फ्रांस में छात्रों के विद्रोह की असली वजह वो नहीं है, जो बताई जा रही
फ्रांस की सड़कों पर छात्र, लेकिन मुद्दा सिर्फ स्कूलों का नहीं है… पढ़िए और समझिए कि ये विरोध फ्रांस के किन बड़े संकटों की तस्वीर दिखा रहा है।
फ्रांस में छात्रों के विद्रोह की असली वजह वो नहीं है, जो बताई जा रही
फ्रांस में छात्र सड़कों पर उतरे, 1 अक्टूबर को भी कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए।AP

फ्रांस की सड़कों पर जलती गाड़ियां, स्कूलों के बाहर प्रदर्शन करते छात्र और सुरक्षाबलों से भिड़ते प्रदर्शनकारी... तस्वीरें देखकर पहली नजर में यह छात्रों का एक और विरोध प्रदर्शन लग सकता है। लेकिन फ्रांस में पिछले करीब एक हफ्ते से जो कुछ हो रहा है, उसकी कहानी सिर्फ टीचरों की कमी, लंबे स्कूल टाइम या बदहाल स्कूलों तक सीमित नहीं है। इसकी पूरी पिक्चर कुछ अलग है, जिसके अलग-अलग किरदार हैं।

पूरे देश में छात्र स्कूलों की खराब हालत, कम स्टाफ, ओवरक्राउडेड क्लासरूम, लंबे स्कूल घंटे और पढ़ाई के बढ़ते दबाव के खिलाफ सड़कों पर हैं। 1 अक्टूबर को फ्रांस के करीब 30 फीसदी स्कूल किसी न किसी रूप में आंदोलन से प्रभावित हुए और 222 जगहों पर स्कूल ब्लॉक किए गए। कई जगह प्रदर्शन हिंसक भी हुआ और पुलिस के साथ झड़पें हुईं।

लेकिन सवाल है- इतना गुस्सा अभी क्यों फूटा? और क्या इसकी वजह सिर्फ शिक्षा व्यवस्था है?

फ्रांस में छात्र सड़कों पर उतरे हैं, देश के कई हिस्सों में उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं।AP

दरअसल, इन प्रदर्शनों को समझने के लिए फ्रांस की बड़ी आर्थिक और राजनीतिक तस्वीर को भी देखना होगा।

मामला स्कूल से देश की अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है

हां, कमाई के मुकाबले फ्रांस सरकार का खर्च काफी ज्यादा है। यानी सरकार जितना पैसा कमा रही है, उससे ज्यादा खर्च कर रही है और इस वजह से बजट घाटा बढ़ रहा है। साथ ही सरकार पर पहले से भारी कर्ज भी है।

2026 में फ्रांस का सार्वजनिक घाटा GDP का करीब 5.4% रहने का अनुमान है। सरकार 2027 में इसे 5% तक लाना चाहती है। इसके लिए सरकार अगले साल करीब 54 अरब यूरो का fiscal adjustment करने की योजना बना रही है। मतलब सरकार अपने खर्च और कमाई के बीच का अंतर कम करने के लिए बजट में बदलाव (कहीं-कहीं कम करने) की योजना बना रही है। 

इसमें 43 अरब यूरो के नए उपाय और पहले से लागू 11 अरब यूरो के उपाय शामिल हैं।

आम भाषा में समझें तो- सरकार के सामने कमाई और खर्च का बड़ा अंतर है। ऊपर से पुराने कर्ज पर ब्याज भी लगातार बढ़ रहा है।

फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू। (फाइल फोटो)AP

2027 में फ्रांस को सरकारी कर्ज पर ब्याज चुकाने में करीब €91.2 अरब खर्च होने का अनुमान है, जो 2026 के €79.2 अरब से काफी ज्यादा है। यानी सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज ही सरकार के बजट पर बड़ा दबाव डाल रहा है।

सरकार के सामने दो मुश्किलें हैं- लोग ज्यादा और बेहतर सरकारी सुविधाएं चाहते हैं, लेकिन सरकार के पास खर्च बढ़ाने की गुंजाइश कम होती जा रही है।

यानी एक तरफ स्कूल, स्वास्थ्य और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने की मांग है, तो दूसरी तरफ सरकार को घाटा कम करने के लिए खर्च नियंत्रित करना पड़ रहा है। यही वह बड़ा संदर्भ है, जिसमें छात्रों का गुस्सा समझना जरूरी है।

छात्रों की शिकायत क्या है?

छात्रों की शिकायतें सीधे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी हैं। टीचरों की कमी, ज्यादा छात्रों वाली कक्षाएं, स्कूलों की खराब इमारतें, लंबे स्कूल घंटे और शिक्षा व्यवस्था का बढ़ता दबाव उनकी प्रमुख चिंताएं हैं। कुछ छात्र यूनिवर्सिटी में दाखिले की प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद अपने भविष्य को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं।

यानी टीचर की कमी इस संकट का एक चेहरा है, पूरा संकट नहीं।

और यही फर्क इस पूरे आंदोलन को समझने में अहम है।

दिलचस्प बात यह है कि 2027 के प्रस्ताव में शिक्षा मंत्रालय का बजट वास्तव में बढ़ाया गया है। सरकार ने शिक्षा के लिए करीब €65.5 अरब का प्रावधान किया है और स्कूलों में छात्रों की संख्या कम करने तथा शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण जैसे उपायों की बात कही है।

फिर भी छात्रों का गुस्सा क्यों कम नहीं हो रहा?

क्योंकि उनकी नाराजगी सिर्फ अगले बजट की एक लाइन से नहीं, बल्कि पूरी सार्वजनिक सेवा व्यवस्था, शिक्षा की गुणवत्ता और अपने भविष्य को लेकर चिंता से जुड़ रही है।

असली दबाव: सरकार के पास विकल्प कितने हैं?

यहीं से कहानी शिक्षा से निकलकर फ्रांस की अर्थव्यवस्था और राजनीति तक पहुंचती है। सरकार पेंशन, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण, सरकारी कर्मचारियों और स्थानीय सरकारों समेत कई क्षेत्रों में खर्च नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।

2027 के प्रस्ताव में कुछ पेंशन बढ़ोतरी सीमित करने से करीब €4.1 अरब बचाने का लक्ष्य है। स्वास्थ्य और दवाओं के खर्च में बदलाव से करीब €4 अरब की बचत का अनुमान है। सरकारी कर्मचारियों के वेतन को फ्रीज करने और sick-pay जैसे खर्चों में बदलाव से भी बचत की योजना है। वहीं कुछ टैक्स बढ़ाकर अतिरिक्त राजस्व जुटाने की कोशिश की जा रही है।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शिक्षा में कितना पैसा जा रहा है, बल्कि यह भी है कि सरकार अपनी सीमित वित्तीय क्षमता में किस क्षेत्र को कितनी प्राथमिकता दे रही है।

विरोध के बीच दबाव में फ्रांसीसी सरकार। (फाइल फोटो)

और इसके साथ जुड़ा है राजनीतिक संकट

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे वक्त सामने आया है जब फ्रांस 2027 के राष्ट्रपति चुनाव की ओर बढ़ रहा है।

2017 में सत्ता संभालने के बाद से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के कार्यकाल में कई बार सरकार बदली है। 2024 में मैक्रों के अचानक चुनाव कराने के बाद संसद में किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इसके बाद बजट और खर्च घटाने की कोशिशों को लेकर सरकारों को लगातार राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ा।

अब प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू की सरकार के सामने भी यही मुश्किल है- भारी घाटे को कम करना, लेकिन ऐसे फैसलों से पैदा होने वाले राजनीतिक और सामाजिक विरोध को संभालना।

यानी फ्रांस में मौजूदा छात्र आंदोलन एक ऐसे समय में हो रहा है जब देश पहले से ही आर्थिक दबाव, राजनीतिक अस्थिरता और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर असंतोष से जूझ रहा है।

इसलिए आज सड़कों पर दिख रहा छात्र गुस्सा सिर्फ टीचरों की डिमांड वाली कहानी नहीं है।

स्कूलों की स्थिति और संसाधनों को लेकर फ्रांस में छात्र सड़कों पर।AP

असर सिर्फ फ्रांस तक सीमित रहेगा?

फ्रांस यूरोपीय संघ (EU) की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक और यूरोजोन (यूरो मुद्रा इस्तेमाल करने वाले EU देशों का समूह) की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसलिए लंबे समय तक चलने वाला घरेलू आर्थिक और राजनीतिक संकट केवल उसकी अंदरूनी राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा।

फ्रांस के बढ़ते कर्ज और बजट घाटे से निवेशकों की चिंता बढ़ रही है। इसका असर यह है कि फ्रांस को अब कर्ज लेने के लिए ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ रहा है। अक्टूबर की शुरुआत में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 4.9% तक पहुंच गई। 

इसका मतलब यह नहीं कि छात्र आंदोलन सीधे यूरोपीय नीति को बदल देगा। लेकिन अगर फ्रांस लंबे समय तक कर्ज, बजट घाटे और राजनीतिक अस्थिरता से जूझता है, तो यूरोपीय स्तर पर बड़े आर्थिक, रक्षा और दूसरी साझा नीतियों पर उसकी स्थिति और बातचीत का माहौल प्रभावित हो सकता है।

विरोध क्या फ्रांस में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ा सकता है?AP

और विरोध की लहर फ्रांस की सीमाओं के बाहर भी दिखाई देने लगी है। पड़ोसी बेल्जियम में भी छात्रों द्वारा स्कूल ब्लॉक किए जाने की घटनाएं सामने आई हैं।

स्कूलों से शुरू हुआ गुस्सा अब फ्रांस की सार्वजनिक सेवाओं, आर्थिक मजबूरियों और राजनीतिक भविष्य से जुड़े बड़े सवालों को सामने ला रहा है।

यही वजह है कि फ्रांस में चल रहा यह आंदोलन सिर्फ टीचर की कमी की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे देश की तस्वीर है जहां सरकार को एक साथ जनता की बढ़ती जरूरतों, भारी कर्ज, बजट घाटे और राजनीतिक दबाव- चारों मोर्चों पर जवाब देना पड़ रहा है।

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