
'When France sneezes, the whole of Europe catches a cold.'
19वीं सदी में प्रचलित हुई यह कहावत यूरोप की राजनीति में फ्रांस के प्रभाव को बयां करती थी। लेकिन इस बार फ्रांस छींक नहीं रहा, जल रहा है। स्कूलों की बदहाली के खिलाफ शुरू हुआ विरोध महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ गुस्से में बदल चुका है। सड़कों पर हिंसा और लूटपाट ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब सवाल सिर्फ फ्रांस का नहीं, बल्कि उस असंतोष का भी है जो यूरोप के दूसरे देशों में सड़कों पर दिखाई दे रहा है।
फ्रांस की सड़कों पर उतरे हजारों छात्र बेहतर स्कूलों, पर्याप्त शिक्षकों और पढ़ाई के लिए अच्छी सुविधाओं की मांग कर रहे थे। उनके साथ माता-पिता, शिक्षक और आम लोग भी जुड़ने लगे। लेकिन स्कूलों से शुरू हुआ यह विरोध धीरे-धीरे महंगाई, महंगे ईंधन और सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च घटने के खिलाफ गुस्से से जुड़ गया। 17-18 अक्टूबर को कई शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए। दुकानों में लूटपाट हुई, इमारतों में आग लगाई गई और पुलिस के साथ झड़पें हुईं। सवाल यह है कि छात्रों की मांगों से शुरू हुआ आंदोलन फ्रांस के लिए इतने बड़े संकट में कैसे बदल गया? प्रेशर झेल रहे राष्ट्रपति मैक्रों अब इसमें होर्मुज (या फारस) एंगल भी जोड़ रहे हैं।

स्कूलों से शुरू हुआ था प्रोटेस्ट
हां, फ्रांस में स्कूलों की स्थिति को लेकर छात्रों का विरोध सितंबर के आखिर में शुरू हुआ था। स्कूलों के नए सत्र की शुरुआत के कुछ ही समय बाद छात्र सड़कों पर उतरने लगे। उनकी प्रमुख शिकायतें थीं- शिक्षकों की कमी, लंबे समय तक क्लासेस न चलना, जर्जर स्कूल की बिल्डिंग्स और यूनिवर्सिटीज में दाखिले की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी। शिक्षकों के खाली पद लंबे समय तक नहीं भरे जाने के कारण कुछ छात्रों की पढ़ाई महीनों तक प्रभावित हो रही थी। स्कूलों की इन समस्याओं के खिलाफ प्रदर्शन कई हफ्ते तक चलते रहे। छात्रों के साथ माता-पिता, शिक्षक और दूसरे लोग भी जुड़ने लगे। प्रदर्शनकारियों की मांग केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रही। वे सरकार से सार्वजनिक सेवाओं के लिए अधिक खर्च करने और आम लोगों की समस्याओं पर ध्यान देने की मांग भी करने लगे।
📹 France’s 140-Year-Old Limoges Landmark Ravaged By Fire, Masked Protesters Suspected
— RT_India (@RT_India_news) October 18, 2026
छात्रों के साथ क्यों जुड़े आम लोग?
प्रदर्शन के बड़े आंदोलन में बदलने की एक प्रमुख वजह महंगाई थी। बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों के बजट पर दबाव डाला। ईंधन की कीमतों को लेकर नाराजगी ने भी इस गुस्से को बढ़ाया। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, छात्रों के प्रदर्शन में ऐसे लोग भी शामिल हुए जो जीवनयापन की बढ़ती लागत (Cost-of-living) और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ रहे दबाव से परेशान थे। फ्रांस के बड़े श्रमिक संगठनों में शामिल जनरल कन्फेडरेशन ऑफ लेबर (CGT) ने भी प्रदर्शन का समर्थन किया। संगठन ने कीमतें कम करने, पेंशन बढ़ाने और वेतन में इजाफा करने की मांग की। इस तरह आंदोलन में दो तरह की नाराजगी एक साथ दिखाई देने लगी। छात्रों और उनके परिवारों की शिकायतें शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी थीं, जबकि दूसरे प्रदर्शनकारी महंगाई, वेतन और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर असंतुष्ट थे।

शांतिपूर्ण मार्च के बाद कहां से शुरू हुई हिंसा?
17 अक्टूबर को फ्रांस के कई शहरों में बड़े प्रदर्शन हुए। इनमें बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्ण तरीके से मार्च कर रहे थे। लेकिन इन प्रदर्शनों के बीच कुछ समूहों ने हिंसा, आगजनी और लूटपाट शुरू कर दी। पेरिस के अलावा मार्सेय, लियोन, बोर्डो, नीस और लिमोज जैसे शहरों में भी हिंसा की घटनाएं हुईं। प्रदर्शनकारियों के कुछ गुटों ने पुलिस से झड़प की, सड़कों पर बैरिकेड लगाए और सार्वजनिक इमारतों को निशाना बनाया। दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं भी सामने आईं।
मध्य फ्रांस के लिमोज शहर में टाउन हॉल में आग लग गई। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक, इमारत का बड़ा हिस्सा आग से बुरी तरह प्रभावित हुआ। पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोआर ने भी शहर की कई सड़कों पर भारी नुकसान की बात कही।
यह भी पढ़ें- फ्रांस में आग, यूरोप में चिंगारी, पश्चिमी देशों की पॉलिसी कैसे खुद पर पड़ने लगी भारी?
कितने लोग सड़कों पर और क्या एक्शन हुआ?
प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस के अधिकारियों ने देशभर में प्रदर्शनकारियों की संख्या करीब 5.5 लाख बताई, जबकि आयोजकों का दावा था कि लगभग 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस पुलिस के मुताबिक, राजधानी में करीब 1.1 लाख लोग शामिल हुए।
गिरफ्तारियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी। फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के हवाले के मुताबिक 18 अक्टूबर तक 2,300 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया था। गृह मंत्री के मुताबिक, हिंसा के दौरान 1000 से ज्यादा पुलिसकर्मी, जेंडरमेरी के जवान और फायर डिपार्टमेंट के कर्मचारी घायल हुए थे।
सरकार क्या कह रही है?
फ्रांस की सरकार ने हिंसा और लूटपाट में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही। गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने हिंसक घटनाओं के लिए वामपंथी उग्र समूहों और लूटपाट करने वालों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक इमारतों पर हमले और दुकानों में लूटपाट को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार ने कहा था कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए 3,000 और शिक्षक तैनात किए जाएंगे। साथ ही, स्कूलों से जुड़े फैसलों में छात्रों को शामिल करने और अगले साल के बजट में यूनिवर्सिटीज के कुछ रजिस्ट्रेशन फीस बढ़ाने की योजना वापस लेने की भी जानकारी दी गई। हालांकि, इन घोषणाओं के बावजूद शिक्षा और महंगाई को लेकर लोगों की नाराजगी बनी हुई है। हिंसा के बाद सरकार के सामने दोहरी चुनौती है- सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करना और उन शिकायतों का समाधान करना जिनके कारण लोग सड़कों पर उतरे।
बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में भी प्रोटेस्ट
बढ़ती महंगाई के खिलाफ शनिवार को फ्रांस के अलावा यूरोप के कई देशों में सड़कों पर लाखों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। फ्रांस के अलावा बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में प्रदर्शन हुए। इससे यूरोपीय संघ (EU) की सरकारों पर दबाव बढ़ गया है।

प्रेसिडेंट मैक्रों ने जोड़ा फारस एंगल
फ्रांस में हिंसा और लूटपाट के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने 18 अक्टूबर को देश को संबोधित किया। उन्होंने हिंसक घटनाओं की निंदा की, लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को जायज बताया। मैक्रों ने कहा कि हिंसा को लेकर फ्रांस के लोगों में गुस्सा और शर्मिंदगी है। उन्होंने यह भी कहा कि दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
Ceux qui ont cherché à faire tomber la République auront à en répondre. https://t.co/qtqKUIXPpu
— Emmanuel Macron (@EmmanuelMacron) October 18, 2026
रॉयटर्स के मुताबिक, मैक्रों ने सरकार से छात्रों, शिक्षकों, सांसदों, ट्रेड यूनियनों और कारोबारी प्रतिनिधियों को एक साथ लाने को कहा, ताकि संकट के समाधान के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार किए जा सकें। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर स्थानीय अधिकारियों को कुछ प्रदर्शनों पर रोक लगाने का अधिकार देने की बात भी कही।
महंगे ईंधन पर काबू पाने के लिए खाड़ी देशों का दौरा
प्रदर्शनों के पीछे महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतें भी अहम मुद्दे हैं। मैक्रों ने अपने संबोधन में कहा कि फ्रांस का इन कीमतों पर पड़ने वाले दबाव को लेकर चिंतित लोगों की बात समझना जरूरी है। उन्होंने इसका संबंध फारस की खाड़ी में जारी संघर्ष से जोड़ा। मैक्रों के मुताबिक, फ्रांस इस संघर्ष में शामिल नहीं है, लेकिन इसके आर्थिक नतीजों का सामना उसे भी करना पड़ रहा है।
मैक्रों ने कहा कि फ्रांस में ईंधन और गैस की आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने ईंधन और गैस की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए खाड़ी देशों का दौरा करने की घोषणा भी की। उनका कहना था कि सरकार ईंधन वितरकों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगी कि आपूर्ति बढ़ाने के प्रयासों का असर उपभोक्ताओं को मिलने वाली कीमतों पर भी दिखाई दे।

बता दें कि मैक्रों की 19 से 21 अक्टूबर के बीच कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और कतर की यात्रा निर्धारित है। फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा था कि बातचीत का उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों और उन्हें पहुंचाने के रास्तों को सुरक्षित करना और उनमें विविधता लाना है। इससे फ्रांस में ऊर्जा संकट का आम लोगों की जिंदगी पर पड़ने वाला असर कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती
मैक्रों के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ उन्हें हिंसा और लूटपाट रोककर कानून-व्यवस्था बनाए रखनी है, तो दूसरी तरफ शिक्षा व्यवस्था, महंगाई और ईंधन की कीमतों को लेकर लोगों की शिकायतों का समाधान करना है। ऊपर से कुर्सी छोड़ने का प्रेशर अलग से है। सरकार पहले ही शिक्षकों की कमी दूर करने और शिक्षा से जुड़े फैसलों में छात्रों की भागीदारी बढ़ाने जैसे कदमों की घोषणा कर चुकी है। मैक्रों ने छात्रों और दूसरे संबंधित पक्षों के साथ बातचीत शुरू करने का भी संकेत दिया है।
लेकिन इन कदमों का कितना असर होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार अपनी घोषणाओं को कितनी जल्दी ठोस नतीजों में बदल पाती है। फ्रांस में जारी घटनाक्रम दिखाता है कि सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतें जब महंगाई और आर्थिक दबाव से जुड़ जाती हैं, तो उनका दायरा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहता।





