "आज की वैश्विक व्यवस्था में ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य है, लेकिन भारत और ग्लोबल साउथ को जो श्रेय मिलना चाहिए, वह उसकी उसी पुरानी मानसिकता के कारण नहीं मिल पा रहा है। यह वही राजवंश है, जो आज भी बना हुआ है। उनकी मानसिकता को सामने लाया जाना चाहिए।”
प्रोफेसर मिश्रा ने आगे कहा कि लोगों को उनकी ही मातृभूमि से बेदखल कर दिया गया था। उनके मुताबिक, यह भारत की सांस्कृतिक क्षमता यानी सॉफ्ट पावर ही थी कि अपनी मातृभूमि से दूर होने के बावजूद लोगों ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जारी रखा। उन्होंने अफसोस जताया कि ब्रिटेन ने अब तक अपना नजरिया नहीं बदला है।
ब्रिटेन रेलवे और परिवहन की विरासत का क्रेडिट लेता है
केशव मिश्रा कहते हैं कि आधुनिक इतिहास-लेखन में यह बात स्पष्ट है कि अगर उपनिवेशवाद नहीं भी होता, तब भी भारत आधुनिक परिवहन प्रणालियां शुरू कर चुका होता। इसलिए इन संस्थानों को ब्रिटिश शासन की कोई अनूठी उपलब्धि नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में भी भारत में गणराज्य, लोकतंत्र और ऐसी कई व्यवस्थाएं मौजूद थीं।
रेलवे के संदर्भ में उन्होंने कहा कि इसमें विचारों और तकनीकों का आदान-प्रदान हुआ था। काउंटर-गारंटी की व्यवस्था भी थी। भारत से बड़ी मात्रा में धन बाहर गया, जिससे ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को काफी फायदा पहुंचा।
मिश्रा के मुताबिक, इसलिए उपनिवेशवाद के वास्तविक स्वरूप को समझना जरूरी है। ब्रिटेन ने भारत के पैसे से भारी लाभ कमाया। यहां तक कि उदारवादी नेता दादाभाई नौरोजी ने भी अपनी किताब में ‘धन के निष्कासन’ की बात कही थी। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन माफी मांगने की बात तो दूर, मुआवजे के सवाल पर भी चुप है।
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